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Thursday, July 23, 2020

पुस्तक परिचय - 'धर्म के नाम पर' लेखक: गीतेश शर्मा


पुस्तक परिचय : अंजलि सिन्हा 




धर्म को लेकर हमारे देश में आज जो हालत बनी है और हिन्दुत्ववादी ताकतों ने अपने आप को जैसे मजबूत किया है, यह हमारे सामने है। पूरे समाज के बड़े हिस्से को धर्म के नाम पर कैसे मूर्ख बना सकते हैं, बरगला सकते हैं और 21 वीं सदी में भी धर्म को लेकर हिंसक वातावरण तैयार किया जा सकता है, इसे हम अपने आंखों के सामने घटित होता देख सकते हैं, बशर्ते आप अंधभक्त नहीं हैं तो। हम सभी सोचने पर मजबूर हैं कि आखिर धर्म ने इतनी ताकत इतनी स्वीकार्यता कैसे हासिल की ? ऐतिहासिक रूप से इसकी क्या भूमिका और उपयोगिता रही है ? और इसका शिकार न सिर्फ हमारा देश है बल्कि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में इसके नाम पर मार काट मचाया जा सकता है और सत्ता पर काबिज होने का यह एक उन्मादी नज़रिया बना है।

हमारे देश के ऐसे हालात में कुछ लोग साझी संस्कृति , गंगाजमुनी तहजीब आदि को पुनर्स्थापित करने की बात करते रहे हैं। यह तहजीब रही है इसमें सहमति भी हो तो भी यह देखना पड़ेगा कि तनाव भी रहा ही है और दूसरी बात कोई भी व्यक्ति या पार्टी आखिर जनता को बहकाती है या अपने हित साधन के लिए धर्म/आस्था का इस्तेमाल कर पाती है तो वह इसीलिए कि लोगों में ऐसी भावना पहले से मौजूद होती है। इस संदर्भ में यह जरूरी हो जाता है कि धर्म का स्वरूप अपने उदगम समय से ही कैसा था और उसने इतिहास में मानवता के साथ क्या व्यवहार किया चाहे वह कोई भी धर्म हो, इसे देखा जा सकता है।
गीतेश शर्मा की किताब ‘धर्म के नाम पर’ जो इन दिनों तीसरे संस्करण में चल रही है, इस सबकुछ को समझने के लिए उपयोगी है। अलग अलग धर्म क्या कहते हैं, अधिकतर हमारे जैसे लोग जो धर्मग्रंथों के अध्ययन में अपना समय नहीं लगा पाते हैं, वे सभी इससे लाभान्वित हो सकते हैं। इस किताब के द्वारा धर्मग्रंथों में क्या कहा गया है, तमाम धार्मिक उपदेश क्या कहते हैं और मानवता के इतिहास में उनकी क्या भूमिका रही है, इन सभी बातों को आप यहां आसानी से समझ सकते हैं।

तार्किकता और नास्तिकता के लिए अच्छी पृष्टभूमि  किताब तैयार करती है क्योंकि वह इन चक्करों मेें नहीं पड़ती है कि उनका पहले स्वरूप कितना अच्छा था जिसे बाद के धर्माचार्यों ने बिगाड़ दिया। किताब स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि धर्म कैसे अपने शुरूआत से ही वह तमाम अज्ञानता को बढ़ानेवाला होता है, अपने मत के प्रचार के लिए दूसरे धर्म के मानने वालों को नेस्तनाबूद कर देने के मिशन को आगे बढ़ाता है और आस्था के नाम पर सत्ता और ऐयाशी के मिश्रण को पेश करता है। कैसे हर धर्म का पेड़ इन्सानों के खून से सींचा गया है। अब तक दुनिया भर में सबसे अधिक हत्यायें धर्म के नाम पर हुई हैं, जो सहिष्णुता के पाठ पढ़ाते हैं उनके हाथ भी मासूमों के खून से रंगे हैं।
ये हम सभी जानते हैं कि यहूदी धर्म, ईसाई और इस्लाम तीनों अब्राहम को अपना पहला पैगम्बर मानते हैं और इसलिए इन तीनों को अब्राहमिक धर्म भी कहा जाता है। इन तीनों में चूंकि यहूदी धर्म सबसे प्राचीन है और इसलिए बाकी दोनों पर यहूदी धर्म का प्रभाव देखा जा सकता है। लेखक बताते हैं कि हिन्दू धर्म इन सभी में सबसे पुराना है। इस किताब में तीन धर्मों की ही - हिन्दू धर्म, ईसाई धर्म तथा इस्लाम - मुख्यतः बात हुई है क्योंकि भारत सहित दुनिया भर में इन तीन का प्रभाव ही अधिक है और इन तीन की कारगुजारियांे ने ही इन्सानियत को सबसे अधिक धक्का पहुंचाया है।
प्रस्तुत है इस किताब का एक संक्षिप्त परिचय !

अपनी बात
किताब की शुरूआत में ही लेखक ‘अपनी बात’ में लिखते हैं कि धर्म को मानव कल्याण का महत्वपूर्ण उपादान चित्रित किया गया है किन्तु धर्म का अज्ञानता एवं विषमता के साथ गहरा सम्बन्ध है। अन्याय एवं विषमता पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को पुष्ट करने में धर्म का बहुत बड़ा हाथ है। एक तरफ वह महान उपदेशों एवं नैतिक आदर्श की बात करता है लेकिन दूसरी तरफ अपने वर्चस्व एवं श्रेष्ठता को बनाए रखने के लिए हिंसा को प्रश्रय देता है।
पहले अध्याय में और उससे पहले अपनी बात में उनका अधिक फोकस हिन्दु धर्म की विसंगतियों पर दिखता है। लेकिन दूसरे अध्याय में जब हिन्दू धर्म पर लिखते हैं तो कई बार लगता है कि हिन्दू धर्म पर उदार पक्ष लिया है जब वे कहते हैं कि हिन्दू धर्म तुलनात्मक रूप से अधिक सहिष्णु है। इसलिए इस दूसरे अध्याय को पहले पृष्टभूमि यानि ‘‘अपनी बात’’ और पहला अध्याय ‘‘मानव ईश्वर और धर्म’’ से जोड़ कर देखना होगा तथा हिन्दू धर्म और दासता तथा हिन्दू धर्म और नारी वाला अध्याय एवं आखिर का अध्याय जो धर्म बनाम मानवता है उसे समेटते हुए देखें तो हिन्दू धर्म के अन्दर छिपा गहरा द्वेष, हिंसा और कूढमगजपन उजागर हो जाता है। इसलिए यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि उन्होंने हिन्दु होने के नाते कुछ रियायत बरता है।
शेष दोनों धर्मों के प्रति भी लोकरंजकतावादी बात किए बिना उनकी तीखी आलोचना सम्बन्धित अध्याय में ही लेखक कर देते हैं और आखिर के अध्याय या शुरू के या फिर धर्म और दासता या धर्म और नारी वाले अध्याय में इसकी ज्यादा चर्चा नहीं करते हैं।

