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Wednesday, August 1, 2018

‘‘क्यों मैं एक नारीवादी नहीं हूं: एक नारीवादी घोषणापत्र’’

पुस्तक परिचय
‘‘क्यों मैं एक नारीवादी नहीं हूं: एक नारीवादी घोषणापत्रा ’’
- अंजलि सिन्हा
( Why I Am Not a Feminist : A Feminist Manifesto, Melville House, Brooklyn and London, February 2017)

जेस्सा क्रिस्पिन (Jessa Crispin) की यह किताब नाम के विपरीत एक खांटी नारीवादी किताब ही है। यह नारीवाद और नारीवादियों की अन्दर से / इनसाइडर के तौर पर/ पड़ताल करती है। सम्भव है कि कहीं कहीं उनके विचार या दृष्टिकोण  से कोई असहमत हो, यह भी हो सकता है कि अमेरिकी समाज की पृष्ठभूमि में लिखी गयी इस पुस्तक की बातें कहीं कहीं अपने सरोकार की न लगें, लेकिन नारीवादी मुहिमों  और प्रयासों की सीमाओं तथा कमजोरियों पर ध्यान आकर्षित करने का काम वह बखूबी करती है। इसे हम नारीवादी आन्दोलन को मजबूत बनाने का प्रयास भी मान सकते हैं। वे सभी जो नारीवाद तथा स्त्राी मुददों से सरोकार रखनेवाले हैं, उन्हें इसे नए सिरेसे समझने सीखने के मकसद से इस किताब पर अवश्य निगाह डालनी चाहिए।

जेस्सा क्रिस्पिन एक आनलाइन पत्रिका ‘‘बुकस्लट’’ ( Bookslut )  और आनलाइन साहित्यिक जर्नल ‘स्पोलिया’ (Spolia ) की सम्पादक हैं। उनकी प्रकाशित किताबों के नाम हैं ‘‘द डेड लेडीज प्रोजेक्ट’ ( The Ladies Project ) और ‘‘द क्रिएटिव टैरट’’( The Creative  Tarrot)  । उनके आलेख तमाम अग्रणी प्रकाशनों में - जिनमें न्यूयॉर्क टाईम्स, द गार्डियन, द वॉशिंग्टन पोस्ट’ आदि शामिल हैं - प्रकाशित हुए हैं। 

किताब अंग्रेजी में हैं, वे सभी जो इसे मंगा कर पढ़ सकते हैं अवश्य पढ़ें, यहां प्रस्तुत है किताब का परिचय। इस पुस्तक में कुल 9 अध्याय हैं उसी क्रम में मैं यहां परिचय दे रही हूं:


1
भूमिका
क्या आप नारीवादी हैं ?

जैस्सा कहती हैं कि यदि नारीवादी होने का अर्थ सिर्फ यह है कि महिलाएं उन सभी अधिकारों और आज़ादियों की हक़दार हैं जो पुरूषों को दी गयी है तो मैं नारीवादी नहीं हूं। यह कहती हैं कि ‘मैं यह लेबल छोड़ रही हूं’ लेकिन दरअसल वह इस लेबल पर जोर से दावा करती हैं।

वे कहती हैं कि जहां औरत सिर्फ मौजूदा दुनिया में हिस्सेदारी करे जो कि भ्रष्ट है, जिसे पितृसत्ता ने बनाया है तो ऐसी भागीदारी उन्हें मंजूर नहीं बल्कि वह उसे फिर से बनाने में सक्षम भी हो। वह सिर्फ सरकार या पूंजीवाद बाज़ार का दरवाजा न खटखटाये बल्कि नया तंत्रा विकसित करने में सक्षम हो। 

अगर आप ऐसी व्यवस्था बनाने को कहते हैं जो उत्पीड़न को बताये, कहे कि ‘‘कृपया मुझे उत्पीड़ित न करें’’ यह व्यर्थ का काम है। मैं अपने आप को ऐसे नारीवाद के साथ नहीं जोड़ सकती जिसका अत्यधिक जोर महज अपने सशक्तिकरण पर है। अगर नारीवाद सिर्फ व्यक्तिगत प्राप्ति के लिए है और उसे ही राजनीतिक प्रगति के लिए कहा जाए तो वे मेरे लिए नहीं है।’

नारीवाद है:
- आत्ममुग्ध सोच प्रक्रिया का प्रतिबिम्बन: मैंने खुद को नारीवादी मान लिया तो मैं जो कुछ भी करूं वही नारीवादी काम हो गया। इससे कोई फरक नहीं पड़ता कि वह कितना प्रतिक्रियावादी है। जो कुछ मैं कर रही हूं, मैं ही हीरो हूं।
- यह लड़ाई एक औरत को इजाजत देती है कि वह गरीब और कमजोरों के उत्पीड़न में बराबरी से भागीदारी करे।
- एक ऐसी प्रणाली है जो उन्हें शर्मिन्दा करे, चुप कराये जो आप से असहमत हैं, जिसे ऐसा सहज भरोसा हो कि असहमति और विवाद गाली है। 
- जो धमकाने वाली व्यवस्था का बचाव करे, पोलिटिकली सही भाषा हो, झुण्ड का शासन हो, थोड़ी भी चुनौती या असुविधा लगे तो व्यक्ति तन जाए
- दशकों तक यही चर्चा चले कि कौन सा टेलीविजन शो अच्छा है और कौन सा बुरा ?
- जो आप से नीचे या छोटे हैं वे आप के दया के पात्र हैं वे आप के सरोकार नहीं हैं, जो आप से उपर हैं वे आप के मॉेडल हैं बेहतर जिन्दगी के लिए। आप का नारीवाद आप की बेहतर जिन्दगी, सम्पत्ति, सुविधा और आसन मजबूत हो इससे परिभाषित होता है।
- इन सभी वजहों से मैं नारीवादी नहीं हूं। 

अध्याय 1
वैश्विक नारीवाद की समस्याएं

इस अध्याय में जेस्सा ने यह बताने का प्रयास किया है कि नारीवाद कैसे आज फैशन में है। आज माना जाता है कि हर औरत को नारीवादी होना चाहिए और इस शब्द पर नए सिरेसे दावा ठोंका जा रहा है। दशकों से जानीमानी सेलिब्रेटी टाइप महिलाएं इस लेबल से दूरी दिखाने का प्रयास करती थीं ताकि वे गैरदोस्ताना और बाज़ार के लिए अयोग्य न दिखें। लेकिन अब धारा बदल गयी है। जो फैशनेबल नहीं था, बाजारयोग्य नहीं था, वह अब फैशनेबल और बाज़ार की रणनीति का हिस्सा बन गया है।

वे व्यंग में कहती हैं कि हम सभी अपने आप को नारीवादी मान सकते हैं, लेकिन जो अस्पष्ट है वह यह कि हम किस लेबल को रिक्लेम करना चाहते हैं, किससे साहस कर शब्द वापस लेना चाहते हैं ? किसी टी शर्ट या स्वेटर पर रैडिकल नारीवादी  लिखा हो तो सार्वजनिक जगहों पर गर्व से पहनते हैं, हम फिर करना क्या चाहते हैं ?

महिलायें, महिलाओं से नारीवादी शब्द पर दावा करने को कह रही हैं। नए नारीवादी पुराने नारीवादियो पर आरोप लगा रही हैं कि आपने आन्दोलन को तबाह किया और नए लोगों को आन्दोलन में शामिल होने के लिए कह रही हैं।
नारीवाद हमेशा से हाशिए की संस्कृति था, कुछ एक्टिविस्टों ने समाज का ध्यान खींचा। कभी भी बहुत बड़े पैमाने पर महिलाओं ने हड़ताल या मताधिकार आन्दोलन या अन्य में भाग नहीं लिया। अधिकतर ने या तो ध्यान नहीं दिया या यही चाहते थे कि यह हंगामा शांत हो जाए। ऐसा नहीं था कि बड़ी संख्या में महिलाओं ने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन के लिए काम किया, उनके लिए जगह बनायी। ये बहुसंख्य महिलाएं नारी आन्दोलन की दूसरी लहर में बस अच्छी शादीशुदा जीवन और थोड़ी आज़ादी चाहती थीं।

हमेशा ऐसी महिलाओं की संख्या बहुत छोटी थी जिन्होंने अपने आप को आन्दोलन में झोंक दिया तथा दूसरे को भी आन्दोलन में खींचा। अधिकतर महिलाएं उन्हीं के कामों से लाभान्वित हुईं जिनसे वे दूरी बनाए रखती थीं।
अब मुख्य धारा के नारीवादी रैडिकल जो काम करते थे उस पर अपना दावा तो ठोंक रहे हैं लेकिन वह काम नहीं कर रहे हैं .....

