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Friday, September 11, 2020

सवाल तो साफ़ है पर नीयत में खोट

 - अर्पिता श्रीवास्तव 

                         परिपक्व संविधान की इबारत २६ जनवरी, १९५० से हमारे सामने है, उसे पढ़ने, समझने, देखने के अनगिनत नज़रिए हमारे सामने है पर हर बार जब कोई असमानता/ग़ैर-बराबरी की दुर्घटना घटती है, जब कोई न्याय मांगती आवाज़ को सरकार और प्रशासन की मिली-भगत से दबाया जाता है, जब कोई जेंडर मुद्दों पर अपनी क्रूरता, असंवेदनशीलता का उदाहरण पेश करता है,ज़ेहन में यही सवाल आता है कि आख़िर सवालों के घेरे में हम कब तक गोल-गोल चक्कर लगाते दिन के बाद दिन, बरस दर बरस तय करते चलेंगे, आख़िर कब हम संवेदनशील समाज बना पायेंगे? समय के साथ जिन बातों को इतिहास की बात बन दफ़्न हो जाना था वह एक लंबे समय से और वर्तमान में सबसे ज़रूरी मुद्दा बन चुका है. हर बात, हर मुद्दे को एक ख़ास कोण से देखने की गजब प्रतिभा हमारे देश ने अर्जित कर ली है. उस ख़ास कोण में धर्म, जाति और जेंडर ने लोगों को क्रूरता की ललित कला विकसित करने में महारत दे दी है. ये ऐसी बातें हो गई हैं जो रोज़मर्रा की छोटी सी छोटी गतिविधियों का हिस्सा हो गई हैं.

                        कोई बड़ी या बहुचर्चित घटना से प्रभावित होकर लिखने का मक़सद नहीं है क्योंकि देश के कई हिस्सों में अनेक परतों में हिंसा की ख़तरनाक साज़िशें निरंतर चल रही हैं और दैंनंदिन जीवन में घटने वाली उन छोटी घटनाओं और बातों को दर्ज़ करने की मंशा है जिन पर बात करना अब विचार-विमर्श का हिस्सा नहीं रह गया है क्योंकि उससे ज़रूरी देश हित, देश भक्ति की बहसों से ही लोकतंत्र को चलाए जाने का गुमान सरकार की राजनीति का मुखपृष्ठ है. बहरहाल हम अपनी बात पर लौटते हैं कि कभी-कभी लगता है कि जब हम अपने आसपास लगातार अन्याय, अपमान की उपस्थिति झेल रहे होते हैं, देख रहे होते हैं, उनका आभास पा रहे होते हैं तो उन्हें सामाजिक-राजनैतिक चश्मे से देखना ज़रूरी होता है पर सवाल यह उठता है कि इस तरह से इन बातों को देखने के सलीके को परवरिश में दिए जाने की समझ कितने परिवारों में मिलती है? अन्याय, अपमान, असमानता, बेइज्जती, ज़िल्लत और द्वेष जैसे अमानवीय भावों पर समझ बनाने की बात तो दूर हम इस तरह की बातों को बतौर इंसान देखने की तमीज़, सिखाने-देखने की बात तक अपने बच्चों को नहीं देते. आज की भागती ज़िंदगी में जिसे बुलेट स्पीड देने का मंसूबा वर्तमान सरकार ने ले लिया है इसमें किसको फुरसत है कि उन छोटी-छोटी पर महत्वपूर्ण बातों पर दख़ल दिया जाए. अल्पमत में ही सही पर बतौर इंसानियत के पक्ष में खड़ा होने का पक्षकार बनने की हिम्मत ही आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है.