2 मानव -ईश्वर -धर्म 
यह पहला अध्याय है जिसमें लेखक मुख्यतः बताते हैं कि अपने वर्चस्व एवं प्रभुत्व को बनाये रखने के लिए धर्म ने हिंसा का सहारा लिया है।
आस्था के नाम पर लोगों को शारीरिक एवं मानसिक रूप से ईश्वर का गुलाम बना दिया।
इस अध्याय में लेखक मानव जाति के विकास यात्रा के इतिहास पर रौशनी डालते हैं। वे बताते हैं कि मानव जाति का उद्धव एवं विकास लगभग 40 लाख वर्ष का है। वह जंगल में हिंसक पशुओं से स्वयं को बचाते हुए प्राकृतिक परिस्थितियों से जूझते हुए अपने लिए आहार एकत्र करता था। पैरों के बल खड़ा होने में, हाथों से काम करने में और दूर तक देखता सीखने में उसे लाखों साल लगे।
मस्तिष्क की विशेष बनावट के कारण अनुभव और खोजों से वह विकसित होती गयी। पशु और मनुष्य के बीच मूल अन्तर यही था कि विकास की प्रक्रिया में मनुष्य का मस्तिष्क परिस्थितियों का सामना करने में सीखता समझता गया जबकि पशु परिस्थिति को न समझने के कारण बचता रहा।
मनुष्य का सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण आविष्कार आग था। मस्तिष्क की जटिल संरचना, सीधा खड़े होकर चलना, शारीरिक गठन तथा आग का इस्तेमाल आदि ने मिल कर मनुष्य के जीवनयापन का ढंग पशुओं से अलग होता गया।
जब पशुओं से अपनी रक्षा के लिए पत्थर और लकड़ी के अनगढ़ हथियार को इस्तेमाल शुरू किया यहीं से प्रस्तरयुग की शुरूआत होती है।
आग की तरह भाषा की उत्पति भी मानव विकास में क्रांति थी। लेकिन भाषा से पहले ही मनुष्य पत्थरों, भित्तियों और शिलाखण्डों पर खुद को व्यक्त करने लगा था। ध्वनि संकेतों को संयोजित कर बोली और भाषा का विकास होता है।
आदि मानव पूरी तरह प्रक्रति पर निर्भर था और प्रक्रति की आक्रामकता से वह भयाक्रांत था। 40 लाख वर्षों में से उसने 39 लाख 90 हजार वर्ष पेड़ों पर जंगलों में एवं गुफाओं में बीताया था।
8-10 हजार साल पहले की उसने खाने के अलावा कुछ सोचना शुरू किया। प्रकृति के अधिकांश रहस्य उसके समझ से परे थे। बादल का गरजना, ओलाव्रष्टि, बिजली का कड़कना, मृत्यु आदि। उसकी इस अज्ञानता, सपने और कल्पना करने की शक्ति आदि ने मिल कर देवी देवताओं को जन्म दिया।
भय, असुरक्षा एवं अज्ञानता के कारण ईश्वर की अवधारणा का जन्म हुआ लेकिन बाद में उसकी बुद्धि एवं चेतना ने मिल कर धर्म की स्थापना कर समाज को अनुशासित करने के लिए आचार-संहिताओं का निर्माण किया।
सर्वशक्तिमान अलौकिक सत्ता से युक्त ईश्वर के प्रति अंधश्रद्धा जागृत  करने के लिए चमत्कारों के किस्से गढ़े गए। जहां विपदाओं से निपटने में उन्हें सम्बल देते थे वही पाप-पुण्य, स्वर्ग नरक, पुनर्जन्म, आदि में विश्वास ने मनुष्य को यथास्थितिवादी बना दिया। अन्याय एवं विषमता को ईश्वरीय बता कर आक्रोश एवं विद्रोह को दबा दिया।
अपने प्रारम्भिक काल से ही धर्म शासक एवं शोषक वर्ग के हित साधन का माध्यम रहा है। राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि बता कर उसके अनुचित कार्यों को धर्मसम्मत बताया गया। धर्म ने प्रजातंत्र को कभी स्वीकार नहीं किया।
भारत में धर्म का कर्मकाण्डी स्वरूप पौराणिक युग में विकसित होता है। 19 वीं, 19 वीं सदी के नवजागरण के दौर में समाज सुधारकों ने सुधार के प्रयास किए लेकिन पुराणों का प्रभाव कायम रहा।
बुद्धिवादियों को हमेशा ही धार्मिक कटटरवादियों के प्रताडना का शिकार बनना पड़ा। पुस्तकों को जलाया जाता था ताकि लोग ज्ञान प्राप्त न कर सकें।
बीच भारत में यह आम धारणा है कि नास्तिकता आधुनिक काल की और यूरोप की देन है, यह एक भ्रांत धारणा है।
चार्वाक, बृहस्पति, शुक्राचार्य, जाबालि आदि भारतीय संस्कृति में प्रमुख नास्तिक दर्शन रहे हैं। लेखक बताते हैं कि नास्तिकता और अनास्था एक ही चीज़ नहीं है। नास्तिकता का अर्थ यह नहीं है कि उसका किसी भी वस्तु में आस्था नहीं हो सकता है। नास्तिकता का मतलब अनिश्वरवाद यानि जो यह मानता है कि सृष्टि के रचयिता ईश्वर नहीं है।
आस्था अनास्था किसी भी चीज में हो सकती है।

3. हिन्दू धर्म
किताब का दूसरा अध्याय हिन्दू धर्म पर केन्द्रित है।
लगभग 40 लाख वर्ष पहले मनुष्य की उत्पत्ति हुई और लगभग साढे़ पांच हजार वर्ष पहले ईश्वर धर्म दर्शन की स्थापना का प्रारम्भ होता है। वे फिर से बताते हैं कि कैसे प्राकृतिक रहस्यों को न समझ पाने के कारण अलौकिक शक्तियों पर अंधविश्वास बढ़ता ही गया।
हिन्दू धर्म का काल साढ़े तीन चार हजार वर्षों का है लेकिन हिन्दू शब्द तेईस-चौबीस सौ वर्ष पूर्व सिकन्दर के (ई पू 327 से 325) भारत आक्रमण के बाद पहली बार प्रयोग हुआ। उसके लगभग एक हजार वर्ष बाद मोहम्मद बिन कासिम (सन 712) के भारत आक्रमण के बाद प्रचलित हुआ। फारस से आए आक्रमणकारी एवं व्यापारी - ‘‘स’’ का उच्चारण ‘‘ह’’ करते थे तो सिन्धु नदी के इस पार रहनेवाले को हिन्दू बोलते थे और उनका धर्म हिन्दू कहलाया। इसके पहले हिन्दुओं को आर्य या भरतवंशी कहा जाता था।
हिन्दू धर्म की उत्पत्ति वैदिक काल से मानी जाती है और इनके आदि ग्रंथ वेद हैं। लगभग 1500 से 900 ईसापूर्व को वैदिक काल एवं 900 से 500 ईसापूर्व को उत्तर वैदिक काल के रूप में जाना जाता है। चार वेद - ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद है। इसमें सबसे पुराना ऋग्वेद 1500 से 1,000 ईसापूर्व के मध्य माना जाता है। ऋग्वेद मुख्यतः विजय और समृद्धि के लिए देवताओं की स्तुति है, यजुर्वेद में मुख्यतः यज्ञ के लिए कर्मकाण्ड, नियमों का मंत्र है, सामवेद में यज्ञ के समय गायी जाने वाली संस्तुतियां हैं और अथर्ववेद में अधिकांश मंत्रों में प्रेतबाधाओ, अनुष्ठानों का वर्णन है।
ईसा पूर्व सातवीं से पांचवी शताब्दी में अनीश्वरवादी एवं नास्तिक ऋषि मुनियों ने अपने अनुभव ज्ञान बुद्धि तथा तर्क के आधार पर वेदान्त अवधारणाओं का खंडन किया। लोकायत तथा चारवाक दर्शन के आचार्य व्रहस्पति ने तमाम कर्मकाण्डों को उन लोगों के जीविका कमाने का साधन बताया जिनके पास बुद्धि तथा शक्ति का अभाव था। इसी समय ईसापूर्व सातवीं से छठी सदी सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल ऋषि ने जगत को कारण कार्यों की लम्बी श्रृंखला का परिणाम मानते हुए समेकिकता का सिद्धांत दिया। इसी समय कणाद ऋषि /छठी शताब्दी ईसापूर्व/ ने जगत का आदि कारण ब्रहम या शक्ति नहीं शाश्वत परमाणु है, यह प्रस्तावित किया। इसके अलावा कई अन्य ऋषियो मुनियों ने दार्शनिकों का लेखक विवरण देते हैं जिन्होंने ईश्वर या वेदो की मान्यता का खण्डन किया।
लगभग चौथी से तीसरी शताब्दी ईसापूर्व रचे गए दर्शनों में ईश्वर एवं वेदों को पुनर्स्थापित करने का प्रयास दिखता है। इसी समय पतंजलि ऋषि ने पूर्व प्रचलित योग को 194 सूत्रों में सुसम्बद्ध किया।
ईश्वरीय आस्था को पुनर्जीवित करने में तीसरी से दूसरी शताब्दी ईसापूर्व रचित महाभारत की भगवदगीता का योगदान अपूर्व है।
किताब में गीता में क्या कहा गया है उसके बारे में भी है जिसका उल्लेख यहां हम नहीं कर रहे हैं। इसी समय लगभग मनुस्म्रति भी धर्मशास्त्रा के रूप में स्थापित होती है और चातुर्वर्ण्य व्यवस्था सामाजिक आचार संहिताओं का आधार ग्रहण करता है। मुख्यतः 18 पुराणों का नाम बताया है।
कबीलों से राज्यों और राज्यों से साम्राज्यों का रूप लेने के दौरान भारत में आर्थिक सामाजिक परिवर्तन कई स्तरों पर हुए। राजा बिम्बिसार (ईसा पूर्व 543 -491) मौर्यवंश गुप्त साम्राज्य आदि के विवरण के माध्यम से लेखक भारत में सामन्तवाद तथा धर्म-जाति आदि के बारे में बताते हैं। निम्न जातियों के साथ अन्याय उत्पीड़न को भाग्य और कर्मों का फल बता कर स्वीकार करने को बाध्य किया जाता है। लेकिन यही वो काल है जब संस्कृत साहित्य का सर्वांगीण विकास हुआ, इस सन्दर्भ में कई सारे लोगों का नाम उन्होंने गिनाया है, (पेज 48) जिन्होंने संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया।
हर्ष साम्राज्य के पतन (सन 606 से 647) के बाद सन 712 में मोहम्मद बिन कासिम का भारत पर आक्रमण होता है। सन 1000 से 1030 के बीच महमूद गजनी ने भारत पर 18 बार आक्रमण किया। सन 1192 में मोहम्मद गौरी ने आक्रमण कर प्रथ्वीराज को पराजित कर दिल्ली तथा उत्तर भारत पर अधिकार कायम किया और 1206 में उसकी म्रत्यु के बाद उसके सेनापति कुतुबुददीन ऐबक ने सत्ता हथिया कर अपने आप को दिल्ली का पहला सुलतान घोषित किया।
छठीं से 9 वीं शताब्दी के बीच जैन और बौद्ध धर्म का शैव-वैष्णव पंथ से संघर्ष हुआ बाद में शैव एवं वैष्णव में भी आपस में तीव्र संघर्ष हुआ। 8 वीं शताब्दी में केरल में जन्मे शंकराचार्य ने एकेश्वरवाद का दर्शन दिया।