यदि नारीवाद को सभी के लिए सुविधाजनक और ग्राहय बनाना हो, जहां हर कोई अपने हित के लिए काम करता हो बजाय इसके कि समग्रता में सभी के लिए काम हो तो पूरा बदलाव चाहनेवाली नक्शे से बाहर हो जाती हैं। जब नारीवाद फैशन बन जाता है तब अधिक समानता वाले समाज का निर्माण बिना फैशन वाला काम बन जाता है, जैसा कि हो रहा है।

नारीवाद को वैश्विक रूप से लोकप्रिय बनाना अच्छी बात लग सकती है, लेकिन वह ऐसी प्रक्रिया को बढ़ावा देता है जो आन्दोलन के लिए नुकसानदेह है, जिसमें कुल फोकस समाज से व्यक्ति की तरफ शिफट हो जाता है। जो पहले सामूहिक कार्रवाई या साझी दृष्टि का मसला था कि जो महिलाएं दुनिया में किस तरह रह सकती हैं और काम कर सकती हैं वह अब पहचान की राजनीति का मसला बन गया है, हमारा सरोकार और हमारी उर्जा अन्दरूनी दिशा में मुड़ गयी है।

आखिर कोई महिला नारीवाद की पहचान को क्यों अपनाना नहीं चाहती यह समझने के बजाय वैश्विक नारीवादी मतान्तरण के अपने प्रयास में बताएंगे कि कैसे नारीवाद के साथ छवि की समस्या है जिसके स्त्रोत हैं दूसरी लहर के रैडिकल नारीवादी।

अगर लक्ष्य सार्वभौमिकता हो, सबको जोड़ना हो तो इन नारीवादियों को अपना लक्ष्य इस हद तक सरलीकृत  करना होगा कि धार्मिक अतिवादी  या नारीद्रोही ही सिर्फ इनसे असहमत होंगे। एक सदी से अधिक समय से हम क्रांति के हिस्सेदार हैं, लेकिन यह दुनिया आज भी महिलाओं के लिए न केवल प्रतिकूल है बल्कि बड़े पैमाने पर हिंसा और भेदभाव उन्हें झेलना पड़ता है। अपने साथ होने वाले अत्याचारों के लिए उन्हें ही जिम्मेदार ठहराया जाता है।

और यह बात भी है कि तमाम सारी महिलाएं अपने खुद की मुक्ति का रास्ता ढंूढने के प्रति उदासीन हैं। वे आज भी काम छोड़ने और बच्चा पालने के लिए घर में रहने को तैयार हैं। वे ‘‘पोल डांसिंग’’ का क्लास लेती हैं और कहती हैं इससे व्यायाम अच्छा होता है। वे ऐसे गायक को पैसा देती हैं जो स्त्राीद्रोही गाने गाता है। वे मददगार पत्नी बनने की कामना करती हैं या सैक्सी गर्लफ्रेण्ड। ऐसी महिलाओं को समझाने के बजाय उन्हें सिर्फ लेबिल दे देने से उनकी सम्भावित भूमिका भी बर्बाद हो जाती है।

जैस्सा कहती हैं कि आखिर महिलाओं को नारीवादी के रूप में पहचान क्यों जरूरी है ? वे बताती हैं कि नारीवादियों के लिए यह पहचान जरूरी है, दुनिया के लिए नहीं। इसका इस बात से कोई ताल्लुक नहीं है कि महिलाएं कैसा जीवन जीयें, अपना काम कैसे करें, परिवार और समुदाय में कैसे रहें। नारीवाद का नया जोर आन्दोलन के दर्शन और राजनीति को समझने के बजाय लेबिल और पहचान पर चला गया है। आप अपने आप को नारीवादी कहने लगें और वही आप को रैडिकल काम बन जाता है। गलत शब्दों की जगह सही शब्दों का इस्तेमाल करें / जबकि सही शब्द भी बदलता रहता है/ यदि सही भाषा का इस्तेमाल आप करते हैं तो कुछ भी करने को आज़ाद हैं, लेकिन गलत शब्द इस्तेमाल कर आपने जो भी जिन्दगी भर अच्छा किया वह सब ढंक जाता है।

वे बताती हैं कि हमारी जरूरत क्या है, हम नए नारीवादियों तक कैसे पहुंचे ? दो रास्ते हैं: पहला, रीब्राण्डिंग से, उसे कम चुनौती वाला ग्राहय बनाएं। महिलाएं अपना जीवन कैसे जीती हैं, वह कोई मायने नहीं रखता, बस सिर्फ अपना लेबल बदल दें, बस नारीवादी हैं। दूसरा नारीवाद का दूसरा संस्करण तैयार किया जाता है जहां महिलाएं जिन दबावों में काम करती हैं उसकी राजनीतिक तथा समाजशास्त्राीय समझदारी बनाने के बजाय उसे व्यक्तिगत चुनाव में बदल दिया जाता है। आप जो भी करते हैं वह नारीवादी हो जाता है।

नारीवाद के रैंक को बढ़ाने का एक दूसरा तरीका यह होता है कि महिलाओं को समझाया जाए कि उनकी जिन्दगी बेहतर हो सकती है यदि वे अपने को नारीवादी कहने लगे। इस तरह नारीवाद सेल्फ हेल्प का दूसरा सिस्टम बन जाता है। घर और बाहर दोनों जगह ताकत बढ़ाना है तो यह लक्ष्य सेल्फ हेल्प से मिलेगा।

सेल्फ हेल्प वाली संस्क्रति व्यक्ति को उसके सामाजिक संदर्भ से अलग कर देती है, जिसमें वह रह रहा है। इसमें आप अपनी खुशी के लिए जिम्मेदार हैं तथा आपका अपनी खुशी पर नियंत्राण है। यह एक प्रकार से बेचैन रहने की संस्क्रति भी है। यहां हमेशा एक ऐसा क्षेत्रा बचा रहता है जहां आप स्वयं को बेहतर बना सकते हैं और कोई व्यक्ति निरन्तर मूल्यांकन तथा दूसरो ंसे तुलना में पड़े रह सकता है।

ऐसे स्त्राी पुरूष जो सेल्फ हेल्प सोच में फंसे होते हैं वे अपना समय अपनी ‘गलतियों’ और कमजोरियों पर काम करने में लगाते हैं, सबसे अच्छे जीवन के लिए। इसलिए सेक्सी फेमिनिज्म के किताबों का अध्ययन होने लगता है। व्यक्तियों की कहानियां आने लगती हैं कि कैसे नारीवाद ने आगे बढ़ने में सम्भोग का आनन्द उठाने में मदद की। पितृसत्ता  का धुंधला  आइडिया होता है कि वह आप को दबाता है और कैसे आप कुछ व्यक्तिगत उपलब्धियों द्वारा इसकी प्रतिक्रिया दें।  
अक्सर ऐसा समझ लिया जाता है कि फेमिनिस्ट लेबिल स्वीकार कर लेने से इसके पीछे का मतलब भी समझ आ जाएगा। लेकिन इस तरह के मनोवैज्ञानिक मार्केटिंग अभियान से इसका अर्थ बहा दिया जाता है।

कुछ भी कठिन करने की जरूरत नहीं बस लेबल की अदला बदली करनी है। आज का नारीवाद सतही कैसे है यह समझने के लिए आप नोट करें कि नारीवाद की सफलता जानने के लिए भी वही मार्कर है जो पितृसत्तात्मक  पूंजीवाद के लिए है - पैसा और शक्ति। हमारा पैमाना भी वही है कि कितनी सीईओ महिलाएं हैं, फॉर्च्युन के 500 कंपनियों की सूचि में कितनी महिलाएं हैं, कितनी ने मेडिकल इन्स्टिटयूट से ग्रेजुएट किया आदि।

हम मान लेते हैं कि पितृसत्ता अपने आप खतम हो जाएगी यदि महिलाएं खुद को नारीवादी कहने लगें। एक महिला सीईओ गर्व से कहती हैं कि वह फेमिनिस्ट मान्यता रखती है। आखिर वह इसी की बदौलत इस पोजीशन तक पहुंची है। चाहे जितना भी स्त्राीद्रोही काम करे, लेकिन सत्ता पर यदि महिला है तो सब ठीक है। इसी आधार पर हिलरी क्लिन्टन का समर्थन कर देते हैं जिसने सत्ता में रहते महिलाओं एवं बच्चों के लिए कल्याणकारी योजनाओं को समाप्त कर दिया था।

अध्याय 2
महिलाओं का नारीवादी होना ही जरूरी नहीं !

