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Friday, December 25, 2020

रूपरेखा वर्मा का स्त्री सम्मान दिवस पर बलात्कार की अपसंस्कृति पर वक्तव्य


                                            बहुत विनम्र महसूस कर रही हूँ, मुझे शर्म भी आ रही है, मैं आपकी इस लंबी-चौड़ी तारीफ़ को इस अर्थ में ले रही हूँ अगर मैं कभी आराम करना भी चाहूं और अगर शरीर और दिमाग चल रहा है तो मैं आराम न करूं, आपका यह आदेश सिर आँखों पर. आज की जो आपने थीम चुनी है उसके लिए मैं स्त्री अधिकार संगठन ( पूर्व में स्त्री मुक्ति संगठन इस नाम से भी काम किया है) शुक्रिया करना चाहूंगी, जबसे यह बना है तब से मैं इसके काम को जानती हूँ , बहुत अच्छा काम आप लोगों ने किया है आगे भी करेंगे पूरा विश्वास है. आपने मेरा जो सम्मान किया मैं उसका भी और आज जो बुलाया है उसका भी शुक्रिया करती हूँ. आज के लिए जो आपने थीम चुनी है निश्चित रूप से कुछ समय से जो बलात्कार की संख्या बढ़ी है और उसका जो रूप है वह भयावह हुआ है तो यह एक सही बात है कि हम इस विषय पर जब कोई ख़ास मौके हों तो इस पर ज़रूर चर्चा करें.

                                      पहली बात तो मैं बहुत संक्षेप में करूंगी कि रेप पहले भी हुए हैं  हम माइथॉलॉजिकल काल में भी उसकी कहानियां सुनते हैं, कल्पनायें हैं वहां पर. और उसके बाद हमारी ज़िंदगी में भी बहुत सी चीज़ ऐसी हुई है. संक्षेप में मैं (नोट) रेखांकित करना चाहूंगी और आपने भी गौर किया होगा कि हालांकि रेप की दास्तानें, खबरें हमने बहुत बचपन से सुनी हैं, जब हम पैदा भी नहीं हुए थे तब भी होता था लेकिन इधर चार-पाँच सालों से जो एक नई बात बलात्कार के साथ हुई है उनको मैं संक्षेप में कहना चाहूंगी. पहले छिपे-चोरी इस तरह की गंदी वारदातें, भीषण वारदातें होती थीं लेकिन कोई सीना तान कर, चौड़ा करके उसका बखान नहीं करता था और घूमता नहीं था और वहशियत नहीं होती थी. बहुत कम सुना है कि इसके साथ वहशियत हुई हो. अब इधर पिछले कुछ सालों में जितने भी रेप के केस सुनने में आए हैं उसमें से ८०% में हम बहुत ही अकल्पनीय वहशत जुड़ी होने की बात सुनते हैं. शरीर का क्षत-विक्षत कर देना, स्त्री के प्राइवेट पार्ट्स में अजीबो-गरीब तरीके की चीज़ें डालना और उसके अंगों को सिगरेट से जलाना या उनको विक्षत करना, उनको नुकसान पहुंचाना अगर जान से मारने की बात नहीं हुई तो. दूसरी बात यह कि जान से मारने की संख्या ज़्यादा बढ़ गई है. पहले रेप के बाद जान से मारने का प्रतिशत ऐसे हादसों में होता था अब जान से मारने की संख्या और ज़्यादा बढ़ी है. हम लोग शुरु से ही जबकि ये दिल्ली का कांड हुआ था तब हमारे बहुत सारे एक्टिविस्ट भी कह रहे थे ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला-चिल्ला के कि फांसी की सज़ा देनी चाहिए, फांसी की सज़ा कानून में आए, और मुझे ठीक से लेटेस्ट कानून के बदलाव याद नहीं आ रहे हैं अब हममें से कुछ लोग उसकी मुख़ालफ़त, उस मांग का विरोध उस समय भी कर रहे थे कि तब लड़कियों को रेप के बाद छोड़ा भी नहीं जाएगा, जान से मारा जाएगा, जो चीज़ आज साबित हो रही है. तीसरी चीज़ जो बहुत ही दुखती है और चौकाने वाली भी है वो है कि सरकार जो ज़्यादातर जगहों पर इसे बहुत गंभीरता से नहीं लेती है. वो उसे अपने निज़ाम, अपने बंदोबस्त की बहुत बड़ी बेइज़्जती नहीं मानती है उन्होंने समाज की अपनी मानसिकता जो पितृसत्तात्मक मानसिकता है उसमें ये एक कुछ हद तक नॉर्मेलाइज़्ड चीज़ हो चुकी थी पहले ही लेकिन सरकार द्वारा जो पूरा बंदोबस्त है जिसमें पुलिस , ब्यूरोक्रेसी और हमारे चुने हुए प्रतिनिधि सभी शामिल हैं और कुछ थोड़ी-सी हद तक अदालतें भी वो इसे एक नॉर्मेलाइज़्ड घटना के रूप में देखने लगी हैं कि लड़की निकलेगी तो ऐसा होगा ही, वो अगर आधुनिक कपड़े पहनेगी तो ये होगा ही यानि ज़िम्मेदारी लड़की की यह जनता में कुछ ऐसी मानसिकता थी लेकिन जो हमारे संविधान के तहत बनाया गया सपोर्ट सिस्टम थे एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम थे न्याय के सिस्टम थे ----------------लेकिन एक ओर चीज़ जो नई हुई है रेप की घटनाओं के साथ जो इस बात के साथ उसके नॉर्मेलाइजेशन प्र्सेस से भी ज़्यादा मुझे सोचनीय लगती है वो विभाजनकारी ज़्यादा है वो है कि अब रेप का भी सांप्रदायीकरण हुआ है हमें याद है कि कठुआ के रेप कांड में क्या हुआ था, कई लोगों ने यहां यू पी की मशहूर हस्तियों ने और मेरे बड़े अच्छे ताल्लुकात वाले लोगों ने भी ये बात उठाई कि आप लोग चिल्ला रहे हैं इसलिए क्योंकि मुस्लिम लड़की है हिंदु लड़्की के रेप में आप लोग कहां जाते हैं हमने उनसे पूछा कि भई! हिंदु लड़की के रेप में आप कभी खड़ी हुई थी उसमें भी हमीं लोग खड़े हुए थे और हम हिंदु-मुस्लिम नहीं देखते हैं. वर्षों बाद एक मुस्लिम लड़की के रेप के बाद जब हम बोल रहे हैं तो आपको लगता है कि हम सांप्रदायिक हैं. ये सांप्रदायीकरण भी इतना नॉर्मेलाइज़ हुआ है और एक सरकारी ड्यूटी की तरह बन गया है ये और भी ज़्यादा अफ़सोसनाक चीज़ है. बस एक खुशी की बात ये है कि इसके बाद भी अब बहुत नहीं तो इतना तो लड़कियां और उनके घरवाले भी जागरूक हो गए हैं कि इसमें से एक छोटा प्रतिशत अब आवाज़ उठाने लगा है. उसको दबाने की बजाय, लज्जित महसूस करने की बजाय न्याय की गुहार लगाने लगा है ज़िद बर ज़िद अपने हक़ को पाने की लड़ाई लड़ता है हालांकि उस लड़ाई में बीच में कितने लोग टूट जाते हैं ये एक अलग दासतां है तो ये नई चीज़ें इस के साथ जुड़ी हैं वो कहीं बहुत तेज़ी से गिरावट की, पेट्रिआर्की की जकड़ बढ़ने की और उसमें सरकार की साज़िश की कहानी कहती हैं.

                              अब अगर हम इस पर थोड़ा नज़र और डाल दें संस्कृति पर आने से पहले कि इधर जो इतनी ज़्यादा रेप की घटनाएं बढ़ी हैं तो उसका भी कोई कारण हम बता सकते हैं, उसका कुछ अनुमान हम लगा सकते हैं तो मुझे यह लगता है कि जब सबसे ऊपर बैठे हुए लोग जातिवादी और धर्म-आधारित राजनीति करते हैं तो कोई भी चीज़ उस राजनीति से और उस बंटवारे से और उससे पैदा हुई जो संवेदनहीनता है उससे मुक्त नहीं हो सकता है और जब संवेदनहीनता कम होती है तो क्रूरता अपने आप संवेदना की जगह लेती है तो अगर आप शादी के लिए या सीमित सुविधाओं के लिए, सिटिजन के अधिकारों के लिए अगर आप हिंदु-मुस्लिम और ईसाई का मामला उठाओगे तो आप चाहें भी, अगर सरकार चाहें भी हालांकि वह नहीं चाह रही है लेकिन ऐसी सरकार होती जो हिंदु, मुसलमान और ईसाई को तो लड़ाना चाहती लेकिन औरतों के साथ वो कोई गलत नहीं होने देना चाहती तो मैं यह कहना चाहती हूँ कि अगर इतनी भली सरकार होती भी तब भी अगर आप एक बार भी खुली छुट देते हो उस तरह की ताकतों को जो संवेदनहीनता आपके अंदर पैदा करते हैं और उस संवेदनहीनता को आप छाती ठोंक करके सेलीब्रेट करने की इजाज़त अगर आप देते हैं तो फिर आप चाहेंगे भी तो आप उसे कंट्रोल नहीं कर पायेंगे. आप मंदिर-मस्जिद की लड़ाई को बढ़ावा दे रहे हैं और उसमें लोगों को