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Sunday, May 26, 2019

चुनाव नतीजों के बाद: कुछ फुटकर बातें

 -अंजलि सिन्हा

नरेंद्र मोदी दुबारा भारत के प्रधानमंत्राी बनने जा रहे हैं।

यह पहली बार है कि कोई गैरकांग्रेसी सरकार दुबारा सत्ता में आयी है। किसानों के व्यापक असन्तोष, बेरोजगारी की अभूतपूर्व समस्या, बढ़ती महंगाई, अर्थव्यवस्था के संचालन को लेकर विगत सरकार की नाकामियों आदि के चलते जहां विपक्षी पार्टियों को यह लगने लगा था कि इस बार भाजपा 2014 के अपने आंकड़ों को दोहरा नहीं पाएगी, यह उसका आकलन गलत साबित हुआ है।

भाजपा के संकीर्ण नज़रिये एवं व्यवहार को देखते हुए आने वाले पांच साल की यात्रा को लेकर शंकाएं बनना लाजिमी हैं, लेकिन यहां हम भाजपा पर नहीं कांग्रेस से लेकर विपक्ष की धाराओं पर, महिलाओं की मानसिकता आदि पर बात कर रहे हैं।

1.
सेक्युलर समूहों या लिबरल विचारकों के एक हिस्से में कांग्रेस को लेकर जबरदस्त रोष है। कुछ तो उसके ‘खतम हो जाने’ आदि की भी कामना करते दिख रहे हैं।

यह सोचना जरूरी है कि बिना विकल्प की तैयारी के गैरजिम्मेदारीपूर्व ढंग से किसी को कोसना तथा उसकी विश्वसनीयता को खतम करने का प्रयास जो कुछ लोगों ने कांग्रेस के लिए किया तो उससे कांग्रेस को जो नुकसान हुआ उसकी चिन्ता न भी करें तो मोदी के पुर्नआगमन को लेकर तो चिन्ता करनी ही होगी।

लोगों ने राजनैतिक पटल पर तो जितना आवश्यक है उतना नहीं किया जिससे कांग्रेस का सही विकल्प उभरता, सामाजिक स्तर पर भी जनमानस को तार्किक, वैज्ञानिक या जातिवाद विरोधी आदि नहीं बनाया। अन्दर से उदार व्यक्ति, जनतंत्रा को आत्मसात किया व्यक्ति इतनी आसानी से अधिनायकवादी प्रव्रत्तियों, सुपरमैन जैसों को आदर्श मानने का समर्थन नहीं करता तो इतनी बड़ी संख्या में जनता ऐसी ताकतों के लिए ढोल नहीं बजाती।

ऐसे प्रबुद्ध लोगों की संख्या कम नहीं हैं जिन्होंने संसदीय लोकतंत्र पर, उसकी प्रणालियों पर भरोसा खतम करने में भूमिका निभायी है जिन्होंने लोकरंजक/पाप्युलिस्ट आन्दोलनों के साथ जुड़ कर भाजपा के लिए रास्ता सुगम किया है और आज भी इसके बारे में समीक्षा करने के लिए तैयार नहीं है।

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इन चुनावों ने सामाजिक न्याय के नाम पर खड़ी पार्टियों की भारी विफलता को भी उजागर किया है। क्या हम इसे उनके एजेण्डा के समय बीत जाने के तौर पर देख सकते हैं ? क्या हम कह सकते हैं कि लोग अब किसी बड़ी पहचान के साथ जुड़ने के लिए तैयार हैं और वह सिर्फ अपनी कम्युनिटी/समुदाय के साथ अपने आप को नत्थी देखना नहीं चाहते हैं ?

दरअसल अगर हम बारीकी से देखें तो नए भारत को लेकर कोई खाका, कोई तस्वीर उनके पास नहीं है। एक दौर में उन्होंने भारतीय समाज के कुछ अलक्षित पहलुओं को एजेण्डा पर लाने का काम किया और उस दौर में अच्छी भूमिका भी निभा पाए, लेकिन वह शायद वहीं ठहर गए। उनका दृष्टिकोण भी पहचान की भूमिका को केन्द्र में जमाए रखा और व्यक्ति की आज़ादी के मसले को आगे नहीं बढ़ाया, ऐसे मूल्य मान्यताओ ंको नहीं गढ़ा जो समाज में न्याय-बराबरी को बढ़ावा दे।

हम देख सकते हैं कि बहुजन पार्टियों ने क्या कभी जाति उन्मूलन का अभियान चलाया ? अम्बेडकर द्वारा दिए गए जाति उन्मूलन के एजेण्डे के बजाय उन्होंने जातियों की मजबूती का अभियान चलाया ताकि चुनावी राजनीति में उन्हें भी प्रतिनिधित्व दिया जा सके और अपने वोट बैंक को मजबूत रखा जा सके। दलितों-पिछड़ों में जातियों-उपजातियों में आपसी मतभेद, भेदभाव, उच्च नीच अनुक्रम आदि यथावत बना रहा। इसी तरह यह भी देखा गया कि इन तबकों की राजनीति करनेवाले राजनीतिक संगठनों में वर्चस्वशाली तबके ही हावी रहे, इन्हीं तबकों के वंचित तबके यहां पर भी हाशिये पर रहे। ऐतिहासिक तौर पर दबे कुचले होने के आधार पर अपनी साझेदारी का दावा ठांेकना तो ठीक है, लेकिन नवीन भारत क्या इसी विजन/भविष्यद्रष्टि के आधार पर बनेगा ?

