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Thursday, November 26, 2020

पितृत्व अवकाश

  - अंजलि सिन्हा



भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली द्वारा आस्ट्रेलिया के साथ क्रिकेट श्रृंखला  के दौरान उठाए एक अलग कदम से एक कम चर्चित मुददा सूर्खियों में आया है। मालूम हो कि उनकी पत्नी - सिनेतारिका अनुष्का शर्मा जो इन दिनों गर्भवती हैं - उनके लिए उन्होंने पितृत्व अवकाश की मांग की तथा इसे इस श्रृंखला के दौरान स्वीकारा भी गया है।

ध्यान रहे मातृत्व अवकाश की तरह जो पिता बननेवाले हैं उन्हें पितृत्व अवकाश मिले इसकी बात काफी समय से चलती रही है, लेकिन हमारे जैसे पितृसत्तात्मक समाज में ज्यादा जोर नहीं पकड़ पाया है जहां पिता अपनी जिम्मेदारी नहीं समझते हैं। 

आज के दौर में जब बतौर श्रमिक और कर्मचारी का दर्जा पाना ही खतरे में है यानि स्थायी नौकरियां समाप्त की जा रही हैं इस नवउदारवादी दौर में जब कर्मचारी सुविधा की बात करना बेमानी हो जाता है, ऐसे में फिर यह मांग भी और पृष्ठभूमि में चली गयी है।

Saturday, November 21, 2020

Report- Stree Mukti Sangathan's 21st Workshop, 2-4 October, 2020


Stree Mukti Sangathan has organised it 21th workshop from 2nd October to 4th October. As we know Sangathan holds annual residential workshop in which various we discuss various issues concerning women and society at large. Due to Covid, this time the workshop was held through virtual mode. In the three days long workshop, we covered issues ranging from feminist politics in contemporary times to the politics associated with social media.  Workshop provided a free, gender- neutral space for both expression and discussion about issues permeating boundaries of personal-political life. Members from different corners of the country joined the workshop, and enriched the discussion through their participation.

Along with sessions, various activities were conducted which focused on and highlighted the problematic deep rooted gender based discrimination through a variety of research based presentation and experience based cultural activities.

Sessions taken by scholars working in the field of women development through various academic, political and cultural initiatives contributed in creating a feminist foundational understanding during the workshop.

Thursday, November 5, 2020

पुस्तक परिचय: भक्ति और जन: सत्ताविमर्श और प्राचीन भारत के जनसमुदायों का संस्कृतीकरण लेखक - डॉ सेवा सिंह : पुस्तक परिचय - अंजलि सिन्हा


भक्ति आन्दोलन के प्रति समग्र आलोचनात्मक रवैया रखने वाली किताबों- रचनाओं की काफी कमी दिखती है।

प्रो सेवा सिंह की किताब ‘भक्ति और जन - सत्ताविमर्श और प्राचीन भारत के जनसमुदायों का संस्कृतीकरण ’ / प्रकाशन वर्ष 2005/ ने इस मामले में एक नयी राह दिखाती है।  ध्यान रहे कि उपरोक्त किताब के बाद आयी उनकी दो अन्य पुस्तकों ‘ब्राहमणवाद और जनविमर्श’ / प्रकाशन वर्ष 2012/ और ‘भक्ति और भक्ति आन्दोलन’ / प्रकाशन: 2017/ के माध्यम से भी उन्होंने इस विषय पर अपने विमर्श को आगे बढ़ाया है।

Wednesday, October 28, 2020

DOES YOUR CITY HAVE A GENDER?

- Nighat Gandhi


If women’s rights are human rights, it stands to reason that a feminist city is a humanist city.

                                     Urban anthropologist, Katrina Johnston-Zimmerman


Does your city have a gender?


Picture uploaded from Google

Thursday, October 15, 2020

Health Crisis in India during COVID-19 Pandemic: Indicator of Failing Neo-liberal Capitalism

- Narender & Vaishali

David Harvey, a Marxist, has rightly argued that in neo-liberal capitalism, the private sector including multinational companies are not interested to deal with global public health crisis like the Covid-19 pandemic but the private hospitals and pharmaceutical companies to have more capital accumulation by undertaking more business from public health and maximize their profits by any means. As he stated:

 Corporatist Big Pharma (Multinational Company) has little or no interest in non-remunerative research on infectious diseases (such as the whole class of coronaviruses that have been well-known since the 1960s). Big Pharma rarely invests in prevention. It has little interest in investing in preparedness for a public health crisis. It loves to design cures. The sicker we are, the more they earn. Prevention does not contribute to shareholder value. The business model applied to public health provision eliminated the surplus coping capacities that would be required in an emergency. Prevention was not even an enticing enough field of work to warrant public-private partnerships. President Trump had cut the budget of the Center for Disease Control and disbanded the working group on pandemics in the National Security Council in the same spirit as he cut all research funding, including on climate change. If I wanted to be anthropomorphic and metaphorical about this, I would conclude that Covid-19 is nature’s revenge for over forty years of nature’s gross and abusive mistreatment at the hands of a violent and unregulated neoliberal extractivism(Harvey, 2020)

Image courtesy Reuters

Tuesday, September 29, 2020

हाथरस बलात्कार काण्ड - समाज अब और क्या समाधान पेश करेगा ?