बेचैनी वैश्विक नारीवाद का एजेण्डा नहीं है यदि वह सारी महिलाओं को अपील करना चाहता है। अब सारा जोर मतों और व्यक्तिगत आख्यानों पर आ गया है। वह बताता है कि सामूहिक और बौद्धिक इतिहास के अध्ययनों की जरूरत नहीं है। अब जीवन शैली पर फोकस होने के चलते नारीवाद बाज़ार में खरीदनेवाली कोई चीज बन जाता है।

रैडिकल नारीवादी पोजीशन को खारिज किए जाने की परिणति जिसे ‘‘च्वाइस फेमिनिज्म’’ कहते हैं, उसमें हुई है। यह वो विश्वास है कि महिला जो भी चुने, अपनी जीवन शैली से, अपने पारिवारिक सम्बन्धों या फिर पॉप संस्कृति के चयन तक, महज कुछ भी चुनने के अपने काम से वह नारीवादी चुनाव कर रही है। इसके पीछे का विचार यही है कि अत्यधिक सख्त पितृसत्तात्मक  इतिहास में महिलाओं की पसन्दगी को तय कर दिया  जाता था तो इस तरह कुछ भी चुन करके आप पितृसत्ता को कमजोर कर रहे हैं और इस तरह आप नारीवादी की तरह व्यवहार कर रहे हैं। इस तरह आपने घोषित कर दिया कि आप नारीवादी हैं और आप नारीवादी हो गए।

नारीवाद के दूसरी लहर के जो सम्भावित लक्ष्य के कई सारे विचार जो पेश किए गए थे वह व्यापक आन्दोलन में आकर्षण पैदा नहीं कर सके क्योंकि एक बार जब पैसा या शोहरत निश्चित मुकाम तक पहुंच जाते हैं, आप के लिए व्यक्तिगत तौर पर अधिक फायदेमन्द होता है अपनी जरूरतों के लिए संघर्ष करना न कि ऐसी प्रणाली बनाने में योगदान दें जो सभी के लिए न्यायपूर्ण हो।
चेतना बढ़ाने वाले सत्रों ने हमें यह विचार दिया कि ‘‘पर्सनल ही पोलिटिकल है’’ लेकिन यह ऐसा मुहावरा है जिसकी वर्षों से गलत व्याख्या की जा रही है। लम्बे समय से महिलाएं इसे इस कदर देखती रही है कि उनकी खुद की निजी जीतें ही राजनीतिक जीतें हैं। अगर मैं शीर्ष पर पहुंच जाउं तो अपने उसूलों पर टिके रहने की जरूरत नहीं। मेरा यहां होना ही राजनीतिक जीत है। इस विचार की अनदेखी की जाती है कि व्यक्तिगत निर्णयों के राजनीतिक परिणाम होते हैं और इन परिणामों की पड़ताल की जानी चाहिए। च्वाइस फेमिनिजम इन मुददों पर चर्चा करने से रोकता हैै। लोग अपनी जिन्दगी जीने का जो रास्ता चुनते हैं उसके प्रभावों पर कोई बात नहीं करता क्योंकि च्वाइस ही फेमिनिस्ट है इसलिए आलोचना अवैध है। यह 

उसका व्यक्तिगत निर्णय है, यह उसकी अपनी यात्रा है। इस मानसिकता के साथ नारीवादी आलोचना ही उत्पीड़न का एक रूप बन गया।

यह छदम हम बनाम वे की मानसिकता तैयार करता है। एक तरह हम बेचारी पीड़ित महिलाएं हैं और दूसरी तरफ वे पुरूष जो हमें दबा के रखना चाहते हैं। फरक बस इतना आया है कि महिलाओं के लिए बनी अधिकतर बाधाओं को हटा दिया गया है। अब वे पारम्पारिक तौर पर मर्दवादी क्षेत्रों में जा सकती हैं, कालेजों में जाती हैं, सार्वजनिक जगहों पर भाषण दे सकती हैं, चुनाव लड़ सकती हैं, जो चाहे कर सकती हैं। वास्तविक गैरबराबरी और बाधायें जिन्हें महिलाओं को झेलना पड़ता है, वह अधिकतर गरीबों के लिए होती हैं। मध्यमवर्गीय और उसके उपर की महिलाएं सत्ता और सुगमता/सुविधा खरीद सकती हैं। लेकिन निम्न आय की महिला के जो ज्वलन्त मुददे हैं - सस्ता गर्भपात, बच्चों की देखभाल, स्वास्थ्य, सार्वजनिक आवास आदि अब नारीवाद के दायरे से बाहर हो गए हैं। इन चीजों के बारे में हमारी राय हो सकती है लेकिन इनको सुधारने के कामों की कमी है।

विपरीत राय या आलोचना एक तरह से हमला है। यह विश्वास इस बात से उभरता है कि आप की सच्चाई ही एकमात्रा सच्चाई है। आपके दुख और उत्पीड़न बोध पर सवाल उठाने की जरूरत नहीं है। इस वातावरण में इस बात पर चर्चा होना असम्भव है कि किस तरह आप के च्वाइस दूसरों को प्रभावित करते हैं।
अध्याय 3 की यहां चर्चा नहीं कर रही हंू। इसमें कुछ महिला लेखकों का विवरण दिया गया है।

अध्याय 4

किस तरह पितृसत्ता का काम करने में नारीवाद की परिणति हुई ?

पितृसत्तात्मक नियंत्राण के सबसे खराब प्रभावों से बचने का महिलाओं के पास एक तरीका है और वो है पैसे के जरिए। खूब पैसा बनाओ और आप पितृसत्ता के सबसे प्रगट तरीकों से पलायन कर सकते हो। आप की बात सुनी जाएगी, आप को सार्वजनिक जीवन में स्थान मिलेगा और तमाम महिलाओं की तरह जिन्हें देखभाल करने के लिए मजबूर किया जाता है, उससे आप बच सकते हैं। आप किसी को पैसा दे सकते हैं ताकि वह आप के लिए काम करे, आप का खाना पकाये, आपके कपड़े सहेजे और आप के बच्चों की देखभाल करे। उत्पीड़न के तमाम घृणित  रूपों से बचने का सबसे तेज और सबसे आसान रास्ता है पैसा और महिलाएं उसे खूब कमा रही हैं।

हममें से कइयों ने यही करना तय किया है : पितृसत्ता से बाहर निकलने का रास्ता खरीद लेने का। महिलाओं को जिन कई तरीकों से नियंत्रण में रखा जाता है , उन बाधाओं को आप पैसे से तोड़ सकते हैं।

पितृसत्ता व्यक्तिगत आज़ादी से बड़ा मसला है। यह कोई हम और वे का मामला नहीं है। यह एक ऐसी प्रणाली है जिसके जरिए शक्तिशाली अपना नियंत्राण तमाम लोगों के जरिए स्थिति पर बनाए रखते हैं।