                         शोषण बहुस्तरीय है और शोषकों की भूमिका तो समय के साथ बहुआयामी हो चुकी है. इस बहुआयामिता के हुनर में वे हर स्थिति, परिस्थिति में अपनी मायावी उपस्थिति दर्ज़ करते हैं. मुखौटों में छिपा उनका नित बदलता नया भेष हमें नया लगता है, आकर्षित करता है पर हर बार मुखौटे का आवरण बना होता है-समय की ज़रूरत के हिसाब से धर्म, जाति, जेंडर, वंचितों-दलितों के साथ अन्याय की पद्धतियों को विकसित करने की भांति-भांति स्याही से.

                          हमारी ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनैतिक चेतना के आईने से उजागर होती है समाज में घटने वाली हर घटना की प्रकृति. इस आईने को अपने सपनों सा सुन्दर बनाना हर नागरिक की ज़िम्मेदारी होती है जिसमें सरकार-प्रशासन से सवाल किए जा सके और घृणा-द्वेष और सांप्रदायिकता की घिनौनी मानसिकता को ज़मीनी स्तर पर खत्म करने का दृढ निश्चय उनकी प्राथमिकता हो जिससे एक सुन्दर दुनिया का ख़्वाब ज़मीनी हक़ीकत बन पाए जहाँ ग़ैर-बराबरी/असमानता, जाति-धर्म, वर्ग, जेंडर आधारित शोषण अतीत की बातें हों.

                          कल्पना कीजिए कि आप, ’आप’ न होकर कुछ और हो जाएं यानि जन्मगत पहचान से इतर आप अपनी श्रेणीगत श्रेष्ठता से सबसे निचले पायदान में पहुंच जाएं तो क्या स्वयं को वही इंसान समझ पाने का माद्दा रखेंगे जैसा कि जन्मगत पहचान से है? अच्छा क्षण भर के लिए सोचिए कि हमारे यहाँ निर्धारित जाति पदानुक्रम में चिन्हित निम्न-दलित वर्ग का इंसान अपनी श्रेणी में ऊपर उठ जाएं और आपकी तथाकथित ’उच्चता’ की श्रेणी में छलांग मार लें तो क्या आप उनके साथ सहज-स्वाभाविक व्यवहार ख़ुद के लिए और उस इंसान के लिए कर पायेंगे? मुझे पूरा विश्वास है कि अगर आप जाति संरचना के हिमायती हैं तो आप के दिमाग में विचारों की झनझनाहट ने आपको झकझोर दिया होगा. अनेक छोटे-बड़े दृश्य, सवाल और अजीब स्थितियों की कल्पना आपने क्षण भर में कर ली होगी और अंदर ही अंदर इस भयावह विचार रूपी स्वप्न से आतंकित हो गए होंगे.

                          जाति का प्रश्न एक ऐसा लिटमस परीक्षण है जिसमें बस दो परिणाम ही होते हैं जैसे कि आपको पता ही है कि लिटमस टेस्ट में भी ऐसा ही होता है. अब आप सोच रहे होंगे कि वो परिणाम क्या है तो बता दें कि आप व्यक्तिगत रूप से जाति संरचना को मानते हैं या नहीं मानते. अब बात उससे आगे की जानी चाहिए क्योंकि कोई भी सवाल सिर्फ व्यक्तिगत परिधि में सीमित नहीं होता बल्कि समाज का संदर्भ उसमें जुड़ा होता है, यह बात हम जितनी जल्दी समझ लें उतनी बेहतरी की तरफ बढ़ेंगे क्योंकि यह हमारी दुनिया को बेहतर बनाने की कोशिशों का मापक यंत्र है. जब यह बात आप पढ़ रहे होंगे तो जैसा कि मैंने पहले ही इशारा कर दिया है कि जाति व्यवस्था को मानने वालों के लिए ही सारी बातें हो रही हैं तो ऐसे लोगों के दिमाग में यह सवाल आएगा कि जाति संरचना नहीं मानने के लिए कहते हैं तो फिर ’आरक्षण’ क्यों? इस पर बातचीत करने के लिए शोषकों के पूरे इतिहास को आपको खंगालना होगा, जातिवादी चश्मे से बाहर आकर दुनिया देखनी होगी तब जाकर बाबा साहब आंबेडकर द्वारा वंचितों-दलितों को दिए जाने वाले आरक्षण का औचित्य समझ पायेंगे. पर एक बात कहने का लोभ-संवरण करना मेरे लिए मुमकिन नहीं और वो है- आपने ध्यान दिया होगा कि " आरक्षण" पर उबाल, गुस्सा, प्रतिरोध और बेचैनी तथाकथित उच्च जाति वर्ग में ही आती है. इसका एक सीधा जवाब है कि एक लंबे समय से उच्च जाति वर्ग का वंचितों-दलितों पर आधिपत्य जमाने की प्रवृत्ति जिसकी वजह से संविधान प्रदत्त अधिकारों के प्रति उन्हें बेचैनी उठना असामान्य नहीं. लोकतंत्र में सवाल उठाना वाजिब हक़ है पर सिर्फ लाभ पर नहीं यानि सिर्फ सुखों के लिए नहीं बल्कि उच्च जातियों द्वारा प्रदत्त पीड़ा, अपमान पर सवाल का जवाब देने की मंशा और साहस भी उनमें होना चाहिए.

