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Thursday, December 20, 2018

बदलो मगर अन्दर से ! नए अभियान, नए प्रश्न

- अंजलि सिन्हा

पिछले कुछ समय से भारत में मी टू अभियान की चर्चा चल रही है। 

इस अभियान के बाद इसके असर को लेकर कुछ सर्वेक्षण रिपोर्ट भी आए हैं और मीडिया तथा सोशल मीडिया सभी जगह पर इसपर विश्लेषण और लेख भी प्रकाशित हुए हैं। इस अभियान की सार्थकता तथा कमजोरियों दोनों पर काफी बातें हो चुकी हैं अब तक। एक रिपोर्ट मार्केट रिसर्च एण्ड एनालिसिस कम्पनी वेलोसिटी एम आर द्वारा कराए गए अध्ययन पर / जागरण, 30 नवम्बर 2018/ आयी है जिसके मुताबिक इस अभियान के कारण कार्यस्थल पर औपचारिक सम्वाद में बदलाव आया है। इस अध्ययन में दिल्ली, मंुबई, बेंगलुरू, कोलकाता, हैदराबाद तथा चेन्नई के लोगों ने हिस्सा लिया। इसमें पाया गया कि 80 फीसद पुरूषों ने महिला सहकर्मियों से संवाद में सतर्कता बढ़ा दी है।

नौकरी जाने का खतरा, सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच आदि को लेकर लोग सतर्कता बरत रहे हैं। इस पर अक्सर ही अलग अलग राय रही है कि कोई सुधार या अनुशासन अन्दर से आए या फिर उपर से पहले अनुशासित कर कानून आदि के दबाव में लोगों में बदलाव लाया जाए जो बाद में धीरे - धीरे उनके आदत का हिस्सा बने। वैसे दोनों ही प्रयास समानान्तर चल सकते हैं। यह सब समस्या को समाप्त करने या कम करने के लिए आवश्यक है मगर यदि पीड़ित को न्याय मिले तथा उसे जो पीड़ा पहुंची है उससे वह उबर पाए इसके लिए आवश्यक है कि पीड़क को किसी प्रकार की सज़ा मिले। जो महिलाएं या लड़कियां घटना के तुरन्त बाद किसी वजह से पुलिस केस नहीं कर पायीं, उन्हें दूसरों के खड़े होने से खुद खड़े होने का हौसला मिला।

मी टू अभियान जो अमेरिका से शुरू हुआ था जब एक निर्देशक के खिलाफ एक अभिनेत्राी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था। इस अभिनेत्राी द्वारा सोशल मीडिया पर व्यथा लिखने के बाद कई अन्य अभिनेत्रियां सामने आयीं और उन्होंने कहा कि ऐसा उनके साथ भी हुआ है। भारत में अभिनेता से लेकर नेता, पत्राकार कई सेलेब्रिटी कहलानेवाले लोग इससे बेपर्द हुए जिन्होंने सम्पर्क में आयी महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा की थी। हमारे समाज में यौन हिंसा का अपराध इतना व्यापक और कई स्तरों पर होता है कि उसका मुकाबला जितने स्तर पर हो वह कम ही माना जाएगा। मी टू अभियान ने भी कुछ असर छोड़ा, चर्चा चली और कमसे कम लोगों तक बात पहुंची तो अच्छा माना जाना चाहिए। इस दौरान जिन लोगों पर आरोप लगे उससे यह भी एहसास और गहरा हुआ कि हमारे समाज में कुछ गहरी बीमारी है। यौन कुण्ठाएं अन्दर कुण्डली मार कर बैठी हैं जो अवसर मिलने पर तुरंत बाहर आती हैं। 

इन कुण्ठाग्रस्त यौनिक सोच और मानसिकता का तो औरतों को सामना रोज-ब-रोज की जिन्दगी में करना ही होता है, लेकिन उसके साथ यह समझने की जरूरत है कि इसका पॉवर के साथ गहरा रिश्ता है। जो ताकतवर होते हैं वे अपनी पोजिशन का फायदा उठा कर अपने मातहतों का उत्पीड़न ज्यादा आसानी से कर पाते हैं। किसी भी प्रकार से सत्तासम्पन्न लोग भयमुक्त होकर हिंसा को अंजाम देते हैं। 

