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Wednesday, January 13, 2021

वर्क फ्रॉम होम ‘घर से काम कीजिए !’


- अंतहीन चुनौतियां या संभावनाओं के खुलते द्वार !

- अंजलि सिन्हा



महामारी ने कई अन्य बातों के अलावा एक पुराने ही शब्द ने हम सभी के जीवन में एक 
गहरी पैठ बना ली है, 

घर से काम कीजिए, वर्क फा्रॅम होम!

जब आप घर बैठे दफ्तर का काम कर सकते हैं तो इससे बढ़िया क्या हो सकता है - न यात्रा 
का झंझट, ना यात्रा खर्च का ना ही कपड़ों की विविधता बनाए रखने की चिन्ता
 आदि-आदि और घर ग्रहस्थी भी साथ-साथ निभा ली जाए।

इन बातों में भी दम है क्योंकि हमारे देश में नौकरीपेशा लोगों को दूसरी सामाजिक
 सुविधायें भी कम ही उपलब्ध रहती हैं जैसे कि सुकून वाली यात्रा की सुविधा
 का ना होना,  परिवहन की लचर व्यवस्था, बच्चों के लिए स्तरीय क्रैश की सुविधा 
का अभाव, दफ्तर के  अंदर की समस्यायें तथा असुरक्षित वातावरण आदि। 
इसलिए घर से ही काम होने लगे  तो उसमें सहूलियतें भी नज़र आने लगती हैं।

लेकिन सिक्के के दूसरी तरफ भी नज़र दौड़ाना ठीक रहेगा। दरअसल कोविड समय के 
लिए तो मजबूरी  भी है और ठीक भी यही है कि आप घर पर रहें और सुरक्षित रहें।
लेकिन सुनने में यही आ रहा है कि अब कई कंपनियां और कुछ अन्य प्रतिष्ठान अपने 
खर्चे बचाने के लिए भविष्य में भी ‘‘वर्क फा्रॅम होम’ का अनुसरण करती रहेंगी।
यदि हमेशा के लिए यह परिपाठी चली काम और शिक्षा की गुणवत्ता पर सोचना होगा।
 इकोनोमिक टाईम्स के एक जॉब सर्वे में कुछ बातें जो सामने आयी हैं उसके मुताबिक 
आने वाले समय में कंपनियां इस बात पर भी सोच रही हैं कि किस तरह घर से ही 
काम करने को लेकर कैसे आगे बढ़ाया जाए।

वैसे घर के काम की मुश्किलों के बारे में भी साथ साथ सोचना होगा।

आफिस में, कार्यस्थल पर काम करने की जिसकी आदत हो वह घर में काम करेगा
 तो कई चीजें़सीखनी पड़ती हैं। घर में कुछ न कुछ घर का काम लगा ही रहता है।
 यह भी सोचें कि अधिकतर लोगों के पास कितना बड़ा घर उपलब्ध होता होगा। 
कई परिवारों में बच्चे बुजुर्ग होंगे उन्हें कितना बांध के रख पाओगे।  घर और आफिस 
के काम में बंटवारा करके अलग अलग टाईम में अलग अलग जिम्मेदारियों का निर्वहन
बेहतर तरीके से संभव हो सकता है। व्यक्ति अपने दिमाग में भी कामों का विभाजन 
करता है।

और चूंकि यह सब संतुलित तरीके से संभव नहीं होता जो तरह तरह के तनावों को 
जन्म देता है। मिसाल के तौर पर एक अग्रणी अख़बार में दिसम्बर माह में दिल्ली की एक  
ख़बर छपी थी। दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके के एक इंजिनीयर - जो घर से आफिस का 
काम करता था - इस कोविड टाईम में उसने घर से आफिस का काम करने दौरान एकाग्रता
 न कर पाने के कारण उसने आप को इतनी क्षति पहुंचायी कि अस्पताल में उसकी मौत हुई। 
मालूम हो कि 32 वर्षीय इंजिनीयर अपने काम के सिलसिले में अंतरराष्टीय कॉल पर था, 
उसी समय घर में इनवर्टर की रिपेयरिंग चल रही थी जिससे उसे बाधा पहुंची और इतना 
गुस्सा हुआ कि खुद को काबू में नहीं कर सका। दरअसल यह कोई एक दिन का गुस्सा 
नहीं रहा होगा।

एक नये सर्वेक्षण के मुताबिक भारत के युवा पीढ़ी के लोग इस मसले पर लगभग समान रूप से बंटे है 
कि क्या उन्हें कोरोना महामारी के चलते घर से काम पसंद आ रहा है या नहीं। छह हजार शहरी 
सहभागियों से बात करने पर मालूम चला कि 55 फीसदी लोग घर में दफतर के काम को नकारात्मक
 रूप में देखते हैं तो 45 फीसदी घर और दफतर के बीच कोई फरक नहीं करना चाहते।