तीन साढे तीन हजार वर्ष पहले हिन्दू धर्म का आरम्भ प्रक्रति की अबूझ अज्ञात शक्तियों की स्तुति से शुरू होता है और मध्ययुग तक आते आते ईश्वर ब्रह्म ब्रम्ह, देवी देवताओं के अवतारों में आता है। बाद में महाभारत, रामायण तथा पुराणों के माध्यम से हिन्दू धर्म का सनातनी स्वरूप विकसित होता है।
13 वीं सदी और उसके बाद विभिन्न सम्प्रदायों के बीच हिंसात्मक टकराव की बात करते हैं जो किसी विदेशी या बाहरी आक्रमणकारी के  खिलाफ नहीं था बल्कि अपने ही धर्म के भीतर दूसरे सम्प्रदाय से था। कुंभ या महाकुंभ के स्नान के समय खूनी टकराव हुआ करते थे।

4. ईसाई धर्म और हिंसा

तीसरे अध्याय ईसाई धर्म और हिंसा के पहले पैराग्राफ में वे एक बार फिर स्पष्ट करते हैं कि जबसे विभिन्न धर्मों की अवधारणा का विकास हुआ तब से विभिन्न संघर्षों के पीछे धार्मिक विश्वास रहा है चाहे वह वैदिक युग में असुरों के साथ लड़े गए युद्ध हों चाहें मध्य मैक्सिको के अजतेकों के साथ लड़ाइयां हों, चाहे ईसाई-मुसलमानों के बीच खूनी संघर्ष हों चाहे ईसाइयों के बीच आपसी रक्तपात हो या मुसलमानों के बीच आपसी संघर्ष या फिर आज तीसरी दुनिया में धर्म की पहचान को लेकर हो।
यहुदी और फिर ईसाई तथा इस्लाम के उदय से पहले बेबीलोन, सुमेर, अस्सीरिया, अरब, मिस्त्रा, ईरान आदि जगहों पर बहुदेववाद था और मूर्तिपूजा का प्रचलन था लेकिन आज उनका अवशेष तक नहीं है, इन तीनों धर्मों ने प्रहार कर खतम कर दिया। चाहे कोई भी धर्म हो उसने अपनी सत्ता तथा प्रभाव स्थापित करने के लिए पहले से चले आ रहे धर्म को नेस्तनाबूद करने का भरसक प्रयास किया।
मध्ययुग में निरंकुश चर्च द्वारा विधर्मियों के खिलाफ चलाये जाने वाले अभियानों में हजारों वाल्डेन्सो, लोलार्डों, हुस्साइयों को जेल में डाल दिया, कइयों को जिन्दा जला दिया, इनका अपराध यही था कि इन्होंने अपने आध्यात्मिक उददेश्य की पूर्ति के लिए अलग रास्ता अपनाया था। पुरोहितों-पादरियों ने सुधार को विधर्मी घोषित किया जो सबसे बड़ा राजदंड होता था जो अक्षम्य अपराध माना जाता था। उन्हें निर्मम और क्रूर यातनायें दी जाती थी।
यहूदी, ईसाई और इस्लाम में सबसे पुराना धर्म यहूदी है। जेरूसलेम के आसपास के अंचलों में इन तीनों धर्मों का केन्द्र रहा है। यहूदी धर्म के प्रादुर्भाव से पहले इन अंचलों में किसी एक धर्म की अवधारणा से लोग अपरिचित थे। विभिन्न कबीलों में बंटे लोगों के अपने अपने देवी देवता होते थे।  
ईश्वर के दूत के रूप में पैगम्बर की अवधारणा यहूदी धर्म से शुरू होती है। यहूदियों के धार्मिक ग्रंथों का संकलन ओल्ड टेस्टामेण्ट के रूप में जाना जाता था। इनमें से एक जेनेसिस के अनुसार पैगम्बर अब्राहम को ईसापूर्व 2000 वर्ष पहले यहोवा /यहूदियों के ईश्वर/ को सन्देश मिला कि कनान क्षेत्रा उसके अनुयायियों का है। इस प्रोमिस्ड लैंड पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए ंिहंसात्मक संघर्षों का प्रारम्भ ईसापूर्व 2000 साल पहले हुआ और आज भी वह खूनी संघर्षों का केन्द्र बना हुआ है जिसे इजराइल के नाम से जाना जाता है।
पहले विभिन्न कबीलों और यहूदी धर्म के बीच संघर्ष हुए फिर यहूदियों और ईसाइयों के बीच तथा मुसलमानों के बीच, फिर ईसाइयों और इस्लाम के बीच - निरन्तर खूनी संघर्ष होते रहे।
18 वीं सदी आते आते यहूदियों और ईसाइयों के बीच शान्ति कायम हो गयी। लेकिन इन दोनों का इस्लाम के साथ संघर्ष जारी रहा जो आज तक चल रहा है।
ईसाई और इस्लाम दोनों धर्मो की जड़ों को यहूदी धर्म में ढंूढा जा सकता है, लेकिन आपसी सदभाव का अभाव है।
यूगोस्लाविया, बोसनिया, क्रोशिया और सर्बिया क्षेत्रों में कैथोलिक और प्रोटेस्टन्टों तथा मुसलमानों के खूनी संघर्षों में लाखों लोग मारे जा चुके हैं।
जेरूसलेम पर अधिकार को लेकर ईसाई धर्मयोद्धाओं ने यहूदियों पर अमानुषिक अत्याचार किए और कतलेआम किया। द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की अगुआई में नाजियों ने कम से कम 80 लाख यहूदियों का कत्ल कर दिया। बाद में ब्रिटिश साम्राज्य के सहयोग से फिलिस्तीन क्षेत्रा में इजराइल राज्य की स्थापना की गयी और लगभग 2,000 वर्षों बाद यहूदी पुनः अपने धार्मिक स्थल पर अपना राज्य स्थापित कर सके।
ईसाई धर्म का जैसा प्रभाव बढ़ता गया यही देखने में आया कि ईसाई मत के अगुआ एक हाथ में बाइबिल और दूसरे हाथ में तलवार लेकर ईसा मसीह के प्रेम, करूणा और अहिंसा के सिद्धान्तों का माखौल उड़ाते रहे। जेरूसलेम का कण-कण हिंसा जनित मानव रक्त में डूबा है, तीनों धर्मों के अनुयायी जेरूसलेम को अपनी पवित्र भूमि मानते हैं।
रोमन सम्राटों ने ईसाइयों पर बेपनाह अत्याचार किए, बाद में ईसाई धर्मावलम्बी एकजुट हुए। ईसाई धर्म के अनुयायियों के मुताबिक  सन 313 में रोमन सम्राट कोन्स्तेनताइन को क्रॉस दिखा और उन्होंने ईसा मसीह की वाणी सुन कर ईसाई मत को स्वीकारा, लेकिन सच्चाई यह थी कि चर्च के बढ़ते प्रभाव का खतरा देख अपनी सत्ता बचाने के लिए कोन्स्तन्ताइन को ईसाई धर्म स्वीकार करना पड़ा। इसके बाद ही ईसाई धर्म की शक्ति बढ़ी  और धर्म सत्ता और राज्य सत्ता द्वारा मिल कर गैर ईसाई लोगों पर अत्याचार का सिलसिला जोर पकड़ने लगा। विज्ञान और विवेकसम्मत सोच पर प्रतिबन्ध लगने लगा।
सन 325 में काउन्सिल आफ चर्च की शुरूआत हुई जिसने ईसाई धर्म के नाम पर ऐसी आचार संहिता का  निर्माण किया जिसका स्वरूप कटटर था। इसने अपने अनुयायियों को मानसिक रूप से गुलाम बना दिया। काउन्सिल द्वारा जारी आदेश के अनुसार प्रत्येक ईसाई को वर्ष में कम से कम एक बार पादरी के सामने अपने पाप की स्वीकृति /कन्फेशन देना पड़ता था।
चौथी सदी में सिकन्दरिया ज्ञान का केन्द्र माना जाता था। वहां के पुस्तकालयों में दर्शन की किताबें खूब थीं। सन 390 में चर्च के आदेश से इसे धर्म विरोधी बता कर जलवा दिया गया था। इसके 25 साल बाद 415 में सिकन्दरिया के एक ज्योतिषी की पुत्राी जो   गणित की पंडित थी हिबाशिया - उसकी हत्या कर दी गयी। सारे दर्शन के केन्द्र तथा विश्वविद्यालयों को यह कह कर बन्द करवा दिया गया कि इससे धर्म को खतरा है। (पेज 94)
पादरियों की एक बड़ी फौज तैयार की गयी जिसका काम लोगों को ईसाई बनाना था।
अत्याचारी राजाओं में फ्रांस के राजा चार्ल्स प्रथम (775 से 790)ने धर्मान्तरण को अनिवार्य कर दिया। उसने अपने साम्राज्य का विस्तार कर पश्चिमी यूरोप को एक किया। तीस साल तक युद्ध के बाद सैक्सन जाति को पराजित कर इंग्लैण्ड पर अधिकार किया। युद्ध में बन्दी बनाये गए चार हजार पांच सौ सैक्सनों का शिरच्छेद कर कतलेआम किया गया। उसने अपने राज्य मे चर्च एवं धार्मिक स्कूलों का जाल बिछा दिया।
सन 1096 से सन 1272 के बीच ‘‘पवित्र स्थान’’ जेरूसलम पर कब्जा करने के लिए आठ क्रूसेडों  (धर्मयुद्धों ) में धर्म के जुनून में आकर लाखों लोगों ने अपनी जान गंवा दी। इनमें से एक धर्मयुद्ध में 50 हजार अबोध बच्चे भी शामिल थे। (पेज 95)
क्रूसेड का इतिहास विश्वासघात से भरा रहा है। चर्च ने क्रूसेडस के महत्व को इतना गौरवान्वित किया कि क्रूसेड में भाग लेने के लिए लोगों में होड लग गयी। लोगों में व्याप्त धार्मिक भावना का फायदा उठा कर चर्च ने धार्मिक उन्माद पैदा किया। कर्ज में डूबे हुए लोगों को यहां मुक्ति दिखायी दी। चर्च को चुनौती देने के लिए ही प्रोटेस्टंट समुदाय की नींव पड़ी। प्रोटेस्टंेट जो ईसाई धर्म में सुधार की बात करते थे उन्हें भी अत्याचार मार काट का शिकार होना पड़ा। (पेज 100)
1483 में स्पेन में / पेज 101/ कम से कम 2,000 विधर्मियों को जिन्दा जला दिया गया। चर्च की निरंकुशता के खिलाफ 1789 में फ़्रांस में राज्य क्रांति के रूप में आक्रोश फटा। इस पूरे अध्याय में तमाम तरह की हत्याओं का विवरण है जिसमें जिन्दा जलाने का, फांसी देने का, जीभ खींच लेने आदि का उल्लेख है।
स्पेन, इटली, फ्रांस आदि में कैथलिकों ने प्रोटेस्टेंटो पर अत्याचार किया और इंग्लेण्ड में प्रोटेस्टंटों ने कैथोलिकों पर अत्याचार किया।
स्पेन में 1600 से 1670 के बीच विधर्मी होने के जुल्म में 31,912 लोगों को जिन्दा जला दिया गया। (पेज 105)ऐसी ही तमाम अन्य हत्याओं का इतिहास दर्ज है।
नवजागरण में चिन्तकों, दार्शनिकों को जेल में डाल दिया गया, जिन्दा जलाया गया। इटली के दार्शनिक ब्रूनो ( 1528-1600) को जिन्दा जला दिया गया, पोलेण्ड के खगोलशास्त्राी कोपरनिकस जिसने कहा कि पृथ्वी  नहीं सूर्य ब्रहमाण्ड के बीच है, उन्हें भी आलोचना का शिकार होना पड़ा। इटली के वैज्ञानिक गैलीलियो जिन्होंने कहा था कि पृथ्वी  सूर्य का चक्कर लगाती है, उन्हें यातनाएं दी गयी। उनसे बार बार उच्चारण करने को कहा गया कि पृथ्वी नहीं सूूर्य चक्कर लगाता है।
गैलीलियो के मृत्यु के चार सौ साल बाद 1992 में पोप पॉल ने पूर्वजों की गलती स्वीकार कर गैलीलियो को दोषमुक्त किया।
अनगिनत लेखकों, कवियों, कलाकारों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, चिन्तकों ने तमाम अत्याचार सहन किए, कुर्बानी दी तब आज दुनिया का बड़ा हिस्सा इन धार्मिक युद्धों से मुक्त हो पाया।

