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Friday, August 24, 2018

मैटरनिटी लीव लम्बी हो या छोटी !


तय करने का आधार क्या हो ?
- अंजलि सिन्हा

पिछले साल सरकार ने मैटरनिटी लीव /प्रसूति अवकाश/ को 12 हफते से बढ़ा कर 26 हफता करने का फैसला लिया था। अब भारत सरकार के श्रम मंत्रालय ने कहा है कि वह एक सर्वेक्षण कराएगी जिसमें यह पता लगाया जाएगा कि मैटरनिटी लीव की अवधि बढ़ाने के कारण महिलाओं पर क्या असर पड़ा है ? बताया जा रहा है कि इसकी रिपोर्ट इसी साल के अन्त तक आएगी और संसद के अगले सत्र में इस पर चर्चा सम्भव है।
सर्वेक्षण होना चाहिए, शोध भी होना चाहिए लेकिन उसका कारण, प्रभाव और जरूरत पर नज़रिया स्पष्ट रखना चाहिए। दरअसल इस मुददे पर चर्चा इसलिए सामने आयी है कि टीमलीज नामक एजेन्सी जो रोजगार और इसके ट्रेंड  पर  काम करती है उसकी एक सर्वेक्षण रिपोर्ट सामने आयी है। इस सर्वे में कहा गया है कि जब से मैटरनिटी लीव की अवधि बढ़ायी गयी है तब से कंपनियां महिलाओं को नौकरी देने में कतरा रही है। एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक जबसे छुटटी की अवधि 12 से 26 हफते तक बढ़ायी गयी है उसके बाद 18 लाख नौकरियां महिलाओं के लिए घट गयी है। दस बड़े सैक्टरों की कंपनियों पर यह सर्वे किया गया है जिसमें पाया गया है कि बड़े शहरों और बड़ी कंपनियों पर इस कानून का असर कम है लेकिन छोटे शहरों और छोटी कंपनियों के अवसर महिलाओं के लिए घट गए हैं।

उम्मीद की जानी चाहिए कि यदि सरकारी स्तर से कोई सर्वे कराया जाए तो उसका फलक और व्यापक होगा जिसमें यह देखा जाए कि नौकरियों के कम होने का कारण लम्बी अवधि की छुटटी के अलावा और क्या हैं ?

नतीजा तो बाद में देखने को मिलेगा लेकिन यह मुददा महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।। एक तरफ उसके सार्वजनिक दायरे के काम पर नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए बाहर नौकरी करना तथा वहां अवसरों में जेण्डरगत आधार पर असमानता न हो यह सुनिश्चित करना जरूरी है क्योंकि समान अवसर औरत का हक है इस पर आज के समय में आम सहमति है। इस बोध को बनने में बहुत समय और परिश्रम लगा है।  घर के बाहर औरत की उपस्थिति नौकरी के साथ ही पेशागत तथा अन्य माध्यमों से जरूरी इसलिए भी है ताकि समाज में स्त्राी पुरूष में समानता आए, पार्थक्य कम हो, सहज सम्बन्धों का प्रशिक्षण हो सके। आधुनिक सभ्य समाज की कसौटी पर  सही नतीजा तभी आएगा जब घर और बाहर दोनों जगहें दोनों का अपना हो।

लेकिन साथ ही सरकार और समाज दोनों को यह सुनिश्चित करना होगा कि जो स्वाभाविक प्राक्रतिक जरूरतें हैं, उनके कारण महिलाओ ंको भेदभाव न झेलना पड़े। इसमें मात्रत्व अवकाश कितने समय का हो यह मुददा भी बनता ही है। इस मसले पर किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले कुछ अन्य आयामों पर भी विचार करना चाहिए। मसलन जंचगी के बाद शारीरिक क्षतिपूर्ति प्रक्रिया कितने समय में पूरी हो जाती है, यहां तो मेडिकल विशेषज्ञो की राय पर आगे बढ़ सकते हैं लेकिन बच्चे के लिए अन्य तरह की व्यवस्थाओं जिसमें पालनाघर/क्रेश, आंगनवाडी आदि की अच्छी, सुलभ व्यवस्था इसमें मदद कर सकती है। कामकाजी महिलाओं को इस समस्या का अधिकतर सामना करना पड़ता है। आंगनबाड़ी के कर्मचारी को तो अभी तक ठीक से कर्मचारी माना भी नहीं जा रहा है, न तो वेतन ठीक है, न ही बच्चों के अनुकूल भवन तथा बुनियादी ढांचा ! प्राइवेट क्रेश की हालत भी भरोसा करने लायक नहीं है न ही उपलब्ध है।

दूसरा यह सोचने वाली बात है कि क्या पित्रत्व अवकाश इसमें कुछ सहयोगी भूमिका निभा सकता है ? 