लिंच करके मारने पे आप चुप रहते हो और न सिर्फ चुप रहते हो  बल्कि उनको आप यह एंश्योर करते हो, सुनिश्चित करते हो कि वो जय-जयकारों के बीच में वापिस आ जायें उनकी बेल नामंज़ूर हो और न ही उनको सज़ा मिलें तो फिर आप अगर चाहते भी कि हम औरतों की सुरक्षा करें तो आप नहीं कर पाते क्योंकि फिर हिंसक मानसिकता का सामान्यीकरण तो होता है जो कहीं भी फिर निकलेगी जिसके बीज हमारी पेट्रिआर्की में पड़े हुए हैं वहीं से निकले ये सारे लोग और औरतें भी वहीं से निकली हैं और आदमी भी वहीं से निकले हैं. और दूसरी चीज़ यह है कि अभी जो हमारी राजनीति है और जो एडमिनिस्ट्रेशन है उसमें यह एजेंडा औरतों का मुदा है ही नहीं और अगर परोक्ष रूप से आता है तो वह परंपरा में वापिस खींच कर वापिस ले जाने वाला आता है जहां पर हमें अहिल्या के नैरेटिव्ज़ मिलते है या माधवी के नैरेटिव्ज़ मिलते हैं. यहीं मैं आना चाह रही थी कि अगर आप एक हिंसा की स्वीकृति देते हैं एक तो हमारी सरकार हिंसा पर लगाम लगाना नहीं चाहती और अगर चाह्ती भी लगाम लगाना तो फिर उसके बस का नहीं होता कि दूसरी हिंसाओं के लिये छोड़े हुए भेड़ियों को रोक ले क्योंकि वह भेड़िये अपना स्वतः साम्राज्य स्थापित कर लेते हैं.       

                              अब बात यह है कि रेप की जो घटनायें हैं संस्कृति में आने से पहले मैं एक और बात परिचय के रूप में कहना चाहूंगी जो अकसर मुझे बहुत सालती है कि जिस दिल्ली की घटना का आपने ज़िक्र किया सालों से हम उसका ही उदाहरण सुनते आये, निर्भया रेप केस. उस समय भी जब बहुत ज़्यादा विचलित थे और प्रदर्शन  चल रहा था तब भी एक बात जो मुझे साल रही थी वो ये कि दिल्ली के बगल में ही करीब-करीब पंजाब में एक बच्ची ने अपने को जलाकर आत्महत्या की थी क्योंकि उसका रेप हुआ था रेपिस्ट रोज़ आकर के उसके घर में उसे ह्यूमिलियेट करते थे चैलेंज देते थे और पुलिस थाने में जब वो गई थी उससे पुलिस वालों ने एक-एक करके उससे इस तरह की बातें पूछी कि अच्छा यह बताओ डिटेल में कि पहले तुम्हारे शरीर पर से क्या उतारा उन्होंने, उसने इतना ज़्यादा बेज़्ज्जत महसूस किया कि उसने आग लगा ली तो जब एक केस में हम इतना उपद्रव करते हैं माफ़ कीजियेगा ’उपद्रव’ शब्द के लिए और रेप जब होता है तो बहुत बड़े-बड़े प्रोटेस्ट होते हैं लेकिन जब एक औरत घर से निकाल दी जाती है चार-चार,पांच-पांच बच्चों के साथ और उसे न नहाने की जगह, न ही सुबह नित्य-कर्म करने की जगह, न बच्चों के लिए स्कूल की सुविधा वगैरह, उसके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली जाती है और सिर के ऊपर से आसमान टूट कर के गिर पड़ता है तो हम इतना शांत पाते हैं समाज को कि कोई कैंडल लाइट नहीं, कोई उपद्रव नहीं. चंद सोशल वर्कर  पुलिस और अदालत में जा-जाकर के अपनी-अपनी चप्पलें तोड़ते रहते हैं. यह बात  मैं इसलिए कह रही हूँ कि असल बात में आना चाहती हूँ कि मुझे यह लगता है कि अगर हम स्त्रियों के ऊपर हुए जो कम भयानक दिखने वाले पर वे कम भयानक हैं नहीं मेरे ख़्याल से, कम भयानक महसूस होने वाले अत्याचार हैं घर से निकाल देना, रोज़-रोज़ मारना, रोज़-रोज़ उसको अपमानित करना, उसको छोटा दिखाना कि तुम्हारे मायके वालों ने यह नहीं सिखाया, इतना भी नहीं बताया. तुम कर ही क्या सकती हो, ये अगर हमें इतना नहीं चुभता है कि हम कोई बड़ी आवाज़ उठायें तो फिर रेप के बारे में ही चिंतित होने का कोई मतलब नहीं बनता, ये मैं दो बार रेखांकित करने वाली बात कहना चाहती