5. इस्लाम और हिंसा 

इस्लाम और हिंसा वाले अध्याय में लेखक बताते हैं कि इस्लाम का अर्थ है शान्ति और समर्पण लेकिन इसके चौदह सौ वर्षों का इतिहास इस बात का साक्षी है कि कुछ काल को छोड़ कर शान्ति कभी नहीं रही। इस्लाम के उदय के साथ ही इसका टकराव मूर्तिपूजकों, बहुदेववादियों, यहूदियों, ईसाइयों के साथ ही इस्लाम के अन्दर काफिर  - मुनाफिक यानि विधर्मी का आरोप लगा कर हिंसक लड़ाइयां और युद्ध हुए।
लेखक के मुताबिक जब कोई मुस्लिम शासक किसी काफिर देश को जीतता था तो उस देश के तमाम लोगों के सामने तीन विकल्प रखता था:
1. इस्लाम कबूल करे
2. जजिया कर दे
3. तलवार से मौत
ये सारी आयतें अलमदीना सूरा में है। पैगम्बर साहब ने निर्देश दिया कि हम युद्ध तब तक जारी रखेंगे जब तक लोग यह स्वीकार न कर ले कि एक ईश्वर के अलावा कोई ईश्वर नहीं है।
सुर: तुल - अम्फाल 65,67 ; सूर तौबा 72.28 आदि तमाम उद्धरणों के माध्यम से लेखक ने बताया है कि कैसे काफिरों के खिलाफ अत्याचार हिंसा को सही ठहराया है और जंग की बात करता है।
कुरान के विभिन्न आयतों में विधर्मियों तथा नास्तिकों के लिए इस जन्म में मौत और कयामत के बाद दोजख / नरक/ की सजा मुकर्रर की गयी है।
मक्का में हजरत मोहम्मद ने अपने आप को जब पैगम्बर घोषित किया तो वहां के स्थानीय लोग नाराज हो गए और उनके जान के दुश्मन हो गए तब मदीना के उनके अनुयायियों के बुलावे पर सन 622 की रात में उन्होंने मदीना की तरफ पलायन किया। इसी पलायन को ‘‘हिज्र’’कहते हैं और तभी से इस्लाम का हिज्री सम्वत शुरू होता है।
इसके दो साल बाद 624 में मदीना के पास बद्र हुनाइन में मक्का के अनुयायियों और मदीना के अनुयायियों के बीच पहली लड़ाई होती है जिसमें मक्का की पराजय होती है, फिर एक साल बादर सन 625 की लड़ाई में मदीना की पराजय हुई। इसके बाद तमाम लड़ाइयों का भी विवरण है।
मोहम्मद के जीवन काल में 38 लड़ाइयां हुई, जिनमें आठ का नेतृत्व उन्होंने खुद किया। उन्होंने कहा कि जो लड़ाई में मारे जाएंगे उन्हें जन्नत हासिल होगी।
लड़ाइयों के दौरान लूटे गए माल को सैनिक आपस में बांट लेते थे। एक बार लूटे गए माल के बँटवारे में सैनिकों के बीच लड़ाई हो गयी तो वह पैगम्बर के पास गए। इसी समय माले गनीमत की आयत उतरी और मोहम्मद ने आदेश दिया कि खुदा का पांचवा हिस्सा उन्हें देने के बाद बचे सामान को सैनिकों के बीच बांट दिया जाए। इसी तरह युद्ध में बन्दी बनाये गए स्त्री पुरूषों का भी बंटवारा होता था। बद्र की लड़ाई में मुहम्मद के अनुयायियों के हाथों मारे गए उबैद की विधवा जैनब से हजरत साहब ने निकाह कर लिया जो उनकी पांचवी पत्नी थी। इसी प्रकार अहूत के कतलेआम में अबू सलीम की विधवा उम्मू सलीमा से भी निकाह कर लिया। (पेज 111)
सन 632 मे हजरत मुहम्मद की मौत के बाद अभी उनका शव दफन भी नहीं हुआ था कि उपस्थित लोगों में खिलाफत को लेकर विवाद हो गया। कुरान के अनुसार हजरत मुहम्मद आखरी पैगम्बर थे इसलिए मुस्लिम सम्प्रदाय को धार्मिक राजनैतिक नेतृत्व देने के लिए खिलाफत की परम्परा शुरू की गयी लेकिन हजरत ने किसी को इस पद के लिए नामित करने की घोषणा अपने जीते जी नहीं की थी।
हजरत की म्रत्यु के बाद वहां उनके शव के पास अबु बकर - जो हजरत की पत्नी आयशा के पिता थे और अली, जो हजरत की बेटी फातिमा के पति थे, दोनों के समर्थकों में मतभेद हो गया। अबु बकर बहुमत में थे, इसका लाभ उठा कर हजरत को दफनाने के पहले ही खलीफा घोषित कर दिया गया। अल्पमत में होने के कारण अली ने स्वीकार तो कर लिया, लेकिन यहीं से मुस्लिम सम्प्रदाय में जो मतभेद शुरू हुआ वह बाद में शिया और सुन्नी सम्प्रदाय के रूप में जाना गया। अबु बकर के समर्थक सुन्नी और अली के समर्थक शिया कहलाये।
शिया और सुन्नी के बीच हिंसात्मक संघर्षों में लाखों लोगों की जान जा चुकी है। 20 वीं सदी के 8 वें दशक में ईरान-इराक युद्ध इसी का परिणाम था जिसमें लगभग 12 लाख लोग मारे गए। हालांकि इराक-इरान युद्ध सीमा विवाद के कारण भी था, लेकिन इरान के शिया सम्प्रदाय के नेता अयातुल्ला खुमैनी ने इस विधर्मी इराकियों के विरूद्ध धर्मयुद्ध बताया।
अबु बकर की म्रत्यु के बाद उमर दूसरे खलीफा बने, फिर उमर की हत्या कर उस्मान खलीफा बने फिर उस्मान की भी बाद में हत्या कर दी गयी। बाद में भी खलीफाओं का लम्बा संघर्ष जारी रहा।
असेसिन का शब्दार्थ हत्यारा है। इसकी उत्पत्ति का इतिहास है। ग्यारहवीं सदी (1090) फारस के शिया मुसलमान हसन सब्बाह ने हत्यारों का एक गुप्त संगठन बनाया जिसका काम इस्लाम को कटटरता से लागू करना था। धर्म के नाम पर इस संगठन के लोग दो सदियों तक यानि 200 साल तक तांडव मचाते रहे। अन्ततः 1256 में मंगोलों ने फारस पर आक्रमण कर इस संगठन का पूरी तरह सफाया कर दिया। (पेज 116)
इस्लाम के नाम पर तमाम क्रूरता और बर्बरता जारी रही। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद खिलाफत प्रथा समाप्त हो गयी - और मुस्तफा कमाल पाशा के नेतृत्व में टर्की में एक धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र उभरा।
शिया और सुन्नी के आपसी हिंसक संघर्षों के अलावा सुन्नियों के बीच भी आपसी खूनी संघर्ष हुए मसलन अशआरी और हम्बली के बीच लगातार 10 वर्षों तक 1962 से 1072 तक घमासान युद्ध में असंख्य लोग मारे गए।
पड़ोसी देश पाकिस्तान में 1985 में राष्टपति जिया उल हक ने शरीयत नियम के तहत हिन्दुओं को मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया, ईशनिन्दा के नाम पर हत्यायें आम रही हैं।