वे महिलाएं जो व्यवस्था का हिस्सा हैं, कोई जरूरी नहीं कि उन पुरूषों से जिन्होंने उसे विकसित किया तथा बनाए रखा है उससे किसी भी रूप में, नैतिक भाषा में कहें तो बेहतर हों। महिलाएं वकील हैं, न्यायाधीश हैं, जो निरपराध पुरूषों और स्त्रिायों को जेल में डालती हैं, गरीबों का शोषण करती हैं, जो संस्थागत नस्लवाद का समर्थन करती हैं। महिलाएं आज राजनेता हैं जो गरीबों की कीमत पर महाधनाढयों को और मालामाल करती हैं।

अब जबकि महिलाएं सत्ता तक पहुंच गयी हैं, हम अधिक समतामूलक दुनिया नहीं देखने वाले हैं बस वही दुनिया जिसमें महिलाएं कुछ अधिक संख्या में होंगी।

आखिर क्यों महिलाएं फिर भी सत्ता के दायरों में सक्रिय हैं ? क्योंकि हमने जेण्डर और नस्ल को पैसे और सत्ता से प्रतिस्थापित किया है। अब आप समाज में अपना स्थान खरीद सकते हैं और उसके लिए ‘‘सही’’ वंश में पैदा होना जरूरी नहीं है। अब महिला के तौर पर हमें सत्ता में सुगमता बनी हुई है , इसलिए यह कम होगा कि वे गैरबराबरी के इस प्रणाली को तोड़ने का प्रयास करें। सत्ता से अच्छी अनुभूति होती है, वह तमाम चीजें आप को देती है, जब तक उसका जूता आपके गर्दन पर न हो।

यह प्रश्न विचारणीय है कि वैश्विक नारीवाद प्रभावहीन क्यों है ? 

क्योंकि एक ऐसा नारीवाद जो स्वहित से निकलता हो, उसे इसलिए अपनाया जाता है क्योंकि वह सत्ता तक रास्ते को सुगम बनाता है, न कि उसे किसी सामाजिक जागरूकता के चलते अपनाया जाता है - वह निश्चित ही सत्ता एवं उत्पीड़न की प्रणाली का हिस्सा होगा और इसलिए वैश्विक मानवाधिकार के लिए अर्थहीन होगा। महिलाएं आज इस प्रणाली की सक्रिय हिस्सेदार हैं और वे उससे लाभान्वित हो रही हैं। 

जब समग्रता में महिलाओं के साथ जैविक कारणों से भेदभाव होता था और वह सीधे तौर पर कानूनी किताबों में दर्ज था तब महिला एकजुटता के कुछ मायने निकलते थे। वहां सार्वजनिक जरूरतें तथा सार्वजनिक बाधायें थीं जो हमें जोड़ें रखती थीं।
लेकिन आज मेरा अधीनीकरण तुम्हारे अधीनीकरण से अलग दिखता है। जिन बाधाओं का मैं सामना करती हूं वह उन बाधाओं से अलग हैं जिनका तुम सामना करती हो। क्योंकि अधिकतर सार्वभौमिक बाधाओं को हटा दिया गया है। हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि कुछ बाधायें जिनको हम स्त्राीद्रोही कहते हैं वह वास्तव में महिलाओं के खिलाफ भेदभाव का नहीं है। हम महिलाएं हैं लेकिन शायद अधिक मददगार होगा अपने बारे में यह सोचना कि हम पहले मनुष्य हैं।

यहां पर यह प्रश्न खड़ा होता है कि हमें अभी भी नारीवाद की जरूरत क्यों है ? निश्चित ही श्रेणीबद्धता को नष्ट करने के काम को अंजाम तक पहुंचाने के लिए। प्रजनन अधिकार, यौनिक हिंसा आदि मुददे हैं जो महिलाओं की आज़ादी के रास्ते में आज भी बाधाएं बने हुए हैं। हमें आत्ममुग्ध नहीं होना चाहिए और संघर्ष को रोकना नहीं चाहिए। हमारी जिन्दगी और भावी पीढ़ी की जिन्दगी के लिए संघर्ष की जरूरत रहेगी।

जब हम समानता की तरफ बढ़ रहे हैं और जब हम मध्यममार्गी स्त्राी के प्रगति को देखते हैं, वह सभी शैक्षिक, औद्योगिक, आर्थिक और सार्वजनिक पद सम्भालने के तौर पर आगे बढ़ रही है - क्या इस बात का कुछ मतलब निकलता है कि हमारी विचारधारा, हमारी जैविक पहचानों पर आधारित हो ? 

यहां एक रास्ता है जिससे यह पता चलता है कि नारीवाद आज भी उपयोगी विचार है। हममें से अधिकतर जेण्डर के चलते इस तरह से या उस तरह से हाशिए पर डाले गए हैं। यह हाशियाकरण हमें यह देखने की द्रष्टि प्रदान करता है कि कैसे पूरी व्यवस्था ही भ्रष्ट है। हाशिए पर होने के चलते महिलाओं को यह परिप्रेक्ष्य और बल मिलता है कि वह व्यवस्था के कार्यप्रणाली को और उसके काले दिल को देख सकें।

नारीवाद का यह संस्करण जो समग्रता में समाज को बदलने के लिए बहुत कुछ कर सकता है, एक शक्तिशाली मुक़ाम पर है क्योंकि हमारे लोग अन्दर तथा बाहर मौजूद हैं। हम भले ही शहर की दीवारों पर हों लेकिन हमने केन्द्र में भी घुसपैठ कर रखी है। अगर हम एक दूसरे से जुड़ते हैं और यह देखते हैं कि इस समूची प्रणाली को ही गिरना चाहिए - यह समाज जो लोभ पर टिका है, यह समाज जो तमाम लोगों को गरीबी, हिंसा, और शोषण से मार रहा है - इसे अंजाम दे सकते हैं।
दुर्भाग्य से तमाम लोग यही सोचेंगे कि इस व्यवस्था के साथ एकमात्रा गलत यही है - और व्यवस्था से मेरा मतलब है यह समग्र जटिल दुनिया जिसे हम ‘‘पितृसत्ता ’’ ‘‘पूंजीवाद’’ जैसे शब्दों से अपर्याप्त ढंग से सम्बोधित करते हैं कि वह उन्हें घुसने नहीं दे रही है। समूची व्यवस्था को इस तरह से बनाया गया है कि वह कुछ लोगों को शामिल करती है और कुछ लोगों को बाहर निकालती है, कुछ को फायदा पहुंचाती है बाकियों का शोषण करती है, इसलिए वह दानवी है। समावेश के लिए अपने इस तरह से संघर्ष करने में आप व्यवस्था को सुधार नहीं रहे हैं, आप बस उन लोगों की कतारों में शामिल हो रहे हैं जो पहले से ही समाविष्ट हैं और लाभ ले रहे हैं। आप अपने खुद का समावेश करने का और शोषण का तरीका ढूंढ़ रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें आप एक महिला आप भी पितृसत्ता हैं।

आसान शब्दों में कहें तो एक बार जब हम व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं और उससे पुरूषों के स्तर पर ही लाभान्वित होने लगते हैं , एक समूह के तौर पर हम इस बात की चिन्ता नहीं करेंगे कि अब किसकी बारी है घायल होने की, जिसके साथ हम जगह साझा कर रहे हैं उनके प्रति हमारी जिम्मेदारी बनती है। और ये कर्तव्य हमारे कथित अधिकारों तथा एनटायटलमेण्ट से पहले आते हैं।

यह विचार कि महिलाएं किसी उद्योग की ‘‘संस्कृति ’’ को बदल सकती हैं यह सफेद झूठ है। भले ही महिलाएं अच्छे इरादों से जायंे, व्यवस्था के खिलाफ अच्छे इरादों की कोई अहमियत नहीं होती है। व्यवस्था आप से पुरानी है। उसने इतना जहर पीया है जितना आप उगलने की उम्मीद भी नहीं कर सकती हैं। आप उसे धीमा भी नहीं कर सकती हैं।