हूँ क्योंकि ये रेप जो है वो स्त्रियों के कमतरीकरण, उनको जब हम छोटा बनाते हैं, बेज़्ज्जत करते हैं, उनको केवल हम खेल की चीज़ समझते हैं, कंट्रोल की चीज़ समझते हैं कि उसे तो केवल कंट्रोल करना है कुछ उसके अपने फर्ज़ अदायगी वो करेगी लेकिन कागज़ में दिए हुए, संविधान में दिए हुए अधिकारों के बारे में हम कभी बहुत सजग नहीं होते कि औरत के भी अधिकार बिलकुल वही है, उनके टूटने पर समाज ज़्यादा चिंतित नहीं होता है तो रेप तो उसकी ही अंतिम परिणति है. उसको एक तमाचा लगा देना, उसको छोटा कहना, उसके आगे बढ़ने के रास्ते रोकना, उसको घर से निकाल देना ये एक लंबी सीढ़ी है इसमें कुछ कम भयानक और कुछ ज़्यादा भयानक लगता है सुनने में तो फिर कुछ और ज़्यादा और फिर रेप हमें सबसे ज़्यादा भयानक लगता है लेकिन अगर केवल एक तमाचे की ही बात से शुरु करें तो अगर वो चलता है तो उसकी अंतिम परिणाम रेप जैसी चीज़ में होने की संभावना ही है वो बच नहीं सकता तो बात जो मैं रेखाकित करके कहना चाहती हूँ वो ये कि हम सोशल वर्कर्स भी यह बात समझे कि बहुत बड़ी आवाज़ें औरत पर कम महसूस होने वाली हिंसा पर जब तक नहीं उठेगी और हम पूर्ण बराबरी की बात नहीं करेंगे. पेट्रिआर्की बहुत चालाक चीज़ होती है वो बहुत लचकदार भी होती है कि समय के साथ वो बदलती भी है. औरतों को ज़्यादा पढ़ने-लिखने के जो रास्ते खुले हैं फिर उसको काम करने के रास्ते खुले हैं उसके पीछे उदारता नहीं है बल्कि नए बाज़ार की माँग है और इसको भी हमें समझना होगा कि उसका मालिकाना हक़ कौन सी चीज़ पर हो पाता है और कौन-सी चीज़ पर नहीं हो पाता है. अगर हम समझे कि स्त्री को, औरत को मैरिज में रेप होना कोई ऐसी बड़ी बात नहीं है या उसको हर समय कम दिखाते रहना, उसपर ताने कसते रहना कम बुरी बात है ज़िंदगी उतनी कठिन नहीं है इन सबके होने पर तो फिर आगे चलकर हम तैयार रहें कि कभी अगर रेप होता है तो वो कोई बहुत अजूबा चीज़ नहीं होगी चूंकि जब औरत ऐसी ही चीज़ मान ली गई है जिसको नियंत्रित किया जा सकता है जिससे कुछ काम निकाले जा सकते हैं जिससे कुछ पारंपरिक कर्तव्यों का पालन कराया जा सकता है पर वो क्या करना चाहती है वो क्या बनना चाहती है उसके लिए कितना मैदान, कितनी ज़मीन अपनी इच्छाओं को, अपने सपनों को संजोने की और अपने संवैधानिक दावों को पाने की कितनी ज़मीन उसके पास है, कितनी समतल ज़मीन. वैसे पुरुषों की भी अपनी तकलीफें हैं मैं उनको डेमोनाइज़ बिलकुल नहीं करना चाह्ती हूँ लेकिन अगर हम तुलना करें तो जिस तरह से हम तमाम मसलों पर आदमी का हक़ बहुत स्वाभाविक हक़ मानते हैं चौंकते नहीं हैं हम ज़रा भी ज़्यादा उसमें अड़चनें नहीं पाते हैं कि वो अपने दावों का क्लेम कर सकता है चाहे वो जायदाद का मामला हो, चाहे उसके अपमान का मामला हो, अभी एम जे अकबर का केस चल ही रहा है तो उनके अपमान का या किसी अधिकार के हनन का मामला हो लेकिन जब औरत निकलती है इस काम के लिए तो उसे अपने घर से, अपने दफ़्तर से लेकर अदालत तक पहुंचने में जिस तरह की उबड़-खाबड़ ज़मीन मिलती है जिसमें वो गिरते-पड़ते ही पहुंच पाती है. इसको अगर हम बहुत अलार्म होकर नहीं लेंगे, हम कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं बनाएंगे तो फिर जो चीज़ उसके साथ हुई उसकी जो हैसियत समाज में होगी और उसके प्रति जो समाज का नज़रिया होगा वो वही होगा जो रेप की संभावना को कोई बहुत अजूबा संभावना नहीं मानता ये नॉर्मेलाइजेशन प्रोसेस फिर अपने आप काम करेगी ये बात मान लीजिए. 

