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Thursday, November 5, 2020

पुस्तक परिचय: भक्ति और जन: सत्ताविमर्श और प्राचीन भारत के जनसमुदायों का संस्कृतीकरण लेखक - डॉ सेवा सिंह : पुस्तक परिचय - अंजलि सिन्हा


भक्ति आन्दोलन के प्रति समग्र आलोचनात्मक रवैया रखने वाली किताबों- रचनाओं की काफी कमी दिखती है।

प्रो सेवा सिंह की किताब ‘भक्ति और जन - सत्ताविमर्श और प्राचीन भारत के जनसमुदायों का संस्कृतीकरण ’ / प्रकाशन वर्ष 2005/ ने इस मामले में एक नयी राह दिखाती है।  ध्यान रहे कि उपरोक्त किताब के बाद आयी उनकी दो अन्य पुस्तकों ‘ब्राहमणवाद और जनविमर्श’ / प्रकाशन वर्ष 2012/ और ‘भक्ति और भक्ति आन्दोलन’ / प्रकाशन: 2017/ के माध्यम से भी उन्होंने इस विषय पर अपने विमर्श को आगे बढ़ाया है।

‘भक्ति और जन’ के माध्यम से हिन्दी भाषी जगत में चर्चा में आए प्रोफेसर सेवा सिंह / जन्म 1941/  - गुरू नानक देव युनिवर्सिटी, अमृतसर में हिंदी विभाग में प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष पद से रिटायर -  हो चुके हैं और सेवा निवृत्ति के बाद भी रिसर्च/अनुसंधान तथा लेखन के कार्य से जुड़े रहे हैं। 

पीड़ित जातियों और तबके के लोगों को भक्ति के दर्शन और विचार ने कैसे अपने लपेटे में लिया और सभी को भक्ति में लगने के लिए प्रेरित कर दिया इसकी अच्छी समझ यह पुस्तक बनाती है। स्त्री और शूद्र जाति - जो प्राकआधुनिक काल में ‘लांछित लोग’ समझे जाते थे, वे अपना परलोक सुधारने के लिए अगले जनम में उंची जाति में पैदा होने के लिए तथा पापों से मुक्ति के लिए कैसे आगे बढ़े इसका उपाय भक्ति मार्ग में बता दिया गया था। हम देखते हैं कि कैसे इसके तहत सेवा, पूजापाठ, तंत्र मंत्र, कर्मकाण्ड का बोलबाला बढ़ा कर वर्ण व्यवस्था को मजबूत बनाया गया तथा प्रतिरोध की सम्भावना को हमेशा के लिए शान्त करने में वर्चस्वशील तबके को सफलता मिली। स्त्रियां सेविका की भूमिका में आयी तथा पूरी शूद्र जाति अपनी स्थिति के लिए अपने कर्म को जिम्मेदार मान कर अगला जन्म सुधारने के लिए सेवा के कर्म में लीन हो गयी क्योंकि भक्ति के मार्ग में उसे मुक्ति का मार्ग दिख रहा था।

‘भक्ति और जन’ के संदर्भ में लिखे ‘ दो शब्द’ में प्रो एस पी सिंह, गुरू नानकदेव विश्वविद्यालय के कुलपति बताते हैं कि जहां ‘भक्ति ने चरम कोटि की बहुविध विडंबनाओं का अस्तित्व बरकरार रखते हुए भारतीय समाज को जोड़े रखा है’ प्रो सेवा सिंह इस बात को स्पष्ट करते हैं कि ‘विरोधाभासों का अस्तित्व यदि चिरकाल तक बना रहे तो वस्तुस्थितियां जड़ीभूत होकर समस्त विकास की रचनात्मकता को लील लेती हैं; और तथाकथित समन्वयवाद के तहत सामान्य जन पर दबाव बनाये रखने की ज़रूरत बढ़ती जाती है। लेखक का मानना है कि यह दबाव कालान्तर में किस कदर अमानवीय और क्रूर होता गया है’

