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Saturday, September 5, 2020

प्रतिनिधित्व का सवाल: कुछ और पहलू

 -अंजलि सिन्हा



‘‘अब कौनसा ऐसा क्षेत्र या काम बचा है जहां महिलायें नहीं हैं। भले वह संख्या में कम हो, लेकिन महिला समुदाय का प्रतिनिधित्व तो कर रही हैं !" उसने कहा। उसके कहने का तात्पर्य यह था कि जब सभी जगह वे मौजूद हैं तो फिर जेण्डर बराबरी क्यों नहीं है ? अभी भी औरतें क्यों हिंसा, दमन, और शोषण का सामना कर रही हैं ? इस साधारण से लगनेवाले प्रश्न ने सोचने के लिए बाध्य किया कि प्रतिनिधित्व की हमारी मांग किस लिए थी ? क्या उसके द्वारा जेण्डरगत न्याय और बराबरी भी नहीं मिल सकती थी क्या ?

वह कहती है कि महिलायें इतना काम तो करती हैं और हर जगह वे प्रतिनिधित्व कर रही हैं फिर भी समाज उनके योगदान को क्यों नहीं स्वीकार करता, क्यों बराबरी नहीं देता।

दरअसल यह देने वाला और लेने वाला मसला भी विचारणीय है। आखिर समाज का कौन सा हिस्सा देगा और किसे लेना है ? समाज का कुछ हिस्सा मूर्त भी है, हालांकि समाज से तात्पर्य तो सभी मूर्त-अमूर्त, इन्सानों के बीच रिश्तों से है, शासन प्रशासन से भी है और घर परिवार से लेकर सभ्यता-संस्कृति तथा हर प्रकार के लोगों आदि सबकुछ समाहित है। बहरहाल मेरे हिसाब से लेना-देना कहना तो महज बात करने का एक तरीका है।

प्रतिनिधित्व का शाब्दिक अर्थ यही होता है कि किसी और की तरफ से बोलना, किसी के पक्ष में उस व्यक्ति या समूह की नुमाइन्दगी करना।  यानि ऐसी स्थिति को संबोधित करना जब सब अपनी बात न कह पा रहे हों। यह स्वेच्छा से भी हो सकता है कि व्यक्ति या समूह किसी व्यक्ति विशेष को अपना प्रतिनिधि मान ले या व्यक्ति या समूह की अनिच्छा से भी हो सकता है जबकि पिछड़े समाजों में वर्चस्वशाली व्यक्ति बाकी का मुखिया होने का, उनकी तरफ से बोलने को अपना हक समझे।

निश्चित ही एक जनतांत्रिक किस्म के समाज में विधायिका या पंचायतें या इस तरह की जो इकाइयां होती हैं जहां निर्णय लिए जाते हैं, उनमें प्रतिनिधित्व का मामला स्पष्ट होता है, वहां समय समय पर ये प्रतिनिधि चुने जाते हैं, लोगों द्वारा भेजे जाते हैं। दुनिया भर में राज काज चलाने के लिए प्रतिनिधि भेजे जाने का तरीका है। अगर प्राचीन ग्रीस के सिटी स्टेटस में यह दिखता है या ईसा से कुछ सदी पहले वैशाली, लिच्छवी आदि गणराज्यों में इसके बेहद प्रारंभिक स्वरूप दिखते हैं। निश्चित ही न ग्रीक के अथेन्स, स्पार्टा जैसे गणराज्यों में प्रतिनिधि चुनने में गुलामों की गिनती नहीं होती थी, उसी तरह की सीमाएं वैशाली, लिच्छवी जैसे गणराज्यों में थी।

लेकिन समाज में जब हाशिए के लोगों के प्रतिनिधित्व की बात हम करते हैं तो उसका अर्थ बिल्कुल ही भिन्न होता है। ऐसा माना जाता है कि वह प्रतिनिधि अपने वर्ग, समुदाय, जेण्डर के लोगों के हित के लिए काम करेगा। और यह प्रतिनिधि बदलते भी रह सकता है।

निश्चित ही हर गैर बराबरी वाले समाज में ही इसकी जरूरत पड़ेगी यदि बराबर हैं तो कौन किसका प्रतिनिधित्व करेगा ? यदि समान अवसर उपलब्ध हो तो अपना पक्ष रखने के लिए अपने ही समुदाय से किसी को क्यों भेजेगा, किसी को भी भेजेगा!