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यद्यपि भाजपा ने भी क्षेत्र एवं इलाके की परिस्थिति आदि को देखते हुए जाति का इस्तेमाल खूब किया है, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के आधार पर चोट पहुंचाने के लिए गैरयादव, गैरजाटव जातियों को अपने पक्ष में करने की तमाम चालें चली हैं, लेकिन कहने के लिए ही सही वह बोल पा रही है कि हमने जाति को चुनाव का आधार नहीं बनाया - उन्हें एक व्यापक हिन्दू पहचान के तहत लाने की कोशिश की है - जो बात नई पीढ़ी के कुछ लोगों को आकर्षित करती है। लालू यादव /अगर जेल के बाहर होते/ को यदि आज भी 90 के दशक की भाषा को दोहराते देखा जाता कि पिछड़ों की दावेदारी को कोई रोक नहीं पाएगा तो यह जातीय सन्दर्भों को ही पुष्ट करना होता। मायावती को अपने वोटबैंक का भरोसा रहा है, लेकिन वह इस सच्चाई से परिचित नहीं होना चाहती कि वह अब लगातार छीज रहा है। इसके अलावा उन्होंने अतीत में जो व्यवहार किया है जिसमें वह किसी भी पार्टी से - यहां तक कि भाजपा से ही हाथ मिला कर - सत्ता बनाने के लिए उत्सुक दिखी हैं, वह भी सवाल खड़ा करता है।

सामाजिक न्याय की पक्षधर इन ताकतों ने जातिवाद, अंधराष्टवाद आदि के खिलाफ क्या जमीनी स्तर पर कोई काम किया ? और न सिर्फ जमीनी स्तर पर बल्कि उनकी विचारधारा भी इन मसलों पर स्पष्ट नहीं है। आखिर प्रकाश अम्बेडकर ने - जिन्होंने चुनावों में एमआईएम /मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन/ जिसकी अगुआई ओवैसी कर रहे हैं - के साथ गठबन्धन करके किसको फायदा पहुंचाया ? लोगों का यह भी कहना रहा है कि अपने भाषणों में भी उनके निशाने पर कांग्रेस अधिक रहती थी ? यह किस तरह की समझदारी का परिचायक है? उनकी जो शख्सियत बनी उसमें उन्हें डा अम्बेडकर के प्रपौत्र होने या विशिष्ट वंचित तबके के होने का फायदा निश्चित मिला होगा। अब ऐसी शक्तियों के आत्मपरीक्षण का समय आ गया है।

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वामपंथ जिसे अपने दुर्ग में ही जबरदस्त शिकस्त मिली, जहां खड़े उसके चालीस प्रत्याशियों में से उनतालीसी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हुई, एक अलग तरह के संकट का शिकार है। निश्चित ही उसके कार्यकर्ताओं के मेहनत में कोई कमी नहीं है, फिर उसकी यह गति क्यों हुई ? वह इन कारणों की तलाश अवश्य करेगा, मगर यह उसके लिए सोचने का मसला है कि राजनीतिक आर्थिक संघर्ष और सामाजिक-सांस्क्रतिक संघर्षों के अन्तर्सम्बन्ध, प्राथमिकताओं, तरीकों आदि को वह कैसे देखता है ? लगभग साडेतीन दशक तक पश्चिम बंगाल की सत्ता में बने रहने का उसने रेकार्ड कायम किया, फिर उसी जमीन पर भाजपा जैसी असमावेशी/हम और वे की राजनीति करनेवाली विचारधारा इतनी पनप क्यों सकीं ?

