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Monday, August 31, 2020

रोज अनसुनी रह जाती हुई चीखें

 - अपर्णा

https://www.youtube.com/watch?v=scwYray2Dsk - link to movie


कोविड-19 के प्रभाव ने हमारे सामने दुनिया को देखने का अलग नज़रिया दे दिया है । कहा यह भी जा सकता है कि उसने चीजों , स्थितियों और मनुष्यों के प्रति हमारे नज़रिये को बदलने को हमें मजबूर कर दिया है । समय न होने के पूंजीवादी मंत्र को उसने तहस-नहस कर दिया । मार्च से अब तक के लगभग पाँच महीनों  में समय न होने का मिथक टूट गया है । संसद , न्यायपालिका सबकुछ ठप और कॉर्पोरेट भी चारों खाने चित्त । उसने सबसे पहले अपनी जवाबदेहियों से पल्ला झाड़ा और फिर सामाजिक जिम्मेदारियों से भी । अपने लिए सुविधाजनक वर्क फ्राम होम की गुंजाइश निकाली । कोविड ने दुनिया को घरों में समेट दिया। इसके अनेक भयावह पक्ष हैं जो समाज के अनेक संस्तरों पर अलग-अलग तरीके से प्रभाव डालते हैं । इसका सबसे नकारात्मक प्रभाव स्त्रियॉं पर पड़ा है । वे समाज के हरेक संस्तर पर शोषण , दमन और हिंसा का शिकार हुईं । कहीं उनके लिए रोजगार की समस्या खड़ी हुई तो कहीं पारिवारिक अत्याचार की । मध्यवर्ग की स्त्रियाँ भी इससे अछूती नहीं रहीं । इसी विषय को लेकर प्रख्यात अभिनेत्री नन्दिता दास ने सात मिनट की एक लघु फिल्म–लिसन हर (उसको सुनो) बनाई । फिल्म की कहानी कुल इतनी है कि नन्दिता दास कोरोना काल में वर्क फ्राम होम कर रही है । बीच में बच्चे को खेल और पढ़ाई संबंधी निर्देश देती रहती है । बच्चा माँ के साथ ही अधिक दिखता है । दूसरे कमरे में मौजूद पिता से उसका कोई खास सरोकार नहीं दिखता । कुरियरवाला आता है तब भी दरवाजा पत्नी खोलती है । पति अंदर से आदेश देता है । फिल्म का हुक पॉइंट यह है कि नन्दिता दास के फोन पर बार बार एक अन्य महिला का फोन आता है और उधर से पुरुष के डांटने-फटकारने-मारने की आवाज आती है और स्त्री बचने की कोशिश करते हुये चीखती है । वह फोन पर नन्दिता दास से सहायता की गुहार लगाती है । नन्दिता दास के सामने दोहरा संकट है । उस पर वर्क लोड है लेकिन वह संवेदनशील स्त्री है । झुंझलाहट के बावजूद फोन को इगनोर करना उसके लिए असंभव है । लिहाजा वह न केवल फोन सुनती है बल्कि पुलिस को फोन करती है जहां से उदासीन जवाब मिलता है और अधिक ज़ोर देने पर यह कहा जाता है कि पुलिस को अपनी ड्यूटी खूब पता है कि उसे क्या करना चाहिए । अंततः वह महिला को कॉलबॅक करती है । फोन महिला का पति उठाता है गुस्से में कहता है रांग नंबर । फिल्म खत्म हो जाती है ।

Wednesday, August 26, 2020

मानसिक स्वास्थ्य- मीटिंग रिपोर्ट

 - पद्मा सिंह 



स्त्री मुक्ति संगठन ने लॉक डाउन के दौरान कुछ  विशेष चर्चाएं आयोजित की  |   हिमानी कुलकर्णी  के द्वारा 3 जुलाई को Socio-political dimension of Mental Helth पर की गयी चर्चा इसी का एक हिस्सा थी | स्त्री मुक्ति संगठन पहले की कार्यशालाओं में  मानसिक स्वास्थ्य पर दो सत्र आयोजित कर चुका है । हिमानी, एक मानसिक स्वास्थ सलाहकार हैं । 

Friday, August 21, 2020

Na mandir, Na masjid!

- Nighat Gandhi




November 9th, 2019. Judgment day. Allahabad’s streets were unusually deserted. For someone like me who abhors driving and having to share roadspace with other cars, pedestrians and cattle, I was relieved. I had to get a document attested so I ventured out to Kutchery that morning. No cars, no ricks, no pedestrians, not even stray cows. Parking was no problem for once. Even the cows figured out to stay away.