किताब नौ अध्यायों में बंटी है: भगवदगीता, कलियुग, मध्यकालीनता, वैष्णव, शैव, तंत्र , आलवार, दर्शन, मोक्ष. दसवें अध्याय निष्कर्ष में प्रोफेसर सेवा सिंह अपनी इस रचना का निचोड़ प्रस्तुत करते हुए बताते हैं कि भक्ति ने जहां ‘समाज-सांस्कृतिक एकसूत्राता के प्रयत्नों में अभूतपूर्व योगदान दिया हैै।’ पर चूंकि ‘कर्मवाद, नीयतिवाद, आत्मवाद, ईश्वरवाद और आस्था भक्ति के बुनियादी तत्व हैं, इसलिए भक्ति का अन्ततोगत्वा प्रभाव अन्धविश्वासपूर्ण होना होता है।... भक्ति की समूची अवधारणा ने दयनीयता, परवशता और दासत्व को आध्यात्मिक रूपान्तरणों के आदर्शीकरण में ढाल कर भारत के उत्पीड़ित जन की मनोचेतना पर सत्ता की पकड़ को द्रढ किया है।’ / पेज 219/
किताब के प्राक्कथन में प्रो सेवा सिंह लिखते हैं:

‘भक्ति अपनी विचारधारा सहित भारतीय मानस की बीज चेतना है। ...शंकराचार्य के स्रोत ग्रंथ भगवतगीता में शूद्र और स्त्री को पापयोनि प्राणियों के लिए भक्ति का प्रावधान तो था पर इनके दासत्व के लिए वर्णधर्म में कोई ढील नहीं थी। ..निम्न वर्णों के प्रति संकुचित व्यवस्था के कारण बौद्ध धर्म उनके बीच लोकप्रिय होने लगा। ..शूद्रों की गतिशीलता के इस दौर को पुराणों ने कलियुग यानि पतनकाल कहा। निम्न वर्णों विशेष कर वैश्यों और शूद्रों ने शास्त्राविहित कर्मों के पालन से इन्कार कर दिया था। इस संकट से उबरने के उपाय में भक्ति के नए गठन की महती भूमिका रही।

पितृसत्तात्मक और वर्णधर्मी आत्मसातीकरण लिए भक्ति की विचारधारा को निरन्तर सम्प्रेषणीय बनाया।

भक्ति भारतीय इतिहास के दो बड़े साहित्यिक आन्दोलन एक सातवीं - नवीं शताब्दी में दक्षिण भारत का भक्ति आन्दोलन और दूसरा पंद्रहवीं सोलहवीं शताब्दी के उत्तर भारत के भक्ति आन्दोलन का सूत्रधार था।

पहला अध्याय जिसका फोकस ‘भगवदगीता’ पर है। लेखक के मुताबिक ‘भगवदगीता भक्ति के नवोन्मेष का प्रस्थान ग्रंथ है। इस ग्रंथ में पहली बार निचले तबकों के लिए भक्ति का प्रावधान किया गया है। भगवदगीता ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है, स्त्री, वैश्य और शूद्रादिक पापयोनि वाले ईश्वर की शरण में आकर परम गति को प्राप्त होते हैं ... अभिप्राय यह है कि वे मानव प्राणी से निम्न स्तर के जीव है।’ / पेज 1/ इस ग्रंथ की आगे चर्चा करते हुए वह बताते हैं कि ‘ वर्णसमाज परिवर्तन से परे है क्योंकि यह ईश्वरेच्छा से है। शूद्र तीनों वर्णों की सेवा के लिए है और भक्ति द्वारा वह अपना अगला जन्म सुधार सकता है।’ आत्मवादी विचारधारा के की चर्चा करते हुए लेखक बताते हैं कि ‘ईसा से छह सौ वर्ष पूर्व उपनिषदों में आत्मवादी विचारधारा का हुआ जिसमें वास्तविकता को और आत्मा को का दर्जा प्रदान किया। यह आदिम कबिलाई लोगों की यथार्थमूलक चेतना को समाज को वैधता प्रदान करने के लिए था। इस आत्मवादी छत्राछाया में ही को बार बार बताया गया कि मरना या मारना आदि कोई वास्तविकतायें नहीं हैं।’

