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Tuesday, July 7, 2020

बुजुर्गों के जीवन की गुणवत्ता / क्वालिटी आफ लाइफ / का सवाल

हमारी पारिवारिक संरचना सरकारों के लिए कितनी सहूलियत प्रदान करती हैं? 
अंजलि सिन्हा

उनका नाम इंगवार है। उम्र अस्सी के करीब होगी।

स्टॉकहोम, स्वीडन के पास के एक उपनगर के रहनेवाले हैं। पेशे से पत्रकार रहे हैं। और इस दौरान दुनिया का चप्पा चप्पा घुमा है। उनका एक नियम बना है कि हर साल एक बार भारत यात्रा करने का। इस बार करोना महामारी के चलते भारत प्रवास पर नहीं आ पाये। पहले पति पत्नी दोनों आते थे, अपनी युवावस्था में उन्होंने यहीं से एक बेटी भी गोद ली थी, जो अब स्वीडन में ही है और उसका अपना परिवार भी बसा है। पत्नी पिछले काफी समय से बीमार है, लिहाजा वह नहीं आ पाती हैं। इंगवार की यात्रा नहीं चूकती। कनॉट प्लेस में होटल में रहते हैं, पुराने जानकारों से मिलते जुलते हैं, यहां घुमते फिरते हैं। हर यात्रा में हमारे यहां एक बार लंच या डिनर पर आते हैं।

Sunday, July 5, 2020

Lockdown through Gendered Lens- Prof. Sudha Vasan, Zoom Lecture

स्त्री मुक्ति संगठन की तरफ से "Lockdown through Gendered Lens", विषय पर प्रोफेसर सुधा वासन, समाजशात्र विभाग, दिल्ली विश्वविद्याल, के द्वारा बात चीत राखी गयी. मीटिंग का youtube लिंक निचे दिया गया है. साथ मे ये एक वक्तव्य का सार है।

कोरोना की इस महामारी से जिन घरों ने हमें बचा रखा है, एक औरत के लिए वही घर असुरक्षित है। जिस देश में एक औरत को मर्द की तुलना में हमेशा कम आँका जाता है, जहाँ विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक एवं व्यतिगत कारणो से अधिकतर मामलों में औरतों का अपना घर नहीं होता, वह लाक्डाउन जेसी परिस्थिति यह सवाल पेदा करती है कि पुरुषों के बनाए गए समाज और घरों में क्या एक औरत अपने आप को इस बीमारी से बचा सकती है और यदि हाँ तो किस कीमत पर ?

जब औरतों ने अपने घरों से बाहर निकल कर भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रो में अपनी जगह बनायी तो यह पाया गया कि  सामज की रूढ़िवादी विचारों ने तब भी उन्हें जकड़ा हुआ था जिसके एक उदाहरण हम महिलाओं और पुरुषों को मिलने वाले वेतन में असमानता के रूप में देख सकते है। महामारी के वक़्त जब डॉक्टर,नर्स  एवं अन्य कर्मचारी इस समस्या से जूझने की पूरी कोशिश कर रहे है, तब भी यह देखा जा सकता है कि औरतें जो अधिकतर निचले स्तर की पोस्ट पर पायी जाती है, उन्हें मिलने वाली सुविधाओं एवं उनके बचाव के लिए ज़रूरी व्यवस्था को अनदेखा किया गया है ।

बाहरी सामज में श्रम शोषण से पीडित औरतें घर में भी एक बराबरी का स्थान नहीं प्राप्त कर पायी। नैशनल कमिशन ओफ़ विमन के मुताबिक़ हर 5 मिनट में एक औरत घरेलू हिंसा का शिकार होती है । लाक्डाउन की परिस्तिथि में जहाँ सरकार द्वारा इस असमानता एवं शोषण से बचने के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी, जहाँ परिवार आर्थिक परेशानियों से घिरा हुआ है, जहाँ माँ अपने बच्चों को खाना नहीं खिला पा रही है, और जहाँ मर्द अपनी तथाकथित  मर्दानगी  का सबूत नहीं दे पा रहे है, वहाँ औरत पर बढ़ रही हिंसा सिर्फ़ इस सामज का असली चेहरा दिखाती है।



Thursday, June 25, 2020

क्या हम इन्फोडेमिक से भी जूझ रहे हैं ?


-अंजलि सिन्हा

जब यह पैनडेमिक अर्थात महामारी का दौर गुजर जाएगा, कोरोना का भय खतम हो जाएगा या कम हो जाएगा तब सोशल मीडिया का स्वरूप कैसा रह जाएगा ? घर के अन्दर बन्दी के इस समय में सामाजिक रूप से जागरूक लोगों ने इसके बेहतर इस्तेमाल की कोशिश की है। जूम, व्हाटसअप, गूगल मीट, फेसबुक लाइव आदि तमाम माध्यमों से सामाजिक सरोकारों के सवालों पर वेबीनार आयोजित होते रहे हैं तो लोगाों को मानसिक रूप से बीमार नहीं होने देने तथा परस्पर सहयोग आदि का प्रयास लोग इन्हीं माध्यमों से करते रहे हैं। 

Saturday, June 6, 2020

वो किससे डरते है ?