यद्यपि ऐसे मुहिमों की सीमाएं हैं और हमें उन सीमाओं को ध्यान में रखना चाहिए ताकि हम यौन हिंसा रहित समाज का निर्माण करने के लिए इन्हीं अभियानों से उम्मीद न पाल बैठे। न्याय के लिए प्रतिरोध और संघर्ष जरूरी होता है जो कभी व्यक्तिगत स्तर पर लड़ा जाता है और कभी सामूहिक रूप से। जैसे कि मी टू भी व्यक्तिगत रूप से शुरू हुआ जो अन्य पीड़ितों के जुड़ते जाने से मुहिम बन गया। हर अभियान और मुहिम समाज पर अपना प्रभाव छोड़ता है और यह अभियान भी अपना प्रभाव छोड़ेगा। जहां तक सीमाओं की बात है तो एक अन्य समस्या जो भारतीय समाज में रूप बदलकर न सिर्फ विद्यमान है बल्कि जड़ भी जमाए हुए है उसके उदाहरण से भी हम समझ सकते हैं। यह है दहेज की समस्या। 

80 के दशक में दहेज विरोधी अभियान चले, कानून में संशोधन कर उसे और सख्त बनाया गया। न सिर्फ 80 के दशक में बल्कि इसके पूर्व में समाज सुधार आन्दोलनों में दहेज की भी बात चलती रही है। ‘‘दहेज न लेंगे न देंगे’’ की शपथ युवाओं को दिलायी जाती थी और ऐसे कई आदर्शवादी युवा सामने आए जिन्होंने दहेज तथा आडम्बररहित शादियां कीं। लेकिन आखिर क्या वजह है कि दहेज हमारे समाज में आज भी समस्या बनी हुई है। खासतौर पर उत्तर भारत के कई राज्यों में परिवारों में बड़ी होती लड़कियां माता पिता के लिए संकट से कम नहीं हैं। शादी का खर्चा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। दहेज देने की परम्परा के साथ बाज़ार की और उपभोक्तावादी संस्कृति की जुगलबन्दी ने समस्या को और विस्तार दिया है। पूंजीवादी समाज में हर चीज के उपभोग पर अत्यधिक जोर होता है तो दहेज में भी कुछ वस्तु तथा धन/पैसा तथा उपभोग की अन्य चीजें आसानी से हासिल करने का अवसर प्रदान करता है। 

ऐसा इसीलिए है क्योंकि जेण्डरभेद अब भी हमारे समाज में बना हुआ है। लड़की अब भी पराये घर की वस्तु है, भाई बहन में समान सम्पत्ति की हिस्सेदारी तय नहीं हुई, बेटियां इस लायक बनें कि उन्हें न तो दान में दहेज चाहिए और न ही खुद का कन्यादान करवाना मंजूर हो। वे भी भाईयों की तरह माता पिता के प्रति वैसे ही जिम्मेदारी लेने वाली, कमाने वाली सदस्य बन सकें। नौकरी या व्यवसाय के बावजूद वे एक निर्भर प्राणी होंगी तो समानता कैसे आएगी ? पितृसत्तात्मक समाज में लड़की को समान दर्जा हासिल नहीं है यह हम सभी जानते हैं। आखिर पितृसत्ता पुरूष को श्रेष्ठ बताने का ही तो विचार है।

यानि समाज में बदलाव के लिए एक दो अभियान नहीं, अभियानों की श्रं्रखला की जरूरत है तथा साथ ही इन अभियानों के अलावा ऐसे संगठनों की भी जरूरत होगी जो सतत रूप से समानता तथा समाज में ढांचागत बदलाव के लिए काम करें । भविष्य के बेहतर समाज की रूपरेखा तैयार करना,  सरकार के सामने मांगें रखना, हर मुहिमों का हिस्सेदार भी बनना यह सब मिल कर ही मी टू जैसे अभियानों की सार्थकता बनाते हैं।

स्त्राीद्रोही मानसिकता को बदलना एक बहुत बड़ा लक्ष्य है जो प्रशासनिक सख्ती के साथ ही सांस्कृतिक आंदोलनों के जरिए भी संपन्न होगा। हिंसक और कुंठित मानसिकता तैयार करने के सभी स्त्रोतों को हम चिन्हित करें और वह निर्मित ही न हो इसके बारे में सोचंे, भले ही इस काम में समय लगे और जल्दी परिणाम हासिल न हो सकें।

1 comments:

Unknown said...

बहुत अच्छा लगा मुझे के लेख। किसी भी अभियान की जरुरत, प्रभाव और सीमाओं की समझ रखना ही इस मुद्दे पर गंभीरता से आगे बढ़ने के लिए जरुरी है। लेख के लिये धन्यवाद।

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