                         जाति प्रताड़ना पर अनेकों किताबें, आत्मकथायें, संस्मरण, लेख, रोज़मर्रा के प्रतिरोध में वैकल्पिक मीडिया पर आए दिन समाचार और प्रतिक्रियायें हम पढ़ ही रहे हैं. जब आप जाति प्रताड़ना पर किसी के अनुभव पढ़ रहे होते हैं तो वे अनुभव आपको उन घरों, गलियों, मोहल्लों, गाँवों, खेत-खलिहानों और सार्वजनिक स्थानों की ऐसी नंगी तस्वीरें दिखाता है कि हम आँखें मिलाकर बात नहीं कर सकते. यह इबारत चहुंओर अपनी-अपनी समझ, शक्ति सामर्थ्य और श्रेष्ठता बोध के आधार पर रची जा रही है. जाति-दंभ की इस राजनीति को मज़बूत करने के पीछे भारत की महान संस्कृति की दुहाई हम कानफोड़ू शोर की तरह सुनते आ रहे हैं. संस्कृति की गरिमा से परे आज के कर्णधार जो भारत को विश्व की महाशक्ति, विश्वगुरु के तमगे से नीचे रख बात नहीं कर सकते, उनसे धरातल की बातों की उम्मीद करना एक खोखली आशा के सिवा कुछ नहीं पर लाख नाउम्मीदी के अंधेरे हमें हरायें, बारहां कोशिश करें कि हम इस लंबी सामाजिक संरचना की अक्षुण्णता पर चोट न करें, ध्वस्त न करें पर प्रतिगामी ताकतों के इस मंसूबे को धूल चटाने हम रोज़ बातें करेंगे, इसकी मोटी असंवेदनशील दीवारों पर अपने विचारों के हथौड़े चला-चलाकर नई दुनिया की इमारत बनाने के स्वप्न को ज़िंदा रखेंगे और पूरा करेंगे.

