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Thursday, November 26, 2020

पितृत्व अवकाश

  - अंजलि सिन्हा



भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली द्वारा आस्ट्रेलिया के साथ क्रिकेट श्रृंखला  के दौरान उठाए एक अलग कदम से एक कम चर्चित मुददा सूर्खियों में आया है। मालूम हो कि उनकी पत्नी - सिनेतारिका अनुष्का शर्मा जो इन दिनों गर्भवती हैं - उनके लिए उन्होंने पितृत्व अवकाश की मांग की तथा इसे इस श्रृंखला के दौरान स्वीकारा भी गया है।

ध्यान रहे मातृत्व अवकाश की तरह जो पिता बननेवाले हैं उन्हें पितृत्व अवकाश मिले इसकी बात काफी समय से चलती रही है, लेकिन हमारे जैसे पितृसत्तात्मक समाज में ज्यादा जोर नहीं पकड़ पाया है जहां पिता अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते हैं। 

आज के दौर में जब बतौर श्रमिक और कर्मचारी का दर्जा पाना ही खतरे में है यानि स्थायी नौकरियां समाप्त की जा रही हैं इस नवउदारवादी दौर में जब कर्मचारी सुविधा की बात करना बेमानी हो जाता है, ऐसे में फिर यह मांग भी और पृष्ठभूमि में चली गयी है।

पितृत्व  अवकाश पर कुछ महिलाओं के ही हवाले से ऐसी टिप्पणियां आ जाती हैं कि पति अगर छुट्टी लेकर घर बैठा तो मदद की बजाय काम बढ़ा देगा। इससे बेहतर है कि वह घर से बाहर ही रहे ताकि औरत अपना काम सुकून से कर सके। ऐसे उदगार हमारे जैसे समाज में आना स्वाभाविक भी है कि जहां पुरूषों के ‘नटखट’ स्वभाव को सम्मान और स्वीकार प्राप्त है, मसलन ‘‘ये रसोई में जाएंगे तो काम बढ़ाएंगे ही’’ आदि।

बावजूद इसके यह समझना जरूरी है कि यह मसला सिर्फ पुरूष के अधिकार का नहीं है बल्कि सरकार द्वारा मातृत्व अवकाश के अलावा बच्चे की जिम्मेदारी निभाने के लिए अगर महिलाओं के लिए छुट्टी के प्रावधान को स्वीकार करती है  तब पुरूषों को कोई छुट्टी नहीं देना एक तरह से क्या जेंडर भेदभाव को बढ़ावा देना नहीं है ?  क्या सरकार इस बात को सही मानती है कि बच्चों की देखभाल के लिए सिर्फ महिलाओं को प्रोत्साहन मिलना चाहिए और पुरूषों को इससे दूर रखना चाहिए ?

सरकार आधिकारिक तौर पर इस बात को स्वीकार करे या न करे लेकिन उसके चिन्तन में इसकी झलक अवश्य मिलती है। चार साल पहले जब मेनका गांधी ने महिला एवं बालविकास मंत्रालय का पदभार संभाल रही थीं तब उन्होंने पितृत्व  अवकाश की मांग का मज़ाक उड़ाया था। उन्होंने यह कहा था कि ‘भारतीय पुरूषों के लिए यह छुट्टी मनाने का समय होगा।’ / इंडियन एक्स्प्रेस, संपादकीय, 19.11.2020/

निश्चित ही पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने में परिवारों की स्थापित मानसिकता के साथ सुर मिलाना सरकार का काम नहीं होना चाहिए।

आज के समय में जब कोविड महामारी ने लोगों को रोजगार तो छीना ही साथ ही यह संभावना जब जतायी जा रही हो कि वर्क फ्रॉम  होम की संस्कृति  बढ़ेगी। ऐसे में जब औपचारिक दफ्तर और कार्य स्थल की धारणा बदलेगी तब गृह कार्य जो अवैतनिक है और उसी घर में सवैतनिक काम भी होगा तब नए ढंग से इस मसले का आकलन बनाना होगा।

पिछले महीने नेशनल सैम्पल सर्वे अर्थात राष्ट्रीय  नमूना सर्वेक्षण रिपोर्ट / एक्स्प्रेस, 19.11.2020/ में बताया गया है कि भारतीय महिलाएं पुरूषों की तुलना में चार घंटे अधिक समय अवैतनिक कामों में लगाती हैं, जबकि कुल श्रमशक्ति यानि वेतनभोगी कामों में उनकी भागीदारी अभी समान नहीं है। श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी 27 फीसदी के आसपास है।

ऐसे में किन्हीं भी उपायों से गृहकार्यो में तथा अवैतनिक कामों में पुरूषों की भागीदारी बनाने के लिए प्रोत्साहन मिलना चाहिए, साथ ही कानूनी दायरे में जेण्डरभेद समाप्त होना चाहिए।

वैसे यह भी देखने में आया है कि पितृत्व  अवकाश को लेकर निजी क्षेत्र में भी धीरे धीरे जागरूकता बढ़ रही है। कुछ साल पहले ख़बर आयी थी कि दिल्ली के एक निजी स्कूल के शिक्षक ने पितृत्व अवकाश की अपनी कानूनी लड़ाई जीत ली है। इस अध्यापक ने अपनी सन्तान प्राप्ति के बाद अपने स्कूल से 15 दिन का पितृत्व अवकाश लिया। छुट्टी से काम पर लौटने के बाद पता चला कि उसका 15 दिन का वेतन काट लिया गया है। स्कूल प्रशासन ने पितृत्च अवकाश देने से मना कर दिया था। इस मामले को जाने-माने वकील तथा सामााजिक कार्यकर्ता अशोक अग्रवाल ने कोर्ट के समक्ष जवाब पेश कर याचिका को जनहित याचिका में बदलने की पेशकश की थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का हवाला दिया है जिसमें किसी याचिका को जनहित याचिका बनाया जा सकता है।