- अंजलि सिन्हा


हाथरस के बलात्कार पीड़िता की मौत हो चुकी है और ताज़ा ख़बर के मुताबिक उसका अंतिम संस्कार भी किया जा चुका है।

परिवारवालों का कहना है कि 14 सितम्बर को अपने ही गांव के नौजवानों द्वारा सामूहिक बलात्कार का शिकार हुई उनकी बेटी के दोषियों पर कार्यवाही करने में पुलिस ने फुर्ती नहीं बरती जबकि पुलिस इस मामले में अपने को बेदाग बता रही है। अभी तक चार आरोपी पकड़े जा चुके हैं जो गांव के ही वर्चस्वशाली जाति से सम्बन्ध रखते हैं।

और अब दोषियों को दंडित करने का मामला सुर्खियों में है। हमेशा की तरह सख्त़ से सख्त़ सज़ा तुरंत सुनाने की बात जोर पकड़ रही है।

पहले के कुछ बलात्कारियों की फांसी भी हो गयी है, जो कि समाज और निर्भया के माता पिता की मांग थी, हैद्राबाद में दिसम्बर 2018 में सामने आयी बलात्कार की घटना में एनकाउन्टर की मांग का भी प्रयोग कर लिया गया है और बलात्कारियों को गांव वालों द्वारा या भीड़ द्वारा पीट पीट कर मारे डाले जाने की घटना भी हम सुन चुके हैं। कथित तौर पर ‘समाज की सामूहिक भावना को शांत करने’ का ऐसा ही सिलसिला जारी रहा तो आने वाले दिनों में हम यह भी सुनेंगे कि लोग बलात्कारियों को चौराहों पर सरेआम फांसी देने या अभियुक्तों को भीड़ को ही सौंपने जैसी मांग कर रहे हैं।

लेकिन क्या ऐसे प्रस्ताव - जो किसी कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेने से बचने या उन्हें बाईपास करने की बात करते हैं - वाजिब कहे जा सकते हैं ?

Monday, September 21, 2020

स्त्रियों के लिए टायलेट की कमी - तकनीकी समाधान से परे जाने की जरूरत

 - अंजलि सिन्हा


 Image Courtesy- DNA newspaper


समस्या जब सिर पर आए तो उसका फौरी तकनीकी किस्म का समाधान ढूंढने  में जुटे लोगों से यह अपेक्षा न करें कि वह बतायें कि अमुक समस्या क्यों है और उसका सही न्याय पूर्ण और स्थाई समाधान क्या होना चाहिए ?

बात है महिलाओं के लिए सार्वजनिक स्थानों, सड़कों, पार्कों, हाट-बाजारों आदि सभी जगह पर्याप्त संख्या में शौचालयों की उपलब्धता की। यह मुददा पुराना है लेकिन समाधान अभी भी नहीं हुआ। अब कोविड समय में जब सार्वजनिक शौचालयों में ताला लग गया तो ऐसे समय में भी जो अपनी ड्यूटी सड़क पर या किसी अन्य खुले स्थान पर, तब लगभग दो दशक पहले बने एक उपकरण ‘शीवी’ (Shewee) की बिक्री में अचानक जबर्दस्त इज़ाफा देखा गया है।

Monday, September 14, 2020

Menstruation: Unpacking the myth

- Ananya



Imagine a state where all colours have lost their meaning. Where the vermilion on my forehead fails to convey my commitment towards the better sex, where my residence in a red light area is not described in sense of some obscene nocturnal place celebrating and upholding the fragile masculinity and where the red patch on my cloth does not convey the original sin of being born a human but identified as a gendered male envying women.

Friday, September 11, 2020

सवाल तो साफ़ है पर नीयत में खोट

 - अर्पिता श्रीवास्तव 

                         परिपक्व संविधान की इबारत २६ जनवरी, १९५० से हमारे सामने है, उसे पढ़ने, समझने, देखने के अनगिनत नज़रिए हमारे सामने है पर हर बार जब कोई असमानता/ग़ैर-बराबरी की दुर्घटना घटती है, जब कोई न्याय मांगती आवाज़ को सरकार और प्रशासन की मिली-भगत से दबाया जाता है, जब कोई जेंडर मुद्दों पर अपनी क्रूरता, असंवेदनशीलता का उदाहरण पेश करता है,ज़ेहन में यही सवाल आता है कि आख़िर सवालों के घेरे में हम कब तक गोल-गोल चक्कर लगाते दिन के बाद दिन, बरस दर बरस तय करते चलेंगे, आख़िर कब हम संवेदनशील समाज बना पायेंगे? समय के साथ जिन बातों को इतिहास की बात बन दफ़्न हो जाना था वह एक लंबे समय से और वर्तमान में सबसे ज़रूरी मुद्दा बन चुका है. हर बात, हर मुद्दे को एक ख़ास कोण से देखने की गजब प्रतिभा हमारे देश ने अर्जित कर ली है. उस ख़ास कोण में धर्म, जाति और जेंडर ने लोगों को क्रूरता की ललित कला विकसित करने में महारत दे दी है. ये ऐसी बातें हो गई हैं जो रोज़मर्रा की छोटी सी छोटी गतिविधियों का हिस्सा हो गई हैं.