                         जब हम अनौपचारिक रूप से मिलकर गंभीर मुद्दों पर छोटे-छोटे समूहों में बात करते हैं तो बृहद क्षेत्र में प्रभाव डालने वाली बातों के असर के साथ-साथ व्यक्तिगत अनुभव भी सहजता से आते हैं. उन्हें जोड़कर देखने से असल तस्वीर सामने आती है. अनेक सवालों में से एक "जाति का प्रश्न" हमें हमेशा उद्द्वेलित करता है और बतौर इंसान हमें शर्म और पीड़ा की असह्य वेदना से भरता है. इतनी बातों के साथ अब उस चर्चा पर आते हैं जो अनौपचारिक रूप से हम कुछ दोस्तों ने मिलकर की जिसमें कुछ प्रमुख बातों का ज़िक्र करते चलूं. एक साथी का मानना धर्म ’इमेजनरी टूल’ की बदौलत जाति ने लंबा घृणित सफर तय किया. जब तक धर्म को खत्म नहीं किया जाता या उसमें मौजूद भेदभाव के तत्वों को समाप्त नहीं किया जा ( जिसकी संभावना दिखती नहीं) तब तक जाति का अस्तित्व हमें मुँह चिढ़ाते रहेगा. हम जिस बेहतर दुनिया की बात करते हैं उसके गोलपोस्ट तक पहुंचने के लिए हमें सबसे पहला गोल धर्म का बनाना होगा. इसी में एक बात और जोड़ी कि जब कोई व्यक्ति अपनी पसन्द से दूसरी जाति में शादी करता है तो उसे वाहवाही मिलती है पर इसमें यह देखा जाना महत्वपूर्ण है कि क्या वह शख़्स शादी के बाद जेंडर बराबरी का व्यवहार करता है अथवा नहीं. यदि ग़ैर-बराबरी, पितृसत्ता को जीने की रस्मों को वह मानता है तब जाति के बाहर शादी भी एक दिखावा है क्योंकि अंततः प्रताड़ना का दुष्चक्र फिर शुरु हो जाएगा.इसी में यह ज़िक्र करते चलें कि देश का प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान रिम्स रांची में सामान्य और आरक्षित बच्चों का हॉस्टल अलग है, ऐसे ही मेरी एक दोस्त ने बताया कि गुजरात के एक सरकारी चिकित्सा संस्थान में हॉस्टल में कमरे की शेयरिंग के समय एक मुस्लिम लड़की के साथ कमरा साझा करने को कोई तैयार नहीं हुआ और तब दोस्त की बेटी ने उसके साथ कमरा साझा किया. ये तो मात्र दो उदाहरण हैं पर रोज़ हज़ारों जगहों में इस तरह की घटनायें घटती होंगी जो शोषित को इस समाज से डरना, विश्वास में कमी लाने में उत्प्रेरक का काम करती हैं, हमारे जन्मगत विशेषाधिकार जिसमें जाति और धर्म आता है वह जन्म लेते ही आप में विश्वास भरता है और प्रताड़ित समुदाय अपने अतीत के बोझे से आतंकित होकर अपने बच्चों की परवरिश करता है, ये विभाजन रेखा दिखाती है कि सिस्टम इस खाई को भरने की चाह नहीं रखता है. जाति, वर्ग की अनेक यातनाओं में से एक और बात की चर्चा करना समीचीन होगा जिसमें घर की हेल्प को आपके अपने टॉयलेट में जाने की अनुमति नहीं होती, इसे आप हर घरों में बने एक अलग टॉयलेट के निर्माण से समझ सकते हैं. दक्षिण में बकायदा अपने घर या फ़्लैट निर्माण के समय इस बात को विशेष तरजीह दी जाती है. इस विषय पर २००९ में कैथरीन स्टॉकेट के लिखे उपन्यास ’द हेल्प’ पर इसी नाम से बनी फ़िल्म की याद दिलाना आवश्यक है जहां रेस और जेंडर के सवाल आते हैं. जाने कितनी जगह, कितनी बार अलग-अलग तरह से यह हम सबने पढ़ा, जाना और सुना है कि सभी मनुष्य एक हैं पर विभाजन और वर्गीकरण की यह खाई चौड़ी होती जा रही है.

