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Tuesday, July 7, 2020

बुजुर्गों के जीवन की गुणवत्ता / क्वालिटी आफ लाइफ / का सवाल

हमारी पारिवारिक संरचना सरकारों के लिए कितनी सहूलियत प्रदान करती हैं? 
अंजलि सिन्हा

उनका नाम इंगवार है। उम्र अस्सी के करीब होगी।

स्टॉकहोम, स्वीडन के पास के एक उपनगर के रहनेवाले हैं। पेशे से पत्रकार रहे हैं। और इस दौरान दुनिया का चप्पा चप्पा घुमा है। उनका एक नियम बना है कि हर साल एक बार भारत यात्रा करने का। इस बार करोना महामारी के चलते भारत प्रवास पर नहीं आ पाये। पहले पति पत्नी दोनों आते थे, अपनी युवावस्था में उन्होंने यहीं से एक बेटी भी गोद ली थी, जो अब स्वीडन में ही है और उसका अपना परिवार भी बसा है। पत्नी पिछले काफी समय से बीमार है, लिहाजा वह नहीं आ पाती हैं। इंगवार की यात्रा नहीं चूकती। कनॉट प्लेस में होटल में रहते हैं, पुराने जानकारों से मिलते जुलते हैं, यहां घुमते फिरते हैं। हर यात्रा में हमारे यहां एक बार लंच या डिनर पर आते हैं।

उनके बारे में यहां उल्लेख करने का मकसद है स्वीडन की स्वास्थ्य व्यवस्था की चर्चा करना। वे बताते हैं कि वे बीच बीच में वे दूसरे देशों में इसलिए जा पाते हैं क्योंकि स्वीडन सरकार की तरफ से उन्हें पत्नी की देखभाल से ब्रेक मिलता है और यह काम सरकारी निगरानी में उनके कर्मचारी करते हैं। वैसे आम समय में भी जब कि वह घर पर होते हैं और पत्नी की देखभाल कर रहे होते हैं तो भी उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग के वे कर्मचारी संभालते हैं, जो नियमित उनके यहां आते हैं। उन्हें स्वयं अस्पताल ले जाकर भटकने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस तरह के कई दूसरे उदाहरण भी आप को मिल जाएंगे। हमारे एक दूसरे मित्र जब जर्मनी से यहां आए उसी बीच उनकी पत्नी बीमार हो गयी, सरकार की स्वास्थ्य सुविधा इतनी चुस्त थी कि उन्हें अस्पताल में भरती कराया गया और तब तक रखा गया जब तक वह वापस न लौटें। उन्हें इस बात का पूरा भरोसा था कि अस्पताल में अच्छी देखभाल और सही इलाज मिल जाएगा।
  
यहां यह बताने का तात्पर्य यह कत्तई नहीं है कि वहां सबकुछ आदर्श अवस्था में मौजूद है। इसके बावजूद व्यक्ति को किसी देश के नागरिक होने के एवज में बुढ़ापे में स्वास्थ्य की सुविधाएं मिलना बहुत ही आवश्यक होता है, सबसे अधिक अनिश्चितता, भय, दुश्चिन्ता इस बात की ही रहती है कि बुढ़ापे में क्या होगा, जब बीमार रहने लगेंगे आप। यद्यपि वहां भी अलगाव झेलते ही हैं। राज्य द्वारा मुहैया करायी गयी सुविधाओं के साथ ही अपने प्रियजनों की, पारिवारिक संरचनाओं द्वारा भावनात्मक संबल भी मिले तो दोनों मिला कर सुखद और आत्मविश्वास का वातावरण तैयार हो सकता था।

अब अगर हम अपने जैसे समाजों पर नज़र दौड़ायें तो यहां के पारिवारिक संरचना ने सरकार और राज्य के लिए बहुत सहूलियत प्रदान की है। उसे किसी भी अपने नागरिक को व्रद्धावस्था की जिम्मेदारी अपने उपर नहीं लेनी है। न स्वास्थ्य की, न भरण पोषण की, न केयर की। यह सब काम परिवार किसी न किसी तरह सम्भाल ही लेता है। जो लोग सरकारी नौकरी से रिटायरमेन्ट के बाद पेंशन पाते हैं उनके हाथ में पैसा तो होता है लेकिन सिर्फ पैसे से सुविधा की गारंटी नहीं होती है और ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। कुछ को व्रद्धावस्था पेंशन मिल भी गया तो उसकी राशि इतनी कम है कि गुनाह बेलज्जत की बात है। फिलहाल यहां हम गरीबी की बात नहीं करते हैं क्योंकि वह तो अलग ही बड़ा मुददा है, जिसमें क्या बच्चा, क्या बूढ़ा और क्या जवान सब परेशान हैं।

