Pages

Subscribe:

Thursday, June 25, 2020

क्या हम इन्फोडेमिक से भी जूझ रहे हैं ?


-अंजलि सिन्हा

जब यह पैनडेमिक अर्थात महामारी का दौर गुजर जाएगा, कोरोना का भय खतम हो जाएगा या कम हो जाएगा तब सोशल मीडिया का स्वरूप कैसा रह जाएगा ? घर के अन्दर बन्दी के इस समय में सामाजिक रूप से जागरूक लोगों ने इसके बेहतर इस्तेमाल की कोशिश की है। जूम, व्हाटसअप, गूगल मीट, फेसबुक लाइव आदि तमाम माध्यमों से सामाजिक सरोकारों के सवालों पर वेबीनार आयोजित होते रहे हैं तो लोगाों को मानसिक रूप से बीमार नहीं होने देने तथा परस्पर सहयोग आदि का प्रयास लोग इन्हीं माध्यमों से करते रहे हैं। 

परिवार के सदस्यों का और दोस्तों आदि का ग्रुप बना कर आपसी चैट का टाईम भी तय करके लोग बातें कर रहे थे। शायद भागदौड़ की जिन्दगी में समय बचाने के लिए लोग भविष्य में भी यह सब करते रहें। पहले भी बड़े लोगों के भाषण लाइव होते रहे हैं, लेकिन जूम आदि जैसे इन्टरएक्टिव सेशन इस महामारी के दौरान अधिक प्रचारित हो सके हैं।

दूसरी चीज़ लोगों में सृजनशीलता बढ़ी है और बड़े रोचक तरीके से अपनी बात दूसरों तक पहुंचाने के नए नए अंदाज भी सामने आए हैं, जैसे चेष्टा सक्सेना द्वारा अभिनीत ‘पुष्पाजीजी;, मंगतराम या प्रणाम वालेकुम जैसे प्रयोग। कई कलाकारों ने सामाजिक महत्व के मसलों पर छोटी छोटी फिल्में अपने ही घरों में रह कर बनायी हैं तथा उसे अपलोड किया है, जिन्होंने काफी लोकप्रियता भी हासिल की हैं।

कुछ चीज़ें जिनके प्रयोग की प्रैक्टिस लोगों को हो गयी है जिसका लाभ समाज के स्तरोन्नयन के लिए, विचारों के आदान प्रदान के लिए हो सकता है वह तो जारी ही रहे। लेकिन सचेत इस बात के लिए होना है कि यह समाज में प्रत्यक्ष क्रिया अन्तरक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता है अर्थात आनलाइन सुविधा की सीमाओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

सवाल यह उठता है कि क्या फेसबुक या सोशल मीडिया के अन्य रूपों में सबकुछ प्रशंसनीय ही है और उसके बारे में कोई आलोचना नहीं हो सकती। कुछ साल पहले पश्चिमी जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अटलांटिक’ ने इस मसले पर एक विस्तृत स्टोरी की थी जिसका फोकस था ‘क्या फेसबुक हमें अधिक एकाकी बना रहा है ’? विभिन्न तथ्यों आदि के आधार पर लेख का निष्कर्ष यही था। दरअसल कई तरह के शोध रिपोर्ट आ चुके हैं जो बताते हैं कि कैसे इन नेटवर्किंग साइटस ने बच्चों में मित्रमण्डली बनाने में बाधा खड़ा किया है और वे किस तरह लोगों को असोशल बना रही हैं, अधिकाधिक एकाकी बना रही हैं। किसी को लग सकता है कि मनुष्य के अपने निजी जीवन में अधिकाधिक एकाकी होते जाने का ही प्रतिबिम्बन इसमें दिखता है।

अपने इर्दगिर्द भी हम देख सकते हैं कि निजी जीवन में जो एक दोस्त तैयार नहीं कर पाता या दोस्ती निभाने की कीमत नहीं चुकाता वह सोशल नेटवर्किंग साइट पर सैंकड़ों फ्रेण्ड बना लेता है। सहपाठी या सहकर्मी भले न जानता हो तथा कोई दोस्तमण्डली न हो तो भी क्या हुआ घण्टो चैट तो किया ही जा सकता है इन आधुनिक तकनीकों द्वारा। आज कल तो लोग बताते हैं कि अब उनके कितने सौ या हजार फ्रेण्ड बन गए हैं। फेसबुक पर घण्टों बीतानेवाले किशोरों को कभी-कभी यह समझाना भी मुश्किल जान पड़ता है कि आभासी दुनिया की इस दोस्ती और वास्तविक दुनिया की दोस्ती में कितना फर्क है ? ‘कनेक्शन’ और बॉण्ड में कितना फर्क है ?

