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Sunday, December 8, 2019

किस तरफ बढ़ता जा रहा है हमारा समाज ?

- अंजलि सिन्हा

अभी हम सभी हैदराबाद की वेटरनरी डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या के बर्बर घटना को लेकर क्षुब्ध थे कि उन्नाव की एक दूसरी बलात्कार पीड़िता ने सफदरजंग अस्पताल में / 6 दिसम्बर की रात/ को दम तोड़ दिया। ज्ञात हो कि उसके साथ बलात्कार को अंजाम देने वाले आरोपी जेल से पैरोल पर रिहा होकर बाहर आए थे और उन पांचों ने उस लड़की को जिन्दा जला दिया था जिसमें वह 90 फीसदी झुलस गयी थी।


बलात्कार की घटनाएं, खास तौर पर, सामूहिक बलात्कार की घटनायें हमारे पूरे देश और समाज को झकझोर रही हैं। हर व्यक्ति अपने को असहाय स्थिति में महसूस कर रहा है कि इस पर काबू कैसे पाया जाए ? महिला सुरक्षा के सारे उपाय लगता है कि नाकाफी साबित हो रहे हैं।

लेकिन इससे कम चिन्तनीय बात यह नहीं है जो शुक्रवार / 6 दिसम्बर/ को तड़के पुलिस ने किया। पुलिस ने हैदराबाद में वेटरनरी डॉक्टर के साथ बलात्कार के चारों आरोपियों को मामले की तफतीश के दौरान घटना स्थल पर ले जाकर गोलियों से मार डाला। हालांकि पुलिस ने कहानी बनायी कि वे भाग रहे थे और पुलिस पर हमला कर रहे थे, इसलिए जवाबी कार्रवाई में उनका एनकाउंटर हुआ। यह बात किसी के भी समझ में आनेलायक थी कि पुलिस अपने पूरे फोर्स के साथ इन चारों आरोपियों को घटनास्थल पर ले गयी, जो जांच के दौरान एक रूटिन प्रक्रिया होती है, और उसी वक्त़ उन चार निहत्थे आरोपियों ने पूरे फोर्स पर वार करने का / पुलिस के मुताबिक/दुःस्साहसी निर्णय लिया।  

समूचे घटनाक्रम का जो विवरण पुलिस ने पेश किया उससे संदेह की स्थिति बनती है जिसके चलते ही राष्टीय मानवाधिकार आयोग ने अपने स्तर पर जांच का फैसला लिया, इतनाही नहीं हैदराबाद उच्च न्यायालय ने भी मारे गए लोगों के शवों को 9 दिसम्बर तक सुरक्षित रखने तथा उनके पोस्ट मोर्टेम की विडियोग्राफी कराने का फैसला सुनाया।
 
बहरहाल ज्यादा बड़ी चिन्ता की बात यह बनती है कि इसे पुलिस के साहसिक कारनामे के रूप में पेश किया जा रहा है और उसकी तारीफ हो रही है। वही पुलिस - जो महज पांच रोज़ पहले जब वेटरनरी डॉक्टर का शव बरामद हुआ था - लोगों के गुस्से के निशाने पर थी, उसके द्वारा बरती लापरवाही के चलते उसके कुछ मुलाज़िमों का निलंबित किया गया था, उसी पुलिस के इस तुरंत न्याय की तारीफ हो रही थी। मीडिया में फोटो आया कि कहीं आतिशबाजी हुई तो कहीं गुलाल लगा कर खुशी जाहिर की गयी तो कहीं महिलाएं पुलिस को राखी बांधती दिखी। कुछ जानीमानी हस्तियां भी न्याय के नाम पर दिग्भ्रमित दिखीं, तो संसद भवन में भी कुछ सांसदों मंत्रियों ने पुलिस बल की शौर्यगाथा सुनायी। भाजपा के सदस्य एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्राी राज्यवर्द्धन राठौड ने कहा कि अच्छाई की बुराई पर विजय हुई तो मध्यप्रदेश के पूर्वमुख्यमंत्राी शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अपराधियों को अपने पाप का फल मिल गया।

एक मशहूर साहित्यकार और लेखिका ने बाकायदा लेख लिख कर बताया कि महिलाएं मजबूरी में इस एनकाउंटर का स्वागत कर रही हैं। यह जानते हुए कि मजबूरी में किसी गलत चीज़ का स्वागत नहीं होता है वे अपने साथ साथ सभी महिलाओं को जोड़ लेती हैं कि ऐसा सभी का मानना है। यह सही है कि स्त्राी पुरूषों के एक बड़े हिस्से ने इस एनकाउंटर का स्वागत किया क्योंकि उसे लग रहा है कि ऐसे ही न्याय पाया जाना है। वे अन्य सभी लोगों की तरह ही घटना से व्यथित हैं, यह बात तो समझ में आती है है, न्याय व्यवस्था पर सवाल भी उचित है, लेकिन न्याय पाने का यह तरीका उन्हें क्यों उचित लगता है ? पुलिस पर जनता का ऐसा भरोसा खुद जनता को कहां ले जाएगा ? क्या जनता अपनी हर समस्या का समाधान पुलिसिया अन्दाज़ में ढंूढे ? उन्होंने निर्भया की मां के हवाले से भी कहा कि सात साल से कोर्ट जाते जाते वह थक गयी हैं। तो क्या अब हम यह सोचें कि किसी को कोर्ट न जाकर तुरंत सारा काम तमाम कर लेना चाहिए। याद रहे कि निर्भया के समय न सिर्फ उसके माता पिता बल्कि देश भर से फांसी दो की आवाज़ उठी थी। उन्हें क्या लगता है कि यदि तुरंत फांसी हो गयी होती तो दुबारा बलात्कार की घटना नहीं घटती ?