- निधि मिश्रा


बात आज से कुछ आठ-दस साल पहले की है। स्त्री मुक्ति संगठन, दिसंबर में अंबेडकर द्वारा मनुस्मृति दहन दिवस को स्त्री सम्मान दिवस के रूप में मना रहा था। लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व वाइस चांसलर, रुपरेखा वर्मा जी मुख्य वक्ता थीं।

रुपरेखा जी ने वक्तव्य के शुरू में ही कहा कि मैं निजी स्तर पर पुस्तकों को जलाने से सहमत नहीं हूं, हमें उन विचारों से लड़ना होगा।

किसी वैचारिक प्रतिद्वंद्वी या किसी प्रतिद्वंद्वी विचारधारा से वैचारिक और प्रिंसिपल्ड लड़ाई लड़ने का नैतिक बल अपनी विचारधारा में कंविक्शन और उन विचारों की श्रेष्ठता के व्यहवारिक, वास्तविक और वैज्ञानिक आधारों को गहराई से समझने से आता है।

Friday, May 29, 2020

आखिर दोषी कौन ?


-अंजलि सिन्हा


राष्ट्रीय  राजधानी क्षेत्र में स्थित लोनी के चिरोडी गांव से एक विचलित करनेवाली ख़बर आयी है, जिसमें एक पिता द्वारा अपनी सन्तानों की हत्या करने की कोशिश की गयी है।


समाचार के मुताबिक पिता ने  अपनी दो बेटियों और दो नातिनों को एक कमरे में बंद कर आग के हवाले कर दिया था, जिसमें एक बच्ची की मौत हो गई। आरोपी ने आग लगा कर आग की सूचना खुद ही पुलिस को दी और जुर्म भी कबूल किया। उसके मुताबिक उसकी दो बेटियों की शादी अलीगढ़ में हुई थी, एक बेटी के दो बेटे और दो बेटियां है तो दूसरी बेटी के एक बेटा है। पिछले दो साल से दोनों बेटियां अपने पांचों बच्चों के साथ मायके में ही रह रही थीं। सलीम चाहता था कि बेटियां अपने ससुराल जायें, अपना घरबार संभाले। लॉकडाउन में सलीम और भी परेशान हो गया। सलीम ने पुलिस को बताया कि बेटियां जब चाहें घर से बिना बताये कई दिनों तक गायब रहती थीं और फिर आ जाती थीं। उनके व्यवहार से वह तंग आ गया था। सलीम की पत्नी और बेटा उसके इस व्यवहार से स्तब्ध हैं। ठेले पर फल बेचनेवाले सलीम ने जो अपराध किया है , वह अक्षम्य है और अब उसे इसकी सज़ा भी भुगतनी पड़ेगी। वह गिरफतार हो गया है। 

Tuesday, May 5, 2020

स्कूली बच्चे: वयस्क विकार !

क्या फिर से चर्चा सज़ा की सख्त़ी के इर्दगिर्द घुमेगी ?

- अंजलि सिन्हा

इन्स्टाग्राम पर बना बच्चों का एक ग्रुप इन दिनों देश की सूर्खियों में है।

वजह यह नहीं है कि यह बच्चे दक्षिणी दिल्ली के नामी स्कूलों में पढ़ते हैं - और जाहिरसी बात है सम्पन्न परिवारों से हैं। दरअसल कक्षा 11 वीं और 12 वीं के छात्रों की इन्स्टाग्राम पर डाली कई सारी पोस्टस से यह विवादों में हैं।

‘बॉयस लॉकर रूम’ नामक इस ग्रुप में लड़कियों के फोटो, उस पर अश्लील टिप्पणियां, यौनिक भाषा तथा इतनाही नहीं बलात्कार जैसे आपराधिक हिंसक व्यवहार को भी बड़े सहज ढंग से व्यक्त किया गया है। 

दक्षिणी दिल्ली की उस लड़की के साहस की तारीफ करनी पड़ेगी जिसने इनमें से कुछ मेसेजेस मीडिया के सामने रखे, जिन्हें देख कर सभी हतप्रभ हैं कि हमारी किशोर पीढ़ी क्या कर रही है ?