एमएल अर्थात मार्क्सवादी-लेनिनवादी ताकतों के कुछ प्रतिनिधि भाजपा की इस जीत पर तरह तरह की प्रतिक्रियाओं के साथ सामने आए हैं।

कुछ एकांगी किस्म के लोगों का कहना है कि इस हार से क्या होता है ? यह तो पूंजीवादी ताकतों की आपसी लड़ाई में किसी को मिली मात का मामला है ? उन्हें जनमानस में आ रहे गुणात्मक बदलाव को समझने की, उसकी तह में जाने की जरूरत नहीं दिखती। उनका चिरंतन दावा यही होता है कि व्यवस्थापरिवर्तन की लड़ाई में वह तो हमेशा की तरह सन्नद्ध रहेंगे, संघर्ष करते जाएंगे।

कुछ लोग राहुल गांधी को इस हार के लिए जिम्मेदार मानते हैं / और इस तरह से अपनी भूमिका पर, अपने आकलन को एजेण्डा पर आने देने से बचते हैं / उन्हें यह पूछा जाना चाहिए कि राहुल गांधी की जगह अगर वह आज होते तो क्या वह क्या करते ? जब हम कहीं न हो तो दूसरे की गलती आसानी से गिना सकते हैं और हम चूंकि गिनती में भी नहीं होते तो हमारे उपर उंगली उठाने की किसी को जरूरत भी नहीं पड़ती। सोचने का मसला यह है कि अगर होते तो इस वेग को रोकने का हमारे पास क्या हथियार था ?

दरअसल वह इस सच्चाई को देखना ही नहीं चाहते कि मोदी को राष्ट्रीय स्तर पर अगर किसी ने चुनौती पेश की तो वह राहुल ही थे। हिन्दी पटटी के तीन राज्यों में कुछ माह पहले भाजपा को शिकस्त देने में उनके ही नेतृत्व  ने निर्णायक भूमिका अदा की थी।

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कुछ लोग बीजेपी की जीत के लिए जनता में उसकी पैठ और मेहनत बता रहे हैं तो क्या जनता में मेहनत या उसे वह जैसी भी है उसे सिर माथे लगाना ही उपाय है।

बुद्धिजीवी वर्ग के एक हिस्से में हमेशा जनता जनार्दन की गाथा कही जाती है, उसका महिमामंडन होता रहता है। वाम की ताकतों में भी हमेशा जनता में धंसना ही सर्वोपरि माना जाता है। निचोड यही होता है कि आत्मगत शक्तियां अगर मेहनत करें, वह मजबूत हों तो वह जनता को अपने पक्ष में कर लेंगे, समय की धार को अपने पक्ष में कर लेंगे। यह सही है कि जनता के समर्थन से ही हार जीत तय होती है, लेकिन क्या जनता जिस तरह की है, उसी को साथ लेकर हम परिवर्तन की लड़ाई में आगे बढ़ सकते हैं ? जनता अगर जातिवाद में विश्वास रखती है, पितृसत्ता  के मूल्यों में सराबोर है, वह धर्म आदि के आधार पर गैर से घ्रणा करती है, तो क्या ऐसी जनता के मानस पर हम चुप्पी बनाए रख सकते हैं ? जनता के मानस पर प्रश्न खड़ा करना जनविरोधी नीयत ही है ऐसा नहीं मानना चाहिए।

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अन्त में एक सवाल महिलाओं की मानसिकता को लेकर। मीडिया में यह बताया गया कि महिलाओं ने बड़ी संख्या में मोदी को वोट दिया। लेकिन यहां यह सोचने का सवाल बनता है कि महिलाओं का ध्यान महिला होने के नाते जसोदाबेन की तरफ क्यों नहीं गया जो मोदी की पत्नी हैं और मोदी द्वारा परित्यक्त होने के बावजूद वह उनकी पत्नी होने की पहचान अपने पास सहेजे रखी हुई हैं। वे उन्हें अपना स्वामी मानती है और उनके विजयी होने की कामना करती आयी हैं।

बहुत कम लोग जानते हैं कि संघ कार्य के लिए पूरावक्ती कार्यकर्ता होकर निकल जाने के बाद मोदी ने उनके साथ औपचारिक सम्बन्ध विच्छेद की कोई प्रक्रिया नहीं चलायी और इस तरह जसोदाबेन ने अपना पूरा जीवन एक परित्यक्त स्त्राी की तरह बीताया।

कोई कहते हैं कि उनकी शादी कम उम्र में हुई थी ! बात सही हो सकती है, हम बस यही पूछना चाहते हैं कि वयस्क हो जाने पर उन्होंने अपनी विवाहित होने की बात पर पर्दा क्यों डाले रखा ? गुजरात के मुख्यमंत्राी होने के बाद उन्होंने जिन तीन चुनावों को लड़ा, उसमें भी उन्होंने अपनी वैवाहिक स्थिति अस्पष्ट रखी, वह कॉलम खाली रखा।

2014 के चुनावों में जब उन्हें यह चिन्ता हुई कि उनका नामांकन रदद हो सकता है तो उन्होंने फार्म पर अपनी वास्तविकता बतायी। उनके जीवन की इस अपारदर्शिता को महिलाएं किस तरह देखती हैं ? क्या इस व्यवहार को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है ? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्राी के पद पर दुबारा चुने जाने के बाद क्या उनके निजी जीवन की यह अपारदर्शिता पर प्रश्न नहीं खड़ा किया जाना चाहिए ?

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