                                          हमारी संस्कृति में आप सभी जानते हैं ,आप सभी कार्यकर्ता हैं और जानकार हैं इसे व्याख्यायित बिलकुल नही करूंगी कि किस तरीके से मर्द केंद्रित समाज में और उसी के इर्दगिर्द बनाई गई संस्कृति में किस तरह से मर्दानगी को रचा जाता है और किस तरह से ’जनानगी’ शब्द अगर हम चलाएं या स्त्रीत्व को, औरतपन को रचा जाता है उसमें जो ग़ैर-बराबरियां हैं यह आप सब लोग जानते हैं यही हमारी मूल संस्कृति हमारी है कि तमाम मॉर्डन डिस्कोर्स के, तमाम सारे सपोर्ट सिस्टम कुछ बहुत खराब, कुछ काम चलाऊ और बढ़िय बहुत कम है. कामचलाऊ और बहुत ख़राब के बीच में ही हमें चुनना होता है सपोर्ट सिस्टम और इंस्टीट्यूशन्स जो कि समान अधिकारों की रक्षा के लिए हम जा सकते है उसमें राजनीति भी है उसमें पुलिस भी है और न्याय व्यवस्था भी है और एडमिनिस्ट्रेशन भी, इन सभी में आप अभी भी देखेंगे कि ये सब व्यवस्थायें होने के बावज़ूद, वो सारा डिस्कोर्स बराबरी का होने के बावज़ूद जो सोच है वो अभी भी ये है भई औरत थोड़ा बहुत छोड़कर के और थोड़ा सहकर के वो अपना घर बना रहे ये जो मीडियेशन सेंटर हर जगह खुले हुए हैं मैं सख़्त ख़िलाफ़ हूँ इनके , घर टिका रहे, घर के अंदर चाहे वो कितना टूटा घर हो, चाहे वो कितना ही तानाशाही से भरा हो, जहां पर एक ग़ुलाम भी हो और एक साहब भी हो. साहब केवल पुरुष नहीं हैं औरतें भी हैं साहब. मैं पुरुष और स्त्री के बीच बहुत बड़ी खाई नहीं खींचना चाह रही लेकिन आमतौर पर जो स्त्री के साथ होता है वो बात है. ये जो हमारी संस्कृति अभी भी है उस पर डेंट बहुत कोशिशों के बाद भी नहीं लग पाया है, हम सफल नहीं हो पाएं हैं बराबरी की पक्की मानसिकता रचने में और अगर आप देखिए तो इसकी पुरानी जड़ें हैं हमारी जो माइथोलॉजी है मुझे लगता है जबसे इंद्र देवता की कल्पना की गई है इसे तो मैं कल्पना ही मानती हूँ इतिहास नहीं मानती, तमाम लोग जुटे हुए हैं माइथोलॉजी को इतिहास बनाने में. मेरे ख़्याल से आप भी उसे इतिहास नहीं मानते होंगे, लेकिन जबसे इंद्र देवता की कल्पना हुई तभी से स्त्री के साथ यौन उत्पीड़न और मुझे लगता है रेप को एक मान्य सी चीज़, एक मामूली तरीके से हो जाने वाली चीज़ चाहे उसे अच्छा ना ही माना गया हो लेकिन सामान्यतः हो जाने वाली चीज़ के रूप में माना गया और न सिर्फ माना गया बल्कि औरत को उसकी ज़िम्मेदारी दी गई क्योंकि अहिल्या पत्थर क्यों बनाई गई भई, उसने क्या किया था? यह सवाल हम सभी उठाते होंगे मेरे ख़्याल से आप लोग भी उठाते होंगे क्योंकि आप लोग भी बड़े मंजे हुए कार्यकर्त्ता हैं तो आपने भी बहुत बार यह सवाल उठाया होगा कि उनके पति जो ऋषि वेष धरकर आया उसको सज़ा हमारी माइथोलॉजी की कहानी लिखने वाले ने क्यों नहीं दिलवाई और अहिल्या को पत्थर क्यों बनवाया और फिर पत्थर बनकर भी उसका तारण कैसे होता है ज़रा गौर कीजिए इसपर, कोई पुरुष ही आकर के वो भी पैर रखेगा हाथ रखने की भी बात नहीं आई यहां पर, मैं तो इस पर भी गौर करती हूँ कि क्या कहानी में यह नहीं हो सकता था कि वो आकर के माथा अपना झुकायेंगे या आप माथे को नहीं झुकवाना चाहते हैं तो हाथ रखेंगे उस पत्थर पर तो अहिल्या तरेगी पर नहीं जब वे पैर रखेंगे तो अहिल्या तरेंगी, ये बात भी गौर करने की है तो