पिछले दिनों फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या पर एक मीम चला था जो बहुत कुछ कह रहा था: ' A guy with 9.8 million followers on Instagram and 1.8 million on twitter was alone, let that sink in. Virtual world is fake.'

कुछ माह पहले बंगलौर में रह रही रांची की एक छात्रा की आत्महत्या का समाचार छपा था। जब उपरोक्त घटना की तहकीकात की गयी तो पता चला कि उसके कभी आत्मीय रहे मित्रा ने -जिसके साथ सम्बन्धों में दूरियां बनी थीं - किसी अलसुबह उसे फेसबुक पर ‘अनफ्रेण्ड’ किया था अर्थात ‘फ्रेण्ड’ की उस सूची से भी उसके नाम को हटा दिया था। इसी के बाद छात्रा ने मृत्यु को गले लगाया था।

अपनी ही तस्वीर रोज अपडेट करनेवाले या कोई ऐसी बातें जो दूसरों से साझा करने की जरूरत नहीं हैं या किसी दूसरे लोगों के लिए उसकी कोई उपयोगिता नहीं हो, उसे भी अपने ‘मित्रों’ से शेअर करने की मानसिकता को सोशल मीडिया बढ़ावा देता है। वह लोगों को आत्ममुग्ध होने का अवसर प्रदान करता है।

आत्ममुग्ध होने का पूरा साजो सामान मौजूद है। सोशल मीडिया मनोरंजन के साथ आप के दिलोदिमाग को तराश रहा है। उसे गंभीर लम्बा कुछ भी नहीं पढ़ना है ज्यादा प्रभावित इस बात से हो जाएगा कि छोटा सा हंसाने वाला विडियो है या फिर एक फोटो आ गया जिसमें प्रियंका गांधी शादी के वेशभूषा में पति और मां के साथ बैठी हैं और कहा जाएगा कोई मुस्लिम आया था मुस्लिम रीति से शादी कराने के लिए या राहुल गांधी के दादा कोई फिरोज गांधी नहीं थे बल्कि फिरोज खान थे आदि। यानि ऐसी सूचनाएं जो लोगों के निजी जिन्दगी में झांकती हों, मनोरंजन भी करती हो और साथ ही ऐसा मानस भी तैयार करे जो जातिवादी-साम्प्रदायिक भी हो।

हालांकि हमारे समाज में पहले से ही ऐसे लोगों की संख्या अच्छी खासी थी जिनके लिए यह व्यक्तिगत प्रचार का माध्यम था। वे स्वयं ही यह तय कर लेते थे कि समाज उनसे लाभान्वित हो रहा है। व्यक्तियों को अपनी सुविधा से घर बैठे विचार बांट कर क्रांतिकारी बनने, समाज सुधारक बनने का अवसर था, लेकिन यह भी किसी संगठन या सामूहिक हस्तक्षेप का विकल्प नहीं हो सकता है।

हर व्यक्ति अपनी पहचान के लिए प्रयासरत है, किसी संगठन या विचार की पहचान या पैठ बनाने के लिए नहीं। वह काफी समय इसमें गुजारता है और उसकी मजबूत धारणा यह बन जाती है कि वह तो यह सब समाज के लिए कर रहा है।

ऐसा करना आसानी से संभव है यदि घर में वाईफाई है, डाटा कार्ड है तो आप अनलिमिटेड इस्तेमाल कर सकते हैं

किसी संगठन के प्रति जवाबदेही से मुक्त हैं। किसी भी उन्नत समाज में जवाबदेही और जिम्मेदारी एक उन्नत मूल्यबोध होगा।

यहां इस व्यक्तिगत प्रयास में आप अपना जो छुपाना चाहते हैं वह छुपा सकते हैं। मान लीजिए, आप बांट कर नहीं खाना चाहते हैं, अपने घर में किसी को नहीं ठहराना या आने देना चाहते हैं यह किसी को पता ही नहीं चलेगा।