किसी कमेटी, संसद, विधान सभा, पार्टी, संगठन आदि कहीं भी यदि जेण्डर संवेदनशीलता का मुददा, महिलाओं के मुददों के प्रति समझ या सरोकार क्या इस बात से तय होगा कि वहां महिलाओं की भागीदारी है या नहीं ? महिलाओं की भागीदारी इन सभी जगहों पर सुनिश्चित होनी चाहिए क्योंकि उनको शामिल नहीं करने की कोई वाजिब वजह नहीं है। सभी जगहों पर भागीदारी उनका हक है लेकिन इस भागीदारी के पीछे यदि हमारी समझ यह है कि फिर उक्त जगह से महिलाओं को मुददा बेहतर ढंग से उठाया जा सकेगा क्योंकि महिला होने के नाते वे अच्छी तरह से समझ पायेंगी कि महिलाओं के मुददे क्या हैं तथा महिला प्रतिनिधि ही महिला मुददे के प्रति संवेदनशील होंगी तो यह समझदारी लोकलुभावन और सतही होगी।

सिर्फ अनुभव के बाद आप यथार्थ को समझ सकते हैं या कल्पना कर सकते हैं, यह बात इसी सच्चाई को प्रतिबिम्बित करती है कि आप मानव इतिहास को ठीक से नहीं समझे हैं। इतिहास के कौन से दौर में हम हैं, हमारी सामाजिक चेतना की यात्रा कहां पहुंची है, उसी में किसी मुददे की समझ तय होती है।

कल्पना करें कि आज़ादी के समय 1947 में सरकार बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ महिलाओं को मिली होती तो क्या जेण्डरभेद का मसला हल हो गया होता ? संविधान में स्त्राी की बराबरी के लिए जो प्रावधान रखे गए, हिन्दु कोड बिल के जरिए हिन्दु स्त्रियों को जो अधिकार दिलाने की कोशिशें हुईं, इस सब इतिहास को हम जानते हैं। इसके खिलाफ सनातनी, रूढिवादी तत्वों ने किस तरह संघर्ष किया यह बात भी विदित है। निश्चित ही वह प्रावधान अपर्याप्त थे लेकिन यह अपर्याप्तता तब भी बनी रहती यदि सिर्फ महिलाएं सरकार में होतीं। यानि कि पूरे समाज में जो मुददा एजेण्डा पर आ चुका होता है उसके पक्ष या विपक्ष में खड़ा होने की चेतना निर्मित हो चुकी होती है।

हर समाज और हर दौर में कुछ लोग, कुछ वैज्ञानिक, समाजशास्त्री, साहित्यकार अपने समय से जरूर बहुत आगे के समाज के बारे में सोच लेते हैं और ऐसे ढेरों उदाहरण मिल सकते हैं, लेकिन पूरे समाज की चेतना उन्नत होने में काफी समय लगता है।

प्रतिनिधित्व आवश्यक है, लेकिन उसे अंतिम समाधान मान लेने की सोच किस तरह उत्पीड़ित समूहों, व्यक्तियों को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य से दिग्भ्रमित कर सकती है या वंचित कर सकती है, यह समझना जरूरी है। 

मिसाल के तौर पर दक्षिण के एक मशहूर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबन्दी को लेकर जब अदालत के सामने मामला आया तो बहुमत से यही फैसला हुआ कि यह पाबन्दी गलत है, लेकिन इसमें अल्पमत में एक महिला जज थी।

प्रख्यात अम्बेडकरवादी विचारक एवं कार्यकर्ता प्रोफेसर आनंद तेलतुम्बडे - जिन्होंने जाति के मसले पर विपुल लेखन किया है - अपनी एक किताब में खैरलांजी काण्ड के बहाने प्रतिनिधित्व के इस ‘मिथ’ पर रौशनी डालते हैं। /पेज 185-86/मालूम हो कि 2006 में अंजाम दिए गए खैरलांजी हत्याकांड में /29 सितम्बर 2006/ दलित समुदाय से सम्बद्ध भोतमांगे परिवार के चार सदस्यों - प्रियंका एवं उनकी मां सुरेखा और प्रियंका के दो भाइयों को सरे आम गांव में पीट पीट कर मार डाला गया था, प्रियंका एवं सुरेखा दोनों सामूहिक यौन अत्याचार का शिकार भी हुई थीं।