Saturday, September 5, 2020

प्रतिनिधित्व का सवाल: कुछ और पहलू

 -अंजलि सिन्हा



‘‘अब कौनसा ऐसा क्षेत्र या काम बचा है जहां महिलायें नहीं हैं। भले वह संख्या में कम हो, लेकिन महिला समुदाय का प्रतिनिधित्व तो कर रही हैं !" उसने कहा। उसके कहने का तात्पर्य यह था कि जब सभी जगह वे मौजूद हैं तो फिर जेण्डर बराबरी क्यों नहीं है ? अभी भी औरतें क्यों हिंसा, दमन, और शोषण का सामना कर रही हैं ? इस साधारण से लगनेवाले प्रश्न ने सोचने के लिए बाध्य किया कि प्रतिनिधित्व की हमारी मांग किस लिए थी ? क्या उसके द्वारा जेण्डरगत न्याय और बराबरी भी नहीं मिल सकती थी क्या ?

Monday, August 31, 2020

रोज अनसुनी रह जाती हुई चीखें

 - अपर्णा

https://www.youtube.com/watch?v=scwYray2Dsk - link to movie


कोविड-19 के प्रभाव ने हमारे सामने दुनिया को देखने का अलग नज़रिया दे दिया है । कहा यह भी जा सकता है कि उसने चीजों , स्थितियों और मनुष्यों के प्रति हमारे नज़रिये को बदलने को हमें मजबूर कर दिया है । समय न होने के पूंजीवादी मंत्र को उसने तहस-नहस कर दिया । मार्च से अब तक के लगभग पाँच महीनों  में समय न होने का मिथक टूट गया है । संसद , न्यायपालिका सबकुछ ठप और कॉर्पोरेट भी चारों खाने चित्त । उसने सबसे पहले अपनी जवाबदेहियों से पल्ला झाड़ा और फिर सामाजिक जिम्मेदारियों से भी । अपने लिए सुविधाजनक वर्क फ्राम होम की गुंजाइश निकाली । कोविड ने दुनिया को घरों में समेट दिया। इसके अनेक भयावह पक्ष हैं जो समाज के अनेक संस्तरों पर अलग-अलग तरीके से प्रभाव डालते हैं । इसका सबसे नकारात्मक प्रभाव स्त्रियॉं पर पड़ा है । वे समाज के हरेक संस्तर पर शोषण , दमन और हिंसा का शिकार हुईं । कहीं उनके लिए रोजगार की समस्या खड़ी हुई तो कहीं पारिवारिक अत्याचार की । मध्यवर्ग की स्त्रियाँ भी इससे अछूती नहीं रहीं । इसी विषय को लेकर प्रख्यात अभिनेत्री नन्दिता दास ने सात मिनट की एक लघु फिल्म–लिसन हर (उसको सुनो) बनाई । फिल्म की कहानी कुल इतनी है कि नन्दिता दास कोरोना काल में वर्क फ्राम होम कर रही है । बीच में बच्चे को खेल और पढ़ाई संबंधी निर्देश देती रहती है । बच्चा माँ के साथ ही अधिक दिखता है । दूसरे कमरे में मौजूद पिता से उसका कोई खास सरोकार नहीं दिखता । कुरियरवाला आता है तब भी दरवाजा पत्नी खोलती है । पति अंदर से आदेश देता है । फिल्म का हुक पॉइंट यह है कि नन्दिता दास के फोन पर बार बार एक अन्य महिला का फोन आता है और उधर से पुरुष के डांटने-फटकारने-मारने की आवाज आती है और स्त्री बचने की कोशिश करते हुये चीखती है । वह फोन पर नन्दिता दास से सहायता की गुहार लगाती है । नन्दिता दास के सामने दोहरा संकट है । उस पर वर्क लोड है लेकिन वह संवेदनशील स्त्री है । झुंझलाहट के बावजूद फोन को इगनोर करना उसके लिए असंभव है । लिहाजा वह न केवल फोन सुनती है बल्कि पुलिस को फोन करती है जहां से उदासीन जवाब मिलता है और अधिक ज़ोर देने पर यह कहा जाता है कि पुलिस को अपनी ड्यूटी खूब पता है कि उसे क्या करना चाहिए । अंततः वह महिला को कॉलबॅक करती है । फोन महिला का पति उठाता है गुस्से में कहता है रांग नंबर । फिल्म खत्म हो जाती है ।

Wednesday, August 26, 2020

मानसिक स्वास्थ्य- मीटिंग रिपोर्ट

 - पद्मा सिंह 



स्त्री मुक्ति संगठन ने लॉक डाउन के दौरान कुछ  विशेष चर्चाएं आयोजित की  |   हिमानी कुलकर्णी  के द्वारा 3 जुलाई को Socio-political dimension of Mental Helth पर की गयी चर्चा इसी का एक हिस्सा थी | स्त्री मुक्ति संगठन पहले की कार्यशालाओं में  मानसिक स्वास्थ्य पर दो सत्र आयोजित कर चुका है । हिमानी, एक मानसिक स्वास्थ सलाहकार हैं । 

Friday, August 21, 2020

Na mandir, Na masjid!

- Nighat Gandhi




November 9th, 2019. Judgment day. Allahabad’s streets were unusually deserted. For someone like me who abhors driving and having to share roadspace with other cars, pedestrians and cattle, I was relieved. I had to get a document attested so I ventured out to Kutchery that morning. No cars, no ricks, no pedestrians, not even stray cows. Parking was no problem for once. Even the cows figured out to stay away.