Before I reached this Kutchery, I stopped at a photocopying shop in Katra market. Men were sitting idly, discussing the Ram Mandir judgment in low tones. I found R.B. Singh, advocate, sitting behind a wooden desk in an enclosure filled with empty desks. No other lawyers or litigants were present. R. B. Singh was anxious to please. How many copies did I want attested? He took out his stamp pad in a jiffy, pressed the rubber stamp on the pad, and stamped the purple “thappa” on the photocopies, and signed his name. He didn’t bother to see the original document to compare it with the copies before attesting it.

I asked R. B. Singh how much I had to pay.

De dijye samajh ke.

I gave him 50. He didn’t look happy. I added 50 more. R. B. Singh took it, but looked forlorn. No other customers seemed likely that morning after the hyped up security concerns in anticipation of unrest or protests following the Ram Mandir judgment.

A traffic-free Kutchery, a pedestrian-free Allahabad, has never been so quiet even on a Sunday, as it was on that morning. I sighted one banana and one apple seller on a street normally packed with roadside vendors.  If only building a massive mandir where a masjid once stood could grant better jobs, better daily wages for vegetable walas and fruit walas, and bring down the price of onions and potatoes!

Friday, August 14, 2020

Whose Freedom is it Anyway?

 Renu Singh





For about a month during the Covid times, I have started listening to the FM radio in the morning, with my cup of coffee. There are usually lots of advertisements of various businesses, brands and motivational speech by Sadguru (a new segment which was started few days ago and is called an hour of positivity). I either avoid them or laugh about it.  However these seemingly two different things have many similarities. Today morning while listening to the radio two sets of advertisements caught my attention. One of them was about Independence Day sale in a shopping mall in Ghaziabad, and another of a fancy housing complex in National Capital Region (NCR). These sales are called “freedom sale”. The first one’s catch phrase was freedom to shop in a safe environment, and the second’s ones was to live in a luxurious housing environment with freedom. Both of them were based on the idea of free choice, and are using the occasion of Independence Day to sell the idea of “freedom”. These two suddenly reminded me of last three days development in news. One of them was about an Assistant Professor of Assam booked by police over a FB post about Ram, which supposedly is “derogatory”. Keep in mind the recent shilnyas of Ram temple in Ayodhya. Where in the middle class was furious over Tabligi Jamat gathering and held the entire community responsible for the spread of corona, but at the same time did not utter a single word about “Bhoomi Pujan” event at Ayodhya, rather celebrated it with lighting diya’s (candles) followed by victory procession in many localities.  

Monday, August 10, 2020

वर्क फ्रॉम होम के दौर में लैंगिक उत्पीडन का बदलता स्वरूप

 - उपासना बेहार

कोरोना वाइरस के कारण देश में सम्पूर्ण लाक डाउन किया गया जिससे सबको घर के अंदर रहने को बाध्य कर दिया गया जिसके चलते लोग घर से ऑफिस का काम (work from home) करने लगे. पहले भारत में कम संख्या में वर्क फ्राम होम होता था लेकिन लाक डाउन के कारण इसका चलन बहुत बढा है. अब लाक डाउन खुलने के बाद भी बड़ी संख्या में लोग अपने घर से ही काम करने लगे हैं. महिलायें भी इससे अछूती नहीं रही हैं. उन्हें भी वर्क फ्राम होम करना पड़ रहा है. लेकिन इस दौरान महिलाओं के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष वर्चुअल यौन उत्पीडन के मामले सामने आ रहे हैं.

Tuesday, August 4, 2020

नई शिक्षा नीति 2020 में क्या सही नहीं है!

 - तारा शंकर 

34 सालों बाद नई शिक्षा नीति 2020 आयी है! 2015 में बनी सुब्रह्मण्यन कमिटी और फिर 2017 में बनी कस्तूरीरंगन समिति की सिफ़ारिशों को शामिल करते हुए इस ड्राफ्ट को तैयार किया गया जिसे कैबिनेट पिछले हफ़्ते मंजूरी दे दी है! इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की ज़रुरत थी लेकिन क्या ये नई शिक्षा नीति कोई आशावादी परिवर्तन की बात करती है? करती है तो कितने ठोस आधारों पर? क्योंकि नीतियाँ तो पहले भी आती रही हैं लेकिन असली समस्या तो ज़मीन पर क्रियान्वयन की रही है! क्या अच्छी बातें हैं इस नीति में और कौन सी बातें कहने-सुनने में अच्छी तो लग रही हैं लेकिन वो असल में अच्छी हैं नहीं?