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Saturday, March 23, 2019

सहवास के अधिकार का कानून फिर सुनवाई के दायरे में

अंजलि सिन्हा

सुप्रीम कोर्ट में सहवास के अधिकार / रेस्टीटयूशन आफ कान्जुगल राइटस/ के कानून को लेकर फिर से एक याचिका दायर की गयी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका की सुनवाई के लिए सहमति दे दी है। अब सुप्रीम कोर्ट के तीन जज इसकी सुनवाई करेंगे। याचिकाकर्ता कानून के दो छात्रों ने - ओजस्व पाठक और मयंक गुप्ता - इस कानून के खिलाफ दायर अपनी याचिका में कहा है कि यह कानून व्यक्तिगत गरिमा तथा स्वायत्तता के खिलाफ है तथा समानता और स्वतंत्राता के मौलिक अधिकार का हनन करता है। इस कानून में प्रावधान है कि पति या पत्नी एक-दूसरे के खिलाफ दाम्पत्य सम्बन्ध स्थापित करने की डिग्री प्राप्त करने का अधिकार देता है। इस डिग्री का उल्लंघन करना दंडनीय है।
1983 में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने सबसे पहले इस कानून को असंवैधानिक घोषित किया था, लेकिन 1984 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इसे संवैधानिक  बताया। इसके बाद 1984 में ही सुप्रीम कोर्ट ने भी सरोज रानी बनाम सुदर्शन चडढा केस की सुनवाई में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को सही बताया था।
 
यह कानून भारत में अंग्रेजी हुकूमत के दौर में बना था लेकिन खुद ब्रिटेन ने इस कानून को भले ही 1970 में रदद कर दिया था, लेकिन हमारा देश उसे ढो रहा है।

इस कानून के विरोध का इतिहास बहुत पुराना है। रकमाबाई का विवाह 11 साल की उम्र में 19 वर्षीय दादाजी भीखाजी से हुआ था। रकमाबाई ने इस विवाह को स्वीकार करने से मना किया क्योंकि यह उनकी इच्छा के विरूद्ध हुआ था। 1884 में भीखाजी ने कानून का सहारा लेकर केस दायर किया कि रक्मा उनके साथ रहे। रक्मा ने भी अंग्रेजी कानून का ही सहारा लेकर दलील दी कि उनकी इच्छा के विरूद्ध उनका बाल विवाह किया गया है। पहली अदालत में रक्मा को जीत मिली लेकिन दूसरी अदालत में मामला उनके खिलाफ गया। कोर्ट ने आदेश दिया कि वे या तो अपने पति के साथ रहेें या जेल जाएं। रक्मा ने तय किया कि भले वह जेल जाएगी, लेकिन अपने पति के साथ नहीं रहेगी। ऐसा माहौल बना कि उन्हें जेल नहीं जाना पड़ा।

सहवास के कानून के खिलाफ यह पहला प्रतिरोध था।

यह कानून साफ तौर पर पुरूषप्रधान मानसिकता का परिचायक है जिसमें पत्नी को पुरूष की सम्पत्ति के रूप में देखा गया है, साथ ही विरोधाभास भी है क्योंकि व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्राता उसका मूलभूत अधिकार है तो फिर किसी को बाध्य कैसे किया जा सकता है सहवास के लिए ?

अब जहां तक यौन सम्बन्ध बनाए जाने का सवाल है तो वह परस्पर सहमति पर ही आधारित हो सकता है, चाहे शादी हो या न हो। हमारे समाज में शादी के बाद मानो पुरूषों को लाइसेन्स मिल जाता है कि पत्नी उसकी सम्पत्ति है और उसके शरीर पर उसका अधिकार है। पहले के जमाने के कानून में बलात्कार एवं व्यभिचार को एक ही श्रेणी में रखा जाता था क्योंकि स्त्राी किसी की सम्पत्ति समझी जाती थी और दोनेां ही मामलों में किसी की सम्पत्ति के साथ छेड़छाड़ मानी जाती थी।

