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Tuesday, September 29, 2020

हाथरस बलात्कार काण्ड - समाज अब और क्या समाधान पेश करेगा ?

- अंजलि सिन्हा


हाथरस के बलात्कार पीड़िता की मौत हो चुकी है और ताज़ा ख़बर के मुताबिक उसका अंतिम संस्कार भी किया जा चुका है।

परिवारवालों का कहना है कि 14 सितम्बर को अपने ही गांव के नौजवानों द्वारा सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई उनकी बेटी के दोषियों पर कार्यवाही करने में पुलिस ने फुर्ती नहीं बरती जबकि पुलिस इस मामले में अपने को बेदाग बता रही है। अभी तक चार आरोपी पकड़े जा चुके हैं जो गांव के ही वर्चस्वशाली जाति से सम्बन्ध रखते हैं।

और अब दोषियों को दंडित करने का मामला सुर्खियों में है। हमेशा की तरह सख्त़ से सख्त़ सज़ा तुरंत सुनाने की बात जोर पकड़ रही है।

पहले के कुछ बलात्कारियों की फांसी भी हो गयी है, जो कि समाज और निर्भया के माता पिता की मांग थी, हैद्राबाद में दिसम्बर 2018 में सामने आयी बलात्कार की घटना में एनकाउन्टर की मांग का भी प्रयोग कर लिया गया है और बलात्कारियों को गांव वालों द्वारा या भीड़ द्वारा पीट पीट कर मारे डाले जाने की घटना भी हम सुन चुके हैं। कथित तौर पर ‘समाज की सामूहिक भावना को शांत करने’ का ऐसा ही सिलसिला जारी रहा तो आने वाले दिनों में हम यह भी सुनेंगे कि लोग बलात्कारियों को चौराहों पर सरेआम फांसी देने या अभियुक्तों को भीड़ को ही सौंपने जैसी मांग कर रहे हैं।

लेकिन क्या ऐसे प्रस्ताव - जो किसी कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेने से बचने या उन्हें बाईपास करने की बात करते हैं - वाजिब कहे जा सकते हैं ?

Monday, September 21, 2020

स्त्रियों के लिए टायलेट की कमी - तकनीकी समाधान से परे जाने की जरूरत

 - अंजलि सिन्हा


 Image Courtesy- DNA newspaper


समस्या जब सिर पर आए तो उसका फौरी तकनीकी किस्म का समाधान ढूंढने  में जुटे लोगों से यह अपेक्षा न करें कि वह बतायें कि अमुक समस्या क्यों है और उसका सही न्याय पूर्ण और स्थाई समाधान क्या होना चाहिए ?

बात है महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों, सड़कों, पार्कों, हाट-बाजारों आदि सभी जगह पर्याप्त संख्या में शौचालयों की उपलब्धता की। यह मुददा पुराना है लेकिन समाधान अभी भी नहीं हुआ। अब कोविड समय में जब सार्वजनिक शौचालयों में ताला लग गया तो ऐसे समय में भी जो अपनी ड्यूटी सड़क पर या किसी अन्य खुले स्थान पर, तब लगभग दो दशक पहले बने एक उपकरण ‘शीवी’ (Shewee) की बिक्री में अचानक जबर्दस्त इज़ाफा देखा गया है।

Monday, September 14, 2020

Menstruation: Unpacking the myth

- Ananya



Imagine a state where all colours have lost their meaning. Where the vermilion on my forehead fails to convey my commitment towards the better sex, where my residence in a red light area is not described in sense of some obscene nocturnal place celebrating and upholding the fragile masculinity and where the red patch on my cloth does not convey the original sin of being born a human but identified as a gendered male envying women.

Friday, September 11, 2020

सवाल तो साफ़ है पर नीयत में खोट

 - अर्पिता श्रीवास्तव 

                         परिपक्व संविधान की इबारत २६ जनवरी, १९५० से हमारे सामने है, उसे पढ़ने, समझने, देखने के अनगिनत नज़रिए हमारे सामने है पर हर बार जब कोई असमानता/ग़ैर-बराबरी की दुर्घटना घटती है, जब कोई न्याय मांगती आवाज़ को सरकार और प्रशासन की मिली-भगत से दबाया जाता है, जब कोई जेंडर मुद्दों पर अपनी क्रूरता, असंवेदनशीलता का उदाहरण पेश करता है,ज़ेहन में यही सवाल आता है कि आख़िर सवालों के घेरे में हम कब तक गोल-गोल चक्कर लगाते दिन के बाद दिन, बरस दर बरस तय करते चलेंगे, आख़िर कब हम संवेदनशील समाज बना पायेंगे? समय के साथ जिन बातों को इतिहास की बात बन दफ़्न हो जाना था वह एक लंबे समय से और वर्तमान में सबसे ज़रूरी मुद्दा बन चुका है. हर बात, हर मुद्दे को एक ख़ास कोण से देखने की गजब प्रतिभा हमारे देश ने अर्जित कर ली है. उस ख़ास कोण में धर्म, जाति और जेंडर ने लोगों को क्रूरता की ललित कला विकसित करने में महारत दे दी है. ये ऐसी बातें हो गई हैं जो रोज़मर्रा की छोटी सी छोटी गतिविधियों का हिस्सा हो गई हैं.

Saturday, September 5, 2020

प्रतिनिधित्व का सवाल: कुछ और पहलू

 -अंजलि सिन्हा



‘‘अब कौनसा ऐसा क्षेत्र या काम बचा है जहां महिलायें नहीं हैं। भले वह संख्या में कम हो, लेकिन महिला समुदाय का प्रतिनिधित्व तो कर रही हैं !" उसने कहा। उसके कहने का तात्पर्य यह था कि जब सभी जगह वे मौजूद हैं तो फिर जेण्डर बराबरी क्यों नहीं है ? अभी भी औरतें क्यों हिंसा, दमन, और शोषण का सामना कर रही हैं ? इस साधारण से लगनेवाले प्रश्न ने सोचने के लिए बाध्य किया कि प्रतिनिधित्व की हमारी मांग किस लिए थी ? क्या उसके द्वारा जेण्डरगत न्याय और बराबरी भी नहीं मिल सकती थी क्या ?