मालूम हो कि यह बीभत्स हत्याकांड लगभग दफना दिया गया था, न स्थानीय अख़बारों ने, न बड़े दलित नेताओं ने रूचि दिखायी, अलबत्ता दलित युवाओं एवं प्रबुद्ध लोगों की जागरूकता के चलते यह उजागर हो सका था। अपनी किताब में बताते हैं कि दलितों के अन्दर यह मिथक व्याप्त है कि अगर उनके अपने लोग नौकरशाही तंत्र में विराजमान होंगे तो वह अधिक दलित अनुकूल होंगे। यही मिथक आरक्षण के बड़े हिस्से को आधार प्रदान करता है। फिर वह बताते हैं कि किस तरह खैरलांजी प्रसंग में जिले की मशीनरी दलित तबके से ही संबंधित थी। भंडारा जिले का पुलिस अधीक्षक और उपपुलिस अधीक्षक, स्थानीय पुलिस स्टेशन इन्स्पेक्टर एवं इलाके का कान्स्टेबल, वह डॉक्टर जिसने पहला पोस्टमार्टेम किया, जिला सिविल सर्जन, पब्लिक प्रॉसिक्युटर जिसने इस मामले में अत्याचार विरोधी कानून लगाने का विरोध किया। वह पूछते हैं कि ‘आप इस मामले में ‘ब्राहमणवादी लोगों’ या ‘शूद्र मानसिकता’ को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। समूचा स्थानीय तंत्र दलितों से भरा था, लेकिन वह अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरा करने में पूरी तरह असफल रहा।’

सोवियत रूस में क्रांति के बाद जब कम्युनिस्ट पार्टी की अगुआई में सरकार बनी तब उसने महिलाओं के मुददे को किस तरह सम्बोधित किया यह देखनेलायक है। हो सकता है कि आज नारीवादी चेतना का स्तर जहां पहुंचा है, उसके अनुरूप वह पूर्ण बराबरी तक नहीं पहुंचता है। लेकिन हम विश्लेषण करते समय तत्कालीन जारशाही के मातहत पूरी सामाजिक चेतना में यह मुददा कहां पर पहुंचा था यह अन्दाजा लगा सकते हैं। मान लें जब चीन में कम्युनिस्ट पार्टी /1949 में/ सत्ता में आयी - और उस समय पूरा पोलित ब्युरो महिलाओं का ही होता और सत्ता के निर्णायक पदों पर महिलाएं ही बैठी होतीं तो जेण्डर के हर सवाल क्या हल हो जाते ?

आज किसी भी देश में समाजवादी व्यवस्था तो छोड़िये, पूंजीवादी, उदारवादी व्यवस्था भी जेण्डर के मसले को छोड़ नहीं सकते हैं, भले ही वह समाज स्त्राी के प्रति हिंसक हो, रूग्ण मानसिकता का हो, स्त्राी के शोषण उत्पीड़न में कोई कसर ना छोड़ता हो तब भी।

1 comments:

Arpita said...

निश्चित ही प्रतिनिधित्व का मसला बहुत ज़रूरी पहलू है पर सवाल यही है कि प्रतिनिधि की सामाजिक और राजनैतिक चेतना क्या है।
शोषित पक्ष का प्रतिनिधि ही मुद्दे उठायेगा इस मिथक से जितनी जल्दी बाहर आ सकें उतना अच्छा होगा। बात है मानसिकता और संवेदनशीलता की और उसे मास लेवल में लागू किए जाने की। आपने बहुत महत्त्वपूर्ण बात रेखांकित की है कि
" प्रतिनिधित्व आवश्यक है, लेकिन उसे अंतिम समाधान मान लेने की सोच किस तरह उत्पीड़ित समूहों, व्यक्तियों को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य से दिग्भ्रमित कर सकती है या वंचित कर सकती है, यह समझना जरूरी है।"

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