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Thursday, July 23, 2020

पुस्तक परिचय - 'धर्म के नाम पर' लेखक: गीतेश शर्मा


पुस्तक परिचय : अंजलि सिन्हा 




धर्म को लेकर हमारे देश में आज जो हालत बनी है और हिन्दुत्ववादी ताकतों ने अपने आप को जैसे मजबूत किया है, यह हमारे सामने है। पूरे समाज के बड़े हिस्से को धर्म के नाम पर कैसे मूर्ख बना सकते हैं, बरगला सकते हैं और 21 वीं सदी में भी धर्म को लेकर हिंसक वातावरण तैयार किया जा सकता है, इसे हम अपने आंखों के सामने घटित होता देख सकते हैं, बशर्ते आप अंधभक्त नहीं हैं तो। हम सभी सोचने पर मजबूर हैं कि आखिर धर्म ने इतनी ताकत इतनी स्वीकार्यता कैसे हासिल की ? ऐतिहासिक रूप से इसकी क्या भूमिका और उपयोगिता रही है ? और इसका शिकार न सिर्फ हमारा देश है बल्कि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में इसके नाम पर मार काट मचाया जा सकता है और सत्ता पर काबिज होने का यह एक उन्मादी नज़रिया बना है।

हमारे देश के ऐसे हालात में कुछ लोग साझी संस्कृति , गंगाजमुनी तहजीब आदि को पुनर्स्थापित करने की बात करते रहे हैं। यह तहजीब रही है इसमें सहमति भी हो तो भी यह देखना पड़ेगा कि तनाव भी रहा ही है और दूसरी बात कोई भी व्यक्ति या पार्टी आखिर जनता को बहकाती है या अपने हित साधन के लिए धर्म/आस्था का इस्तेमाल कर पाती है तो वह इसीलिए कि लोगों में ऐसी भावना पहले से मौजूद होती है। इस संदर्भ में यह जरूरी हो जाता है कि धर्म का स्वरूप अपने उदगम समय से ही कैसा था और उसने इतिहास में मानवता के साथ क्या व्यवहार किया चाहे वह कोई भी धर्म हो, इसे देखा जा सकता है।
गीतेश शर्मा की किताब ‘धर्म के नाम पर’ जो इन दिनों तीसरे संस्करण में चल रही है, इस सबकुछ को समझने के लिए उपयोगी है। अलग अलग धर्म क्या कहते हैं, अधिकतर हमारे जैसे लोग जो धर्मग्रंथों के अध्ययन में अपना समय नहीं लगा पाते हैं, वे सभी इससे लाभान्वित हो सकते हैं। इस किताब के द्वारा धर्मग्रंथों में क्या कहा गया है, तमाम धार्मिक उपदेश क्या कहते हैं और मानवता के इतिहास में उनकी क्या भूमिका रही है, इन सभी बातों को आप यहां आसानी से समझ सकते हैं।