6. धर्म और दासता
धर्म और दासता के अध्याय में दासता के आरम्भ होने पर है जिसमें बताया है कि कृषि और गृहउद्योग के विकास के बाद मनुष्य की आवश्यकतायें बढ़ी तब उसे अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता हुई, तब पराजित सैनिकों को मारने के बजाय बन्दी बना कर दास के रूप में उनसे सेवा करवाया जाने लगा।
लगभग चार से पांच हजार वर्ष प्राचीन सुमेरियन सभ्यता के पौराणिक गाथाओं में उल्लेख मिलता है कि मनुष्य जाति की उत्पत्ति देवताओं के दासों के रूप में हुई। सुमेर, बेबीलोन, मिस्त्रा, वैदिक सभ्यताओं में दासप्रथा के स्पष्ट उल्लेख मिलते हैं।
धर्मों एवं सामन्ती व्यवस्था द्वारा पुष्ट दासप्रथा कुछ सौ साल पहले तक बरकरार रही। ईसाई धर्म में इसे स्लेव या सर्फ, इस्लाम में गुलाम, अब्द, मा, मलाकात, ऐमनुकुम, हिन्दू धर्म में शूद्र, चांडाल, अन्त्यज कहलाये।
दासता का सबसे अमानवीय पहलू यह रहा कि मनुष्य जाति के ही एक हिस्से को दास के रूप में उस पर घोर उत्पीड़न और अत्याचार किया गया और यह सब सदियों तक चलता रहा।


7. हिन्दू धर्म और दासता

हिन्दू धर्म और दासता’’ इस अध्याय में वैदिक काल से दास एवं दस्यु का उल्लेख मिलता है। इस अध्याय में मुख्यतः जाति प्रथा, वर्णव्यवस्था की चर्चा है। वैदिक युग में पेशे पर आधारित वर्ण व्यवस्था थी। एक परिवार के सदस्य अलग अलग पेशा के कारण अलग अलग वर्ण के हो सकते थे। ऋग्वेद की एक ़ऋचा में एक व्यक्ति कहता है कि मैं कवि हूं, मेरे पिता चिकित्सक और मां पत्थर घिसती है। हम नाना प्रकार से अर्थोपार्जन करते हैं’’
ईसा पूर्व छठी सदी में लिखा गया ग्रंथ निरूक्त में एक भाई पुरोहित और दूसरा शान्तनु राजा यानि क्षत्रिय है। विश्वामित्र क्षत्रिय थे और ऋषि कहलाये।
लेकिन रामायण काल तक जाति व्यवस्था पुष्ट हो गयी थी। बाल्मिकी रामायण में यह स्वीकार किया गया है कि विराट पुरूष के मुख से ब्राहमण, भुजाओं से क्षत्रिय, जांघों से वैश्य और पैरों से शूद्र की उत्पत्ति हुई । चांडालों का उल्लेख मिलता है जो स्मशान के आसपास रहते थे।
बौद्ध काल तक आते आते वर्ण व्यवस्था जाति व्यवस्था में परिणत हो जन्मगत आधार ले लेती है और कर्म का आधार गौण हो जाता है। ब्राहमण अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए जाति व्यवस्था का पुख्ता रूप देने लगे । शूद्रों को धर्म और ईश्वर का भय दिखा कर तीनों वर्णों की सेवा करने के लिए बाध्य किया गया।
मौर्य काल के आसपास मनु ने धर्म और ईश्वर के नाम पर जाति प्रथा को वंशानुगत बनाया तथा आचार संहिता की रचना की। इस आचार संहिता का उल्लंघन करनेवालों के लिए इस लोक और परलोक दोनों में कठोर दण्ड विधान की व्यवस्था की गयी है। मनु का दृष्टिकोण शूद्रों और स्त्रियों के प्रति भेदभाव पूर्ण था। ब्राहमणों को दान देकर बड़े से बड़ा पाप से मुक्ति मिल सकती है। ब्राहमण नर हत्या कर दे तो भी उसे प्राणदंड नहीं दे सकते सिर्फ निर्वासित कर सकते थे।
शूद्रों को क्या करना चाहिए और क्या नहीं इस पर नारद स्मृति में विस्तार से लिखा गया है।
मनुस्मृति के अनुसार शूद्र की हत्या करना एक बिल्ली अथवा नेवले अथवा मेंढक अथवा गधे की हत्या के बराबर है जिसके प्रायश्चित के लिए थोड़ी सी तप साधना पर्याप्त है। चांडालों को आभूषण पहनाना वर्जित था। जिस शूद्र जाति को समस्त अधिकारों से वंचित किया गया, वही सदियों तक अर्थव्यवस्था की रीढ़ रही।
ईसापूर्व पांचवीं छठीं शताब्दी तक हिन्दू समाज पर धार्मिक अन्धविश्वास और कर्मकाण्ड हावी हो गया था। ऐसे में बुद्ध एवं महावीर का उदय हुआ जिन्होंने हिन्दू समाज की कुरीतियों के खिलाफ अभियान चलाया।
जातपात और दासता के लिए सिर्फ मनु जिम्मेदार नहीं बल्कि तमाम पुराण, उपनिषद, आख्यान जातपात के पक्ष में भरे पड़े हैं। श्रीमद भागवतगीता में (पेज 134)
8 वीं सदी में शंकराचार्य ने हिन्दू समाज को एक सूत्रा में पिरोने की चेष्टा की, लेकिन वे जन्मगत जातिप्रथा के कटटर समर्थक होने के कारण यह नहीं कर पाये।
मनु, याज्ञवल्क, नारद आदि की आचार संहितायें कौटिल्य का अर्थशास्त्रा भी न केवल शूद्र प्रथा को न्यायोचित ठहराते बल्कि इसे ईश्वरीय विधान बताते हैं। मनु ने सात प्रकार के दोषों का उल्लेख किया है। बाद में नारद ने 15 प्रकार के दासों का उल्लेख किया। वे मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते, वेद पढ़ना तो क्या सुनना भी पाप और अक्षम्य अपराध था। धर्मसूत्रों मे चांडालों को कुत्तों और कौओं के साथ जोड़ा गया है।
तीसरे से छठी ईसवी के बीच ब्राहमण परम्परा के विधायकों - विष्णु, याज्ञवल्क, नारद, ब्रहस्पति, कात्यायन आदि द्वारा रचित ग्रंथ अस्पृश्यता अस्प्रश्यता और जातीय बंधन को दृढ करनेवाला है। अस्पृश्य शब्द का प्रयोग इसी दौरान पहली बार होता है। अस्पृश्य द्वारा किसी ब्राहमण को जानबूझ कर छू लेने पर म्रत्युदण्ड का प्रावधान है। बाद के दौर में जाति व्यवस्था अमानवीयता की हर सीमा लांघ जाती है। कुआं, तालाब, सब अलग, बस्ती भी गांव के बाहर और शूद्रों की परछाईं भी ब्राहमणों पर न पड़े। तरह तरह से अपमानित करना।
लेखक बताते हैं कि इस्लाम एवं ईसााई धर्म में जाति व्यवस्था जैसे बर्बर विधान नहीं हैं। शूद्रों में भी चांडाल, डोम, भंगी, चमार की गणना सबसे नीचे की गयी है। (पेज 137)
लेखक कहते हैं कि शारीरिक आघात या हत्या कर देना ही हिंसा नहीं है। कोई विशेष जाति अस्प्रश्य कहलाये, विष्ठा ढोये, तमाम मानवीय मर्यादा और अधिकार से वंचित हो यह हिंसा से कम बिल्कुल नहीं है। जो 