हो सकता है कि कुछ प्रगतिशील विचारवान भी कहें कि हमें भी ऐसा ही करके अपने विचार लोगों के बीच ले जाने चाहिए। हो सकता है कि सही विचार चला भी जाए लेकिन बड़ा मुददा यह है कि सतही लोकरंजक ढंग से विचार-विमर्श को बढ़ावा देना कहां तक वाजिब है। गहरे पैठ कर विचार विमर्श का विकल्प नहीं हो सकता है, चलते फिरते ज्ञान दे देना।
विरोधी विचार वालों का यदि कोई मज़ाक उड़ाये तो अच्छा ही लगता है, लेकिन उस मज़ाक की प्रक्रति कैसी है मारक है, छोटे में बड़ी बात कह देने जैसी है या फिर गुदगुदी करनेलायक है, व्यक्तिगत स्तर पर उतर कर लानत-मलामत करनेवाली है, यह गौर करनेलायक है।

सोशल मीडिया के शिष्टाचार को लेकर भी समय समय पर विचार पढ़ने को मिलते है, लेकिन बावजूद इसके अब सोशल मीडिया भी पुराना हो  रहा है तो लोगों से भी परिपक्व होने की उम्मीद की जाय, लेकिन वह सतही क्रिया का प्रतिक्रिया देनेवाला ही मुख्य रूप से अपनी छवि बनाए हुए है।

सोशल मीडिया के शिष्टाचार पर पीयूष पांडेय /हिंदुस्तान/ ने एक बार लिखा था कि आप खुद से सवाल पूछिए कि आप सोशल मीडिया के मंच पर क्यों हैं ? इसका उददेश्य क्या है ? प्रभावशाली लोगों से नेटवर्किंग के लिए, नए नए दोस्त बनाने के लिए, मौज मस्ती के लिए, अपना कहा लोगो को पढ़ाने के लिए ? वे कहते हैं कि सम्भव है कि आपने पहले ऐसा न सोचा हो, लेकिन यदि आप सोचते हैं तो आप इसका बेहतर इस्तेमाल कर सकते हैं। वे बताते हैं कि करोड़ो लोगों को पता ही नहीं कि फेक न्यूज क्या बला है और वे अपने विचार के हिसाब से फारवर्ड करते रहते हैं। यदि आप हर चीज़ पोस्ट करके टैग करते रहेंगे तो यह सोशल मीडिया शिष्टाचार में अभद्रता माना जाता है। उनका कहना था कि कोईभी पोस्ट पढ़ते समय आप सोचें कि उसको पढ़ना आप के लिए कितना जरूरी है ? सोशल मीडिया के शिष्टाचार को समझना जरूरी है। इसमें दिन में अधिक पोस्ट करना, बिना पूछे टैग करना, लाइक्स के लिए गुजारिश करना आदि अभद्रता है। उनके अनुसार ट्रैफिक  लाइट एप्रोच: लाल - ठहरिए, कुछ भी लिखने पढ़ने पोस्ट करने से पहले सोचिए कि वह कितना जरूरी है। नारंगी/पीला: परखिये आप के शब्द, आप की बातें किसी के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक स्थिति पर तंज तो नहीं हैै। आप की बातें आप की छवि का निर्माण करती हैं। हरा - चलिए, यदि आप की सामग्री तथ्यपरक है, लोगों के लिए उपयोगी है तब आप इसे पोस्ट कर दें।

अन्त में, सोशल नेटवर्क से जुड़ने का मामला नई तकनीक या उसके नुकसान फायदे का नहीं है। वह व्यक्तियों की रूचि के साथ ही अलग अलग प्रकार के लोगों पर निर्भर करता है कि वे ऐसे कम लागत एवं कम समय लेने वाले इस आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किसलिए करते हैं।


2 comments:

Arpita said...

अंजलि
बहुत ज़रूरी बातें हैं इस आलेख में, खुद को परखने यानी आत्मालोचन को बाध्य ( सकारात्मक रूप में ) करता ।


यह बात सभी पर लागू होती है और याद रखे जाने वाली है -
हर व्यक्ति अपनी पहचान के लिए प्रयासरत है, किसी संगठन या विचार की पहचान या पैठ बनाने के लिए नहीं। वह काफी समय इसमें गुजारता है और उसकी मजबूत धारणा यह बन जाती है कि वह तो यह सब समाज के लिए कर रहा है।

Babita said...

Anjali ji,
Bahut achha likha h aapne.social s ide ke baare me jesa aajkal chal raha h .log aajkal kafi time social media par bitate ase me important ho jata h ki kuch important matarial share kare .

Post a Comment