इसमें प्रवेश पाने के लिए आप को उन मुखियाओं के गुणों को प्रदर्शित करना होगा जिन्होंने उसे बनाया। आगे बढ़ने के लिए उनके व्यवहार का अनुकरण करना होगा, उनके मूल्यों को स्वीकारना होगा। उनका मूल्य है सत्ता, सत्ता का प्रेम और सत्ता का प्रदर्शन। तब तक आप उस संस्कृति का हिस्सा बन चुके होंगे।

बहुत कम लोग इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे व्यवस्था में क्यों जाते हैं ? वे कहेंगे कि वहां अच्छा लगता है, आप को चीजें मिलती हैं। अगर आप ऐसी बातें कहें तो लोग आप को सुनते भी हैं और लोग आप को ध्यान दें, यह भी अच्छा लगता है। अगर आप सत्ता को अहमियत देते हैं तो लोग आप को सत्ता देंगे। और उसके साथ पैसा और विलासिता भी आएगी जिसमें एक तरह से उत्पीड़न और दुःख से बाहर का रास्ता दिखेगा। जो लोग व्यवस्था के बाहर रह गए हैं उनके बारे में बहुत कम ही विचार होगा।

जब आप वहां पहुंचेंगे तो आप बिकाउ नहीं, आप खरीददार होंगे।

और यकीन करें: लोग आप से घृणा करेंगे अगर आप पैसे की तुलना में आज़ादी को चुनेंगे। अगर आप सहानुभूति, ईमानदारी, सिद्धान्तों पर अड़िग रहने की अपने मूल्यों पर आधारित जिन्दगी जीना तय करते हैं। क्योंकि इससे आप उन्हें याद दिलाएंगे इन पहलुओं पर उनकी अपनी कमियों को व्यवस्था के बाहर बहुत अकेलापन है लेकिन आप को वही चाहते हैं।

हमारा हाशियाकरण हमें ऐसी ताकत प्रदान कर सकता है कि हम जो अन्य लोग हाशिए पर हैं उनके साथा हाथ मिलाएं और उनके साथ सहानुभूति कायम /empathise  / करें। ऐसे सभी लोग जिन्हें बेकार घोषित किया गया है जैसे अश्वेतों से लेकर धार्मिक अल्पसंख्यकों या गरीबों तक, यहां निश्चित ही गठजोड़ कायम हो सकता है।

हक़ीकत यही है कि न केवल यहां साझापन नहीं है बल्कि अपने समूचे इतिहास में नारीवाद भयानक नस्लवाद, समलैंगिकता विरोध, अन्धराष्ट्रवाद  और  सहानुभूति की कमी की भावना का शिकार रहा है। यह इसी बात को दर्शाता है कि नारीवाद के मुख्य धारा का लक्ष्य सत्ता में साझीदारी का रहा है न कि उसके विनाश का। लक्ष्य सत्ता में भागीदारी का रहा है न कि सत्ताधारी सत्ताविहीन के गतिविज्ञान को उजागर करने का रहा है।

हाशियाकरण होने के चलते हमें कम से कम इस बात के प्रति जागरूक होना चाहिए था कि व्यवस्था कैसे काम करती है। हमंे अन्य वंचित आबादी की स्थिति के बारे में जागरूक होना चाहिए था। इसके बजाय इसने हमें स्वार्थी बनाया। इसने हमें अपनी खुद की प्रगति, अपने खुद के हक़ पर अधिक केन्द्रित किया। अपने लक्ष्यों के बारे में जागरूक हुए बिना या अपने कामयाबी के प्रभावों को समझे बिना अपने स्वहित के लिए संघर्ष करना, आप को हीरो नहीं बनाता। आप को वह किसी अन्य स्वार्थी महत्वाकांक्षी व्यक्ति के समकक्ष खड़ा कर देते हैं।

इस वक्त़ महिलाएं अनोखी स्थिति में हैं। हम लोगों ने आधी दूरी तय कर ली है। सत्ताधारी/सत्ताविहीन के गतिविज्ञान के दोनों तरफ हम हैं। फिर यह बहुत आसाना होना चाहिए था कि हम इस दमनकारी व्यवस्था को दोनों तरफ से तोड़ देते।

अध्याय 5
सशक्तिकरण आत्ममुग्धता का दूसरा नाम है

एक ऐसी संस्कृति का दबाव झेलने के लिए जो हमें लगातार बताती रहती है कि महिलाएं सिर्फ शरीर हैं, सिर्फ सेक्स हैं, सिर्फ सम्पत्ति हैं, हम अपने विशिष्ट होने के विचार का निर्माण करते हैं। महिला होने के नाते हम स्वाभाविक रूप से पुरूषों की तुलना में अधिक सहदय, अधिक अनुरागी, हैं। जो अवमानना हमें झेलनी पड़ती है उसका इस विचार से मुक़ाबला किया जा सकता है।

वे सभी लोग जो हाशिये पर हैं उन्हें ऐसा करना पड़ता है। गठजोड़ बनाने होंगे, एक दूसरे का खयाल करना होगा। उन्हें कुछ विशिष्टताएं, कुछ गुण विकसित करने होंगे क्योंकि हाशियाकरण के अनुभव से बचने के लिए एकजुटता कायम करनी होगी। 

हमें हमारे उत्पीड़कों को समझाने का तरीका ढंूढना होगा ताकि वे हमें नुकसान न पहुंचायें, हमें मारे पीटें न । यह बात हमें चालाक बना सकती है।

लेकिन यह कोई अन्तर्निहित गुण नहीं है। दरअसल यह विचार कि महिलाएं स्वाभाविक तौर पर दयालु और केयरिंग हैं पुरूषों के साथ ही पैदा होता है। उन्होंने हमें घर तक सीमित करने के लिए बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया।
जेस्सा आगे कहती हैं कि मौजूदा समय में मैं देखती हूं कि कैसे महिलाएं महिला राजनेताओं के पक्ष में खड़ी हो जाती हैं। उनका समर्थन महज इसी बात से होता है कि वह जेण्डर साझा करती हैं। सैनिक हस्तक्षेप के समर्थन के लम्बे इतिहास के बावजूद यह कहते हुए कि वे हमें युद्ध से दूर रखेंगी, तमाम सामाजिक सेवाओं को समाप्त करने के बावजूद ये महिलाएं इन महिला राजनेताओं की समझदारी की बात करती हैं। अगर जेण्डर को उलट दिया जाए तो यह समर्थन वापस ले लिया जाएगा।

हमारी अपनी संस्क्रति से बचने के लिए हम अपने आप को यह कहानी बताते हैं, लेकिन कुछ कहानियां सहायक नहीं होती, वे महज उपकरण होती हैं।

इस अन्तरनिहित जेण्डर गुणों पर हमारा यकीन स्पष्ट तौर पर उस भाषा में दिखाई देता है जिसका इस्तेमाल हम पुरूषों और स्त्रिायों के परिस्थिति का वर्णन करने के लिए करते हैं। हम बिना सवाल उठाए पुरूषग्रंथी से निर्मित ‘‘समस्याओं’’ को सन्दर्भित करते हैं और अगर पुरूष कहें कि स्त्राीग्रंथी ‘‘समस्याओं’’ को निर्मित करती है तो हम गुस्सा हो जाते हैं। हम जहरीले पुरूषत्व को अन्तरनिहित मानना चाहेंगे और महिला व्यवहार की किसी समस्या को सामाजिक तौर पर गढ़ा हुआ मानेंगे। यह बहुत सुविधाजनक है।

इस बात पर यकीन करना कि महिला होना अपने आप में विशिष्ट है, यह पुरूषों का अमानवीयकरण करती है। हमारे अन्दर कुछ खास गुण हैं यानि दूसरे के अन्दर वह नहीं हैं।

किसी किस्म के समूह /जेण्डर, राष्टीयता, धर्म आदि/ के साथ अपने आप को जोड़ना ही सबसे आसान तरीका है खुद को सशक्त महसूस करने के लिए।