इसमें बच्चे बड़े ही कैजुअल ढंग से रेप की बात कर रहे हैं, सेक्सुअल ऑब्जेक्टिफिकेशन कर रहे हैं। स्कूलों में गहरे में व्याप्त मिसोजिनी/नारीद्वेष का यह एक नमूना है। और यह सब अव्वल कहे गए स्कूलों का मामला है। औरत के शरीर के उपभोग तथा वस्तुकरण की मानसिकता इसमें साफ देख सकते हैं। भददे मज़ाक और जोक्स भी इसमें शेयर किए गए हैं।

Sunday, April 19, 2020

लॉकडाउन में घरेलू हिंसा में बढ़ोत्तरी


बस बहाना चाहिए था ? कुछ है जो छुपाये नही छुपता !!



-अंजलि सिन्हा

उसने फोन की चर्चा में तो यही बताया था कि सबकुछ ठीक है।

लॉकडाऊन  में सब घर पर हैं। बच्चे भी खुश हैं कि माता पिता घर पर हैं, समय से मनपसंद खाना मिलता है आदि। हालांकि बच्चे बाहर खेलना मिस कर रहे हैं। कभी कभी नेटफिक्स लेटेस्ट मूवी भी देख लेते हैं। पतिदेव भी घर के काम में हाथ बंटा देते हैं, आदि।

यह अलग बात है कि ‘सबकुछ ठीक’ का आवरण अधिक समय तक टिक नहीं सका, जब पड़ोस की परिचिता ने फोन करके बताया कि उसे पति ने किसी बात पर पीटा था, इतना शोरगुल हुआ कि बात घर तक सीमित नहीं रह सकी ।

निश्चित ही उसकी आपबीती अपवाद नहीं कही जा सकती।

Sunday, March 29, 2020

साठ पार के बाद

 - अंजलि सिन्हा

कुछ साल पहले मैंने एक लेख लिखा था ‘‘40 पार के बाद’’ जो स्त्राी मुक्ति संगठन की पुस्तिका ‘दासी गृहलक्ष्मी’ में ‘जब बच्चे बड़े हो गए’ नाम से छपा था। यह लेख ऐसी महिलाओं को ध्यान में रख कर लिखा गया था जो जिन्दगी के लगभग चार दशक बीत जाने के बाद की वास्तविकता से रूबरू कराता था। 40 पार कर जाने के बाद महिलाओं की आबादी के एक बड़े हिस्से की जिन्दगी में ऐसा दौर आता है जब उसे खालीपन का एहसास होता है। यह उन महिलाओं के सन्दर्भ में था जो शादी घर गृहस्थी और बच्चों में स्वयं को पूरी तरह झांेक देती हें। 40 के आसपास आते आते बच्चे बड़े हो गए होते हैं, वे खुद को सम्भालने लायक हो गए होते हैं या उस प्रक्रिया में होते हैं। कभी कभी वे चाहते भी नहीं कि माता पिता बच्चों की तरह उनका खयाल करें अथवा उनके सिर पर सवार रहें। इस दौर के भीतर औरत अपना नया कोई कौशल या रूचि भी विकसित नहीं कर पाती। शादी से पहले के दोस्तों -मित्रों का सर्किल छूट गया होता है या औपचारिक रूप ले लिया होता है। नए रिश्तेदार तो होते हैं जिन्हें दोस्त का दर्जा आम तौर पर नहीं दिया जा सकता है। उम्र के इस पड़ाव पर अपने लिए कोई नया उद्यम ढंूढ पाना भी कोई आसान बात नहीं होती है। और तब यही समय तनाव का कारण बनता है क्योंकि अब के समय में नाते-रिश्तेदार भी नहीं मिलते। कुछ लोग तनाव को मैनेज भी कर लेते हैं लेकिर तब वे समय को बीताने ‘‘काटने’’ लगते हैं।

Monday, February 10, 2020

प्रेमः विश्वास से बाज़ार तक


- किरन पांडे 

      वैलेन्टाइन डे आने वाला है और हर तरफ प्यार ही प्यार नजर आने लगा है। प्रेमियों के लिये बाज़ा की हर दुकान नायाब तोहफों से सज चुकी है। प्यार की भावना का किस तरह इज़्हार किया जाना चाहिये या फिर आप अपने प्यार के लिये क्या क्या कर सकते है, इस सब पर पूरा ब्यौरा लेकर बाज़ा आपके सामने प्रस्तुत है। आप अपनी क्षमतानुसार अपने प्यार का सर्टिफिकेट आप अपने साथी को दे सकते हैं। बात है सन् 1996 की जिस दिन किसी ने अपने प्यार का इज़्हार मुझसे किया था। ये महज एक संयोग था पर था बहुत खूबसूरत। क्योंकि इसके पहले मुझे इस दिन के बारे में कुछ भी पता नहीं था। शायद इसलिए कि बाज़ा ने तब तक प्यार की दुनिया में अपनी जगह नहीं बनाई थी। दोस्तों से चर्चा हुई तो पता चला कि ये खास दिन प्यार करने वालों का होता है।