Monday, July 13, 2020

तुर्की – गैर धर्मनिरपेक्ष रास्ते पर


 मुशर्रफ अली
Hagia Sophia: Turkish Govt Opens The Door Of Centuries-old Controversy
क़ुव्वत ओ फ़िकरो अमल पहले फ़ना होता है
फिर किसी क़ौम की शौकत पे ज़वाल आता है
                                                                                                       –  इक़बाल
(किसी क़ौम के दबदबे या रौब में तब गिरावट आती है, जब उसकी सोचने-विचारने की ताक़त खत्म हो जाती है)
8 जुलाई 2020 को तुर्की के राष्ट्रपति तय्यप इरदुगान ने चर्च से मस्जिद फिर मस्जिद से म्यूजियम बना दी गयी ऐतिहासिक इमारत हय्या सोफ़िया को फिर से मस्जिद बनाने की घोषणा की इसके बाद 10 जुलाई को वहां के सुप्रीम कोर्ट ने इरदुगान के फैसले के पक्ष में फैसला दिया। इस घटना के बाद दुनिया भर के मुसलमानों में खुशी की लहर दौड़ गयी और पस्ती में डूबी हुई क़ौम को एक विजय का अहसास हुआ। इस घटना के बाद मैं इंटरनेट पर मुसलमानों की प्रतिक्रिया का अध्ययन करता रहा था। मैं इस तलाश में था कि इस घटना के विरोध में इसकी मज़्ज़मत में मुस्लिमो की तरफ़ से कोई तो आवाज़ सुनाई देगी लेकिन जहां तक इंटरनेट पर मैं ढूंढ पाया एक भी आवाज़ विरोध की नही मिल पायी जबकि समर्थन करती और खुशियां मनाती पोस्टें भरी पड़ी थी। मेरी नज़र में यह घटना वैसी ही है जैसी बाबरी मस्जिद ढहने की है और वहां के सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी वैसा ही है जैसा नवम्बर 2019 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद के संबंध में सुनाया। तुर्की में हय्या सोफिया को ढहाया नही गया लेकिन सांकेतिक रूप से माने तो यह ढहाने जैसा ही क़दम है। बाबरी मस्जिद, मंदिर तोड़कर बनाई गई अभी यह बात विवादित बनी हुई है लेकिन हय्या सोफिया 1453 से पहले चर्च था यह ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है। जब मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने मस्जिद बना दिये गए चर्च को म्यूजियम में 1934 में बदला तब विवाद को समाप्त करने का उनका बहुत ही समझदारी भरा क़दम था मगर तुर्की राष्ट्रपति तय्यप इरदुगान ने कमाल अतातुर्क के सारे किये कराए पर अपने निजी स्वार्थ में पानी फेर दिया और दुनिया भर में मुसलमानों की जो खराब छवि बना दी गयी है उसको और खराब कर दिया। उनके इस काम से मुसलमानों की जो बुनियादी समस्याये हैं वो हल होने की जगह और बढ़ गईं।
उनका यह तरीक़ा वैसा ही है जैसा कि लोगों को रोज़गार देने उनकी गरीबी दूर करने की जगह किसी शहर का नाम बदल देना।
इरदुगान अपनी नाकामयाबी छिपाने के लिये इस तरह की हरकतें कर रहे है और वो इस तरह की हरकतों से दुनिया भर के मुसलमानों के ख़लीफ़ा बनना चाहते है। उन्होंने वैसे ही मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क द्वारा बनाये गए धर्मनिरपेक्ष तुर्की को गैर धर्मनिरपेक्ष रास्ते पर डालकर बर्बादी में धकेल दिया है। वो समस्या ग्रस्त अपनी जनता को ख़िलाफ़त ए उस्मानिया की वापसी का ख्वाब दिखा रहे है उनका यह ख्वाब वैसा ही है जैसा भारत मे हिन्दू राष्ट्र का दिखाया जा रहा है। अगर हिन्दू राष्ट्र का ख्वाब गलत है तो ख़िलाफ़त क़ायम करने का ख्वाब भी खारिज करने लायक है यह नही हो सकता कि एक तरह के राज की आप हिमायत करें और दूसरे तरह की मुखालफत और ऐसे काम की मज़म्मत या विरोध न करना या खामोश रहना भी इरदुगान निहायत ही गलत और अहमकाना काम का समर्थन करना होगा। जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गयी थी तब भी भारत ही नही दुनिया भर की धर्मनिरपेक्ष गैर मुस्लिम लोगों ने उसकी मुखालफत और मज़म्मत की थी जबकि इरदुगान के इस नाजायज़ क़दम की मुसलमानों को मज़म्मत करनी चाहिये न कि समर्थन। कोई करे न करे लेकिन मेरी यह ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी बनती है कि मैं इस गैर जरूरी और अविवेकपूर्ण क़दम का विरोध और मज़म्मत करू।

Tuesday, July 7, 2020

बुजुर्गों के जीवन की गुणवत्ता / क्वालिटी आफ लाइफ / का सवाल

हमारी पारिवारिक संरचना सरकारों के लिए कितनी सहूलियत प्रदान करती हैं? 
अंजलि सिन्हा