किसी समूह के लिए अपना अस्मिताबोध निर्माण करने का आसान तरीका है उस समूह के ‘‘विलोम’’ को खारिज करने का या उसे हल्का साबित करने का। अपने आप को दयालु दिखाने के लिए यह दिखाना होगा कि पुरूष हिंसक हैं। कोई भी ऐसी चीज़ जिससे आप दूरी बनाना चाहते हैं तो उसे आप अपने विरोधी के पहचान के साथ जोड़ सकते हैं। ‘‘मैं ऐसे समूह से जुड़ी हूं जो इसके विपरीत है और इसलिए मैं इसके विपरीत गुणों की वाहक हूं।’’

इसका मकसद बस यही होता है कि अपने को और अपने स्त्रोता समूह को अपनी अहमियत से अवगत करा दें। जब मन में कोई कमी लगे तो आप खुद को उस समूह बोध के साथ जोड़ कर उसे समाप्त कर सकते हैं जिससे आप पहचाने जाते हैं। राष्ट्रवाद संघर्ष के दिनों में मजबूती ग्रहण करता है। लोग गरीबी, बेरोजगारी कठिनाई झेल कर उसे ढंक कर अचानक राष्टवाद की परियोजना में शामिल हो जाते हैं। हमारा देश महान है.....। राष्ट्रवाद अपने आप में कोई बुरा नहीं है। खासकर तब जब किसी समूह को अपमानित और खारिज किया गया हो। वह ‘‘मूल्यवान’’ है यह कहना एक सार्थक कार्रवाई है।

नारीवादी इतिहास में यही सिलसिला चला आ रहा है, पितृसत्तात्मक व्यवस्था द्वारा स्त्राीत्व और विशिष्टताओं को जिस तरह खारिज किया गया है तो उन पर दावा ठोंकना है। 

ध्यान रहे कि यह बहुत आसान है कि दूसरे की अहमियत को कम करके अपनी अहमियत का एहसास करना। हम ‘‘वह’’ नहीं हैं ऐसे परिभाषित करने के बजाय अपने गुणों का लेखा जोखा प्रस्तुत करें। एक जेण्डर के तौर पर पुरूषों के प्रति आम घृणा बहुत विचलित करती है। दोष थोपने  की इस कार्रवाई के चलते हम न केवल पुरूषों की समग्र मानवता को देखने से इन्कार कर रहे हैं बल्कि अपनी खुद की मानवता को देखने से भी इन्कार कर रहे हैं।

लगता है किसी पुरूष अहंकार को पंक्चर करना गोया कोई सार्वजनिक सेवा हो। हम अपना मूल्य समझे बिना किसी केे मूल्य केा कम किए।

एक बार जब आप प्रस्तुत करने लगते हैं तो नुकसान करने की अपनी खुद की क्षमता की पड़ताल से आप बच निकलते हैं। अगर वे बुरे लोग हैं तो आप अच्छे लोग हैं और इसलिए आप जो भी करते हैं वह व्यापक हित के लिए होता है।
इसलिए राजनीतिक विमर्श में जो आप से असहमत होता है उसे तत्काल हिटलर घोषित किया जाता है। कोई फरक नहीं पड़ता है कि आप हिटलर के खिलाफ क्या करते हैं या क्या बोलते हैं ?

जब भी किसी से हम सुपीरियर महसूस करते हैं तो उस व्यक्ति की मानवता को हम छीनते हैं अपनी अहमियत के लिए। हमारा उत्पीड़न करने के लिए उन्हें हमारा अमानवीकरण करना पड़ा और हमने भी उनका अमानवीकरण किया, भले हम उनकी दया पर टिके थे। इस बात कोई फरक नहीं पड़ता कि हम उनके साथ क्या करते हैं, उनके बारे में क्या सोचते हैं ? हमारे मन में वे उत्पीड़क हैं और हम पीड़ित हैं।

यह ख़तरनाक होता है कि पीड़ित की मानसिकता के साथ अमानवीकरण का नज़रिया मिला दिया जाए। पीड़ित की यह मानसिकता कवच बन जाती है, इसलिए हमें यह पड़ताल नहीं करनी पड़ती कि हम कर क्या रहे हैं ?

कोई भी समूह जिसे कितना भी समय से उत्पीड़ित रखा गया हो वह बदले की भावना से ताकत ग्रहण करता है जिसे हम सोशल मीडिया के झुण्ड न्याय में घटित होते देख रहे हैं।

हमें अपने गुस्से या हिंसा की अपनी क्षमता पर सोचने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह पुरूषों की समस्यायें हैं। इसके बावजूद कि लगभग हर संघर्ष में महिलाएं मौजूद रही हैं। जब नागरिकों को निशाना बनाया गया, जब बम रखे गए उस वक्त भी मौजूद रही हैं। यह कहना कि उनके पास बोलने की क्षमता नहीं थी या पुरूष सहयोगी ने उनका ब्रेनवॉश कर दिया, एक तरह से अपने भीतर के अंधेरे से खुद को अलग करने का मतलब है उस पर से अपना नियंत्राण छोड़ रहे हैं।
पीड़ा को इस्तेमाल करने की प्रव्रत्ति मौजूद है। हमने झेला है, सहा है इसलिए स्वार्थी होने का हमारा अधिकार है। हम अपनी स्थिति बेहतर करने के पात्रा हैं क्योंकि हमने कितना झेला है।

महिलाएं जो सत्ता केन्द्रों तक पहुंच सकी हैं वे उन पुरूषों का अनुकरण करती हैं जो सत्ता पर कब्जा जमाए बैठे हैं। सत्ता हासिल करने के बावजूद उन्होंने अपनी चर्चाओं का फोकस सत्ताविहीनता ही रखा है।

जो सत्ता आप के पास नहीं है उसके बारे में शिकायत करना आसान है बनिस्पत यह कि आप अपने पास की सत्ता का इस्तेमाल कैसे करती हैं।

प्रकाशन उद्योग के उदाहरण से लेखक बताती हैं कि कैसे फरक सिर्फ यह है कि एक छोटा तबका बाहर के बजाय उद्योग में अन्दर आया है। उसने उद्योग को समतामूलक नहीं बनाया है क्योंकि वे व्यवस्था के निर्माताओं पर दोषारोपण करने में सक्षम हैं, उनकी अपनी कार्रवाइयों पर कोई सवाल नहीं उठता, भले वे असमानताओं को बनाए रखने की कोशिशों में जुटे हों।

महिलाएं मनुष्य हैं और वे मनुष्य की तरह काम करती हैं, मगर आज के समाज में पहचान पर ज्यादा जोर देना, एक महिला के रूप में पहले चिन्हित करना और दूसरे नम्बर पर मनुष्य के तौर पर समुदाय की भावना और गहरे में धंस जाती है।
यह बहुत स्वाभाविक है कि आप अपने संघर्ष से लाभान्वित होना चाहते हैं। आपने कमियों, कमजोरियों से, भेदभाव और अपमान से नुकसान झेला है। आप दूसरी तरफ से आकर अपने लिए एक दायरा बनाने में सफल रहे हैं। और अब आप चाहते हैं कि उसका भुगतान मिले। इसलिए जरूरी है कि अपने शक्तिहीनता पर फोकस रखें और दूसरों पर दोषारोपण करें। इस तरह हम अपने नए पोजीशन से लाभान्वित हो सकते हैं, बिना इस बात की पड़ताल के कि हम करते क्या हैं ?