सर्वेक्षण में सहभागी अधिकतर ने कहा कि घर से काम करने का मतलब है दफतर के काम
का अधिक बोझ। दरअसल काम अधिक इसलिए भी हो जाता है कि काम के घंटों और आराम के
 घंटों में फरक करना मुश्किल हो जाता है। इतनाही नहीं चूंकि आप दफतर नहीं जा रहे हैं इसलिए 
वरिष्ठों के भी निर्देश  होते हैं कि - जरूरत पड़ने पर उन्हें - हर वक्त़ उपलब्ध रहना चाहिए। 

अगर महिलाओं की बात करें तो उन्हें वर्क फ्रॉम होम में अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है 
जिसका प्रभाव उनके काम की गुणवत्ता पर भी पड़ता है। घर और आफिस के काम का दबाव और
घालमेल उनके मानसिक सेहत पर भी असर डालता है। हमारे समाज में परिवारों के अन्दर जो रहन
सहन है उसमें औरत स्वयं भी इस बात की अभ्यस्त बन जाती है कि ग्रहस्थी को कैसे चलाना है।

जानीमानी अभिनेत्री और निर्देशक नंदिता दास ने सात मिनट की एक फिल्म बनायी थी, 
इसी कोविड काल में। फिल्म का शीर्षक था ‘लिस्टन अू हर’ // जिसमें घर से काम करनेवाली 
औरत को एक ही समय में कितने प्रकार के मोर्चे पर जूझना पड़ता है इसे सम्बोधित किया है। 

घर से ही दफ्तर के काम को अंजाम देने के मसले की ओर लौटें तो यह महिलाओं के लिये अलग
ही मायनेे रखता है। उसके लिये तो वह गृहकार्य का ही विस्तार हो जायेगा। घर में सब काम करते 
हुए, मेहमानों का भी सत्कार करते हुए काम पूरा करेगी। मसलन घर से काम करने की छूट एक 
तो दोहरे बोझ को वैधता देनेवाली बात है, वहीं दूसरी तरफ वह अपनी पहचान में कर्मचारी बोध से
लैस नहीं हो पाएगी। जो मजबूरी में ही सही लेकिन जितना देर दफ्तर में रहती थी उतना देर घर काम
से मुक्ति रहती थी। दूसरा बाहर की एक्सपोजर का भी है जो ज्ञान का अहम हिस्सा होता है।
जिनके पति या अन्य पुरुष सदस्य घर बैठे काम करने लगे वे अलग से हर समय घर पर दबाव
बनाये रखेंगेेे। यानि जो दिनभर उनकी डयूटी बजाने से मुक्ति रहती थी वह भी छिन जाय। 
वहीं काम के घंटों का लचीला होना किसी भी कर्मचारी वह स्त्रा  हो या पुरूष ज्यादा प्रोडक्टिव हो
सकता है, लेकिन वह इस बात पर निर्भर करता है कि काम की प्रकृति क्या है ।

यदि घर का काम निपटा कर आप दफतर पहुंचे तो दफतर के काम में दिमाग का बटन
आसानी से ऑन हो जाता है बजाय इसके कि घर में सभी सदस्यों, सभी कामों के बीच उसी 
वातावरण में आप अपने दफतर का काम निपटाएंगे।

कोविड महामारी ने यह भी दिखाया है कि श्रम बल में महिलाओं की सहभागिता दर -
जो दुनिया में पहले से ही कम है, और घटी है। कोविड 19 के लॉकडाउन के आठ माह बाद
यह देखने को मिला कि एक साल पहले की तुलना में 13 फीसदी कम महिलाएं नौकरियों में कम 
हुई थीं या नौकरियां तलाश रही थीं, जबकि पुरूषों में यह अनुपात कम था।

महामारी के दिनों में स्त्रियों, किशोरियों या बच्चों पर - अर्थात जो तुलनात्मक रूप से अशक्त हैं -
उन्हें जिन अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है वह स्थिति महज कोरोना के बहाने
सामने नहीं आयी है। क्लेयरे वेनहैम और उनके सहकर्मियों द्वारा किया गया अनुसंधान जो 
‘जेण्डर एण्ड कोविद 19’ नामक लेख में प्रकाशित हुआ था, वह कुछ साल पहले फैली 
इबोला महामारी की चर्चा करता है। उनके मुताबिक इबोला महामारी के दौरान जब
पश्चिमी अफ्रीका में स्कूल बन्द हेने पर लड़कियों पर ज्यादा असर पड़ा। शिक्षा से उनका 
डापआउट रेट  बढ़ गया, किशोरावस्था में गर्भवती तथा यौनिक हिंसा के अन्य मामले बढ़ गए।
शोध में इस बात की भी चर्चा है कि  इबोला /2014/, जीका वायरस / 2015-16/, 
हाल में सार्स, स्वाइन फलू आदि  तमाम महामारियों में जेण्डर बराबरी के मुददे पर
गहरा असर डाला।

लेकिन उन पर बातें फिर कभी !



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