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Saturday, June 6, 2020

वो किससे डरते है ?

- निधि मिश्रा


बात आज से कुछ आठ-दस साल पहले की है। स्त्री मुक्ति संगठन, दिसंबर में अंबेडकर द्वारा मनुस्मृति दहन दिवस को स्त्री सम्मान दिवस के रूप में मना रहा था। लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व वाइस चांसलर, रुपरेखा वर्मा जी मुख्य वक्ता थीं।

रुपरेखा जी ने वक्तव्य के शुरू में ही कहा कि मैं निजी स्तर पर पुस्तकों को जलाने से सहमत नहीं हूं, हमें उन विचारों से लड़ना होगा।

किसी वैचारिक प्रतिद्वंद्वी या किसी प्रतिद्वंद्वी विचारधारा से वैचारिक और प्रिंसिपल्ड लड़ाई लड़ने का नैतिक बल अपनी विचारधारा में कंविक्शन और उन विचारों की श्रेष्ठता के व्यहवारिक, वास्तविक और वैज्ञानिक आधारों को गहराई से समझने से आता है।

बाकि जब खुद की विचारधारा का आधार गैर बराबरी, सामाजिक श्रेणीबद्धता,झूठा श्रेष्ठता बोध और खोखले दावे हों तो प्रतिद्वंद्वी विचार से नहीं व्यक्तियों से लड़ना, उनको एक क्रांतिकारी सलाम ,एक क्रांतिकारी अभिवादन, क्रांतिकारी साहित्य रखने भर के लिए जेल में ठूंस देना जरूरी हो जाता है। पूरी दुनिया भर में डरपोक सरकारें यही करती हैं।

इसलिए अब NIA ने डरपोक सरकारों के चलते बिट्टू सोनवाल और एक अन्य (असम के कृषक मुक्ति संग्राम समीति के सलाहकार अखिल गोगोई के साथी) के उपर लेनिन की फोटो फेसबुक पर अपलोड करने,लाल सलाम लिखने और साथियों को कामरेड कहने का आरोप लगाते हुए चार्जशीट दाखिल की है (लिंक कमेंट बाक्स में) ज्ञात हो कि बिट्टू सोनवाल को इस साल और गोगोई को पिछले साल दिसंबर में Anti CAA प्रोटेस्ट के लिए गिरफ्तार किया गया था।बेल मिलने के बावजूद उन्हें रिहा नहीं किया गया है।जबकि बिनायक सेन मामले में कोर्ट ने स्पष्ट निर्णय दिया था कि कम्यूनिस्ट साहित्य रखना और पढ़ना कोई अपराध नहीं।

लाल सलाम और कामरेड शब्द मैंने पहली बार इलाहाबाद हाईकोर्ट चौराहे पर, सफदर हाशमी की हत्या के कुछ ही दिनों के अंदर उनकी पत्नी मलयश्री हाशमी के मुंह से नुक्कड़ नाटक "हल्ला बोल" के दौरान सुने थे।(उस समय शायद मैं मेडिकल कॉलेज के पहले वर्ष में थी और उत्सुकतावश अपनी प्रिय सहेली के आग्रह पर यह देखने गई थी कि यह नुक्कड़ नाटक क्या बला है।तब मुझे वामपंथ, समाजवाद और साम्यवाद का क ख ग भी नहीं पता था। आज भी क ख ग से आगे बढ़कर च छ ज तक ही पहुंच पाई हूं)।

पता नहीं आत्मविश्वास से दमक रही मलयश्री की तनी हुई मुठ्ठी हवा में उठाकर लाल सलाम कहने का जादू था या उस औरत के कनविक्शन का,जो अपने पार्टनर की हत्या के मात्र दो दिन बाद ही ठीक उस ही जगह(साहिबाबाद) पर ठीक उस ही नुक्कड़ नाटक (हल्ला बोल) को करने पहुंच गयी जिसके मंचन के दौरान सफदर की हत्या हुई थी,कि मेरे और सहेली सहित तमाम दर्शकों की भीड़ मुठ्ठियां तान कर लाल सलाम कहने लग गई । वहां से हम दोनों ने पैसे मिलाकर सफदर पर,सफदर की कविताओं की किताब खरीदी और रात भर में पढ़ डाली (उस किताब के खो जाने पर हम दोनों में गुस्सा गुस्सी भी हो गई थी।बाद मे कई सालों बाद पुनः खरीदी)। सफदर के बारे में उस किताब से तमाम जानकारी मिली।

यह और बात है कि उसके बाद हम दोनों मेडिकल के विस्तृत पाठ्यक्रम और पढ़ाई,ड्यूटी में इतने व्यस्त हो गये कि तब लाल सलाम का क ख ग भी पता करने का समय वर्षों तक नहीं मिला (ना इंटरनेट था ना मोबाईल)! होनहार सहेली , राजनीति से दूर एक बेहतरीन डाक्टर है और अब पूरी तरह अध्यात्मिक हो गई है। मैं डाक्टरी करने के साथ साथ आज क ख ग से च छ ज तक पहुंच गई हूं। जब इस घटनाक्रम और अपने खुद के अनुभवों पर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि श्रेष्ठ विचारों की ताकत उसको धारण करने वालों के नैतिक बल से आती और प्रसारित होती है। और यह अनैतिक सत्ताओं को बहुत डराता है।

तो आइए श्रेष्ठ विचारों के नैतिक बल को श्रेष्ठ व्यहवार में बदलें!

पढ़िए और समझिए कि अक्सर क्रांतिकारी विचार से डरकर विचारक को क्यूं खत्म कर देना चाहते है राजनीति और धर्म।

PS- निधि मिश्रा पेशे से डॉक्टर है, और इलाहाबाद मे रहती है। वो स्त्री मुक्ति संगठन की सक्रिय सदस्य है। 

2 comments:

Babita said...

Mujhe bhi yaad h ek baar me bhi ese kisi program me samil hui thi jisme Manu ismruti bookk ko jalaya gaya tha .lekin vo galat tha hame soch badlne ki jarurat h.

Babita said...

Mujhe bhi yaad h ek baar me bhi ese kisi program me samil hui thi jisme Manu ismruti bookk ko jalaya gaya tha .lekin vo galat tha hame soch badlne ki jarurat h.

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