अहिल्या हैं, माधवी हैं तमाम चरित्र हमारे माइथोलॉजी में हैं जिनको कि घोड़ों के लिए एक बार, दो बार नहीं बल्कि सौ-सौ बार भेजा गया. जब इस तरीके की एक बड़ी कल्चरल नदी जिसे महानद संस्कृति का कहते हैं हम तो यह मानते हैं कि हमेशा से एक संस्कृति नहीं, समानांतर कई संस्कृतियां रहीं हैं लेकिन कोई नहरों की तरह हैं पर कोई महानद था  हमारा, संस्कृति की जो चौड़ी धारा थी वो इसी तरह की माइथोलॉजी से बनी हुई है और ज़रा देखें हमारी संस्कृति में आज भी और वो लोग भी जो जेंडर डिस्कोर्स करते हैं वैसे भी बहुत बड़ी संख्या में मैंने देखे कि उन्हें कृष्ण लीला में कोई भी उनको गड़बड़ नहीं मालूम होती है आप निंदा न करें लेकिन कुछ तो कहीं विचलन होना चाहिए, सवाल यह है कि तालाब में नहाती स्त्रियों के कपड़े उठा कर के उनको नग्न देखने, निर्वस्त्र देखने की इच्छा जो पुरुष रखता हो उसे हम पूजनीय मानकर के और उसके साथ इतने हमने कर्मकांड जोड़े हुए हैं क्या कभी यह सवाल उठते हैं कि कौन सी संस्कृति थी और उसी संस्कृति का प्रवाह आज भी हमारे बीच में है कि हम यह भेद नहीं कर पाते हैं कि धर्म जिस तरह से हमसे आस्थाएं हमारे मन में पिरो देता है बीज बो देता है वह बहुत मज़बूत हो जाती है कि हममें से बहुत से प्रगतिशील लोग भी उससे छुटकारा पा नहीं पाते हैं तो आप ये कह दीजिएगा वहां पर कि आत्मा-परमात्मा का था इंसान मामूली हाड़मांस का दिखने वाला और दर्द, खुशी महसूस करने वाला संवेदनशील इंसान जिसकी तकलीफें भी बहुत छोटी हैं जिसकी खुशी भी बहुत छोटी हैं उसके लिए हम इतना निर्मम हो जाएं कि वो प्रेम भी न कर पाए और अगर वो करे तो दंडित हो तो इस विरोधाभासी चिंतन को भी हमें सोचना पड़ेगा. जो लोग जेंडर पर काम नहीं कर रहे हैं उनके लिए तो क्या कहें लेकिन हम कह सकते हैं कि भई ‍अज्ञानी हैं और अज्ञान हम उन तक पहुंचाने की कोशिश करेंगे, संवेदना पहुंचाने की कोशिश करेंगे लेकिन हममें से भी बहुत से लोग कितना इन बातों पर सवाल उठाते हैं अपने को खंगालते हैं मुझे अपने अनुभवों से बहुत शक़ है इस बात पर. और अगर कोई यह समझे कि मैं कोई एक धर्म के प्रति दुराग्रह रखती हूँ और उसी से उदाहरण लेकर क्रिटिसाइज़ कर रही हूँ तो आप देख लीजिए कि इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान के ट्राइबल इलाके हैं हम मुख़्तारा बाई का किस्सा नहीं भूले हैं लेकिन मुख़्तारन बाई के पहले और बाद में दर्ज़नों उसी तरह के वहशियत भरी घटनएं हो चुकी हैं वहां पर जहां कि रेप सर्वाइवर है उसी को धर्म के नाम पर  दोषी माना जाता है उसी को सज़ा मिलती है तो कौन सा धर्म है धर्मों से निकली संस्कृति हम जी रहे हैं यह आपको मानना पड़ेगा कि धर्म से स्वतंत्र संस्कृतियां हममें से कोई नहीं जीता, बहुत कम इक्का-दुक्का जो अपने स्वतंत्र चिंतन के आधार पर, अपने विवेक के आधार पर अपने जीने की संस्कृति चुनते हैं वो मेरे ख़्याल से ०.०५% भी इस देश का नागरिक नहीं है. बहुत कम है. जब हमें संस्कृतियां धर्मों से ही मिलीजुली मिल रही है इन्हीं संस्कृतियों में हम जी रहे हैं तो कोई भी धर्म के लिए चुनौती देती हूँ सारे धर्मों का उदाहरण इस समय देने का समय नहीं है मैंने ख़ुद ही कम समय में खत्म करने का वादा किया था और मैं ज़्यादा वक़्त ले रही हूँ.