Before I reached this Kutchery, I stopped at a photocopying shop in Katra market. Men were sitting idly, discussing the Ram Mandir judgment in low tones. I found R.B. Singh, advocate, sitting behind a wooden desk in an enclosure filled with empty desks. No other lawyers or litigants were present. R. B. Singh was anxious to please. How many copies did I want attested? He took out his stamp pad in a jiffy, pressed the rubber stamp on the pad, and stamped the purple “thappa” on the photocopies, and signed his name. He didn’t bother to see the original document to compare it with the copies before attesting it.

I asked R. B. Singh how much I had to pay.

De dijye samajh ke.

I gave him 50. He didn’t look happy. I added 50 more. R. B. Singh took it, but looked forlorn. No other customers seemed likely that morning after the hyped up security concerns in anticipation of unrest or protests following the Ram Mandir judgment.

A traffic-free Kutchery, a pedestrian-free Allahabad, has never been so quiet even on a Sunday, as it was on that morning. I sighted one banana and one apple seller on a street normally packed with roadside vendors.  If only building a massive mandir where a masjid once stood could grant better jobs, better daily wages for vegetable walas and fruit walas, and bring down the price of onions and potatoes!

Friday, August 14, 2020

Whose Freedom is it Anyway?

 Renu Singh





For about a month during the Covid times, I have started listening to the FM radio in the morning, with my cup of coffee. There are usually lots of advertisements of various businesses, brands and motivational speech by Sadguru (a new segment which was started few days ago and is called an hour of positivity). I either avoid them or laugh about it.  However these seemingly two different things have many similarities. Today morning while listening to the radio two sets of advertisements caught my attention. One of them was about Independence Day sale in a shopping mall in Ghaziabad, and another of a fancy housing complex in National Capital Region (NCR). These sales are called “freedom sale”. The first one’s catch phrase was freedom to shop in a safe environment, and the second’s ones was to live in a luxurious housing environment with freedom. Both of them were based on the idea of free choice, and are using the occasion of Independence Day to sell the idea of “freedom”. These two suddenly reminded me of last three days development in news. One of them was about an Assistant Professor of Assam booked by police over a FB post about Ram, which supposedly is “derogatory”. Keep in mind the recent shilnyas of Ram temple in Ayodhya. Where in the middle class was furious over Tabligi Jamat gathering and held the entire community responsible for the spread of corona, but at the same time did not utter a single word about “Bhoomi Pujan” event at Ayodhya, rather celebrated it with lighting diya’s (candles) followed by victory procession in many localities.  

Monday, August 10, 2020

वर्क फ्रॉम होम के दौर में लैंगिक उत्पीडन का बदलता स्वरूप

 - उपासना बेहार

कोरोना वाइरस के कारण देश में सम्पूर्ण लाक डाउन किया गया जिससे सबको घर के अंदर रहने को बाध्य कर दिया गया जिसके चलते लोग घर से ऑफिस का काम (work from home) करने लगे. पहले भारत में कम संख्या में वर्क फ्राम होम होता था लेकिन लाक डाउन के कारण इसका चलन बहुत बढा है. अब लाक डाउन खुलने के बाद भी बड़ी संख्या में लोग अपने घर से ही काम करने लगे हैं. महिलायें भी इससे अछूती नहीं रही हैं. उन्हें भी वर्क फ्राम होम करना पड़ रहा है. लेकिन इस दौरान महिलाओं के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष वर्चुअल यौन उत्पीडन के मामले सामने आ रहे हैं.

Tuesday, August 4, 2020

नई शिक्षा नीति 2020 में क्या सही नहीं है!

 - तारा शंकर 

34 सालों बाद नई शिक्षा नीति 2020 आयी है! 2015 में बनी सुब्रह्मण्यन कमिटी और फिर 2017 में बनी कस्तूरीरंगन समिति की सिफ़ारिशों को शामिल करते हुए इस ड्राफ्ट को तैयार किया गया जिसे कैबिनेट पिछले हफ़्ते मंजूरी दे दी है! इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की शिक्षा व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की ज़रुरत थी लेकिन क्या ये नई शिक्षा नीति कोई आशावादी परिवर्तन की बात करती है? करती है तो कितने ठोस आधारों पर? क्योंकि नीतियाँ तो पहले भी आती रही हैं लेकिन असली समस्या तो ज़मीन पर क्रियान्वयन की रही है! क्या अच्छी बातें हैं इस नीति में और कौन सी बातें कहने-सुनने में अच्छी तो लग रही हैं लेकिन वो असल में अच्छी हैं नहीं? 