आखिर न्याय कैसे मिले इस बात को लेकर इतना भ्रम क्यों रहता है ? यह तो सही है कि कानून व्यवस्था ठीक नहीं होने के कारण लोग इस एनकाउंटर को सही मान रहे हैं लेकिन लोगों की जेहनियत और प्रव्रत्ति को भी समझने की जरूरत है जब यह आवाज़ आती है कि अभियुक्तों को सरेआम चौराहे पर फांसी दो या उन्हें जनता को सौंप दो ताकि हम उनकी बोटी बोटी काटेंगे और उन्हें सबक सिखाएंगे। हमें यह सोच कर इस मानसिक बुनावट की बर्बरता को कम करके नहीं आंकना चाहिए कि कोई परेशान होकर या गुस्से में ऐसा बोल रहा है बल्कि वह ऐसा व्यवहार करने का ‘‘हिम्मत’’ भी रखता है। हत्या करने, हिंसा करने की प्रव्रत्ति भी उसके अन्दर है जो वह न्याय पाने या दिलाने के नाम पर करना चाहता है।

कोई बच्चा यदि किसी को फांसी पर चढ़ता देखता है, सुनता है, किसी को पीट पीट कर मार डालने के बारे में सुनता है या अन्य तमाम तरह के हिंसक व्यवहार को देखता है तो वह सिर्फ उससे डरता नहीं है बल्कि वह हत्या करना, हिंसा करना सीखता भी है। यही नहीं वह ऐसी सोच वाला युवा बन कर तैयार होता है जिसमें यह करना नार्मल भी हो।

सख्त़ सज़ा और बर्बर सज़ा में फरक को भी किसी भी सभ्य समाज को समझना चाहिए।

मध्ययुगीन न्याय की अवधारणा बदले की भावना पर टिकी होती थी, इसलिए चोरी करनेवाले का हाथ काट देने या उसे नेत्राहीन बना देने या ऐसे ही सख्त़ सज़ा के प्रावधान बनाए जाते थे। सरेआम फांसी देने के पीछे भी यही बात रहती थी कि दोषी की ऐसी दुर्गति से शेष समाज भी सबक ले।

आधुनिक वक्त़ में अर्थात सभ्य समाज में अपराधी की आपराधिकता को उसके समग्र नहीं समझा जाता लिहाजा इसके लिए उसके सुधार पर जोर रहता है। निश्चित कालावधि की सज़ा बीताने के बाद यह माना जाता है कि वह अपने किए अपराध पर पश्चात्ताप करेगा और बेहतर इन्सान बनेगा।  इसी का प्रतिबिम्बन अधिकतर विकसित देशों में फांसी की सज़ा की समाप्ति पर दिखता है।

मध्ययुग में कानून बनाने वाला, न्याय करनेवाला तथा इस पर अमल करने के सभी कार्य एक ही व्यक्ति या संस्था में अर्थात राजशाही में समाहित होते थे, आधुनिक राज्य में हम विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के अन्तर से इसे समझ सकते हैं, जहां कोशिश एक दूसरे पर अंकुश रखने की होती है।

एक और बिन्दु पर गौर करना चाहिए कि पुलिस की इस कार्रवाई के समर्थन से आप खुद पुलिस को, सुरक्षा बलों को निरंकुश बनाएंगे। सब जानते हैं कि वे आम लोगों को किस तरह तंग करते हैं, निहित वर्चस्वशाली तबकों के दबाव में या उनके हित में आम लोगों की जिन्दगी को तबाह करने में संकोच नहीं करते हैं। रूचिका गेहरोत्रा केस /1990/ तो लोगों की स्म्रतियों बाकायदा दर्ज है कि किस तरह इस उभरती खिलाड़ी के साथ हरियाणा के तत्कालीन इन्स्पेक्टर जनरल आफ पुलिस राठौड ने यौन अत्याचार किया तथा उसके द्वारा विरोध करने पर पूरे परिवार को इस तरह परेशान किया गया - रूचिका के भाई को साइकिल चोरी जैसे आरोपों में जेल की हवा खिलवा दी - कि तंग आकर रूचिका ने आत्महत्या कर ली थी।

अभी हाल में वर्ष 2012 में छत्तीसगढ़ में हुई एक ऐसी ही मुठभेड़ हत्या का खुलासा हुआ है जिसमें 17 लोग मारे गए थे, जिनमें कई बच्चे भी थे। इन निरपराधों को नक्सली कह कर मार दिया गया था, अब न्यायिक जांच में पता चला है कि वे आम लोग थे, जिनके पास न कोई हथियार था, न ही इनको नक्सलियों से कोई सम्बन्ध था। लेकिन इन बीते सात सालों में सुरक्षा बल के वह जवान ऐसे ही लोगों एवं सरकारों की वाहवाही लूट रहे थे।

अब जहां तक बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का मसला है, हम इस चक्कर में भी ना पड़ें कि पहले अधिक था कि अब अधिक है। पहले भी था और अब भी है, लेकिन आखिर वह हो रहा था और अब भी है, लेकिन आखिर वह हो क्यों रहा है ? कुण्ठा क्यों पल रही है ? बच्चा से मर्द बनते ही वह शिकारी क्यों बन जा रहा है ?

अब तो यौन हिंसा के खिलाफ लड़ते हुए, अभियान और आन्दोलन करते हुए भी चार दशक से अधिक समय बीत गया है। मथुरा बलात्कार काण्ड में आए विवादास्पद फैसले के बाद /1978/से लगातार आन्दोलन जारी रहा है। लड़ाई तो खैर जब तक अपराध रहेंगे तब तक जारी रहेगी, लेकिन मूल कारणों को फिर भी ढंूढना ही होगा।

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