धर्म या संस्कृति  ऐसी मान्यताओं और संहिताओं को स्वीकृति देती हो उस पर कोई गर्व कैसे कर सकता है।
19 वीं सदी के पूर्वार्द्ध में नवजागरण का आरम्भ जब हुआ तो इन रूढियों एवं जड़ता के खिलाफ अभियान चला। इन समाज सुधारकों को विधर्मी कहा गया, उन पर अत्याचार किया गया। आज भी भले ही दास प्रथा का दुनिया भर में उन्मूलन हो गया हो, रंगभेद की दीवार चरमरा गयी हो लेकिन हमारा देश जाति प्रथा से मुक्त नहीं हो पाया है। इसलिए हिन्दू धर्म चाहे जितनी महानता की बात करे जाति प्रथा का कलंक उसके पास है।


8. ईसाई धर्म और दासता
ईसाई धर्म और दासता वाले अध्याय में ईसाई और यहूदी दोनों की चर्चा होती है। यहूदियों के ओल्ड टेस्टामेन्ट के अनुसार कर्तव्यच्युत, पापी, अभिशप्त ही दास हुए। यहूदियों के ईश्वर याहोवा के श्राप से कनान से निकाले गए यहूदी मिश्र में दास रहे। यहूदी धर्म के पैगम्बर मोजेज को याहोवा ने कहा था कि वे पड़ोसी देशों तथा अपरिचितों को दास बनायें और यहां तक कि उन दासों के बच्चे भी यहूदियों की सम्पत्ति होगी। उनके धार्मिक ग्रंथ लेव (Lev 25 .44 -46 ) तथा एक्सोड (EXOD ) में इसका उल्लेख है।
यहूदी सम्प्रदाय में दो तरह के दास होते थे: पहली श्रेणी के वे यहूदी थे जिन्हें किसी विशेष अपराध के लिए दंडित कर दास बनाया जाता था। दण्ड की अवधि बीतने पर इन्हें मुक्त कर दिया जाता था। दूसरी श्रेणी में वे होते थे जिन्हें युद्ध में बन्दी बनाया जाता था या खरीदा जाता था। इन्हें मुक्ति नहीं मिलती थी और इनकी सन्तानें भी दास होती थीं।
ईसाई धर्म के अनुसार पाप के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को दास बनाया जाता था। लेकिन 15 वीं 16 वीं सदी में चर्च ने चतुराई से यूरोप के गोरे ईसाइयों को दासत्व से मुक्त कर दिया। अफ्रीका के नीग्रो, हैम और काइन को कहा कि ये दास बनने के लिए ही पैदा हुए हैं। 18 वीं सदी तक दासप्रथा अपने क्रूरतम रूप में मौजूद रही। ईसाई धर्म ने बड़ी चतुराई से कहा कि ईश्वर के लिए सभी समान हैं, लेकिन समानता आत्मा तक सीमित है, शरीर से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः दास की आत्मा स्वतंत्रा हो सकती है लेकिन शरीर पर मालिक का अधिकार हो सकता है, दास का कर्तव्य है कि वह मालिक की आज्ञा माने, उसकी सेवा करे। बाइबिल में बार-बार इसका उल्लेख है कि हे दासों, जो लोग शरीर से तुम्हारे स्वामी हैं उनकी निष्ठा से सेवा करो जैसे कि ईसा मसीह की (इफिसी, 6ः 5,6,7), (इफिसी -7-20), (कुरन्थी, 9-1-7-21),  (कुरन्थी, 12,13) दासों को क्या करना है इसका उल्लेख है।
ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह ने करूणा, दया, प्रेम और भाईचारे का सन्देश दिया लेकिन पहले से चली आ रही दास प्रथा पर वे मौन रहे। शोषण और विषमता के प्रश्न पर चुप रहे।
रोमन और ग्रीक साम्राज्यों द्वारा ईसाई धर्म को राजधर्म के रूप में स्वीकार कर लेने कर लेने के बाद चर्च ने कहा, ईश्वर की इच्छा से ही व्यक्ति राजकुल में जन्म लेता है, वह राजा बनने का अधिकारी होता है लेकिन ईश्वर का प्रतिनिधि होने के नाते राजा की नियुक्ति या अपदस्थ करने का अधिकार चर्च का होगा। चर्च और राजतंत्र की इस दुरभिसन्धि ने दोनो को अपरिमित अधिकार दिए। पूरे मध्ययुग तक पूरा यूरोपीय समाज तीन भागों में बंटा था। चर्च के पुरोहित, दूसरा राजा, राजकुल के लोग और तीसरे वे सभी लोग जो इन दोनों की सेवा के लिए थे। दासों का बाज़ार लगता था जिसमें उनकी खरीद बिक्री होती थी, उनका आयात निर्यात होता था। यह व्यापार सबसे अधिक मुनाफा देने वाला होता था।
धार्मिक मान्यता के कारण ही दासप्रथा की जड़ें इतनी गहरी पैठ गयीं कि कई सुधारवादी भी इसके पक्ष में थे। चर्च की सत्ता न केवल सर्वोपरि थी बल्कि बेहद निरंकुश भी थी। दासों को हथकड़ी, बेड़ी, जंजीर से बांध कर रखना इतना सामान्य था कि बड़ी हथकड़ी और जंजीर का लघु उद्योग पूरे यूरोप में फैला हुआ था।
ु18 वीं सदी तक पोप-पादरियों ने दासप्रथा को उचित ठहराते हुए इसे पाप से जोड़ते हुए ईश्वरीय विधान बनाया। सन्त पॉल और सन्त अगस्ताइन ने दास प्रथा को धर्मसम्मत बताते हुए संहितायें जारी कीं। राजा चर्च को भेट स्वरूप दास देते थे। सन 1488 में पोप इनोसेंट अष्टम को राजा फर्डिनन्ड ने भेंट में 100 दास दिए। इस तरह कई विवरण दिए हैं इस किताब में। दासता के खिलाफ लम्बा आन्दोलन चला और कई 
यूरोपी देशों में अमेरिका तथा ब्रिटेन में विद्रोह भी हुआ जो इतिहास में दर्ज भी है।
आधुनिक मूल्य बोध ने मनुष्य को धर्म और ईश्वर की जकड़न से काफी हद तक मुक्त किया। नास्तिकों को चर्च के तमाम अत्याचार और हिंसा झेलना पड़ा।