Thursday, July 23, 2020

पुस्तक परिचय - 'धर्म के नाम पर' लेखक: गीतेश शर्मा


पुस्तक परिचय : अंजलि सिन्हा 




धर्म को लेकर हमारे देश में आज जो हालत बनी है और हिन्दुत्ववादी ताकतों ने अपने आप को जैसे मजबूत किया है, यह हमारे सामने है। पूरे समाज के बड़े हिस्से को धर्म के नाम पर कैसे मूर्ख बना सकते हैं, बरगला सकते हैं और 21 वीं सदी में भी धर्म को लेकर हिंसक वातावरण तैयार किया जा सकता है, इसे हम अपने आंखों के सामने घटित होता देख सकते हैं, बशर्ते आप अंधभक्त नहीं हैं तो। हम सभी सोचने पर मजबूर हैं कि आखिर धर्म ने इतनी ताकत इतनी स्वीकार्यता कैसे हासिल की ? ऐतिहासिक रूप से इसकी क्या भूमिका और उपयोगिता रही है ? और इसका शिकार न सिर्फ हमारा देश है बल्कि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में इसके नाम पर मार काट मचाया जा सकता है और सत्ता पर काबिज होने का यह एक उन्मादी नज़रिया बना है।

हमारे देश के ऐसे हालात में कुछ लोग साझी संस्कृति , गंगाजमुनी तहजीब आदि को पुनर्स्थापित करने की बात करते रहे हैं। यह तहजीब रही है इसमें सहमति भी हो तो भी यह देखना पड़ेगा कि तनाव भी रहा ही है और दूसरी बात कोई भी व्यक्ति या पार्टी आखिर जनता को बहकाती है या अपने हित साधन के लिए धर्म/आस्था का इस्तेमाल कर पाती है तो वह इसीलिए कि लोगों में ऐसी भावना पहले से मौजूद होती है। इस संदर्भ में यह जरूरी हो जाता है कि धर्म का स्वरूप अपने उदगम समय से ही कैसा था और उसने इतिहास में मानवता के साथ क्या व्यवहार किया चाहे वह कोई भी धर्म हो, इसे देखा जा सकता है।
गीतेश शर्मा की किताब ‘धर्म के नाम पर’ जो इन दिनों तीसरे संस्करण में चल रही है, इस सबकुछ को समझने के लिए उपयोगी है। अलग अलग धर्म क्या कहते हैं, अधिकतर हमारे जैसे लोग जो धर्मग्रंथों के अध्ययन में अपना समय नहीं लगा पाते हैं, वे सभी इससे लाभान्वित हो सकते हैं। इस किताब के द्वारा धर्मग्रंथों में क्या कहा गया है, तमाम धार्मिक उपदेश क्या कहते हैं और मानवता के इतिहास में उनकी क्या भूमिका रही है, इन सभी बातों को आप यहां आसानी से समझ सकते हैं।

Monday, July 13, 2020

तुर्की – गैर धर्मनिरपेक्ष रास्ते पर


 मुशर्रफ अली
Hagia Sophia: Turkish Govt Opens The Door Of Centuries-old Controversy
क़ुव्वत ओ फ़िकरो अमल पहले फ़ना होता है
फिर किसी क़ौम की शौकत पे ज़वाल आता है
                                                                                                       –  इक़बाल
(किसी क़ौम के दबदबे या रौब में तब गिरावट आती है, जब उसकी सोचने-विचारने की ताक़त खत्म हो जाती है)
8 जुलाई 2020 को तुर्की के राष्ट्रपति तय्यप इरदुगान ने चर्च से मस्जिद फिर मस्जिद से म्यूजियम बना दी गयी ऐतिहासिक इमारत हय्या सोफ़िया को फिर से मस्जिद बनाने की घोषणा की इसके बाद 10 जुलाई को वहां के सुप्रीम कोर्ट ने इरदुगान के फैसले के पक्ष में फैसला दिया। इस घटना के बाद दुनिया भर के मुसलमानों में खुशी की लहर दौड़ गयी और पस्ती में डूबी हुई क़ौम को एक विजय का अहसास हुआ। इस घटना के बाद मैं इंटरनेट पर मुसलमानों की प्रतिक्रिया का अध्ययन करता रहा था। मैं इस तलाश में था कि इस घटना के विरोध में इसकी मज़्ज़मत में मुस्लिमो की तरफ़ से कोई तो आवाज़ सुनाई देगी लेकिन जहां तक इंटरनेट पर मैं ढूंढ पाया एक भी आवाज़ विरोध की नही मिल पायी जबकि समर्थन करती और खुशियां मनाती पोस्टें भरी पड़ी थी। मेरी नज़र में यह घटना वैसी ही है जैसी बाबरी मस्जिद ढहने की है और वहां के सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी वैसा ही है जैसा नवम्बर 2019 में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद के संबंध में सुनाया। तुर्की में हय्या सोफिया को ढहाया नही गया लेकिन सांकेतिक रूप से माने तो यह ढहाने जैसा ही क़दम है। बाबरी मस्जिद, मंदिर तोड़कर बनाई गई अभी यह बात विवादित बनी हुई है लेकिन हय्या सोफिया 1453 से पहले चर्च था यह ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित है। जब मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने मस्जिद बना दिये गए चर्च को म्यूजियम में 1934 में बदला तब विवाद को समाप्त करने का उनका बहुत ही समझदारी भरा क़दम था मगर तुर्की राष्ट्रपति तय्यप इरदुगान ने कमाल अतातुर्क के सारे किये कराए पर अपने निजी स्वार्थ में पानी फेर दिया और दुनिया भर में मुसलमानों की जो खराब छवि बना दी गयी है उसको और खराब कर दिया। उनके इस काम से मुसलमानों की जो बुनियादी समस्याये हैं वो हल होने की जगह और बढ़ गईं।
उनका यह तरीक़ा वैसा ही है जैसा कि लोगों को रोज़गार देने उनकी गरीबी दूर करने की जगह किसी शहर का नाम बदल देना।
इरदुगान अपनी नाकामयाबी छिपाने के लिये इस तरह की हरकतें कर रहे है और वो इस तरह की हरकतों से दुनिया भर के मुसलमानों के ख़लीफ़ा बनना चाहते है। उन्होंने वैसे ही मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क द्वारा बनाये गए धर्मनिरपेक्ष तुर्की को गैर धर्मनिरपेक्ष रास्ते पर डालकर बर्बादी में धकेल दिया है। वो समस्या ग्रस्त अपनी जनता को ख़िलाफ़त ए उस्मानिया की वापसी का ख्वाब दिखा रहे है उनका यह ख्वाब वैसा ही है जैसा भारत मे हिन्दू राष्ट्र का दिखाया जा रहा है। अगर हिन्दू राष्ट्र का ख्वाब गलत है तो ख़िलाफ़त क़ायम करने का ख्वाब भी खारिज करने लायक है यह नही हो सकता कि एक तरह के राज की आप हिमायत करें और दूसरे तरह की मुखालफत और ऐसे काम की मज़म्मत या विरोध न करना या खामोश रहना भी इरदुगान निहायत ही गलत और अहमकाना काम का समर्थन करना होगा। जब बाबरी मस्जिद तोड़ी गयी थी तब भी भारत ही नही दुनिया भर की धर्मनिरपेक्ष गैर मुस्लिम लोगों ने उसकी मुखालफत और मज़म्मत की थी जबकि इरदुगान के इस नाजायज़ क़दम की मुसलमानों को मज़म्मत करनी चाहिये न कि समर्थन। कोई करे न करे लेकिन मेरी यह ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी बनती है कि मैं इस गैर जरूरी और अविवेकपूर्ण क़दम का विरोध और मज़म्मत करू।