                         एक साथी ने बताया कि स्कूली शिक्षा से निकलने के बाद ही उन्हें जाति, धर्म और जेंडर की विषमताओं, विभाजन और भेदभाव का एहसास हुआ अन्यथा स्कूल तक तो यही लगता था कि ये सब बातें अब बीते दिनों की बातें हैं और ग्रामीण इलाकों में ही ऐसा कुछ होता होगा. इसमें यह जोड़ना बहुत आवश्यक लग रहा है कि स्कूली शिक्षा में शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे सिर्फ किताबी ज्ञान पर ही फोकस न रहें बल्कि यथार्थ के साथ बच्चों का साक्षात्कार कराएं जिसमें बच्चों को समानता, धर्म-निरपेक्षता, प्रगतिशीलता और लोकतांत्रिकता के प्रति ज़िम्मेदार और संवेदनशील बनाएं. हां तो अब फिर उस साथी की बात पर लौटते हैं- उस साथी की बात में एक ख़ासियत यह उभर कर आई कि उनके परिवार ने घर में ग़ैर-बराबरी मूल्यों को अपनाया नहीं, न ही घर में किसी के साथ ऐसा व्यवहार किया, इसी बात में उन्होंने बताया कि एक बार जब घर में टाइल्स की मरम्मत के लिए दो मजदूर घर आए और भरी दोपहर में उनकी तबियत नासाज़ देख कर इस साथी ने उनसे बतौर इंसान व्यवहार किया तो उन मजदूरों की असहजता को उसने स्पष्ट रूप से महसूस किया. वे बहुत बोलने पर ही सोफ़े में बैठे पर सशंकित होकर. यह उदाहरण है तो बड़ा सामान्य-सा पर क्या हम इसे दैनिक कार्य-व्यापार में आए दिन नहीं देखते और इसके विपरीत व्यवहार लोग नहीं करते? हमारी क्या प्रतिक्रिया होती है? हम कैसे व्यवहार करते हैं? आपके घर में चाय-नाश्ते, खाने के बर्तन, कुर्सी-पलंग में बैठने के कुछ अघोषित नियम कई पीढ़ियों से चले आ रहे हैं जिन्हें सहज जीवन-व्यवहार मानकर हम अंध-भक्त की तरह मानते चले आ रहे हैं तो कीजिए ख़ुद का स्कैन. निम्न वर्ग और जाति की मार तो दृश्य रूप से पूरे समाज में फैली ही है उसमें पढ़े-लिखे समाज के नज़रिए की बानगी उस साथी की मित्र की पढ़िए कि आप अपनी हेल्प को कुछ पैसा अलग से देकर चाहे जितना श्रम करा सकती हो यानि पैसा देकर आप अपने ख़ून चूसने वाले चरित्र को जस्टिफाई कर सकते हैं. देखिए! गरीबी और अशिक्षा के साथ दबे-कुचले वर्ग की समझ को अगर आप अपने इंसान होने का एहसास दिला पाएं तो उस सुकून के पलों में जब आप बतौर इंसान होने के नाते किसी से बिना पूर्वाग्रह के बात करेंगे, काम लेंगे तो यह भी एक छोटा पर ज़रूरी कदम होगा इंसानियत से भरी ख़ूबसूरत दुनिया बनाने में. हो सकता है कि एक घर की चारदीवारी में आपके द्वारा किया गया अपमान भरा व्यवहार कोई बाहरी व्यक्ति नहीं देख पा रहा पर यह इस धरा में इस तरह की अमानवीयता को बढ़ावा दे रहा है, कहा गया है न कि हर क्रिया, हर प्रतिक्रिया दर्ज़ होती है. किसी भी बात में श्रेष्ठताबोध होना लाल घंटी का बजना समझा जाना अति आवश्यक है. चर्चा के इसी क्रम में उसने कहा कि हालिया घटनाओं में विज्ञान से, चिकित्सा से निपटने वाली चुनौतियों को ताक पर रखकर एक बहुत बड़ी भीड़ जब ताली, थाली बजाने और दीप जलाने जैसे यशोगान करने वाले काम कर रही है तो क्या आश्चर्य कि आने वाले समय में ये प्रतिगामी ताकतें महान भारतीय संस्कृति के काले पन्नों यथा सती प्रथा और बाल विवाह के औचित्य को वाज़िब ठहराने लगे. बहरहाल फिर से जाति प्रश्न पर आते हुए उसने अपना एक अनुभव साझा किया कि उनके स्कूल की प्राचार्या के पद पर बैठी महिला की कार्यक्षमता पर सवाल उठाया जाता है क्योंकि वे दलित हैं और दूसरी वे स्त्री हैं. यह भी सदियों से अर्जित सहज प्रतिक्रिया का जीता-जागता उदाहरण है जबकि किसी भी व्यक्ति की क्षमता, प्रबंधकीय गुण और व्यवस्था प्रबंधन के गुण विशेष ट्रेनिंग और अनुभव की माँग करते हैं साथ ही पूरे स्टाफ का सहयोग. यह सवाल उठाना कितना ग़ैर-वाजिब है कि दलित जाति की होने की वजह से वे कार्य-निष्पादन में पीछे हैं. इसमें यह सवाल भी आता है कि समाज के अधिकतम प्रतिष्ठित प्रमुख पदों पर सवर्ण बैठे हैं तो उनके कार्य-संचालन की कमियों को आप क्या जातिगत चश्मे से देख उन्हें दोषी करार देते हैं? इस तरह की कूड़ाई मानसिकता से बाहर आने के लिए सिस्टम के ज़िम्मेदार होने की सबसे महती आवश्यकता है साथ ही स्वयं के स्तर पर नित अभ्यास और चर्चाओं की आवश्यकता है जो दिमाग में पड़े जाति-धर्म की मोटी काई को साफ करने की दिशा में सार्थक कदम होगा.