हमने दशकों और शताब्दियों तक देखा है कि कैसे पुरूष अपनी पोजीशन के चलते लगातार लाभान्वित होते रहे हैं। जाहिर है हम भी वही चाहते हैं। वे हमारे आदर्श हैं, चीज़ों को करने का एकमात्रा तरीका पित्रसत्तात्मक तरीका हमने देखा है।
यह कहना आसान है कि जब हमारे पास बराबर की सत्ता आ जाएगी तब हम सबके समावेश के लिए काम करेंगे, जो स्थिति हमारे जीवन में घटित नहीं होनेवाली है। अगर हमने अपने पास की सत्ता का इस्तेमाल सिर्फ अपने लिए नहीं, सबके लिए किया हो तो हमें वह पुरस्कार नहीं मिलेगा जिसे हम चाहते हैं। हम वह जिन्दगी नहीं जी पाएंगे जैसा पुरूष हमेशा से जीते हैं।

खुद में बदलाव हो, इस पर केन्द्रित करने की कामना, खुद के सशक्तिकरण का विचार है, यह दुनिया को बदलने की अक्षमता का बोध है। एक तरह की शक्तिहीनता की भावना है कि आप अच्छा कर रही हैं तो दुनिया अच्छा कर रही होगी।
निराशा की यह भावना थकान से पैदा होती है। हमने समाज बदलने की, दुनिया बदलने की, व्यवस्था के अन्दर महिलाओं के लिए दायरा बनाने की बहुत कोशिश की। और वह काम पूरा नहीं हो सका क्योंकि वह हो ही नहीं सकता था। व्यवस्था तो हमें बाहर ही रखेगी। अब हमारे पास क्या नहीं है इस पर फोकस करना आसान है न कि हमें किस तरह बाधित किया गया इस पर फोकस करना। हम जो पाना चाहते हैं उसको पाने में हमारी अक्षमता मानना आसान है न कि हम गलत चीज़ ही चाहते हैं।

आत्मसशक्तिकरण हमें किस तरह अमानवीकरण, विशिष्टता, आत्ममुग्धता तक पहुंचा देता है इसका एक कारण यह है कि हम कामयाबी क्या है, सुख क्या है, जीवन का मतलब क्या है, इसको लेकर पित्रसत्तात्मक मूल्यों और परिभाषाओं के दायरे में काम कर रहे हैं।

समकालीन नारीवाद का अधिकतर सत्ता की भाषा का इस्तेमाल कर रहा है। लड़कियों को ‘‘सशक्तिकृत ’’ करना है, महिलाओं को ‘‘आत्मसशक्तिकरण’’ के लिए संघर्ष करना है , आखिर यह सत्ता किसके लिए इस्तेमाल होनेवाली है: लड़की जो भी चाहती है। एक ऐसी व्यवस्था में जो सफलता को पैसे से नापती है, उपभोक्तावाद और प्रतियोगिता को महत्व देती है, सहृदयता और समुदाय का अवमूल्यन करती है। इन लड़कियों और महिलाओं को क्या चाहिए यह पहले से घुटटी पिलाई गयी होती है।

ऐसा नारीवाद जो व्यवस्था को विकल्प नहीं दे सकता वह व्यवस्था का वाहक ही बनेगा।
सदियों से पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने खुशी को इसी तरह परिभाषित किया है कि कोई व्यक्ति आप की इच्छाओं के अधीन रहे।

हमें यही सीखाया गया है कि हम अधिक पैसे से खुश रहें, हम ध्यानाकर्षण के केन्द्र में रहें तो सुखी होंगे और हम सुखी होंगे। हमारा एकल परिवार हो, हमारा पार्टनर सहयोग करता हो।

हमारे पास अच्छा करने की क्षमता है मगर उसका अधिक इस्तेमाल नहीं कर सकते। अगर हम ‘‘अच्छा क्या है ’’ इसकी परिभाषा इस तरह करें कि ‘‘हमारे लिए अच्छा क्या है ?’’

अध्याय 6
वे संघर्ष जिन्हे हम चुनते हैं !

इस अध्याय में मोटे तौर पर देखें तो वे बताती हैं कि हम कैसे सुविधाजनक संघर्ष चुनते हैं। नारीवाद विशेष तौर पर इण्टरनेट नारीवाद के निशाने पर नारीद्रोह की व्यक्तिगत कार्रवाइयां हैं। पुरूष या स्त्राी के काम की जांच होती है और गलती पकड़ी गयी तो सज़ा सुना दी जाती है, संगठित प्रयास से उस स्त्राी या पुरूष को नौकरी से हटा दिया जाता है।

किसी ने अटपटा जोक सुना दिया या कोई कान्फेरेन्स में गलत टी शर्ट पहन कर चला गया और हैशटैग सर्कुलेट हो गए। नतीजा कि या तो उस व्यक्ति को झुकना पड़ा या कोई संस्थान अपने बहिष्कार या सार्वजनिक अपमान से बचने के लिए आननफानन में उस व्यक्ति को हटा कर दूसरे की नियुक्ति कर दी।

इस ‘‘गुस्से की संस्कृति '’ पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। किसी पुरूष को उसके मूर्खतापूर्ण कार्रवाइयों या अचेतन अभिव्यक्ति का खामियाजा भुगतना पड़े इसकी तुलना रोज ब रोज के सार्वजनिक जीवन में महिलाओं को जो झेलनी पड़ती है उससे नहीं की जा सकती है।

वे टिम हंट नामक नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक के बारे में एक किस्सा बताती हैं कि कैसे उन्होंने किसी सेमिनार में अपनी पत्नी को लेकर जोक सुनाया, किसी ने उस जोक का आधा अधूरा हिस्सा सोशल मीडिया में पेश कर दिया, जो वायरल हो गया, जिससे उस प्रोफेसर की ‘‘नारीद्रोह छवि’’ मीडिया में बनी। और अचानक उस प्रोफेसर का कोई दोस्त नहीं रहा। अचानक इस घटना के बाद ‘‘लिंच मॉब’’ ‘‘पोलिटिकल करेक्टनेस गॉन मैड’’ कहते हुए प्रोफेसर की बर्खास्तगी की मांग करने लगा।

लेखिका बताती हैं कि मेरी लापरवाही एक समस्या है, मैंने जब पहली बार घटना सुनी तो ध्यान नहीं दिया और यही सोचा कि यह श्वेत अहमक बूढ़ा आदमी  जिसे ऐसे पाला पोसा गया है कि महिलाएं दोयम दर्जे की होती हैं। लेकिन जब उस जोक का सन्दर्भ पढ़ा तो समझ में आया कि श्रोता समूह में पहले से घात लगा कर कोई बैठा था, जो उस प्रोफेसर को नीचे गिराने के लिए तैयार था। टिम ने मज़ाक किया था कि महिलाओ को पुरूषों के साथ प्रयोगशाला में काम नहीं करने देना चाहिए क्योंकि वे पुरूषों से प्यार करने लगती हैं और फिर उनका ध्यान बंट जाता है। इस सूचना से वह हिस्सा गायब कर दिया गया था कि इसी तरह उनकी अपनी पत्नी से मुलाकात हुई थी। रॉयल सोसायटी ने भी उनसे दूरी बना ली और उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।

यह सही है कि विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं को बड़े पैमाने पर नारीद्वेष झेलना पड़ता है और कैरियर के लम्बे दौर में बहुत सारा गुस्सा संचित हो जाता है। यह समझा जा सकता है। लेकिन इस पूरे प्रसंग में जिस व्यक्ति ने टिवटर पर हंट को निशाना बनाया वही सिर्फ जिम्मेदार नहीं है। उन संस्थानों पर गौर करें, जिन्होंने परिस्थितियों की समीक्षा किए बिना हंट से समर्थन वापस ले लिया। विश्वविद्यालय ने बिना आनाकानी के उन्हें नौकरी से निकाल दिया, सिर्फ एक ख़राब जोक सुनाने के लिए। क्योंकि बीते अतीत में ऐसी घटनाएं हुई होंगी जब देखा गया होगा कि कैसे ऐसा विरोध अचानक व्यापक रूप धारण कर लेता है। किस तरह एक गम्भीर चर्चा के लिए अब ‘‘गुस्सैल नारीवादी’’ एक बाधा बन गए हैं। हर उस महिला ने हंट पर केन्द्रित उस टिवट को रिटिवट किया और देखते देखते हंट का इस्तीफा मांगनेवालों की तादाद बढ़ गयी। यह ऐसा समूह था जो किसी के बारे में विवादास्पद सूचना साझा किए जाने पर यकीन करने को पूरी तरह तैयार थे। बिना जांच पड़ताल के कि वैज्ञानिक ने वास्तव में क्या कहा था, और उसका सन्दर्भ क्या था, लोगों को यह जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी उन्हें बस यही पता था कि निशाने पर एक श्वेत पुरूष वैज्ञानिक है, लिहाजा दोषी वही होगा।