Tuesday, July 7, 2020

बुजुर्गों के जीवन की गुणवत्ता / क्वालिटी आफ लाइफ / का सवाल

हमारी पारिवारिक संरचना सरकारों के लिए कितनी सहूलियत प्रदान करती हैं? 
अंजलि सिन्हा

उनका नाम इंगवार है। उम्र अस्सी के करीब होगी।

स्टॉकहोम, स्वीडन के पास के एक उपनगर के रहनेवाले हैं। पेशे से पत्रकार रहे हैं। और इस दौरान दुनिया का चप्पा चप्पा घुमा है। उनका एक नियम बना है कि हर साल एक बार भारत यात्रा करने का। इस बार करोना महामारी के चलते भारत प्रवास पर नहीं आ पाये। पहले पति पत्नी दोनों आते थे, अपनी युवावस्था में उन्होंने यहीं से एक बेटी भी गोद ली थी, जो अब स्वीडन में ही है और उसका अपना परिवार भी बसा है। पत्नी पिछले काफी समय से बीमार है, लिहाजा वह नहीं आ पाती हैं। इंगवार की यात्रा नहीं चूकती। कनॉट प्लेस में होटल में रहते हैं, पुराने जानकारों से मिलते जुलते हैं, यहां घुमते फिरते हैं। हर यात्रा में हमारे यहां एक बार लंच या डिनर पर आते हैं।

Sunday, July 5, 2020

Lockdown through Gendered Lens- Prof. Sudha Vasan, Zoom Lecture

स्त्री मुक्ति संगठन की तरफ से "Lockdown through Gendered Lens", विषय पर प्रोफेसर सुधा वासन, समाजशात्र विभाग, दिल्ली विश्वविद्याल, के द्वारा बात चीत राखी गयी. मीटिंग का youtube लिंक निचे दिया गया है. साथ मे ये एक वक्तव्य का सार है।

कोरोना की इस महामारी से जिन घरों ने हमें बचा रखा है, एक औरत के लिए वही घर असुरक्षित है। जिस देश में एक औरत को मर्द की तुलना में हमेशा कम आँका जाता है, जहाँ विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक एवं व्यतिगत कारणो से अधिकतर मामलों में औरतों का अपना घर नहीं होता, वह लाक्डाउन जेसी परिस्थिति यह सवाल पेदा करती है कि पुरुषों के बनाए गए समाज और घरों में क्या एक औरत अपने आप को इस बीमारी से बचा सकती है और यदि हाँ तो किस कीमत पर ?

जब औरतों ने अपने घरों से बाहर निकल कर भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रो में अपनी जगह बनायी तो यह पाया गया कि  सामज की रूढ़िवादी विचारों ने तब भी उन्हें जकड़ा हुआ था जिसके एक उदाहरण हम महिलाओं और पुरुषों को मिलने वाले वेतन में असमानता के रूप में देख सकते है। महामारी के वक़्त जब डॉक्टर,नर्स  एवं अन्य कर्मचारी इस समस्या से जूझने की पूरी कोशिश कर रहे है, तब भी यह देखा जा सकता है कि औरतें जो अधिकतर निचले स्तर की पोस्ट पर पायी जाती है, उन्हें मिलने वाली सुविधाओं एवं उनके बचाव के लिए ज़रूरी व्यवस्था को अनदेखा किया गया है ।

बाहरी सामज में श्रम शोषण से पीडित औरतें घर में भी एक बराबरी का स्थान नहीं प्राप्त कर पायी। नैशनल कमिशन ओफ़ विमन के मुताबिक़ हर 5 मिनट में एक औरत घरेलू हिंसा का शिकार होती है । लाक्डाउन की परिस्तिथि में जहाँ सरकार द्वारा इस असमानता एवं शोषण से बचने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी, जहाँ परिवार आर्थिक परेशानियों से घिरा हुआ है, जहाँ माँ अपने बच्चों को खाना नहीं खिला पा रही है, और जहाँ मर्द अपनी तथाकथित  मर्दानगी  का सबूत नहीं दे पा रहे है, वहाँ औरत पर बढ़ रही हिंसा सिर्फ़ इस सामज का असली चेहरा दिखाती है।



Thursday, June 25, 2020

क्या हम इन्फोडेमिक से भी जूझ रहे हैं ?