कलियुग शीर्षक अध्याय में लेखक इस दौर के वैचारिक सारतत्व की चर्चा करते हुए बताते हैं ‘ धम्म के स्थान पर भक्ति का नवोन्मष कलियुग का विचारधारात्मक सारतत्व है। कलयुग का भयानक द्रश्य प्रस्तुत किया गया। यह ईसा के पहली शताब्दी के आसपास प्रस्तुत हुआ। हर विघटन को हम कलयुग समझने के अभ्यस्त हो गए लेकिन भक्ति की उपलब्धता के कारण यह महत्वपूर्ण हो गया। पाप दुराचार करनेवाले भी भगवद कथा से पवित्र हो जाते हैं। सतयुग में ध्यान करने से, त्रेता में बड़े बड़े यज्ञ करने से, द्वापर में विधिपूर्वक पूजा करने से जो फल मिलता है, कलियुग में यह सब श्री हरिकीर्तन से ही प्राप्त होता है। सारे पापों से मुक्ति भक्ति में ही है।
इस काल में शूद्रों को धन्य माना गया है क्योंकि वह द्विजों की सेवा से अपने लोक पर विजय प्राप्त कर सकता है।

अध्याय ‘मध्यकालीनता’ में लेखक बताते हैं कि कैसे कलिकाल के जनउभार से निपटने में भक्ति के कारगर उपाय का पुराणों में महिमामंडन किया गया। ईसा के छठी शताब्दी के बाद सामन्ती राज्यसत्ताओं में ब्राहमण वर्ग की भागीदारी और जनमानस ब्राहमणिक विचारधारा की जकड़बंदी बढ़ती गयी। अनेक देवताओं को राज्य से संरक्षण प्राप्त था तथा पूजा आदि की व्यवस्था थी तथा अंधविश्वासों का पूरा तंत्रा खड़ा किया गया। गुप्तोत्तर काल में सत्ता संचालन में अंधविश्वास में बड़ी शक्ति थी।

लेखक आगे बताते हैं कि ‘ब्राहमणवादी आदर्श ने निम्न वर्णों के बीच उस कर्मवाद के सिद्धांत के प्रति आस्था पैदा की जिसके अनुसार वैश्य, स्त्रियां और शूद्र के उद्धार के लिए द्विजों की सेवा और विष्णु की भक्ति के अलावा कोई उपाय नहीं था।’ / पेज 55/

बुद्धिवाद किस तरह अंधविश्वास के लिए विनाशकारी होता है, इसे बखूबी समझते हुए ‘भारतीय धर्मशास्त्रा प्रणेताओं ने निरंतर स्वतंत्र चिन्तन और तर्क को अनिष्टकारी माना है। वे जनता को अपने काबू में रखने की बुनियादी समस्या के प्रति सजग रहते हुए विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक वर्ग को सुरक्षा प्रदान करनेवाले धार्मिक का विरोध करने की को पनपने नहीं देते। वे जान रहे थे कि इनमें अविश्वास करने से उस समाज की बुनियाद को ही चोट जिसकी उन्होंने इतनी उमंग से कल्पना की है। इसलिए मनु ने घोषणा की थी कि जिस समाज में नास्तिक लोग होते हैं, वह समाज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।’ /पेज 65/

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए लेखक शंकराचार्य की बात करते हैं, उनके मुताबिक ‘शंकराचार्य घोषित करते हैं कि जो का विषय है उस पर तर्क नहीं किया जा सकता है। तार्किकों को दया का माना गया है। शंकर के अनुसार तार्किक सींग और पूंछ रहित वृषभ  है। परिणामस्वरूप शंकराचार्य के साथ ही दार्शनिक गतिविधियों का लगभग अंत हो गया। तर्क का विध्वंस भारतीय विज्ञान के लिए घातक सिद्ध हुआ।’ / पेज 67/