                                आप कोई भी धर्म ले लीजिए उसमें निकली हुई जो संस्कृति है जो ज़्यादातर लोग जी रहे हैं उसमें वो चेतना कहां है कि स्त्री बराबर का हक़ रखती है और गरिमा जैसी कोई चीज़ स्त्री के जीवन में भी होती है आत्मनिर्भरता स्त्री के जीवन में भी होती है, होनी चाहिए ये कौन सी संस्कृति हमें यह बात कहती है. नई संस्कृति का जो समतावादी लोगों ने नारा दिया था हम तो उनके घरों में भी देख चुके हैं क्या होता है उनके यहां, शादियां कैसे होती हैं अपने साथियों के क्रिटिसिज़्म का वक़्त नहीं है पर ज़रूर हमें आत्म-चिंतन की भी ज़रूरत है आज. और जो जिस तरह की विवशता देख रहे हैं कि तमाम तरह की योजनाओं के बावज़ूद वो एक मिशन महिला शक्ति या नारी शक्ति मिशन है जिसमें कि दिखावटी काम बहुत होता है एक पिंक पेट्रोलिंग भी स्थापित हो गई है हमारे लखनऊ में, हो सकता है पूरे यूपी में, आप देखिए पिंक और आसमानी का भेद तो चल ही रहा है ना. लड़के और लड़कियों का ब्रिटिश कम्युनिटी से जो निकला था कि हम किस रंग के कपड़े पहनेगा जेंडर के हिसाब से तो अधकचरी मानसिकता से निकली सरकारी योजनाएं हैं ये रेप जैसी समस्या न तो उनके लिए या स्त्री अधिकार जैसी समस्या न तो उनकी प्राथमिकता है उनकी, न सिर्फ उसकी प्राथमिकता नहीं है बल्कि उनकी अपनी जो विचारशीलता है आइडियोलॉजी है उसमें तो वो हमें परंपरा की तरफ ही ले जा रहे हैं हमारे देश में मनु-स्मृति तो करीब करीब पूरी लागू हो चुकी है और उसी का एक हिस्सा है उसी किताब में "यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता" जिसको कि इन लोग कोट करते-करते थकते नहीं, हमारे प्रोग्रेसिव लोग भी कहते थकते नहीं, उसी में दो श्लोक आगे के ज़रा पढ़ लीजिए और बाकि के पन्नों में क्या लिखा है तो इसका क्रिटिक आप बहुत बार कर चुके होंगे वो मुझे बताने की ज़रूरत नहीं. मैं सिर्फ यह कहना चाहती हूँ जब तक हम पूर्ण स्वतंत्रता के, पूर्ण समानता के लिए स्त्री के छोटे अपमान, उसको कमतर बनाने की बात को हम बहुत गंभीरता से नहीं लेंगे तो सिर्फ रेप पर आंदोलन करना रेत पर से सरसों निकालने / उगाने जैसा होगा. हमें उन चीज़ों को भी उतनी ही गंभीरता से लेना होगा.