-अंजलि सिन्हा

जब यह पैनडेमिक अर्थात महामारी का दौर गुजर जाएगा, कोरोना का भय खतम हो जाएगा या कम हो जाएगा तब सोशल मीडिया का स्वरूप कैसा रह जाएगा ? घर के अन्दर बन्दी के इस समय में सामाजिक रूप से जागरूक लोगों ने इसके बेहतर इस्तेमाल की कोशिश की है। जूम, व्हाटसअप, गूगल मीट, फेसबुक लाइव आदि तमाम माध्यमों से सामाजिक सरोकारों के सवालों पर वेबीनार आयोजित होते रहे हैं तो लोगाों को मानसिक रूप से बीमार नहीं होने देने तथा परस्पर सहयोग आदि का प्रयास लोग इन्हीं माध्यमों से करते रहे हैं। 

Saturday, June 6, 2020

वो किससे डरते है ?

- निधि मिश्रा


बात आज से कुछ आठ-दस साल पहले की है। स्त्री मुक्ति संगठन, दिसंबर में अंबेडकर द्वारा मनुस्मृति दहन दिवस को स्त्री सम्मान दिवस के रूप में मना रहा था। लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व वाइस चांसलर, रुपरेखा वर्मा जी मुख्य वक्ता थीं।

रुपरेखा जी ने वक्तव्य के शुरू में ही कहा कि मैं निजी स्तर पर पुस्तकों को जलाने से सहमत नहीं हूं, हमें उन विचारों से लड़ना होगा।

किसी वैचारिक प्रतिद्वंद्वी या किसी प्रतिद्वंद्वी विचारधारा से वैचारिक और प्रिंसिपल्ड लड़ाई लड़ने का नैतिक बल अपनी विचारधारा में कंविक्शन और उन विचारों की श्रेष्ठता के व्यहवारिक, वास्तविक और वैज्ञानिक आधारों को गहराई से समझने से आता है।

Friday, May 29, 2020

आखिर दोषी कौन ?


-अंजलि सिन्हा


राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र में स्थित लोनी के चिरोडी गांव से एक विचलित करनेवाली ख़बर आयी है, जिसमें एक पिता द्वारा अपनी सन्तानों की हत्या करने की कोशिश की गयी है।


समाचार के मुताबिक पिता ने  अपनी दो बेटियों और दो नातिनों को एक कमरे में बंद कर आग के हवाले कर दिया था, जिसमें एक बच्ची की मौत हो गई। आरोपी ने आग लगा कर आग की सूचना खुद ही पुलिस को दी और जुर्म भी कबूल किया। उसके मुताबिक उसकी दो बेटियों की शादी अलीगढ़ में हुई थी, एक बेटी के दो बेटे और दो बेटियां है तो दूसरी बेटी के एक बेटा है। पिछले दो साल से दोनों बेटियां अपने पांचों बच्चों के साथ मायके में ही रह रही थीं। सलीम चाहता था कि बेटियां अपने ससुराल जायें, अपना घरबार संभाले। लॉकडाउन में सलीम और भी परेशान हो गया। सलीम ने पुलिस को बताया कि बेटियां जब चाहें घर से बिना बताये कई दिनों तक गायब रहती थीं और फिर आ जाती थीं। उनके व्यवहार से वह तंग आ गया था। सलीम की पत्नी और बेटा उसके इस व्यवहार से स्तब्ध हैं। ठेले पर फल बेचनेवाले सलीम ने जो अपराध किया है , वह अक्षम्य है और अब उसे इसकी सज़ा भी भुगतनी पड़ेगी। वह गिरफतार हो गया है। 

Tuesday, May 5, 2020

स्कूली बच्चे: वयस्क विकार !

क्या फिर से चर्चा सज़ा की सख्त़ी के इर्दगिर्द घुमेगी ?

- अंजलि सिन्हा

इन्स्टाग्राम पर बना बच्चों का एक ग्रुप इन दिनों देश की सूर्खियों में है।

वजह यह नहीं है कि यह बच्चे दक्षिणी दिल्ली के नामी स्कूलों में पढ़ते हैं - और जाहिरसी बात है सम्पन्न परिवारों से हैं। दरअसल कक्षा 11 वीं और 12 वीं के छात्रों की इन्स्टाग्राम पर डाली कई सारी पोस्टस से यह विवादों में हैं।

‘बॉयस लॉकर रूम’ नामक इस ग्रुप में लड़कियों के फोटो, उस पर अश्लील टिप्पणियां, यौनिक भाषा तथा इतनाही नहीं बलात्कार जैसे आपराधिक हिंसक व्यवहार को भी बड़े सहज ढंग से व्यक्त किया गया है। 

दक्षिणी दिल्ली की उस लड़की के साहस की तारीफ करनी पड़ेगी जिसने इनमें से कुछ मेसेजेस मीडिया के सामने रखे, जिन्हें देख कर सभी हतप्रभ हैं कि हमारी किशोर पीढ़ी क्या कर रही है ?

