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Friday, May 29, 2020

आखिर दोषी कौन ?


-अंजलि सिन्हा


राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र में स्थित लोनी के चिरोडी गांव से एक विचलित करनेवाली ख़बर आयी है, जिसमें एक पिता द्वारा अपनी सन्तानों की हत्या करने की कोशिश की गयी है।


समाचार के मुताबिक पिता ने  अपनी दो बेटियों और दो नातिनों को एक कमरे में बंद कर आग के हवाले कर दिया था, जिसमें एक बच्ची की मौत हो गई। आरोपी ने आग लगा कर आग की सूचना खुद ही पुलिस को दी और जुर्म भी कबूल किया। उसके मुताबिक उसकी दो बेटियों की शादी अलीगढ़ में हुई थी, एक बेटी के दो बेटे और दो बेटियां है तो दूसरी बेटी के एक बेटा है। पिछले दो साल से दोनों बेटियां अपने पांचों बच्चों के साथ मायके में ही रह रही थीं। सलीम चाहता था कि बेटियां अपने ससुराल जायें, अपना घरबार संभाले। लॉकडाउन में सलीम और भी परेशान हो गया। सलीम ने पुलिस को बताया कि बेटियां जब चाहें घर से बिना बताये कई दिनों तक गायब रहती थीं और फिर आ जाती थीं। उनके व्यवहार से वह तंग आ गया था। सलीम की पत्नी और बेटा उसके इस व्यवहार से स्तब्ध हैं। ठेले पर फल बेचनेवाले सलीम ने जो अपराध किया है , वह अक्षम्य है और अब उसे इसकी सज़ा भी भुगतनी पड़ेगी। वह गिरफतार हो गया है। 


सलीम का किस्सा पढ़ रही थी और बरबस नजदीक के इलाके में रहनेवाली सुनीता - जो घर घर जाकर बरतन पोंछा का काम करती है - उसकी तथा उसकी तीनों बेटियों की कहानी याद आयी। 
लगभग 15 साल पहले सुनीता के पति का देहान्त हो गया, वह शायद टीबी का मरीज था। पति की मौत के बाद अपना तथा अपनी तीनों बेटियों का पेट पालने के लिए उसने कुछ घरों में झाडू पोंछा का काम शुरू किया। इलाके के किसी भलेमानुस के प्रयास से कुछ सालों बाद सरकारी विधवा पेंशन भी मिलने लगी। कुछ रहमदिल लोगों ने दो बेटियों की शादी में सहयोग किया तो शादी भी करा दी। छोटी बेटी ने अपनी मर्जी से शादी की।

स्थिति यह है कि दोनों बड़ी बेटियों में भी एक का परिवार बहुत गरीब है और दूसरी वाली का पति नशेडी और पियक्कड है। हालत यहां तक आ पहुंची है कि दोनों बेटियां अपने बच्चों के साथ अपनी मां के पास हैं। सुनीता घरों में काम करके बेटियों , नतिनियों का पेट पाल रही है। मेरे काफी समझाने के बाद भी बेटियां काम करने नहीं जा रही हैं, उन्हें घर-घर जाकर काम करने की इच्छा नहीं है और काम जल्दी मिलता भी नहीं है।


इस तरह के अन्य ढेरों मामले हैं, जिसमें यह दुश्चक्र चलता रहता है।


ऐसे प्रसंग जब भी सुनाई देते होंगे तो हममें से बहुतों के पास बहुत तरह की बातें होती हैं। कोई उनके ससुरालवालों को जिम्मेदार ठहराता दिखता है क्योंकि उन्होंने जिम्मेदारी नहीं संभाली, कुछ लोग युवाओं की नशाखोरी की बात भी कर सकते हैं !

मैं समझ नहीं पाती कि लड़कियां क्या कोई वस्तु होती हैं कि शादी से पहले मायकेवालों की जिम्मेदारी में रहें तो शादी के बाद ससुरालवालों की ?


गरीबी एक बड़ी वजह जरूर है जिसमें सलीम आपा  खो बैठता है और सुनीता को भी लगता रहता है कि किसी भी दिन भागते भागते काम करते करते वह कहीं ढेर हो जाएगी। वह सर पकड़ कर बैठती है लेकिन सुबह उठ कर फिर काम पर निकल जाती है क्योंकि बच्चे क्या खायेंगे ?