फिर स्वीडन के पत्रकार मित्र इंगवार की तरह मैं यहां का एक उदाहरण लेती हूं। 
एक मित्र के घर में उनकी बूढ़ी मां है और इसी तरह एक दूसरे के घर में बीमार पिता हैं। ये दोनों पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर हैं। मित्र की माताजी अब 86 वर्ष की हो चुकी हैं और उनका शारीरिक तथा मानसिक दोनों किस्म का स्वास्थ्य ख़राब है और इलाज चल रहा है। यानि दोनों के इलाज का खर्चा भी होता है, यह तो जाहिर सी बात है। इसके अलावा अपने सहारे उठना, बैठना भी नहीं होता लिहाजा दो व्यक्तियों के सहयोग से ही नित्यक्रिया, नहाना-धोना सब होता है। अस्पताल और डॉक्टरों तथा इलाज के अलावा अगर आप देखभाल की सेवा बाजार से उपलब्ध करवाते हैं तो क्या खर्चा आता है इस उदाहरण से समझ सकते हैं। इस खर्चे को परिवार को ही उठाना है और सरकार का इसमें कोई लेना देना नहीं है कि वह इस दिशा में कुछ नीति बनाये, बजट तय करे और जिम्मेदारी ले। इसकी कोई जरूरत नहीं है क्योंकि सरकार की और आम समाज की भी यही मान्यता है कि यह काम परिवार के भीतर का ही है। ‘‘अच्छा परिवार’’ है तो निभायेगा ही, ‘‘बुरा है’’ तो तड़पने के लिए, मरने के लिए छोड़ देगा। सभी का ध्यान परिवार के भीतर की व्यवस्था पर होता है, नागरिक अधिकार पर नहीं।

तो एक बार खर्चे का आकलन करते हैं उस उपरोल्लेखित माताजी का जिन्हें अगर प्रोफेशनल आधार पर सेवाएं मुहैया करायी जाएं तो कितना खर्चा आ सकता है ? निश्चित ही ऐसा करने के लिए परिवार की अपनी आर्थिक हैसियत होनी चाहिए, दूसरे ऐसी सेवाएं उपलब्ध करानेवाली कम्पनियां भी आज मौजूद हैं। उदाहरण के तौर पर पोर्टिया एक प्राइवेट कम्पनी है जो ऐसी सेवाएं उपलब्ध कराती हैं।12 घंटे के लिए केयर करनेवाले अटेण्डट/पुरूष या महिला का चार्ज है 750 रूपये और इसके अलावा अगर हम दोनों टाईम खाना, नाश्ता, चाय पानी जोड़ दें तो यह लगभग एक हजार के करीब बैठता है और अगर किसी मरीज के लिए दोनों शिफट अर्थात पूरे रात दिन के लिए इन्तजाम करना है तो दो लोगों को खर्चा हुआ प्रतिदिन का 2,000 तो महिने भर में 60,000। एक दिन में औसत चार डायपर का 200 रूपए प्रतिदिन - अर्थात महिने भर में 6,000 रूपए, दवाई आदि का 5,000 रूपए और अन्य खर्च खाना पीना 2,000 रूपए मान लें तो कुल खर्चा पड़ेगा 60,000 + 6,000 + 5,000 + 2,000 अर्थात 73,000 रूपए। यह खर्चा तब है जब लोग अपने मकान में रहते हैं यानि एक बुजुर्ग पर 70 हजार से अधिक का खर्चा बैठता है। यह वह खर्चा है जो गरीब परिवार खुद ही परोक्ष रूप से वहन करता है। अर्थात सरकार की चूंकि कोई जिम्मेदारी नहीं है, इसलिए यह काम व्यक्ति को खुद को ही करना पड़ता है।

अब कोई कह सकता है कि सभी को अपना इंतज़ाम पहले से ही सोच लेना चाहिए। पहली बात यह कि सोच लेने के बावजूद संभव नहीं है क्योंकि अपनी सीमित आमदनी में कोई इतनी बचत भविष्य के लिए कैसे करे ? और दूसरी बात यह कि यदि आप के पास पैसे का इन्तजाम हो भी गया तो आप इलाज और केयर की ऐसी व्यवस्था को सुनिश्चित करना चाहते हो जिसकी गारंटी हो। आप न्यूनतम यहीं चाहते हों कि जैसे कि बिल बढ़ाने के लिए निजी अस्पताल तरह तरह का इलाज करवाते रहते हैं और कई बार केस भी बिगाड़ देते हैं, ऐसी स्थिति कभी न बने।