तीसरा मुददा, जो गम्भीर है वह बुजुर्गों का है जिसे अभी ठीक से सम्बोधित नहीं किया जा रहा है। घर में बड़े बुजुर्ग या बीमारों के लिए भी या फिर चुनौतीपूर्ण विकलांगता हो किसी बच्चे या बुजुर्ग का तो औरत की नौकरी पर असर पड़ता है।

समाज में सहयोगी व्यवस्थाओं की इतनी कमी है कि काम छोड़ कर घर बैठने के अलावा कोई रास्ता नहीं निकलता। क्या कोई फेैमिली लीव के बारे में भी विचार करना चाहिए जो स्त्राी पुरूष कोई भी कर्मचारी जरूरत पड़ने पर ले सके।

यदि राज्य के द्वारा इस तरह की सुविधायें नागरिक हकों में शामिल कर वास्तविक कल्याणकारी राज्य बने तो काफी समस्यायें तो स्वतः ही हल हो जाती। तब वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी समाधान सिर्फ परिवार के अन्दर नहीं तलाशा जाता। यदि सहयोगी व्यवस्थाओं को राजनीतिक रूप से नीतिगत स्तर पर विकसित किया जाता तो एकल रह रहे स्त्राी पुरूष या जिनके परिवार में कोई बचा न हो उन्हें इतनी बड़ी असुरक्षा का सामना नहीं करना पड़ता। असुरक्षा तथा अनिश्चितता बहुत बड़ी मानसिक पीड़ा पहुंचाती है। तनाव का कारण भी यह बनता है।

चाइल्ड केयर लीव की सुविधा भी सरकार ने / जो सरकारी नौकरियों में कार्यरत महिला कर्मचारियों के लिए लागू होता है/ दी उसमें भले ही वह सभी को न मिलती हो लेकिन यह जुमला भी इतना प्रचारित हुआ कि जनमानस में यह बैठ गया कि दो बच्चों के 18 साल के होने तक महिला कर्मचारियों को लगभग 5 साल की अवधि के बराबर बैठा कर वेतन देना पड़ेगा। कुछ सरकारी महिला कर्मचारियों ने इसका फायदा भी उठाया होगा, लेकिन विचार तो यह करना है कि क्या इसकी जरूरत है ? परिवारों को यह जवाब देना चाहि कि जहां बच्चे के देखभाल की जरूरत है चाहें उसकी बीमारी हो या परीक्षा तब ऐसी स्थिति क्यों है कि वह जरूरत मातायें ही पूरा करें। यद्यपि माताओं को ऐसा लग सकता है कि वे ही इसे बेहतर अंजाम दे सकती हैं लेकिन सरकार ने ऐसी पित्रसत्तात्मक नियम के लिए क्यों कदम बढ़ाया जिसमें औरत अपनी नौकरी में नुकसान झेले। आखिर कहीं न कहीं घर के काम औरत के हिस्से अधिक हो इसके लिए हमारी कानून व्यवस्था में भी जगह बनी हुई है।

शोध के नतीजों के मुताबिक मात्रत्व अवकाश की जो भी अवधि सरकार तय करे, वह सभी कामकाजी महिलाओं पर लागू होनी चाहिए। साथ ही यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि आंगनबाड़ियों का व्यापक विस्तार हो तथा वह उच्चस्तरीय बने ताकि जरूरत पड़ने पर बच्चे तक माता पिता की पहुंच अपने कार्यस्थल के नजदीक हो। चतुर्दिक तथा बहुआयामी उपायों से ही महिलाओं का नौकरी में बने रहना सम्भव होगा। श्रमशक्ति में बराबर की भागीदारी ही स्थायी रूप से जेण्डरगत भेदभावों से मुक्ति दिलाएगी। 

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