9. इस्लाम और दासता

इस्लाम से भी पहले से चली आ रही दास प्रथा को मिटाने का प्रयास हजरत मोहम्मद ने नहीं किया। कुरान और हदीस में कई बार यह उल्लेख किया गया है कि दासों के साथ कैसा व्यवहार किया जाए। हजरत मोहम्मद कहते हैं कि ‘‘दासों को वही भोजन दो जो स्वयं करते हो, वही कपड़े दो जैसा स्वयं पहनते हो।’’ लेकिन यह व्यवस्था उन्हीं गुलामों के लिए थी जिन्होंने इस्लाम कबूल कर लिया था। कुरान में उल्लेख है कि जो गुलाम अपनी कीमत अदा कर दे उसे मुक्त कर दिया जाए।
अतः इस्लाम की तरफ से यह दावा गलत है कि इस्लाम में दासता के लिए कोई स्थान नहीं है क्योंकि तथ्य कुछ और है।
इस्लाम को ईसाई और यहूदी धर्मों से विरासत में जो परम्परा मिली उसमें दासप्रथा भी थी। हजरत मोहम्मद - व्यवहारकुशल थे, वे जानते थे कि सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के लिए दासों की महत्वपूर्ण भूमिका है इसलिए उन्होंने इसे न नकारा, न कभी उन्मूलन का प्रयास किया। फिर भी यहूदियों और ईसाइयों की तुलना में दासों के प्रति प्रगतिशील रूख रखा।
कुरान शरीफ में एक तरफ कहा गया है कि गुलामों को इस्लाम कबूल करने के बाद मुक्त कर दें और दूसरी तरफ यह भी कहा गया कि गुलामों के साथ कैसा व्यवहार करें। हजरत मोहम्मद के अलावा जिन दो लोगों ने सबसे पहले इस्लाम कबूल किया उसमें उनकी पत्नी खदीजा थी और दूसरा उनका गुलाम जैद था। इस्लाम कबूल करने के बाद उसे आजाद किया गया। इसी जैद का पुत्रा उस्मान तीसरा खलीफा बना।
हजरत मोहम्मद के समय से ही युद्ध में लोग बन्दी बनाए जाते थे जिसमें मर्द, औरत, बच्चे सभी रहते थे। हजरत के आदेश के मुताबिक इनमें से बीस प्रतिशत को खुदा के लिए छोड़ कर बाकी गुलामों को सैनिक आपस में बांट सकते थे। खुद हजरत साहब भी अपना हिस्सा लेते थे।
कुरान की आयतों में कई आयतें गुलामों से सम्बन्धित हैं मसलन किन परिस्थितियों में गुलाम बना सकते हैं, उनके साथ क्या व्यवहार करेंगे आदि।
गुलाम औरत के साथ मालिक बिना शादी के भी सहवास कर सकता था। गुलाम औरत के पति के रहते हुए भी मालिक को विवाह कर लेने का हक़ था। (सुर: अहजाब 33/40, 52)

इतिहास में पहली बार मुसलमानों ने सैनिक बनाने के लिए गुलाम इकटठा किए, गुलामों को खरीदा, मुस्लिम खलीफाओं और बादशाहों द्वारा अपनी और अपने हरम की सुरक्षा के लिए गुलाम तैनात किए क्योंकि उनकी स्वाभिभक्ति सन्देह से परे थी। तीसरे खलीफा उस्मान को जब मुसलमानों की उग्र भीड़ ने मार डाला तब उस्मान की रक्षा करते हुए मारे गए लोगों में सभी गुलाम थे।
भारत में कुतुबुददीन ऐबक जैसा गुलाम पहला मुसलमान शासक (सन 1206) बना था। वह मुहम्मद गोरी का गुलाम था जो बाद में प्रधान सेनापति बना था।

10. धर्म और नारी 
‘‘धर्म और नारी’’ अध्याय में मुख्यतः यही बताया गया है कि कैसे किसी भी धर्म ने स्त्राी को अधिकार और समानता नहीं दी और अत्याचार के लिए संहितायें और आदेश पारित करते रहे। अलग से भी तीनों धर्मों में स्त्राी की स्थिति को दर्शाया है।
उसके अगले अध्याय हिन्दू धर्म और नारी में इसी बात की चर्चा है कि हिन्दू धर्म में शूद्रों, दासों और स्त्राी जाति के लिए गौरव करने के लिए कुछ भी नहीं है।
वैदिक युग के बाद से ही नारी वस्तु में, पुरूष की भोग्या और वंश बढ़ाने के साधन मात्रा में तब्दील होती चली गयी। उसे दान की वस्तु के समकक्ष रखते हुए कन्यादान का बखान किया गया है।
एक नहीं कई कई पत्नी रखना धर्मसम्मत था, भोगविलास के लिए वेश्यालयों, गणिकालयों की व्यवस्था थी। साधारण पुरूष ही नहीं देवताओं को भी किसी नारी पर मन आ जाए तो भोग की छूट थी।
दूसरी तरफ स्त्राी के सतीत्व, यौन शुचिता को सर्वाधिक महत्व दिया गया। विवाह से पहले स्त्राी के कौमार्य को अक्षुण्ण रखने के लिए उसे ‘अक्षत यौना’ कहा गया। यौन सम्बन्धों को लेकर सारी वर्जनाएं केवल नारी के लिए थी। उस नारी की पूजा होती है जो अपने पंगु पति की कामेच्छा पूर्ति के लिए स्वयं अपने पीठ पर लाद कर उसे कोठे पर ले जाती है। पति का स्थान ईश्वर का और पत्नी का चरण की दासी का।
ईसापूर्व दूसरी शताब्दी में रचे गए धर्मशास्त्रों में स्त्राी को पापिष्ठा, पतिता, बुद्धिहीना, कुटिला, कलंकिनी के रूप में चित्रित किया गया है। जिस मनु ने स्त्राी को पिता, पति या पुत्रा के अधीन रहने की व्यवस्था दी, वेद पढ़ने सुनने से वंचित किया, मर्यादा के नाम पर तमाम रूढियों में जकड़ दिया, उसी मनु ने यह भी कह दिया कि ‘यत्रा नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्रा देवता’ यानि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता वास करते हैं। लेकिन पूरी मनुस्म्रति में यह एक झूठी चीज़ है। मनुस्म्रति ईसा के दो सौ वर्ष पूर्व लिखी गयी। मनु ने जो आचारसंहिता दी उसी के आधार पर मिताक्षरा की रचना हुई जिसका प्रभाव हिन्दू धर्म पर आज भी है। सुश्रुत संहिता में भी बाल विवाह आदि का उल्लेख है। 1929 में शारदा कानून द्वारा बाल विवाह पर प्रतिबंध लगा।
महान समाज सुधारक ईश्वरचंद्र विद्यासागर के अथक प्रयासों से 25 जुलाई 1856 को विधवा विवाह के पक्ष में कानून पारित किया गया तो ब्राहमणों ने इसके विरोध में ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन दिया। शिक्षा से वंचित स्त्राी के लिए शिक्षा के अधिकार की बात 19 वीं सदी के समाजसुधारकों ने की।

