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Tuesday, November 20, 2018

अकेले जिन्दगी बदल सकते हैं, दुनिया नहीं !

-अंजलि सिन्हा

अकेले अपने प्रयासों से अपनी जिन्दगी में बेहतरी लाना, आत्मविश्वासी बनना तथा बहुत कुछ हासिल कर लेना भी बहुत अच्छा होता है। वह एक प्रकार से उपलब्धि बोध का एहसास कराता है। खासतौर से ऐसे समाज और ऐसे समय में जब महिलाओं के लिए तमाम प्रकार के बन्धन और वर्जनाएं हों। 

स्व को अधिकाधिक ‘‘लायक’’ सक्षम और सशक्त करते जाने का प्रयास हर व्यक्ति का अपना निर्णय और हक़ होता है। जैसे जैसे हम उपरी पायदान को हासिल करते जाते हैं हमें सुकून तो मिलता है लेकिन फिर अधूरापन भी लगता है कि हम तो उसके उपर वाले और फिर उसके भी उपरवाले के काबिल हैं, हमारी तुलना में कितने फिसडडी लोग कहां कहां पहुंच जाते हैं आदि। फिर इस एहसास से बेचैन होकर फिर से और सशक्त होने के प्रयास में जुट जाते हैं।

लेकिन यदि पूरे समाज में औरत की हैसियत और बराबरी के लिए वातावरण तैयार करना है तथा ऐसा देश और समाज बनाना हो जहां औरत को अपने लिए स्थान तलाशने के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़े तो वह काम सामूहिक रूप से तथा संगठन बना कर करना होता है। इससे तुरन्त विजयबोध की अनुभूति नहीं होती, वह धीरे धीरे लम्बा चलनेवाला ऐसा काम होता है जिसका प्रभाव हो सकता है कि अपनी जिन्दगी में दिखे भी नहीं और इसके लिए हमारी मानसिक तैयारी भी होती है।