इसमें बच्चे बड़े ही कैजुअल ढंग से रेप की बात कर रहे हैं, सेक्सुअल ऑब्जेक्टिफिकेशन कर रहे हैं। स्कूलों में गहरे में व्याप्त मिसोजिनी/नारीद्वेष का यह एक नमूना है। और यह सब अव्वल कहे गए स्कूलों का मामला है। औरत के शरीर के उपभोग तथा वस्तुकरण की मानसिकता इसमें साफ देख सकते हैं। भददे मज़ाक और जोक्स भी इसमें शेयर किए गए हैं।

Sunday, April 19, 2020

लॉकडाउन में घरेलू हिंसा में बढ़ोत्तरी


बस बहाना चाहिए था ? कुछ है जो छुपाये नही छुपता !!



-अंजलि सिन्हा

उसने फोन की चर्चा में तो यही बताया था कि सबकुछ ठीक है।

लॉकडाऊन  में सब घर पर हैं। बच्चे भी खुश हैं कि माता पिता घर पर हैं, समय से मनपसंद खाना मिलता है आदि। हालांकि बच्चे बाहर खेलना मिस कर रहे हैं। कभी कभी नेटफिक्स लेटेस्ट मूवी भी देख लेते हैं। पतिदेव भी घर के काम में हाथ बंटा देते हैं, आदि।

यह अलग बात है कि ‘सबकुछ ठीक’ का आवरण अधिक समय तक टिक नहीं सका, जब पड़ोस की परिचिता ने फोन करके बताया कि उसे पति ने किसी बात पर पीटा था, इतना शोरगुल हुआ कि बात घर तक सीमित नहीं रह सकी ।

निश्चित ही उसकी आपबीती अपवाद नहीं कही जा सकती।

Sunday, March 29, 2020

साठ पार के बाद

 - अंजलि सिन्हा

कुछ साल पहले मैंने एक लेख लिखा था ‘‘40 पार के बाद’’ जो स्त्राी मुक्ति संगठन की पुस्तिका ‘दासी गृहलक्ष्मी’ में ‘जब बच्चे बड़े हो गए’ नाम से छपा था। यह लेख ऐसी महिलाओं को ध्यान में रख कर लिखा गया था जो जिन्दगी के लगभग चार दशक बीत जाने के बाद की वास्तविकता से रूबरू कराता था। 40 पार कर जाने के बाद महिलाओं की आबादी के एक बड़े हिस्से की जिन्दगी में ऐसा दौर आता है जब उसे खालीपन का एहसास होता है। यह उन महिलाओं के सन्दर्भ में था जो शादी घर गृहस्थी और बच्चों में स्वयं को पूरी तरह झांेक देती हें। 40 के आसपास आते आते बच्चे बड़े हो गए होते हैं, वे खुद को सम्भालने लायक हो गए होते हैं या उस प्रक्रिया में होते हैं। कभी कभी वे चाहते भी नहीं कि माता पिता बच्चों की तरह उनका खयाल करें अथवा उनके सिर पर सवार रहें। इस दौर के भीतर औरत अपना नया कोई कौशल या रूचि भी विकसित नहीं कर पाती। शादी से पहले के दोस्तों -मित्रों का सर्किल छूट गया होता है या औपचारिक रूप ले लिया होता है। नए रिश्तेदार तो होते हैं जिन्हें दोस्त का दर्जा आम तौर पर नहीं दिया जा सकता है। उम्र के इस पड़ाव पर अपने लिए कोई नया उद्यम ढंूढ पाना भी कोई आसान बात नहीं होती है। और तब यही समय तनाव का कारण बनता है क्योंकि अब के समय में नाते-रिश्तेदार भी नहीं मिलते। कुछ लोग तनाव को मैनेज भी कर लेते हैं लेकिर तब वे समय को बीताने ‘‘काटने’’ लगते हैं।

Monday, February 10, 2020

प्रेमः विश्वास से बाज़ार तक


- किरन पांडे 

      वैलेन्टाइन डे आने वाला है और हर तरफ प्यार ही प्यार नजर आने लगा है। प्रेमियों के लिये बाज़ा की हर दुकान नायाब तोहफों से सज चुकी है। प्यार की भावना का किस तरह इज़्हार किया जाना चाहिये या फिर आप अपने प्यार के लिये क्या क्या कर सकते है, इस सब पर पूरा ब्यौरा लेकर बाज़ा आपके सामने प्रस्तुत है। आप अपनी क्षमतानुसार अपने प्यार का सर्टिफिकेट आप अपने साथी को दे सकते हैं। बात है सन् 1996 की जिस दिन किसी ने अपने प्यार का इज़्हार मुझसे किया था। ये महज एक संयोग था पर था बहुत खूबसूरत। क्योंकि इसके पहले मुझे इस दिन के बारे में कुछ भी पता नहीं था। शायद इसलिए कि बाज़ा ने तब तक प्यार की दुनिया में अपनी जगह नहीं बनाई थी। दोस्तों से चर्चा हुई तो पता चला कि ये खास दिन प्यार करने वालों का होता है।