बाद में कोर्ट ने दिल्ली सरकार से भी इस सम्बन्ध में शिक्षकों की स्थिति स्पष्ट करने को कहा। दिल्ली सरकार ने हलफनामा दायर कर स्पष्ट किया कि निजी स्कूलों के शिक्षकों को भी पितृत्व अवकाश मिलेगा। मालूम हो कि सन 1997 में केन्द्र सरकार ने 15 दिन के पितृत्व अवकाश की घोषणा की थी । बाद में दिल्ली सरकार ने भी इसे स्वीकार करते हुए मान्यताप्राप्त गैरसरकारी स्कूलों के अध्यापकों को भी इसका लाभ देने की बात कही थी।

पिछले ही साल फुड एग्रीगेटर कम्पनी जोमॅटो ने पितृत्व  अवकाश प्रदान करने के मामले  में एक नयी पहल की थी।  उसने नए पिताओं के लिए 26 दिन पेड लीव/भुगतानप्राप्त छुटटी देने का निर्णय लिया। दिलचस्प था कि कंपनी के मुताबिक यह पितृत्व  अवकाश सरोगसी, गोद लेने यहां तक कि समलैंगिक शादियों के मामले में भी कायम रहेगा। ीhttps://economictimes.indiatimes.com/small-biz/startups/newsbuzz/zomato-rolls-out-26-weeks-paternity-leave/articleshow/69634749.cms

याद कर सकते हैं कि पुराने जमाने में जब महिलाओं को जंचगी होने वाली होती तो उन्हें मायके भेज दिया जाता था, ऐसी प्रथा थी कि पिता की कोई भूमिका नहीं रहती थी। न अस्पताल जैसा संस्थागत नेटवर्क रहता था और उपर चेतना की कमी, तथा कम उम्र की शादी इसके चलते कई बार प्रसूति के दौरान हीं महिलाओं की मौत हो जाती थी। उस जमाने की फिल्मों में भी इसकी झलक मिलती थी। पिछले दिनों बंगाल के महान कलाकार सौमित्र चटर्जी का निधन हुआ। उनकी सबसे पहली फिल्म ‘अपूर संसार’ में उनकी पत्नी बनी है शर्मिंला टैगोर - जो डिलीवरी के लिए अपने माता पिता के यहां जाती है और वहीं उसका देहांत होता है। बच्चा बच जाता है। अपने ही बच्चे से मिलने के लिए फिल्म में नायक सौमित्र दस साल बाद पहली दफा आते हैं।

देर सबेर यह भी विचार करना ही चाहिए कि परिवारों में देखभाल का काम/केयर वर्क, बच्चों के अलावा बुजुर्गों या बीमार लोगों के लिए भी करना होता है तो क्या किसी ऐसी छुट्टी के बारे में विचार होना चाहिए जो इन ज़रूरतों को भी पूरा करे।

वैसे तो इसे  विडम्बना ही कहा जा सकता है कि अब राज्य से मांग करने का विचार नहीं हो रहा है और हम सोचते हैं कि सारी जिम्मेदारियां परिवार के अन्दर निभा ली जायें। सरकार तो पहले से ही यही चाहती और सोचती है तभी तो 2007 में जब वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल के लिए कानून बना तो परिवार खास तौर पर बेटों की ज़िम्मेदारी मानी गयी। माता पिता की कथित तौर पर अनदेखी करने पर जुर्माना तथा सज़ा का प्रावधान भी रखा गया और सरकार ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा। दुनिया के विकसित देशों में वरिष्ठ नागरिकों की जिम्मेदारी के लिए सरकारों द्वारा व्यवस्था बनायी गयी है, लेकिन हमारे यहां बातें सन्तानों पर केन्द्रित रहती हैं। जिन लोगों की सन्तानें नहीं हैं वे ‘‘बेसहारा’’ की श्रेणी में शुमार किए जाते हैं। इस बात पर सोचा नहीं जाता कि सहारा हर बुजुर्ग को चाहिए जो उन्हें नागरिक के रूप में हासिल होना चाहिए।

बहरहाल अगर हम पितृत्व  अवकाश की तरफ वापस लौटें तो यही बात कह सकते हैं कि सरकार की तरफ से नीतिगत स्तर पर जेंडर समानता की दिशा में कदम उठाते हुए इसे सार्वजनिक और निजी सभी जगह लागू करना चाहिए। फिर समाज की यह जिम्मेदारी बनेगी कि पिता इसे छुट्टी नहीं बल्कि जिम्मेदार पिता बनने के लिए इसका इस्तेमाल करेंगे।

जरूरत इस बात की है कि प्राकृतिक अन्तर को छोड़ कर सभी जेण्डर आधारित कामों का बंटवारा खत्म हो। और इस हकीक़त को समझ लिया जाए कि श्रम के भिन्न अवसर हमारे समाज में स्त्री पुरूष के बीच भेद का प्रमुख कारण है।

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