उनका नाम इंगवार है। उम्र अस्सी के करीब होगी।

स्टॉकहोम, स्वीडन के पास के एक उपनगर के रहनेवाले हैं। पेशे से पत्रकार रहे हैं। और इस दौरान दुनिया का चप्पा चप्पा घुमा है। उनका एक नियम बना है कि हर साल एक बार भारत यात्रा करने का। इस बार करोना महामारी के चलते भारत प्रवास पर नहीं आ पाये। पहले पति पत्नी दोनों आते थे, अपनी युवावस्था में उन्होंने यहीं से एक बेटी भी गोद ली थी, जो अब स्वीडन में ही है और उसका अपना परिवार भी बसा है। पत्नी पिछले काफी समय से बीमार है, लिहाजा वह नहीं आ पाती हैं। इंगवार की यात्रा नहीं चूकती। कनॉट प्लेस में होटल में रहते हैं, पुराने जानकारों से मिलते जुलते हैं, यहां घुमते फिरते हैं। हर यात्रा में हमारे यहां एक बार लंच या डिनर पर आते हैं।

Sunday, July 5, 2020

Lockdown through Gendered Lens- Prof. Sudha Vasan, Zoom Lecture

स्त्री मुक्ति संगठन की तरफ से "Lockdown through Gendered Lens", विषय पर प्रोफेसर सुधा वासन, समाजशात्र विभाग, दिल्ली विश्वविद्याल, के द्वारा बात चीत राखी गयी. मीटिंग का youtube लिंक निचे दिया गया है. साथ मे ये एक वक्तव्य का सार है।

कोरोना की इस महामारी से जिन घरों ने हमें बचा रखा है, एक औरत के लिए वही घर असुरक्षित है। जिस देश में एक औरत को मर्द की तुलना में हमेशा कम आँका जाता है, जहाँ विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक एवं व्यतिगत कारणो से अधिकतर मामलों में औरतों का अपना घर नहीं होता, वह लाक्डाउन जेसी परिस्थिति यह सवाल पेदा करती है कि पुरुषों के बनाए गए समाज और घरों में क्या एक औरत अपने आप को इस बीमारी से बचा सकती है और यदि हाँ तो किस कीमत पर ?

जब औरतों ने अपने घरों से बाहर निकल कर भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रो में अपनी जगह बनायी तो यह पाया गया कि  सामज की रूढ़िवादी विचारों ने तब भी उन्हें जकड़ा हुआ था जिसके एक उदाहरण हम महिलाओं और पुरुषों को मिलने वाले वेतन में असमानता के रूप में देख सकते है। महामारी के वक़्त जब डॉक्टर,नर्स  एवं अन्य कर्मचारी इस समस्या से जूझने की पूरी कोशिश कर रहे है, तब भी यह देखा जा सकता है कि औरतें जो अधिकतर निचले स्तर की पोस्ट पर पायी जाती है, उन्हें मिलने वाली सुविधाओं एवं उनके बचाव के लिए ज़रूरी व्यवस्था को अनदेखा किया गया है ।

बाहरी सामज में श्रम शोषण से पीडित औरतें घर में भी एक बराबरी का स्थान नहीं प्राप्त कर पायी। नैशनल कमिशन ओफ़ विमन के मुताबिक़ हर 5 मिनट में एक औरत घरेलू हिंसा का शिकार होती है । लाक्डाउन की परिस्तिथि में जहाँ सरकार द्वारा इस असमानता एवं शोषण से बचने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी, जहाँ परिवार आर्थिक परेशानियों से घिरा हुआ है, जहाँ माँ अपने बच्चों को खाना नहीं खिला पा रही है, और जहाँ मर्द अपनी तथाकथित  मर्दानगी  का सबूत नहीं दे पा रहे है, वहाँ औरत पर बढ़ रही हिंसा सिर्फ़ इस सामज का असली चेहरा दिखाती है।