ईसाई धर्म और नारी अध्याय में लेखक बताते हैं कि ईसाई धर्म ने स्त्रिायों की दशा सुधारी यह कुत्सित प्रचार है। जिस समाज में नैतिक संहिताओं के उल्लंघन पर कठोर दंड था वहां स्त्राी स्वतंत्रा स्थिति का उपभोग नहीं कर सकती। यहां भी मठाधीशों ने स्त्राी को बहकाने वाली मोहिनी के रूप में चित्रित किया।
विडम्बना है कि जिस ईसाई धर्म के प्रचार और विस्तार के लिए ईसाई स्त्रिायां गैरधर्मावलम्बियों की यातना और हिंसा की शिकार हुई, उसी धर्म के पोप और पादरियों ने उन्हें धर्म के नाम पर समानता के अधिकार से वंचित रखा। रोमन सम्राट द्वारा ईसाइयों के विरूद्ध अत्याचार में ईसाई औरतों ने घोर यातना सहकर अपने धर्म का प्रचार किया, स्त्रिायों के बलिदान का विवरण इस अध्याय में है जिससे उनका गौरव तो उस समय बढ़ा लेकिन उसी ईसाई समाज में औरत को नरक का द्वार, पापिष्ठा भी कहा गया। उनके ब्रहमचर्य व्रत को अस्त्रा बना कर स्त्राी पुरूष के सहज स्वाभाविक सम्बन्धों को हीन द्रष्टि से देखा गया।
औरतों के त्याग, बलिदान और रक्त से सींचे ईसाई धर्म ने उन्हें समानता नहीं दी। बाइबिल के अनुसार ‘परमपिता परमेश्वर ने आदम को गहरी नींद में सुलाया और उसकी पसलियों में से एक पसली निकाली और उसे नारी बना कर आदम के पास लाये।’ (पर्व 2, आ 21-22)
‘ईश्वर ने अपनी आज्ञा नहीं मानने की सज़ा नारी को दी कि वह पीड़ा सहेगी, गर्भधारण करेगी क्योंकि उसने ईश्वर की नहीं सर्प की बात मान कर वर्जित फल खाये। यह शाप दिया कि पुरूष तुम पर प्रभुता करेगा, तबसे नारी शापित है। (तौरत उत्पति, पर्व 3, आ 1 से 7 और 11 से 18) ‘पड़ोस की स्त्राी, उसके दास-दासी बैल और गधे से लालच मत कर।’ ( पर्व 21 आ. 16-17) औरत की तुलना पशुओं से की गयी है।
ईसाई समाज में स्त्रिायों के वर्तमान स्थिति का श्रेय 15 वीं शताब्दी के मानवतावादी नास्तिकों का है, नवजागरण जो चार पांच सदी तक चलता रहा जिसमें सुधारवादियों और अनीश्वरवादियों को घोर यातनाएं दी गयीं।
यहूदियों की धार्मिक पुस्तक ‘ओल्ड टेस्टामेण्ट’ में इसके रूथ ( 4,1)में जिक्र है कि बूर्ज ने रूथ को खरीदा था। यानि स्त्राी की खरीद को धार्मिक सहमति मिली थी। एपसोड 20/17 में पत्नी, नौकर, नौकरानी, बैल और गधे को एक श्रेणी में रखा गया है। डेन्टोरोनाकी ( 22,2,29) में लिखा है कि विवाद के बाद यदि पता चले कि पत्नी अक्षतयौना नहीं है तो उसकेा पिता के घर के सामने पटक कर पत्थरों से मारा जाए।  इसी 

नियम को बाद में इस्लाम ने अपना लिया, जिसके तहत बदचलनी के लिए औरतों को पत्थरों से मारे जाने की सज़ाये दी जाती हैं।
लेविटिअस (20,10) में लिखित नियम के अनुसार पुरूष को किसी स्त्राी के साथ छेड़छाड़ के अपराध में उसे उस स्त्राी से विवाह के लिए बाध्य होना है। यानि पुरूष को जो दण्ड है वह वास्तव में स्त्राी को मिला कि उत्पीड़न करनेवाले से विवाह करना।
पति तलाक दे सकता है, लेकिन पत्नी को तलाक के लिए कारण बताना है, सबूत देना है।
ईसा मसीह को जन्म देने वाली स्त्राी है लेकिन उसी स्त्राी को बाइबिल के अनुसार पुरूष ने रचा है।
सन्त पॉल और सन्त अगस्ताइन  (सन 30 ) ने स्त्रिायों के प्रति विधानों को और कठोर बनाया। सन्त पाल अपनी पत्नी को त्याग कर सन्त बने। और सन्त अगस्ताइन के तीन स्त्रिायों के साथ सम्बन्ध थे जिनमें से एक से एक पुत्रा भी जन्मा था। इन्होंने ही स्त्राी पुरूष प्रेम में यौन सम्बन्ध को पाप बताया, इसको लेकर लिखी गयी उनकी संहिता से उन्हें प्रसिद्धि मिली। दोनों सन्तों ने संहिता में जो लिखा है उसका विवरण किताब में है। डायन का आरोप लगा कर स्त्रियों को पकड़ कर लाया जाता था जिन्हें चर्च के आदेश से मृत्युदंड  दिया जाता था।

इस्लाम और नारी शीर्षक अध्याय में बताया कि सही है कि 1400 साल पहले हिन्दू धर्म और ईसााई धर्म की तुलना में इस्लाम ने महिलाओं को अधिकार दिए जैसे सम्पति में कुछ हिस्सेदारी मिली , तलाक का अधिकार दिया, शिक्षा से वंचित नहीं किया ।
इस्लाम इस अवैज्ञानिक धारणा को गलत मानता है कि पहली स्त्राी की रचना पुरूष के बायें पैर से हुई और फिर दोनों ने मिल कर मानव जाति की रचना की।
पत्नियों के मामले में तो चार की सीमा तय कर दी गयी लेकिन लौंडी रखने की कोई सीमा नहीं थी। पुरूष तीन बार तलाक कह कर सम्बन्ध विच्छेद कर सकता है, लेकिन औरत को सबूत पेश करना है। स्त्रिायों के लिए पर्दा लाजिमी बताया गया है। कई मुस्लिम देशों में पुरूषों की तरह औरतों में भी खतना की प्रथा है, जिससे स्वास्थ्य की जटिलताएं पैदा होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हर साल 20 लाख लड़कियों को खतना तो सिर्फ अफ्रीका के सहारा क्षेत्रा में किया जाता है।
कुरान, हदीस और शरीयत के नाम पर सदियों से औरत पददलित हो रही है। धर्म समान दर्जे का रास्ता नहीं देता इसलिए नारी को अपना रास्ता खुद चुनना होगा।

11 धर्म बनाम मानवता
किताब के आखिर के अध्याय ‘‘धर्म बनाम मानवता’’ में कुल मिला कर लेखक ने यह बताने की कोशिश की है कि धर्म ने चाहे वह कोई भी धर्म हो, ने मानवता को शर्मसार किया है। कैसे तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने मानवता का भला किया। यह एक तरह से राष्टों, युद्धों का इतिहास भी है जिसमें धर्म के नाम पर अत्याचार अन्याय का सिलसिला कैसे चलता है।
मानवीय नैतिक मूल्य, आस्था, सदाचार, चरित्रा, करूणा, दया, अध्यात्म, न्याय और समता के सहयोग से मानवतावाद का विकास हुआ। समता और न्याय ही इन सबका आधार होता है जबकि धर्म में यही बुनियादी आधार गायब है।
धर्म और हिंसा के इस नाभिनालबद्ध रिश्ते की विस्तृत पड़ताल करने बाद वह एक जरूरी सवाल लेखक पूछता है, जिस पर गौर करने की जरूरत है।
कोई पूछे कि अगर धार्मिक ग्रंथों में नास्तिकों, अनीश्वरवादियों, क़ाफिरों के विरूद्ध विषवमन ही नहीं, उनका संहार करने तथा नरकगामी होने तक का आवाहन किया जाता है तो नास्तिकों को क्या यह अधिकार नहीं है कि वे इन ग्रंथों की ऐसी तैसी करें ? .. ..धार्मिक ग्रन्थों में प्रतिपादित अन्धविश्वासों पर चोट किए बिना विज्ञान व विवेकपरक मानसिकता नहीं गढ़ी जा सकती।’ (पेज 228)
अपने महत्वपूर्ण आलेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ में भगतसिंह ने क्या यही नहीं कहा था:
प्रत्येक मनुष्य को जो विकास के लिए खड़ा है, रूढिगत विश्वासों के हर पहलू की आलोचना तथा उन पर अविश्वास करना होगा और उनको चुनौती देनी होगी। प्रत्येक प्रचलित मत की हर बात को हर कोने से तर्क की कसौटी पर कसना होगा। यदि काफी तर्क के बाद भी वह किसी सिद्धान्त अथवा दर्शन के प्रति प्रेरित होता है, तो उसके विश्वास का स्वागत है। उसको सुधारा जा सकता है, क्योंकि विवेक उसके जीवन का दिशासूचक है। पर निरा विश्वास और अन्धविश्वास ख़तरनाक है। यह मस्तिष्क को मूढ़ तथा मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है। जो मनुष्य अपने को यथार्थवादी होने का दावा करता है, उसे समस्त प्राचीन विश्वासों को चुनौती देनी होगी।’’

'धर्म के नाम पर' लेखक: गीतेश शर्मा, प्रकाशक: राजकमल, तीसरा संस्करण - इसवी 2013)

2 comments:

Arpita said...

अंजलि आपका शुक्रिया जो आपने इस किताब का ज़िक्र किया, ज़रूरी किताब जो धर्म के नाम पर बनाए विश्वासों को तार्किकता के साथ ध्वस्त करती है और मानवता की दिशा में आगे बढ़ने के लिए मार्ग दिखाती है।

Babita said...

अंजलि जी, आपने इसमें धर्मो के बारे में काफी जानकारी दी है। जैसे कोई धर्म किसी व्यक्ति पर अत्याचार करना सिखाती हैं। और कोई भी धर्म और धर्म ग्रंथो में लिखी बाते मनुष्य जाति के लिए सही नहीं है। दास प्रथा, और नारी की स्थिति आदि। के बारे में पता चला।

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