                         हाल में सांसी जनजाति में प्रेमविवाह को लेकर पंचायत ने फरमान जारी कर स्त्री-पुरुष को निर्वस्त्र घुमा कर उन पर ज़ुर्माना ठोंका और पंचायत प्रमुखों ने उसे आपस में बाँट लिया ( पूरा समाचार आप यहां पढ़ सकते हैं- https://thewirehindi.com/137833/rajasthan-sikar-panchayat-forces-couple-to-bathe-naked-in-public-for-alleged-affair/) इसी तरह की एक घटना उत्तरप्रदेश में हुई थी जिसका वीडियो वाइरल हुआ था जिसमें पुलिसकर्मियों ने प्रेमी जोड़े को निर्वस्त्र कर गाँव में घुमाया. जब संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत काम करने वाली संस्थाएं जाति-दुराग्रहों को किसी कानून की तरह पालन करती हैं वहां इस ज़हर से मुक्ति के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होगी. एक व्यक्ति की गरिमा को ताक पर रखकर लिए जाने वाले अनगिनत किस्से हमारे देश की महान सभ्यता और संस्कृति का प्रति-उत्तर है जो सच्चाई को बयां करते हैं. इस क्रम में उत्तरप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के उस अभियान का ज़िक्र करते चलें जिसमें सफाई कर्मचारियों के लिए नियुक्ति निकाली गई थी जिसमें सभी जातियों के उम्मीदवारों का चयन हुआ पर बाद में पता चला कि चयनित सवर्ण उम्मीदवार २०००/- देकर सफाई का काम दलितों से करा रहे हैं यह एक बहुत बड़ा सवाल है कि जाति आधारित श्रम, आज के समय में भी अपनी विकरालता से अट्टाहास कर रहा है और हमें हमारे मनुष्य होने के दंभ पर थूक रहा है और हम जाति-दंभ में उन्हें सीवर में मरने के आंकड़ों को दर्ज़ करने का कर्तव्य निभा रहे हैं. ( पढ़िए ताज़ा ख़बर https://thewirehindi.com/137065/himachal-pradesh-two-workers-died-inside-septic-tank/) जापान से आयातित बुलेट ट्रेन तकनीक हो या कोई अन्य आधुनिक तकनीक हो उसे जनता के पैसों से आयातित कर हमारी सरकार मनुष्य की गरिमा, जीवन के ज़रूरी संसाधनों और सुविधाओं की फिक्र और कर्तव्य को राज्य की, सिस्टम की कार्य-सूची से बरसों पहले बाहर हो चुकी है वैसे याद दिलाते चलें कि मैला ढोने की प्रथा को कानूनन अपराध माना गया है.