वे आगे कहती हैं कि नारीवादी नीति का यह औपचारिक हिस्सा बन गया है। जब तक हम इस विनाशात्मक गतिविज्ञान में उलझे रहेंगे, हम किसी सकारात्मक काम में अपनी उर्जा कम खर्च करेंगे, हम भले समझते रहंे कि प्रतिशोध की व्यक्तिगत कार्रवाइयों से कुछ रचनात्मक कर रहे हैं। अधिकतर नारीवादी संस्क्रति इसके प्रति अनभिज्ञ रहती है कि यह बार बार दोहराये जाने वाला पैटर्न क्यों बन गया है और क्यों बदले की संस्क्रति लोगों की इतनी अच्छी लगती है।
हम लोग अपने मन में गहरे कहीं एक फेहरिस्त दबाए रहते हैं, हर प्रकार के अन्याय और असम्मान की सूचि, हर वक्त जब हमें शक्तिहीन बनाया गया और हम बोल नहीं पाए। यही वह सूचि है जो गुस्से की संस्क्रति को ताकत देती है। यह एक सुविधाजनक गुस्सा है। आत्मपरीक्षण के कठिन काम से बचने के लिए हम इसका इस्तेमाल करते हैं।

हम भूल जाते हैं कि बाकी लोगों के पास भी अपनी सूचि होती है क्योंकि हमन9े उनके साथ जो किया है, अन्य नस्लों के लोग, अन्य देशों के लोग, अन्य यौनिकता के लोग।

हम अपने अन्दर के पूर्वाग्रहों / नस्ल, अंध राष्ट्रवाद , समलैंगिकता विरोध/ उन लम्हों को छिपाते हैं, शर्मिन्दा होते हैं, ऐसे अस्तित्वों से इन्कार करना हमें मौका देता है, ऐसे लोगों पर फैसला सुनाने का जिनका अपने स्याह कोनों पर कम नियंत्राण है। हमें यह समझना होगा कि नारीद्रोह की अन्तर्वस्तु व्यक्ति के दिल में नहीं होती बल्कि जिस तरह की हमारे समाज की संरचना बची है उसमें होती है। एक व्यक्ति के बाद दूसरे पर फोकस करना उतना ही प्रभावी होगा जितना आप के पूर्वाग्रहों के लिए आप से कोई सम्पर्क साधे। हम अपने आप को कितना भी शुद्ध करने की कोशिश करें, अन्तर्वस्तु बनी रहेगी जब तक कि मूल स्त्रोत पर केन्द्रित न करे।

इस कड़ी मेेहनत के लिए हम लोग उत्साहित नहीं रहते क्योंकि हम अपनी सूचियों पर कुछ ज्यादा ही समय बीता रहे हैं। क्रोधित नारीवाद उस आग की तरह होती है जो आंख के बदल आंख की मांग करती है। यदि हम उसे बढ़ावा देते हैं तो हम बर्बाद हो जाएंगे।

व्यवहार के पैमाने पर जिन्हें आप चाहें तो पोलिटिकली करेक्ट कह सकते हैं, जरूरत है कि हर कोई मानवता के कुछ अपेक्षाओं को पूरा करे। अगर उन पैमानों का हिंसा या घ्रणा के जरिए गम्भीर रूप से कोई उल्लंघन नहीं करता हो तो उसे निश्चित सज़ा मिले लेकिन मानवता के कुछ अपेक्षाओं पर कोई खरा नहीं उतरता है तो आप उससे असहमत हो सकते हैं लेकिन उसे निर्वासित नहीं कर सकते हैं। उनकी कार्रवाई एक बहस को जनम दे सकती है।

विरोधी होना अच्छा लग सकता है, ‘‘मैं अन्दर हूं, आप बाहर हों’’ ऐसा क्लब बनाना अच्छा लग सकता है, लेकिन ऐसा चिन्तन, बोलने और लिखने की कोई अहमियत नहीं होती। किसी व्यक्ति को सिर्फ श्वेत पुरूष /उच्च जाति यहां/ के रूप में खारिज करना अपने आप को विचारक की श्रेणी में नीचे गिराना है। घिसी पीटी बातो ंको दोहराते जाना न्यूनीक्रत करना है।

हमें इस बात पर भी सोचना होगा कि आखिर हम किस प्रकार के बौद्धिक वातावरण में रहना चाहते हैं। ऐसा वातावरण जहां असहमति और विविध विचारों का दमन होता हो, जहां भाषा और परिभाषा पर इतना जोर दिया जा रहा हो। वहां नारीवाद सतही हो जाता है, जब छोटी मोटी असहमतियों को भी हमले के रूप में देखा जा रहा हो, वहां जटिल विचारों को लोगों तक पहुंचाने में लेखकों को कोई जगह नहीं मिलता है।

हमें कोई चुनौती नहीं दे, हम सहमति रखने वालों से घिरे रहें, यह विचारों के अवमूल्यन में परिणत होगा। सदियों से पुरूषों ने बातचीत पर नियंत्राण और वर्चस्व बनाए रखा है, इसके बहाने के रूप में इस्तेमाल कर यह औचित्य प्रदान नहीं करता कि हम उन्हीं पद्धतियों का इस्तेमाल कर नियंत्राण अपने हाथ में ले लें।

अगर हम बेहतर दुनिया बनाना चाहते हैं तो हमें बुनियाद भी अलग डालनी होगी। उस बुनियाद से काम नहीं चलेगा जिस पर पितृसत्ता खड़ी है। अधिकतर महिलाएं अधिकतर पुरूषों से बुनियादी तौर पर भिन्न नहीं होती हैं। हमारे सामने खतरा रहता है कि हम दुनिया को इण्टीरियर डिजाइनर के अन्दाज़ में बदल सकते हैं, बुनियादी ढांचा वही है। गुस्से के चक्र से दूर जो अच्छा लगता है लेकिन कुछ ठोस होता नहीं है।

शायद एक दौर था जब किसी व्यक्ति के हरकतों को चिन्हित करने से कोई बहस शुरू हो सकती थी। लेकिन अब गुस्से को एक तत्काल समाधान के रूप में देखा जाता है - एक व्यक्ति को नौकरी से हटा दिया जाता है तो दूसरे को टवीटर से हटा दिया जाता है, तीसरे को माफीनामा देने पर मजबूर किया जाता है - और लोग अब चुप रहना सीख गए हैं। यौनवादी जोक/चुटकुले नहीं सुनाने का मतलब यह नहीं है कि अन्तर्निहित यौनवाद अब अस्तित्व में नहीं है। लोग अपने पूर्वाग्रहों को छुपाने में अब अधिक चतुर हो गए हैं।

व्यक्तिगत नारीद्वेष लक्षण है न कि कारण। एक समय में एक व्यक्ति से निपटते रहने से दुनिया के नारीद्वेष का स्तर घटता नहीं है। जिस व्यवस्था में हम रह रहे हैं वह प्रतियोगिता और हिंसा को पुरस्क्रत करती है, वह व्यवस्था सहदयता और देखभाल का अवमूल्यन करती है, वह तब तक नारीद्वेष पैदा करती रहेगी जब तक हम उसको सम्बोधित नहीं करेंगे।

समग्र ढांचे से संघर्ष करने का मतलब यह भी हो सकता है कि हम अपनी पूरी जिन्दगी में सच्ची सफलता न देख पाएं। और प्रगति इतनी धीमी हो कि हम शायद ही उसे महसूस कर पाएं।

गुस्से की संस्कृति अनुत्पादक होने के बावजूद अच्छी इसलिए लगती है कि वहां कम से कम जीतने की हमें उम्मीद दिखती है। अगर हम एक शत्राु को समाप्त कर दे, अगर किसी एक व्यक्ति के दिल के यौनवाद को समाप्त कर दे, इसका मतलब यह हुआ कि हमने दुनिया को थोड़ा सुधारा। यह उपलब्धि लग सकती है लेकिन दूसरा व्यक्ति तत्काल उसकी जगह ले

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