                                                 आख़िरी चीज़, मैंने टाइम बहुत ले लिया है अपने इरादे के ख़िलाफ़. आख़िरी चीज़ में कहना चाहूंगी मुझे बड़ी चीज़ और लगती है और आज के माहौल में वो ज़्यादा ज़रूरी है यूपी में आ चुकी है और मध्यप्रदेश मे आ रही है. इश्क़, प्रेम की जो बात है. मुझे लगता है कि तमाम सारे जो सांस्कृतिक कारण है, हिंसा के बढ़ावे की जो बात है इन सबके अलावा जो बेसिक और बहुत ही मज़बूत कारण मुझे जो लगता है कि हमारे यहाँ यह संस्कृति में ही शामिल है और आज के माहौल में उसे कुछ राजनैतिक रूप से बढ़ावा मिला है कि देवी-देवता प्रेम करें तब तो ठीक है, पवित्र चीज़ हो जाती है हमारे देश में कोई देवी-देवता ऐसा नहीं है जो प्रेम करता नहीं दिखाया हो और अगर आप कुरान पढ़ें तो शिव और पार्वती के बारे में जो आख्यान है नैरेटिव्ज़ हैं वो जो लोग श्लील और अश्लील का भेद मानते हैं मैं थोड़ा कंफ़्यूज़्ड हूँ उसके बारे में लेकिन जो लोग मानते हैं वो आज जो अश्लील चीज़ें कही जाती हैं उनसे कहीं ज़्यादा अश्लील हैं तो उस देश में जहां पर कि मैथुन तक को यानि फिज़िकल इंटरकोर्स तक को विस्तार से बयां किया गया है, छंदों और दोहों में, वहां पर दिल के अंदर जो प्रेम उपजता है भावना के रूप में जिसका कि शरीर से उतना गहरा रिश्ता नहीं भी होता है क्योंकि शरीर वाली चीज़ को हम लोग बहुत बड़ा मानते हैं मैं नहीं मानती, वो हमेशा मिला हुआ होता है दिल, मन और शरीर का प्रेम मिलाजुला होता है लेकिन और लोग जो समझते हैं तो हम लोग इंसानों के स्तर पर देवी-देवताओं के प्रेम की तरह स्वीकृति नहीं देते बल्कि मैं कहूंगी कि स्वीकृति ही नहीं सपोर्ट और सेलीब्रेट भी करना होता है. मैंने कुछ दूसरे समाजों में ऐसा देखा है कि वे लोग भी बड़े कट्टर थे, प्रेम के विरोधी हुआ करते थे, ख़ुद अपना साथी चुनने के विरोधी हुआ करते थे पर उन्होंने बदला है अपने को. और किसी भी दूसरे लड़के या लड़की में प्रेम को किस तरह से कम्युनिटी आमतौर पर सपोर्ट करती है वह हमारे सीखने की चीज़ है हमारे यहां क्या है कि प्रेम देवी-देवता करें तो पवित्र इंसान करे तो बहुत गंदी बात, ख़राब बात है, बदचलनी है तो फिर ऐसा है तो रेप तो होना निश्चित है अगर प्रेम जैसी चीज़ को हम जगह नहीं देते, हम इश्क़ को, प्रेम को गंदी चीज़ मानेंगे तो फिर बच क्या जाता है शरीर बच जाता है तो शरीर की जैसे आप भूख मिटाते हो खाना खाने की उसके साथ डॉमिनेंस का जो तत्व है जो बार-बार साइकोलॉजिस्ट ने कहा है कि रेप में संतुष्ट करने की बात कम होती है डॉमिनेंस की बात ज़्यादा होती है तो जो भी है हमारा समाज आपाधापी वाला समाज है ऊंचे और नीचे वाला समाज है कौन किसको डॉमिनेट करता है उसी की भैंस होती है जिसकी लाठी उसकी भैंस, यह सिस्टम पहले भी चल रहा था तो ये होना ही है और स्त्री के साथ तो सेक्चुअल हैरास्मेंट तो होना ही है उसे तो किसी के कब्ज़े में तो होना ही है तो मुझे लगता है जब तक प्रेम को स्वीकृति और आदर और सेलीब्रेशन की चीज़ हम नहीं मानेंगे तब तक यह समस्या हमारे साथ रहेगी और यह बात आज और भी ज़्यादा ज़रूरी है जबकि हमारे यहां एक नया ऑर्डिनेंस आया है जिसमें कि एक धर्म के लोग लगातार पकड़े जा रहे हैं पीटे जा रहे हैं उनकी दुर्दशा की जा रही है और घर तोड़े जा रहे हैं. आप रोज़ पढ़ रहे हैं उसके बारे में तो आज ये चार-चार बार रेखांकित करने वाली बात है कि हम प्रेम को सेलीब्रेट करना चाहते हैं और रेप को खत्म करना चाहते हैं. जब प्रेम बढ़ेगा तो मुझे लगता है कि डॉमिनेंस भी कम होगा हालांकि प्रेम विवाहों में भी मैंने देखा है डॉमिनेंस तो ये आदतें थोड़ी सी देर में  जायेंगी तो कहीं कमतरी होती है उससे तो मुझे लगता है कि रेप खत्म नहीं होगा तो बहुत कम ज़रूर होगा अगर एक बार प्रेम की स्थापना हो जाए. तो मैं अपनी बात खत्म करूंगी यह कह के कि हमें बराबरी और प्रेम का साम्राज्य चाहिए तो शायद इस समस्या में बहुत बड़ी चोट लग पाएगी.     


PS- डॉ. रूपरेखा वर्मा के लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति रहीं हैं और नारीवादी आन्दोलन का लम्बे समय से हिस्सा है. ये वक्तव्य दिनांक १७ दिसंबर को स्त्री मुक्ति संगठन द्वारा स्त्री सम्मान दिवस के आयोजन किया मे दिया गया था.

                     

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