अगले अध्याय ‘वैष्णव’ में आगे बताया गया कि ‘मध्यकाल में श्रमजीवी समुदाय में कैसे भक्ति के माध्यम से जकड़बन्दी की विचारधारा का आत्मसातीकरण हुआ। एक तरफ निचले तबके के लोगों के लिए सभी मानवीय धार्मिक सुलभता का निषेध था और दूसरी तरफ भक्ति द्वारा तमाम अंधविश्वास, पुनर्जन्म, पाप-पुण्य, दैवी विधान आदि द्वारा गहरी मनोग्रंथी पैठा दिया गया।

बाद में भक्ति सामंती व्यवस्था में समाहित होती है। जनजातीय समुदायों के उपास्य देवों में जनजातीय सम्बन्धों की झलक दिखती है। भक्त और  भगवान का सम्बन्ध सामन्ती सम्बन्धों का प्रतीक है और इन सम्बन्धो की दैवी आधिकारिता के बल पर सामन्तीय दमन को बल मिलता है और लोक चेतना के स्तर पर आत्मस्वीक्रति भी प्रदान करता है। लेखक आगे भक्ति परंपरा के सबसे बड़े देव नारायण की चर्चा करते बताते हैं कि वह ‘‘अवैदिक तथा जनजातीय है।’’ उनके मुताबिक ‘नारायण का उल्लेख वेदों में नहीं है। इनकी लोकप्रियता के कारण परवर्ती ब्राहमण ग्रंथों में उनकी चर्चा होने लगी।/ पेज 73/ फिर आगे अवतारों की चर्चा करते हुए लेखक इस तथ्य पर रौशनी डालते हैं कि ‘अन्य अवतारों की का भी अधिकतर अवैदिक तथा था। अवतारवाद में अवैदिक और लोकप्रिय का ब्राहमणिक आत्मसातीकरण है। भगवदगीता की अवतारवाद की नयी , भक्ति की सामाजिक भूमिका को सीधे सीधे लक्षित करती है।’ / पेज 77/

अध्याय शैव में शिव की भक्ति के बारे में चर्चा है। वैष्णवों ने विष्णु की भक्ति के लिए विष्णु पुराण की रचना की तथा शिव की भक्ति के लिए शिवपुराण की रचना हुई। भक्ति में विष्णु का महत्व स्वीकार कर लिया गया था और शिव का भी। लेकिन शिव के अवैदिक तत्वों का आत्मसात नहीं किया जा सका।

लेखक के मुताबिक ‘शिवपुराण में मातृसत्तात्मक जनजातीय विचारों से सम्बद्ध सांख्य की प्रक्रति और वेदान्त के पुरूषसत्तात्मक विचारों को भक्ति द्वारा सन्तुलित किया गया। सांख्य और वेदान्त का विवाद दो समुदायों का विवाद व्यक्त करता है। भगवदगीता से लेकर सभी पुराण ग्रंथों में सांख्य के स्त्री तत्व को वेदान्त के पुरूष तत्व की सेवा में आत्मसात करने का प्रयास किया जाता है। / पेज 103/

‘तंत्र’ पर केन्द्रित अध्याय में लेखक जिक्र करते हैं कि भारत की संस्कृति  में तांत्रिक प्रभाव गहरा है। देवीप्रसाद चटटोपाध्याय के हवाले से वह इस बात का भी जिक्र करते हैं कि ‘तंत्रावाद के अनुष्ठानों में पहले केवल स्त्रियां भाग लेती थीं।’
लेखक आगे बताते हैं कि मध्यकाल में वैष्णव और शैव भक्ति की दो समानान्तर परम्परायें विकसित हुई थीं। वैष्णव भक्ति में ब्राहमणिक परम्परा थी और शैव भक्ति में व्यापारी और दस्तकारी परम्परावाले शामिल थे। भक्ति के लिए सभी अन्तर्विरोधों के प्रति आंखें मंूद ली गयी क्योंकि मध्यकाल की सामन्ती व्यवस्था में सन्तुलन कायम करने में भक्ति की कारगरता सिद्ध हो चुकी थी। इसलिए भक्तितंत्रा का महिमामण्डन कर भक्ति तत्व को आत्मसात करने की होड़ लग गयी।

