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Tuesday, November 2, 2021

PERFORMING MASCULINITY: AT WHAT PRICE?

 - Nighat Gandhi

Nidhi Mishra and I anchored a group discussion last month based on Anand Patwardhan’s 1994 documentary, Father, Son and Holy War. Masculinity (mardangi) doesn’t seem to have changed a whole lot for the better in the three decades since the film was made.

Discussion participants wanted to know if there’s a way to reimagine and redesign desi masculinity?  Can it change into something less toxic?

Hence, this article. 



Sunday, August 15, 2021

WOMEN AND MENTAL HEALTH: A SOCIO-CULTURAL PERSPECTIVE

- Nighat Gandhi

 

                  image credit U Chicago Medicine

 

WOMEN’S health is inextricably linked to their status in society. It benefits from equality, and suffers from discrimination. Today, the status and well-being of millions of women world-wide remain tragically low.

                                                                                                   WHO World Health Report (1998)

 

Saturday, March 6, 2021

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर : हमारी विरासत, हमारी चुनौतियां - अंजलि सिन्हा

 


Women's demonstration for bread and peace – March 8, 1917, Petrograd, Russia

8 मार्च अन्याय और गैरबराबरी के खिलाफ एकजुट होने, प्रतिरोध करने और सत्ता के सामने चुनौती पेश करने का प्रतीक दिवस बन गया है।  यह जहां से और जब से शुरू हुआ उसमें समय के साथ बहुत सारे मुद्दे जुड़ते गए। हर देश और समाज 8 मार्च के इतिहास को याद करते हुए अपने यहां के मुद्दे और समस्याओं के खिलाफ खड़े होने, अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए संकल्पबद्ध होता है। संघर्ष की इस लंबी परंपरा से हम सभी को और पूरी मानवता को बहुत कुछ नया हासिल होता रहा है और भविष्य में इस संघर्ष यात्रा में हमारे क्या मुद्दे और मांगें होंगी इसकी भी झलकी पेश करता है।

Sunday, February 14, 2021

किसान आंदोलन और स्त्री अपनी सांचाबंद शैली को तोड़ कर आगे आती महिला किसान

-अंजलि सिन्हा 




हर जनांदोलन नयी नयी छवियों का निर्माण करता है। शाहीनबाग आंदोलन ने संविधान की रक्षा के लिए खड़ी हुई अल्पसंख्यक समाजों की दादियों को जहां केन्द्र में ला दिया था, तो वर्तमान शासन के लिए चुनौती बने किसान आन्दोलन ने इसी तरह कई सारी छवियां को लोकप्रिय किया है।

इन्हीं में से एक छवि टैक्टर पर बैठी उस स्त्री  किसान की है, जो आत्मविश्वास से भरपूर न केवल ट्रेकटर चला रही है बल्कि अपनी सहेलियों को टैक्टर चलाने का प्रशिक्षण देने वाली भी है। निश्चित ही यह महज फोटो के लिए खींची तस्वीर नहीं है, इस बार सभी ने इस आन्दोलन में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को देखा है।

Saturday, February 13, 2021

प्रेम का पालतू हो जाना....

- रूपाली सिन्हा 




"प्रेम व्यक्ति के भीतर एक सक्रिय शक्ति का नाम है। यह वह शक्ति है जो व्यक्ति और दुनिया के बीच 
दीवारों को तोड़ डालती है, उसे दूसरों से जोड़ देती है।"
-एरिक फ्रॉम

प्रेम हमेशा से ही चुनौतीपूर्ण रहा है, इसके तेवर हमेशा से ही बाग़ी रहे हैं। यह हर तरह की सामाजिक
बंदिशों को चुनौती देता रहा है-अमीर- ग़रीब, ऊँच- नीच, छोटा-बड़ा आदि। जब इन चुनौतियों से टकरा कर 
वह सामाजिक नॉर्म्स को तोड़ता है तो उसकी सज़ा भी मुक़र्रर होती है। इतिहास में ऐसे उदाहरण के रूप में 
सोहनी-महिवाल, हीर-रांझा, लैला-मजनूँ दिखाई देते हैं तो आजकल यह ऑनर किलिंग के रूप में दिखता है।
फिल्मों में भी इसका प्रतिबिम्बन दिखता है। आपको 'क़यामत से क़यामत तक', 'एक दूजे के लिए', 'इशकज़ादे' 
याद ही होंगी। मिसाल स्थापित कर यह सबक़ सिखाया जाता है कि नॉर्म्स के ख़िलाफ़ जाओगे तो यही हश्र होगा। 
लेकिन ये सब प्रेम के विद्रोही तेवर थे।

Wednesday, January 13, 2021

वर्क फ्रॉम होम ‘घर से काम कीजिए !’


- अंतहीन चुनौतियां या संभावनाओं के खुलते द्वार !

- अंजलि सिन्हा



महामारी ने कई अन्य बातों के अलावा एक पुराने ही शब्द ने हम सभी के जीवन में एक 
गहरी पैठ बना ली है, 

घर से काम कीजिए, वर्क फा्रॅम होम!

जब आप घर बैठे दफ्तर का काम कर सकते हैं तो इससे बढ़िया क्या हो सकता है - न यात्रा 
का झंझट, ना यात्रा खर्च का ना ही कपड़ों की विविधता बनाए रखने की चिन्ता
 आदि-आदि और घर ग्रहस्थी भी साथ-साथ निभा ली जाए।