                         अनगिनत अमानवीय व्यवहार, अभ्यास और प्रक्रियाओं को समूचे समाज में स्वीकार्यता की ऐसी सील लगी है जिसकी स्याही शोषितों की आत्मा को चीकट काले रंग से स्याह कर तार-तार करती है. इस अपमान और दंश पर खुले तौर पर विरोध, बातचीत करना, अपनी गलतियों को स्वीकारना तो अभी भी दूर की कौड़ी लगती है पर कहा गया है न कि सामाजिक बुराईयों और गलत अभ्यास के लिए हमेशा लड़ते रहना, आवाज़ उठाना मनुष्य होने का एहसास ज़िंदा रखना है. निश्चित ही वह सुबह कभी तो आएगी जब हमारी पहचान सिर्फ एक इंसान के रूप में होगी.

                         आपसी राय-मशविरे और चर्चा के दौरान यह बात भी सामने आई कि सरकारी कार्यालयों में जातिगत गाँठों का उभार अकसर दिखता है. ये वे गाँठें हैं जिनको ढोते उच्च जाति दंभी वर्ग प्रतिष्ठा का सवाल बना लेते हैं, इसी तरह के एक वाकिए का ज़िक्र एक साथी ने किया कि उनके ऑफिस में महिलाकर्मियों के रिटायरमेंट पर महिला सहकर्मियों द्वारा फेयरवेल दी जाती है. जब एक सफाई कर्मचारी जो टॉयलेट सफाई से जुड़ी थी उसके रिटायर होने पर उसके विदाई समारोह को उसके काम, वर्ग, जाति से जोड़ा और जेंडर के सवाल को तो समझा ही नहीं. मात्र गिनती के कुछ सहकर्मियों के सहयोग से और तमाम विरोध के साथ विदाई समारोह हुआ जिसमें उस महिलाकर्मी ने हाथ जोड़कर बाकि महिला सहकर्मियों को बगलें झांकने से बचा लिया क्योंकि वह सफाईकर्मी महिला समझती थी कि हाथ मिलाने के लिए हाथ बढ़ाने का साहस अभी समाज में नहीं है.

                         जाति एक ऐसा प्रेत है जो जीवन भर पीछा नहीं छोड़ता. शादी और नौकरी के लिए जाति सर्वप्रमुख प्राथमिकता होती है. घरों में परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से बचपन से यह घुट्टी पिलाई जाती है कि अपने से नीचे जाति, दलित जाति के लड़के या लड़कियों के बारे में विचार करने की भी ज़रूरत नहीं है और यह सीख युवाओं की रगों में दौड़ रही होती है. एक साथी ने बताया कि शहर में उच्च जाति का सरनेम लगाकर लंबा समय बिताया. चूंकि उच्च जाति का सरनेम साथ लगा था तो समाज में व्याप्त तमाम जाति दंश से तो बच गए पर अपने आसपास के उच्च जाति वर्ग के लोगों के असल चेहरे बेपर्दा होते रहे. लोग किस तरह विष-वमन करते हैं इसका अच्छा ख़ासा अनुभव है उस साथी को. ऐसे ही अपनी दोस्त के साथ कॉलेज दिनों में किराए के लिए साझा कमरे की खोज के दौरान हर घर में सबसे पहले उसका यह बताना कि मैं मुस्लिम हूँ समाज के नंगेपन की इंतहा को दर्शाता है. जीवन अनुभवों में ऐसे साक्षात्कार ही वो टर्निंग पॉइंट होते हैं जिसे कुछ लोग मनुष्य बनने की प्रक्रिया में आगे बढ़ने की प्रेरणा मानते हैं वहीं ज़्यादातर लोग इसे व्यक्तिगत अनुभव जान बस ’आह’ कर भूल जाते हैं.

