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Tuesday, May 5, 2020

स्कूली बच्चे: वयस्क विकार !

क्या फिर से चर्चा सज़ा की सख्त़ी के इर्दगिर्द घुमेगी ?

- अंजलि सिन्हा

इन्स्टाग्राम पर बना बच्चों का एक ग्रुप इन दिनों देश की सूर्खियों में है।

वजह यह नहीं है कि यह बच्चे दक्षिणी दिल्ली के नामी स्कूलों में पढ़ते हैं - और जाहिरसी बात है सम्पन्न परिवारों से हैं। दरअसल कक्षा 11 वीं और 12 वीं के छात्रों की इन्स्टाग्राम पर डाली कई सारी पोस्टस से यह विवादों में हैं।

‘बॉयस लॉकर रूम’ नामक इस ग्रुप में लड़कियों के फोटो, उस पर अश्लील टिप्पणियां, यौनिक भाषा तथा इतनाही नहीं बलात्कार जैसे आपराधिक हिंसक व्यवहार को भी बड़े सहज ढंग से व्यक्त किया गया है। 

दक्षिणी दिल्ली की उस लड़की के साहस की तारीफ करनी पड़ेगी जिसने इनमें से कुछ मेसेजेस मीडिया के सामने रखे, जिन्हें देख कर सभी हतप्रभ हैं कि हमारी किशोर पीढ़ी क्या कर रही है ?

इसमें बच्चे बड़े ही कैजुअल ढंग से रेप की बात कर रहे हैं, सेक्सुअल ऑब्जेक्टिफिकेशन कर रहे हैं। स्कूलों में गहरे में व्याप्त मिसोजिनी/नारीद्वेष का यह एक नमूना है। और यह सब अव्वल कहे गए स्कूलों का मामला है। औरत के शरीर के उपभोग तथा वस्तुकरण की मानसिकता इसमें साफ देख सकते हैं। भददे मज़ाक और जोक्स भी इसमें शेयर किए गए हैं।

हममें से किसी को भी यह समझने की गलती नहीं करनी चाहिए कि यह किसी एक स्कूल या कुछ बिगड़े बच्चों का मामला है। इसकी व्यापकता के बारे में एहसास करने, जानने की जरूरत है कि बच्चों में यह बीमार मानसिकता बढ़ रही है जिसे वे कभी छुपा ले जाते हैं और कभी मूर्खतावश पकड़े जाते हैं।

कुछ माह पहले मुंबई के सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों में शामिल एक स्कूल के आठ बच्चे ऐसी ही वजह से स्कूल से निलंबित किए ग थे। उनकी भाषा उसी किस्म की थी, ‘रेप’ और ‘गैंग बैंग’ ( अर्थात सामूहिक बलात्कार ) की। इनमें कई सेलेब्रिटीज के बच्चे थे और जैसा कि ऐसे मामलों में होता है ‘बच्चे गलतियां करते हैं’ कहते हुए उनमें से कइयों के माता पिताओं ने मामले को हल्का कर दिया था और मामला रफा दफा हो गया था।

कुछ साल पहले ही दक्षिण दिल्ली के एक स्कूल के बच्चों के व्हाटसअप ग्रुप पर अपनी ही किसी सहपाठी की अश्लील तस्वीरों का मामला रौशनी में आया था और जिसका नतीजा उस लड़की के उस स्कूल छोड़ने में हुआ था।

दरअसल मी टू अभियान के समय 2018 में एक अन्तरराष्ट्रीय स्तर के सर्वेक्षण में कहा गया था कि ‘भारत महिलाओं के लिए सबसे ख़तरनाक जगह है’

बच्चे भी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और वे यहां तमाम तरह के सेक्सिस्ट जोक्स और सामग्री पढ़ते हैं, शेयर करते हैं और स्वयं ऐसी सामग्रियों के निर्माता भी हैं।

बॉयस लॉकररूम’ से सम्बधित कुछ बच्चे पकड़े गए हैं, बाकी भी पकड़े जाएंगे। कुछ पैसे रूतबे के दम पर छूट जायेंगे। दिल्ली महिला आयोग ने भी शिकायत में मांग की है कि इन्हें सख्त सज़ा हो। त्वरित कार्रवाई की मांग भी होगी। लेकिन मूल सवाल फिर भी गायब ही रहेगा कि औरत के शरीर के वस्तुकरण करने की जिम्मेदारी किस किस पर डाली जाये। कैसे शरीर के उपभोग के चीज़ में तब्दील होता है और इस भूमिका में भागीदारी की पहचान हो। आखिर विकृत यौन मानसिकता तैयार करने के स्त्रोत तो इसी समाज में हैं। 