परंतु सलीम या सुनीता के घर में सबकुछ पर्याप्त होता तो भी क्या उन्हें अपनी युवा बेटियों और उनके बच्चों के भरण पोषण की जिम्मेदारी लेने के लिए बाध्य रहना ही चाहिए।


यही से यह बात उठती है कि तमाम परिवारों में क्यों बेटियां किसी न किसी पर निर्भर बनी रहती हैं। इसके बिल्कुल उल्टे द्रश्य अधिक देखने को नहीं मिलते हैं, जहां जवान बेटे घरों में आराम फरमा रहे हैं और बुजुर्ग पिता बेटों तथा उनके बच्चों के लालन पालन में रात दिन एक किए हुए हैं।


यद्यपि यहां बेटियों के सन्दर्भ में यह बात उठ सकती है कि वे भले अर्थार्जन का काम नहीं कर रही हों, मगर घर ग्रहस्थी या बच्चों की जिम्मेदारी तो वहीं उठाए हुए हैं तो क्या इसे काम का दर्जा नहीं मिलना चाहिए ?

इस पूरे मसले को जेण्डर के नज़रिये से ही समझा जा सकता है।पितृसत्तात्मक समाज में पुरूष की भूमिका और स्त्राी की भूमिका समान होने भी नहीं दी जाती है। पुरूष जहां कर्ता है वहीं स्त्राी अपनी मानसिकता में निर्भरताबोध को आत्मसात कर लेती है। पितृसत्ता का मतलब ही है ऐसी भिन्न भूमिका वाली मानसिकता जिसका स्त्राी पुरूष दोनों शिकार होते हैं। स्त्राी स्वयं भी यह मानने लगती है कि वह उपभोग की वस्तु है चाहे घर के अन्दर वैवाहिक जीवन में हो या फिर बाज़ार के लिए हो। इस पूरी समाजीकरण की प्रक्रिया में धीरे धीरे उसका देह ही उसकी सबसे बड़ी अमानत हो जाती है, उसकी की धुरी पर कभी उसे बचाने के लिए , कभी उसे सुघड़ बनाने के लिए तो कभी कोई रखवाला ढूंढ़ कर उसके हवाले करने के लिए प्रयासरत रहती हैं। अपने सपनों का राजकुमार ढूंढने की यह ख्वाहिश अक्सर मृगमरीचिका ही साबित होती है अलबत्ता खोज जारी रहती है। 


अगर औरत समान हक, समान जिम्मेदारी और हर जगह पूर्ण बराबरी की सोच लेकर अपना सफर तय करने लगे तो पितृसत्ता के लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। इसीलिए यह पितृसत्ता  के हक़ में है कि ऐसी व्यवस्था बने जिसमें वह सहर्ष शामिल भी हो और शिकार भी बन सके। वह पीड़ित भी हो और पीड़क की मानसिकता से लैस भी हो। वह जोर-जबरदस्ती और यौनिक हिंसा की शिकार भी होगी और कहीं अपनी इच्छा के विरूद्ध भी स्वयं को किसी को सशरीर सौंप देने को सही भी ठहरा देगी और कभी अपनी ‘‘च्वाइस’’ अपनी मर्जी से भी ‘‘मातहत’’ होना अपने जीवन में चुन लेगी। वह कह भी सकती है कि माता पिता जो भी करेंगे हमारे भले के लिए करेंगे, वही हमारे लिए बेहतर वर तलाश सकते हैं।

अब ताहिरा, साहिरा - सलीम की बेटियां - और सोनी और मीनू - सुनीता की बेटियां - आदि तमाम लड़कियों को ससुराल से मायका और फिर मायके से ससुराल भेज दिए जाने की प्रक्रिया से शिकायत ही होगी यह जरूरी नहीं है। अधिकतर स्त्रियां ताउम्र विस्थापनबोध में रहती हैं, और उसे ही नियति मान लेती हैं। वे जहां पैदा होती हैं, वहां उन्हें ऐसे पाला पोसा जाता है कि वे ‘पराये घर’ की हैं और ‘पराये घर’ वाले उसे बात बात पर मायके की याद दिलाते रहते हैं। ऐसा वातावरण है या वह ऐसे गढ़ी गयी हैं कि दूसरों के साथ-साथ खुद भी अपने पैरों पर कुल्हाडी  मारती रहती हैं।

क्या इस गुफतगू से यह निष्कर्ष निकाला जाए कि औरत हर जगह और हमेशा निर्भर प्राणी की मानसिकता में ही रहती है। वह स्वतंत्रचित्त इन्सान भी बनी है और यही बात वास्तव में बदलाव की वजह है कि वह जेण्डरभेद और पित्रसत्ता के खिलाफ तरह तरह से मोर्चा ले रही हैं। देखना यह है कि यह प्रयास और ताकतवर कैसे बने ! फिर ताहिरा, साहिरा, सोनी, मीनू सभी श्रमिक बन सकें, वेतनभोगी काम के भी साझीदार बनें और घरगृहस्थी जैसे बिना वेतन के काम में दूसरों का साझीदार बनायें। पिता के घर से पति के घर और फिर पति के घर से पिता के घर भेज देने के लिए सामान न बने।

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