कोई यह भी कह सकता है कि कितनी अच्छी बात है कि हमारे यहां परिवार यह जिम्मेदारी उठाता है। जनाब इसके लिए भी सोचने की जरूरत है। एक तो जरूरी नहीं कि सभी के पास परिवार हो, दूसरे हो भी तो पास में न हो, पास में हो तो भी इस स्थिति में ना हो, ना पैसा हो ना संभालनेवालों का अपना स्वास्थ्य सम्भालनेलायक हो। परिवार के अन्दर रहने और भावनात्मक सम्बल प्रदान करने की अपेक्षा तो समझ में आती है और चूंकि हमारे समाज में यह जिम्मेदारियां परिवार के भीतर की समझी जाती हैं, लिहाजा समाज में यह चर्चा जरूर होती है कि किसकी सन्तान कितनी लायक/नालायक है , परिवार कितना ‘अच्छा’ है या ‘बुरा’।

अगर ऐसी स्थितियां न हों तो दानखाते में चलाये जा रहे वृद्धाश्रमों का ही मुंह देखना होगा जिन्हें न तो अच्छा समझा जाता है और ना ही उनकी स्थिति अच्छी होती है। यहां भी दानकर्ता रहम करके की दान करते हैं, उनके अधिकार के लिए नहीं। कुल मिला कर भावनाओं का दोहन करके रकम जुटाई जाती है।

धीरे धीरे इस क्षेत्र में भी कुछ प्राइवेट कम्पनियां निवेश कर रही हैं जो कि बहुत महंगे हैं। लेकिन इनके मातहत जैसे भी स्थान उपलब्ध हैं या उपलब्ध हो रहे हैं उनमें असल चीज़ गायब है - गारंटी सुरक्षा की, बेहतर इंतजाम और देखभाल की। और यह काम सिर्फ और सिर्फ सरकार कर सकती है बल्कि उसे ही करना चाहिए। लेकिन चूंकि सारा फोकस परिवार के भीतर है तो समाज का ध्यान सरकार पर नहीं परिवार और सन्तानों को तमगा देने पर है। दूसरे हमारे समाज का जो ढांचा है उससे सरकारों को यह सुविधा मिल जाती है कि सस्ता श्रम उपलब्ध हो जाता है। यदि परिवार के सदस्य खुद जिम्मेदारी उठाने की स्थिति में नहीं हैं तो घरेलू सहायक रख सकते है। पिछड़े समाजों में नौकर-नौकरानी मिल जाते हैं। यदि पश्चिमी समाज में आप को घरेलू सहायक रखना हो तो आप को बहुत अमीर होना पड़ेगा और बुजुर्गों के लिए वहां कोई सहायक रखेगा ही क्यों यदि सरकार जिम्मेदारी ले रही है।

यह कह कर भी बात को हल्का नहीं करना चाहिए कि यह तो ‘‘मिडिल क्लास’’ की समस्या है। गरीब कहां सोचता है कि बुढ़ापे का क्या होगा ? यह सही है कि उसके पास कल के सोचने के लिए कहां है वह तो आज के जुगाड़ में ही खप रहा है, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि उसका कल वैसा ही बना रहे। यह सही है कि गुजारा तो सभी को हो ही रहा है उसी में बुजुर्गों का ही हो जाएगा।

नहीं, ध्यान रहे कि बुढ़ापे में सभी की जरूरतें विशेष होती हैं और उसे पूरा करने के लिए राजनैतिक रूप से ही इंतज़ाम होना चाहिए और समान रूप से होना चाहिए। जिस व्यक्ति के पास परिवार सहयोग करनेलायक होगा वह चाहे तो सुविधा ना ले, लेकिन इन्तज़ाम सभी के लिए समान हो।

अन्त में, किसी भी देश और समाज के लिए आधुनिक तथा सभ्य होने के पैमाने में सबसे उंचा पैमाना होता है कि वह देश या समाज अपने यहां अलग-अलग रूपों में प्राकृतिक कारणों से निर्भर तथा अशक्त लोगों के लिए क्या व्यवस्था बनाता है। और इसे सिर्फ नागरिकों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता, यह सुनिश्चित करना होता है कि सामाजिक सुरक्षा के लिए सरकारी स्तर पर नीतियां बन रही हैं या नहीं । नीतियों में ही पहले यह तय करना होता है कि हर व्यक्ति के नागरिक अधिकार की गारन्टी हो, इसके लिए पुख्ता कानून बने और उसे पूरा करने के लिए बजटीय प्रावधान हो।

1 comments:

Bandna said...

Ye mudda jo iss lekh mai uthaya gaya hai vo madhyam varg ka mudda hote huye bhi , hamare samaaj ko aaina dikhata hai

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