और यदि इनमें से कुछ को विक्रत के श्रेणी में ना भी रखें तो गैरबराबरीपूर्ण, शक्तिसम्पन्न तथा पौरूषपूर्ण मानसिकता की श्रेणी में तो डाल ही सकते हैं और इन्हीं में से कुछ अपनी सीमा पार कर जाते हैं तो वे अपराधी व्यवहार की श्रेणी में आ जाते हैं।

उक्त स्कूल के बच्चों को उनके कानूनअसम्मत व्यवहार के लिए जहां तक सज़ा की बात हैं तो इस बात से कोई इन्कार नहीं करेगा कि उन्हें अपने किए की सज़ा तो मिलनी चाहिए। अब जो प्रावधान है उसके मुताबिक वे सुधारगृह  भेजे जा सकते हैं, जहां सुधरने की गुंजाइश कम बिगड़ने की गुंजाइश अधिक होती है। कुछ यह भी सुझाव दे सकते हैं कि इनके साथ किशोर अपराधी नहीं बल्कि बड़े/वयस्क अपराधी की तरह पेश आएं,, सख्त़ सज़ा का प्रावधान करें आदि। लेकिन सोचना यह है कि वे भविष्य में किस प्रकार के व्यक्ति और नागरिक के रूप में हमारे बीच विचरण करें ? और फिर सज़ा तो आप उन्हीें को दे पायेंगे जो पकड़ में आ जाएंगे, जिनका भांडा फूटेगा, लेकिन पूरे वातावरण को बिगाड तो वे भी रहे हैं जो पकड़ से स्वयं को बचा ले जाते हैं।

सज़ा तो निश्चित होनी चाहिए इन बच्चों को वरना इन बच्चों को देख दूसरे बच्चों का भी इसी किस्म के अपराध करने की तरफ, स्त्राीविरोधी हिंसा को जायज ठहराने या उसे ‘एंजॉय’ करने की दिशा में हौसला बढ़ेगा। लेकिन दंड जो भी तय हो एप्रोच/समझ यह होनी चाहिए कि इसके लिए बीज, खाद, पानी हम बड़ों की दुनिया ने परोसा है।

हो सकता है कि सज़ा के रूप में उन्हें स्कूल से निकाला जाए या एक साल इम्तिहान न बैठने दिया जाए।


जो भी तय करें, अपने समाज को गंभीरता से यह विचार करना चाहिए कि अपने बच्चों का स्वस्थ नज़रिया कैसे विकसित करे और यह तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक औरत का स्थान बराबरी का न हो। अक्सर इस बात को ऐसे भटकाया जाता है कि वह देवी है, मां है, बहन है और उसका स्थान सर्वोच्च है। लेकिन यह सब उपदेशों तक ही सीमित रहता है। आम जनजीवन में वह उपभोग की वस्तु और गैरबराबर इन्सान है। ऐसी छवि निर्मित करने के लिए जिम्मेदार स्त्रोतों की पहचान जरूरी है।

समानता हर स्तर पर चाहे वह आर्थिक हो, राजनीतिक हो, शैक्षिक, सामाजिक, इन सभी के साथ ही छवि का निर्माण भी होता है, जिसमें हमारे प्रचार माध्यम, टी वी, फिल्में, रहन-सहन, संस्कृति आदि का बहुत व्यापक दायरा है जो स्त्राीद्रोही सोच तैयार कर रहा है, उसे मजबूत बना रहा है। इन सभी को एजेण्डा पर लेना एक बड़ा काम है, लेकिन मर्द बनते बच्चों पर काम करना निहायत जरूरी मसला भी है। वरना हम चाहे जितना विकास की सीढ़ियां चढ़ने का प्रयास करें, लेकिन लोग रूग्ण मानसिकता वाले ही तैयार होंगे। ऐसे कुण्ठित, बीमार जेहन लेकर हम भविष्य का कैसा समाज बना पाएंगे यह विचारणीय है।

फिलहाल तो सभी चिन्तित हैं।

1 comments:

Babita said...

कम शब्दों में अच्छे से बताया आपने।

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