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Sunday, April 19, 2020

लॉकडाउन में घरेलू हिंसा में बढ़ोत्तरी


बस बहाना चाहिए था ? कुछ है जो छुपाये नही छुपता !!



-अंजलि सिन्हा

उसने फोन की चर्चा में तो यही बताया था कि सबकुछ ठीक है।

लॉकडाऊन  में सब घर पर हैं। बच्चे भी खुश हैं कि माता पिता घर पर हैं, समय से मनपसंद खाना मिलता है आदि। हालांकि बच्चे बाहर खेलना मिस कर रहे हैं। कभी कभी नेटफिक्स लेटेस्ट मूवी भी देख लेते हैं। पतिदेव भी घर के काम में हाथ बंटा देते हैं, आदि।

यह अलग बात है कि ‘सबकुछ ठीक’ का आवरण अधिक समय तक टिक नहीं सका, जब पड़ोस की परिचिता ने फोन करके बताया कि उसे पति ने किसी बात पर पीटा था, इतना शोरगुल हुआ कि बात घर तक सीमित नहीं रह सकी ।

निश्चित ही उसकी आपबीती अपवाद नहीं कही जा सकती।

पिछले दिनों राष्ट्रीय  महिला आयोग ने मीडिया को बताया है कि लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के मामले में बढ़ोत्तरी हुई है। करोना महामारी के कारण आर्थिक नुकसान, नौकरी की चिन्ताएं, लोगों के मानसिक स्वास्थ्य आदि पर तो हम सब का ध्यान जा रहा था, लेकिन आयोग के खुलासे के बाद इसकी तरफ भी ध्यान गया।राष्ट्रीय  महिला आयोग ने आंकड़ा दिया कि मार्च 23 से अप्रैल 16 के बीच उसके पास 587 शिकायतें आयी हैं जिसमें से 239 मामले घरेलू हिंसा के हैं। आयोग के मुताबिक 27 फरवरी से 22 मार्च के बीच उसके पास घरेलू हिंसा के 123 केस आए थे। कहने का तात्पर्य कि लॉकडाऊन के दौरान घरेलू हिंसा के मामलों में लगभग दुगुनी बढ़ोत्तरी हुई है। 


आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा बताती हैं कि लॉकडाउन की खास परिस्थिति में जबकि पूरे परिवार को घर तक ही सीमित रहना है, इसका मतलब यही होता है कि परिवार के अन्दर के उत्पीड़क और पीड़ित दोनों को एक ही छत के नीचे गुजारना पड़ता है, जिसकी वजह से आप महिला विरोधी हिंसा में या ‘आत्मीय हिंसा’ में बढ़ोत्तरी देख सकते हैं। आयोग की तरफ से ऐसे मामलों पर तुरंत कार्रवाई के लिए एक अलग वाटसअप नम्बर भी जारी किया गया है।


लेकिन अध्यक्षा का स्पष्टीकरण एक पहलू तक ही सीमित है। वह इस बात पर रौशनी नहीं डालता कि स्त्रिायों की बढ़ती कारकशक्ति/एजेंसी, उनका आत्मविश्वास के साथ चीजों को अंजाम देना, पिछली पीढ़ी की औरतों की तरह ‘चरणों की दासी’ बन रहने की नियति को नाकूबूल करना किस तरह पारम्पारिक किस्म के पुरूषों को किस कदर चुभता होगा, जिसकी परिणति भी हिंसा में होती होगी।

न सिर्फ हमारे देश में बल्कि कोविड 19 की महामारी के दौरान दुनिया के अन्य देशों से भी महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा की ख़बरें आ रही हैं। द गार्डियन ने ख़बर दी है कि ब्रिटेन में 23 मार्च से 16 अप्रैल के बीच कम से कम 16 महिलाओं की घरेलू हिंसा में मौत हो गयी। कारेन इंगाला स्मिथ ने पिछले 10 साल का डाटा शेयर किया जिसमें उन्होंने बताया कि प्रति वर्ष औसतन घरेलू हिंसा से 5 मौतें होती हैं।

फिर क्या यह कहा जा सकता है कि करोना ने पुरूषों को अचानक हिंसक बना दिया है।

यद्यपि पुरूष यह सोच सकते हैं कि करोना ने उन्हें अधिक प्रभावित किया है। उन्हें घर में रहना पड़ता है, अधिक संख्या में उनकी नौकरी गयी है या दांव पर लगी है क्योंकि जॉब में उनका प्रतिशत अधिक है, सार्वजनिक दायरे में विचरण तथा कमाने के लिए बाहर जाने में वे महिलाओं से आगे हैं लिहाजा घर में रहना उन्हें तुलनात्मक रूप से अधिक भारी पड़ रहा है।

महिलाओं के खिलाफ अपराध में बढ़ोत्तरी के साथ यूएस नेशनल क्राइम एजेंसी ने यह आशंका व्यक्त की है कि इस दौरान बच्चों के खिलाफ आनलाइन यौनिक हिंसा में भी अपराध बढ़े हें।

महामारी के दिनों में स्त्रिायों, किशोरियों या बच्चों पर - अर्थात जो तुलनात्मक रूप से अशक्त हैं - उन पर बढ़ती ंिहंसा का प्रसंग महज करोना के बहाने सामने नहीं आया है। क्लेयरे वेनहैम और उनके सहकर्मियों द्वारा किया गया अनुसंधान जो ‘जेण्डर एण्ड कोविद 19’ नामक लेख में प्रकाशित हुआ है, उसमें कुछ साल पहले फैली इबोला महामारी की चर्चा करता है। उनके मुताबिक इबोला महामारी के दौरान जब पश्चिमी अफ्रीका में स्कूल बन्द हेने पर लड़कियों पर ज्यादा असर पड़ा। शिक्षा से उनका डापआउट रेट बढ़ गया, किशोरावस्था में गर्भवती तथा यौनिक हिंसा के अन्य मामले बढ़ गए। शोध में इस बात की भी चर्चा है कि इबोला /2014/, जीका वायरस / 2015-16/, हाल में सार्स, स्वाइन फलू आदि  तमाम महामारियों में जेण्डर बराबरी के मुददे पर गहरा असर डाला।

ये सारे तथ्य और आंकड़े यह सोचने के लिए मजबूर करते हैं कि  ऐसे दबाव तथा हिंसक वातावरण निर्मित करने के लिए कौन जिम्मेदार हैं ? निश्चित ही इस महामारी ने सभी के लिए मुसीबतें खड़ी की हैं जिसका दूरगामी असर मानवता पर लम्बे समय तक रहेगा। लेकिन इससे यह सोचने के लिए भी हमें विवश किया है महिलाओं को बराबरी की तरफ आगे बढ़ते जाने का काम अभी अधूरा है। जो भी तबका वंचित और कमजोर होता है, उस पर महामारी तथा प्राक्रतिक आपदाओं की मार भी अधिक पड़ती है। इस दौर में हिंसा को यह समझ कर छोड़ा नहीं जा सकता क्योंकि घरेलू हिंसा करनेवाला भी बेचारा परेशान था बल्कि गहरे पैठे पित्रसत्तात्मक मूल्यों से निजात पाने का अवसर भी मान सकते हैं। आखिर पूरी बराबरी कब सुनिश्चित होगी ?

1 comments:

Babita said...

Bahut achhe se bataya aaj corona ke time me mahilaon ki condition ya atyachar jyada ho rahe h

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