भक्ति का तंत्रों में प्रवेश, धुर अन्तर्विरोधों को ढंक कर एक समान पुरूषसत्तात्मक, वर्णभेदमूलक भक्ति की विचारधारा का ढांचा खड़ा हो गया। कुलार्णव तंत्र के अनुसार चार युगों की बात होती है - सत्ययुग में श्रुति -वेद द्वारा प्रतिपादित आचार की प्रधानता, त्रोता में स्म्रति की, द्वापर में पुराण की और कलयुग में तंत्रा की प्रधानता होती है। कहा गया कि वेदज्ञान जितना आवश्यक है उतना ही तंत्रा का भी ज्ञान जरूरी है। ज्ञान का क्रियात्मक रूप तंत्र का विषय है।  

अध्याय ‘अलवार’ में लेखक दक्षिण भारत के तमिल प्रदेश में हुए भक्ति आन्दोलन के विकास पर निगाह डालते हैं। लेखक के मुताबिक ‘ईसापूर्व सातवीं सदी में भक्ति ने वहां आन्दोलन का रूप धारण कर लिया था। वैदिक धर्मावलम्बी ब्राहमण लोग घटिकायें बना कर अलग रहते थे। कांचीपुरम की घटिका प्रसिद्ध थी। यही वह कालखण्ड था जब बौद्ध और जैन धर्म को पृष्ठभूमि में ढकेल दिया जाता है। दक्षिण के तमिल भक्ति के विकास में ब्राहमण को दिए गए भूमि अनुदान भी कारण था। इस अनुदान में मिली भूमि से ब्राहमणों का कृषि क्षेत्र  में प्रवेश हुआ।

लेखक अगले अध्याय ‘दर्शन’ में भागवतधर्म, शंकराचार्य आदि के बारे में बात करते हैं। वे बताते हैं कि भागवत में जब भक्ति को एक धर्म के रूप में स्थापित किया जा रहा था उसी समय 8 वीं शताब्दी के आसपास शंकराचार्य दार्शनिक भक्ति की विचारधारा द्रढ कर रहे थे। भक्ति की अतार्किकता को शंकराचार्य ने अपने दर्शन में श्रद्धा और आस्था के मद्देनज़र शास्त्रसम्मत प्रामाणिक स्वरूप स्थापित किया। ‘मोक्ष’ शीर्षक अध्याय में लेखक भगवदगीता की इस स्थापना की चर्चा करते हैं कि शूद्र और स्त्रियां पापयोनि होते हुए भी, शरणागत होने पर मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। दासत्व भोगने के पुरस्कार स्वरूप अगले जनम में उच्च वर्ण में जन्म लेकर विशेषाधिकारों का आनंद उठाया जा सकता है।

किताब के अंतिम अध्याय ‘निष्कर्ष’ में किताब का निचोड़ प्रस्तुत करते हुए लेखक दो बातों पर विशेष जोर देते हैं: एक भक्ति की समूची अवधारणा ने किस तरह ‘दयनीयता, परवशता और दासत्व को आध्यात्मिक रूपांतरणों के आदर्शीकरण में ढालकर भारत के उत्पीड़ित जन की मनोचेतना पर सत्ता की पकड़ को दृढ किया है।’ /पेज 219/

दूसरे, ‘भक्ति को समझने-समझाने में सजग रहने की जरूरत होती है, क्योंकि हम लोगों की मनोचेतना में भक्ति के स्वायत्त-तात्विक स्वरूप की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इतिहास के पटल पर वर्गीय अन्तर्विरोधों का उदघाटन करने के लिए हमें भक्ति के अन्तर्गत कर्मवाद, पाप-पुण्य और मोक्षादर्श से ठंुसी मनोग्रंथियों के मद्देनज़र कड़े आत्मनिरीक्षण का अभ्यस्त होना होता है।’ /वही/ 



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