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Saturday, February 13, 2021

प्रेम का पालतू हो जाना....

- रूपाली सिन्हा 




"प्रेम व्यक्ति के भीतर एक सक्रिय शक्ति का नाम है। यह वह शक्ति है जो व्यक्ति और दुनिया के बीच 
दीवारों को तोड़ डालती है, उसे दूसरों से जोड़ देती है।"
-एरिक फ्रॉम

प्रेम हमेशा से ही चुनौतीपूर्ण रहा है, इसके तेवर हमेशा से ही बाग़ी रहे हैं। यह हर तरह की सामाजिक
बंदिशों को चुनौती देता रहा है-अमीर- ग़रीब, ऊँच- नीच, छोटा-बड़ा आदि। जब इन चुनौतियों से टकरा कर 
वह सामाजिक नॉर्म्स को तोड़ता है तो उसकी सज़ा भी मुक़र्रर होती है। इतिहास में ऐसे उदाहरण के रूप में 
सोहनी-महिवाल, हीर-रांझा, लैला-मजनूँ दिखाई देते हैं तो आजकल यह ऑनर किलिंग के रूप में दिखता है।
फिल्मों में भी इसका प्रतिबिम्बन दिखता है। आपको 'क़यामत से क़यामत तक', 'एक दूजे के लिए', 'इशकज़ादे' 
याद ही होंगी। मिसाल स्थापित कर यह सबक़ सिखाया जाता है कि नॉर्म्स के ख़िलाफ़ जाओगे तो यही हश्र होगा। 
लेकिन ये सब प्रेम के विद्रोही तेवर थे।

'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे' के बाद यह तेवर बदल गया दिखता है। उसके बाद प्रेम को पालतू बनाने की प्रथा
का सूत्रपात होता है। माँ बाप की मर्ज़ी और अनुमोदन से इश्क़ एक नया फेनॉमिना है और नया विचार है। 
उनके आशीर्वाद और सहमति को सभ्यता- संस्कृति का जामा पहना दिया जाना बहुत अपील करता है। 
याद कीजिए 'विवाह', 'हम आपके हैं कौन', 'मुझसे दोस्ती करोगी' वगैरह फिल्मों को। शादी के तमाम ताम-झाम, 
रस्मो-रिवाज़, अनुष्ठान और उसमें पूरे कुनबे का शामिल होना। धीरे-धीरे यह सब जीवन में भी शामिल हो गया। 
गया वो ज़माना जब लड़का-लड़की सबकुछ छोड़, बंदिशों को ठोकर मार अपने दम पर नई दुनिया बसाने निकल 
पड़ते थे। यह एक बड़ा बदलाव है जिसे देखने की ज़रूरत है।

रोमांस का तो (सामाजिक)सहमति के साथ ही गहरा विरोध है। प्रेम का जो रोमांटिक तत्व है वह हर तरह की
परिधि और बंधन को तोड़ता है। साहित्य में रोमांटिक धारा ने परंपराओं और रूढ़ियों को तोड़ कर व्यक्ति और 
लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। शादी की पूरी व्यवस्था ही सामाजिक
स्वीकार के साथ-साथ एक बँधी लेकिन 'सुखी' ज़िन्दगी की है। इस तरह प्रेम को शादी से अंतिम रूप से जोड़ 
दिया जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि उसकी शुरुआत ही अभिनय और भूमिका निर्वहन से होती है। 
लड़का पहले दिन से संरक्षक की भूमिका में और लड़की गौरवान्वित, आज्ञाकारिणी अर्धांगिनी के रूप में। 
बराबरी के रिश्ते न तो बनते हैं और न ही इसकी कोशिश की जाती है।
 
अब प्रेम में विशेषाधिकार के उदाहरण देखिए। भूमिकाएँ यहाँ पहले से ही तय हैं, उनके बाहर नहीं जाना है ।
मसलन प्रणय निवेदन पुरुषों का विशेषाधिकार है और उसे स्वीकार करना स्त्री का कर्तव्य। और ना करने 
पर एसिड अटैक। प्रेम निवेदन करने की सज़ा  ही तो दी गई थी शूपर्णखा को उसकी नाक काटकर। एक स्त्री के
रूप में उसने अपनी परिधि जो लाँघी थी। फिर उसे अप्रत्यक्ष धमकियाँ और चेतावनियाँ भी दे दी जाती हैं जैसे 
कि - 'तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी।' अभी भी औरतों 
के एक बड़े प्रतिशत को सामाजिक स्वीकृति और सुरक्षा के लिए शादी एक बड़े विकल्प के रूप में दिखाई देती है 
चाहे उसके अंदर कितनी भी ग़ैरबराबरी, हिंसा और उत्पीड़न हो, और उसे बचाने के लिए वे कुछ भी करती हैं। 
अब इन सब झमेलों में प्रेम के लिए अवकाश ही कहाँ है! प्रेम को कहाँ और कैसे ढूँढे वह भला ! हालाँकि इसमें 
उसकी अपनी मानसिक गुलामी और अनुकूलन भी एक बड़ी वजह है।

प्रकृतितः प्रेम मुक्तिदायक है लेकिन व्यवहार में बंधन में डालने वाला है। ख़ासतौर पर हमारे समाज और 
हमारी संस्कृति के संदर्भ में। अगर थोड़ी ढील मिल भी जाए तो ये कि समान जाति में प्रेम स्वीकृत है, अंतरजातीय है
तो भारी समस्या है। वर्गीय कोण भी इसमें भूमिका अदा करता है। प्रेम को एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में भी 
इस्तेमाल किया जाता है। लव जिहाद इसका जीता जागता उदाहरण है।

तो कुल मिला कर प्रेम अभी बहुत से बंधनों में जकड़ा हुआ है, अभी उसकी वास्तविक मुक्ति नहीं हुई है। 
और प्रेम को अलग से मुक्त करा लेना संभव नहीं है। जब समाज सौ-सौ बंधनों में जकड़ा है, प्रेम कहाँ से 
मुक्त होगा! वैलेंटाइन डे का प्रतीकात्मक महत्व तो हो सकता है लेकिन इतने भर से बात बनेगी नहीं। 




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