                          भेदभाव भरे माहौल में बराबरी के व्यवहार, अन्याय-अपमान से बचने के लिए न जाने कितनों को अपनी पहचान छुपानी पड़ती है ये कहीं न कहीं समाज के दोहरे चरित्र का बोझ लोगों पर डालता है. हम ऐसी संस्कृति को महान कैसे कह सकते हैं जहाँ दूसरों को कमतर दिखाने की प्रक्रिया, साज़िशें सदियों से चली आ रहीं हैं. हाल ही में द वायर में यह खबर छपी "जेलों में बंद दलित, आदिवासी, मुस्लिमों की संख्या देश में उनकी आबादी के अनुपात से अधिकः एनसीआरबी" , एक और खबर "बहुजनों और मुस्लिमों के लिए इंसाफ की राह मुश्किल क्यों है" ( https://thewirehindi.com/137168/ncrb-data-higher-share-of-dalits-tribals-muslims-in-prison-than-numbers-outside/  दूसरी खबर का लिंक- https://thewirehindi.com/137907/adivasi-dalit-muslims-indian-society-governments/) हम आप रोज़ाना अख़बारों में जाति की वजह से मारपीट, हत्या, बलात्कार, मॉब लिंचिंग की घटनाएं पढ़ते ही हैं साथ ही संस्थागत हत्याओं की ख़बर पढ़ने के आदी हैं जिसमें विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले दलित छात्रों की आत्महत्या, किसानों की आत्महत्या और सीवर कर्मियों की आए दिन मौत की ख़बर शामिल है (https://thewirehindi.com/137510/madhya-pradesh-seoni-farmer-suicide-compensation/, https://thewirehindi.com/137065/himachal-pradesh-two-workers-died-inside-septic-tank/) इनकी मौतें सवाल खड़े करती हैं.

                         चर्चा के क्रम में एक साथी ने अपने ज़मीनी स्तर पर कार्य के दौरान के अनुभव को साझा किया जिसमें बताया कि किस तरह उत्तरप्रदेश में चैरू और खैरवार जनजातियों में उच्चता-निम्नता का भाव बिलकुल वैसे ही है जैसा कि दक्षिण में माला और मालिका जनजातियों में यह ज़हर फैला है. किस तरह से आए दिन मिड डे मील में जाति के आधार पर रसोई पकाने को लेकर भेदभाव किया जा रहा है. जाति के ठेकेदारों द्वारा खुले तौर पर प्रशासन, स्कूल प्रशासन को धमकाया जाता है कि मध्यान्ह भोजन के लिए दलित-वंचित समुदाय के लोगों से रसोई बनवाने से उनके बच्चों का धर्म नष्ट हो जाएगा. ऐसी स्थिति में यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि सरकार, प्रशासन को किसी ख़ास पसंद ( चॉइस के मसले) को किसी भी हालत में प्राथमिकता नहीं देना चाहिए बल्कि समानता के अवसर को लागू करने की आवश्यकता है. अगर सरकार, प्रशासन इस तरह के विवादों, विरोध में अपनी सुविचारित, सुगठित इच्छा-शक्ति प्रगट कर दे तो संस्थाओं में होने वाले जातिगत भेदभाव को रास्ते से हटा पाने की दिशा में सार्थक प्रयास होगा. लोकरंजक व्यवहार और निर्णयों की वजह से ही हम आज भी जाति-धर्म की भंवर में फंसे घुट रहे हैं. समाज में संवेदनशीलता, मानसिकता में बदलाव और संवैधानिक निर्णयों को मुहर लगाने से ही जाति-धर्म दंश की भयावह स्थितियों से बाहर आ पायेंगे और खुली हवा में साँस ले पाने का, आज़ाद मनुष्य की अस्मिता का बोध कर पाएंगे.                          

PS- अर्पिता श्रीवास्तव स्त्री मुक्ति संगठन से जुडी है. वो लम्बे समय से इप्टा रायगढ़ में सक्रिय है.

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