कानून में अन्तर्निहित इस विडम्बना की ओर भी हमारा ध्यान क्यों नहीं जाता कि एक स्त्राी जीवन के अपने अधिकार एवं स्वतंत्राता के अधिकार की रक्षा कर सकती है, मगर विवाह के बाद अपने शरीर की रक्षा नहीं कर सकती। महिलाओं को लिए अब तक भारतीय दण्ड विधान की धारा 498 ए का सहारा रहा है, जिसके अन्तर्गत वे आपसी सम्बन्धों में क्रूरता, अपने आप को ‘‘पति के विकृत यौन व्यवहार’’ से बचाने के लिए  कानूनी प्रक्रियाओं की मदद ले सकती रही हैं, मगर पति पत्नी के आत्मीय सम्बन्धों में ‘‘विकृत’’ या ‘‘अस्वाभाविक’’ का पैमाना क्या होगा ? क्या यौन सम्बन्ध बनाने की अत्यधिक मांग को ‘‘विकृत’’ कहा जा सकता है ?

कुछ आंकड़ों की बात करें: हर छह घण्टे में भारत में एक युवा विवाहिता स्त्राी अपने पति के हाथों जलायी जाती है, पीट कर मार दी जाती है या पति के भावनात्मक अत्याचार से आत्महत्या करती है। युनाइटेड नेशन्स के पापुलेशन फण्ड के मुताबिक - 15 से 49 साल उम्र के बीच - भारत की दो तिहाई शादीशुदा औरतें, मार खाती हैं, बलात्कृत होती हैं या यौनसम्बन्ध बनाने के लिए पतियों द्वारा मजबूर की जाती हैं। वर्ष 2005 में 6787 ऐसे मामले सामने आए थे जिनमें पतियों या उनके परिवारजनों द्वारा महिलाओं के मारे जाने की घटनाएं हुई थीं। यहभी जानी हुई बात है कि 56 फीसदी भारतीय महिलाएं मानती हैं कि पतियों को उन्हें कभी कभी पीटने का अधिकार है। प्रश्न उठता है कि भयानक शारीरिक हिंसा का शिकार होने वाली हर स्त्राी क्या बहुत राजी-खुशी से अपने पति से यौन सम्बन्ध बनाती होगी या वह इससे बचने के लिए अपने आप को सरेण्डर कर देती होगी।

हमारे समाज में वैसे भी शादी और सहवास जैसे आचार-व्यवहार को पूरी तरह से निजी नहीं रहने दिया गया है। परिवार के साथ समुदाय का हस्तक्षेप साधिकार होता है। प्रेम, साथ रहने और शादी करने आदि में परस्पर सहमति तथा जुड़ाव की भावना को ही केन्द्रीय कारक माना जाना चाहिए इसके बाद समाज रीतिरिवाज, भावनाएं आदि को आप जितना स्थान देना चाहते हैं दें लेकिन जिन्हें साथ रहना है वे ही महत्वपूर्ण हैं।

चूंकि समाज बदल रहा है तो धीरे-धीरे कानून में भी सुधार की मांग बढ़ रही है। पिछले दिनों व्यभिचार के कानून में भी संशोधन कर स्त्राी पुरूष दोनो पर समान रूप से लागू करने की व्यवस्था दी गयी। ज्ञात हो कि व्यभिचार का कानून सिर्फ पुरूष पर लागू होता था। पत्नी चूंकि पति की सम्पति होती थी तो पत्नी के विवाहेतर सम्बन्ध बनने पर वह पुरूष दोषी होता था जिस पर दूसरे की पत्नी से सम्बन्ध स्थापित करने का आरोप रहता था लिहाजा पति उस पुरूष पर व्यभिचार के तहत केस चलाने की मांग कर सकता था।

आखिर वैवाहिक सम्बन्धों को किन कसौटियों पर मजबूत बनाए जाने की जरूरत होनी चाहिए ?  क्या उसका आधार आपसी सम्बन्धों में जनतंत्र एवं पारदर्शिता होगी या उसे परम्परा के नाम पर एक पक्ष की वरीयता की बुनियाद पर ही चलाया जाएगा।

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