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Sunday, February 14, 2021

किसान आंदोलन और स्त्री अपनी सांचाबंद शैली को तोड़ कर आगे आती महिला किसान

-अंजलि सिन्हा 




हर जनांदोलन नयी नयी छवियों का निर्माण करता है। शाहीनबाग आंदोलन ने संविधान की रक्षा के लिए खड़ी हुई अल्पसंख्यक समाजों की दादियों को जहां केन्द्र में ला दिया था, तो वर्तमान शासन के लिए चुनौती बने किसान आन्दोलन ने इसी तरह कई सारी छवियां को लोकप्रिय किया है।

इन्हीं में से एक छवि टैक्टर पर बैठी उस स्त्री  किसान की है, जो आत्मविश्वास से भरपूर न केवल ट्रेकटर चला रही है बल्कि अपनी सहेलियों को टैक्टर चलाने का प्रशिक्षण देने वाली भी है। निश्चित ही यह महज फोटो के लिए खींची तस्वीर नहीं है, इस बार सभी ने इस आन्दोलन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को देखा है।

यह साफ देखने में आ रहा है कि किसान आन्दोलन में महिलायें खेती-किसानी के मुददे पर ही बढ़चढ़ कर हिस्सेदारी कर रही है। वे मंच से भाषण भी दे रही हैं, पत्रकारों को वे साक्षात्कार भी दे रही हैं कि हम किसान हैं और किसानी हमारा पेशा है, इससे हमारी गृहस्थी चलती है, तो हम इस समय घर में कैसे रह सकते हैं। वे अपने खुदकुशी किए अपने किसान पतियों की तस्वीरों को लिए भी जुलूसों-सभाओं में शामिल हो रही हैं और बता रही हैं कि उन्हें अब किस तरह खेती का और घर का मोर्चा साथ साथ संभालना पड़ रहा है।

दरअसल किसान परिवारों में तो हमेशा से ही महिलायें खेती किसानी के काम में बराबर की भागीदार रही हैं।

वर्ष 2011 के आंकड़ों को देखें तो कृषि क्षेत्र के कार्यबल का 75 फीसदी हिस्सा महिलायें थीं। ग्रामीण भारत में, लगभग 80 फीसदी स्त्रियां जीवनयापन के लिए खेती पर निर्भर रहती है। खेतीहरों/क्रषकों/किसानों में उनका हिस्सा 33 फीसदी है तो खेतमजदूरों में 47 फीसदी है। (https://www.downtoearth.org.in/news/agriculture/hard-work-but-low-wages-for-women-farmers-61656)

बावजूद इसके हम सभी जानते ही हैं कि किसान बोलते ही हमारे मन में क्या छवि उभरती है - वही पगड़ी बांधे, कंधे पर हल लिए पुरूष किसान। अब यह भी ख़बर लगातार आ रही है कि हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान के कई गांवों में इन तीन ‘काले क्रषि कानूनों’ के खिलाफ महापंचायतें हो रही है, जिसमें इलाकों के खाप पंचायतों की भूमिका स्पष्ट है। ध्यान रहे कि इन महापंचायतों में महिलाओं की संख्या को भी रेखांकित किया जा रहा है।

इन खाप पंचायतों का किसान आंदोलन के समर्थन में एकजुट होना तथा सरकार को चुनौती देना बहुत अच्छी पहल है। हमें यह मान कर चलना चाहिए कि सोच समझ व्यवहार आदि सबकुछ बदल सकता है और इसीलिए उम्मीद करें कि किसान आंदोलन तथा इन महापंचायतों में महिलाओं की भागीदारी और बढ़ती सक्रियता खाप पंचायतों के अन्दर भी स्त्रियों के प्रति नज़रिये के बदलाव को प्रोत्साहित करेगी।

ज्ञात है कि खाप पंचायतें आम तौर पर स्त्राद्रोही मानसिकता से ग्रस्त रही हैं। महिलाओं की गतिशीलता पर प्रतिबंध तथा खासतौर पर प्रेमविवाह को लेकर इनकी भूमिका बहुत ही समस्याग्रस्त रही है। ऐसे उदाहरण सामने आते रहते हैं कि ऐसे मसलों में परिवारों का हुक्का पानी बन्द करना, गांव निकाला के साथ जान से मार डालने तक को भी जाति पंचायतें सही ठहराती रही हैं। हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इन खाप पंचायतों पर काफी कुछ लिखा जा चुका है।

इस आंदोलन में सही पक्ष के साथ खड़ा होने तथा वर्तमान किसान आंदोलन को मजबूती प्रदान करने के साथ ही अगर वे अपनी सोच में भी परिवर्तन लाने को तैयार हों, अपनी भूमिका और अपने अन्दर के आधुनिकता विरोधी, रूढिवादी रवैये को लेकर पुनर्विचार करें तथा इसको लेकर विचारमंथन की प्रक्रिया चलाये तो इस आन्दोलन में भागीदारी का यह ऐतिहासिक परिणाम माना जा सकता है।

वैसे संभव है कि यह उम्मीद महज कल्पना जगत में ही विचरण करती रह जाए।

लेकिन जहां तक किसान की पहचान के साथ आंदोलन में जोरदार उपस्थिति दर्ज करा रही महिलाओं के संदर्भ में हम निश्चित ही अधिक आशावान हो सकते हैं।

यह सभी स्त्रियां जब आंदोलन में अपनी अपनी भूमिका अदा करके और उसके उददेश्यों की पूर्ति के लिए संघर्ष में शामिल होने के बाद घरों को लौटेंगी तो निश्चित ही ज्यादा जोर से बोल पाएंगी कि हम भी किसान हैं। जय जवान और जय किसान वाले पोस्टर देख कर उनके मन में सवाल उठेगा और वह अपनी दावेदारी के लिए अधिक सचेत रहेंगी।

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