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Friday, April 27, 2018

बच्चियों पर बलात्कार के लिए फांसी का सवाल: नहीं समझी गयी अध्यादेश से पहले आकलन या शोध की जरूरत !

-अंजलि सिन्हा


दिल्ली उच्च न्यायालय ने केन्द्र से पूछा है  कि 12 साल से कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार के दोषी को मौत की सज़ा के लिए अध्यादेश लाने से पहले क्या सरकार ने कोई अध्ययन या वैज्ञानिक आकलन किया था ? यह सवाल कोर्ट ने एक पुरानी याचिका की सुनवाई के दौरान की थी जिसे मधु किश्वर ने 2013 के बलात्कार सम्बन्धी कानून संशोधन पर दायर किया था। पीठ ने सरकार से पूछा कि मौत की सज़ा क्या बलात्कार की घटना को रोकने में कारगर साबित होगी ? क्या अपराधी पीड़ितों को जिन्दा छोड़ेंगे ? सबसे अहम बात कोर्ट की यह टिप्पणी है कि ‘‘सरकार असल कारणों पर गौर नहीं कर रही है, न ही लोगों को शिक्षित कर रही है।’’ पीठ ने बताया कि दोषियों में अक्सर 18 साल से कम उम्र का पाया जाता है और ज्यादातर मामलों में दोषी-परिवार या परिचित में से कोई होता है। वैसे यह बात सरकार को ही स्पष्ट होनी चाहिए थी कि अगर वह नया कानून बना रही है तो इसके पक्ष में उसके पास क्या तर्क हैं और क्या अध्ययन हैं जिन्हें वह पेश करती सकती है।

अपराध के आंकड़ों में बताया गया है कि चार में से एक अपराधी को सज़ा होती है। पुलिस यह भी कहती है कि बलात्कार के दस मामलों में चार झूठे होते हैं, जबकि यह आकलन भी किया जाता है कि बलात्कार के सौ मामलों में चार ही केस दर्ज होते हैं। 2016 में नेशनल क्राइम रिपोर्ट ब्युरो के अनुसार 2016 में बच्चों के साथ बलात्कार के 64,138 मामले उजागर हुए/इंडियन एक्स्प्रेस, 22 अप्रैल 2018/ रिपोर्ट यह भी बताती है कि सज़ा की दर महज 3 फीसदी रही और 94 फीसदी अभियुक्त परिवार से जुड़े था या जानकार थे। 

सरकार ने आपराधिक कानून /संशोधन/ अध्यादेश 2018 के माध्यम से 12 साल से कम उम्र के बच्चियों से बलात्कार के दोषियों को मौत की सज़ा का प्रावधान रखा है। 16 साल से कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार के मामले में सज़ा 10 से बढ़ा कर 20 साल8 कर दी गयी है तथा इसे जीवनपर्यन्त भी दी जा सकती है।

निर्भया केस के बाद भी देश भर में फैले रोष तथा जनता का दबाव देख कर कानून को सख्त बनाया गया था, लेकिन अब जब उसको लागू हुए पांच साल बीत गए हैं तो हम असर का मूल्यांकन आसानी से आंकड़ों के आधार पर कर सकते हैं। अगर हम नवम्बर 2011 में नेशनल क्राइम्स रेकार्ड ब्युरो द्वारा प्रकाशित आंकड़ों पर गौर करेंगे तो विचलित करनेवाली स्थिति बन सकती है। ब्युरो के मुताबिक विगत 40 सालों में महिलाओं के खिलाफ अत्याचारों की संख्या में 800 फीसदी इजाफा हुआ है, दूसरी तरफ इस दौरान दोषसिद्धी अर्थात अपराध साबित होने की दर लगभग एक तिहाई घटी है। 

एमनेस्टी इंटरनेशनल, इंडिया के कार्यकारी निदेशक बताते हैं कि भारत में विगत साल बलात्कार के 38,947 मामले दर्ज हुए जबकि बच्चों के खिलाफ अपराध के 1,06,000 मामले दर्ज हुए। (http://www.rediff.com/news/column/will-hanging-rapists-stop-rape/20180417.htm) भारत में सरकारी आंकड़े यहीं कहते हैं कि यौन अत्याचार के 99 फीसदी पीड़ित पुलिस के पास शिकायत लेकर जाते नहीं हैं। इतनाही नहीं अपराधियों में से महज एक फीसदी जेल जाते हैं।

यह स्पष्ट है कि आंकड़े बढ़े हैं और इसकी एक वजह यह बतायी जाती है कि महिलाओं में जागरूकता आने के कारण अब वे शिकायत लेकर अधिक संख्या में पहुंच रही हैं। हर अपराध की शिकायत दर्ज हो तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन आंकड़ों के जाल से परे जाकर भी यह सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि यौनिक हिंसा की घटनाओं में कमी नहीं आ रही है। कहीं बस में अश्लील हरकत का विडियो जारी कर लड़की दोषी पर कार्रवाई की अर्जी लगाती है तो कहीं किसी महिला के घर के सामने अश्लील हरकत करते व्यक्ति का सीसीटीवी फूटेज मीडिया में सामने आता है। रोज बरोज यह छोटी हरकत माने जानेवाले अपराधी सुरक्षित वातावरण में विचरण नहीं करने देते तो इन्हीं में से कुछ ‘बडे़ अपराध’ माने जानेवाले बलात्कार के लिए भी साहस जुटा लेते हैं। एक तरफ परत दर परत पैठी यौनिक कुंठाएं हैं तो साथ ही पौरूषपूर्ण होने का बोध। वे ताकतवर है इसका एहसास उन्हें होता है। पूर्व केन्द्रीय मंत्राी पी चिदम्बरम साहब भी अपने कॉलम /जनसत्ता 22 अप्रैल 2018/ में यही बताते हैं कि ‘‘बलात्कार की वजह सेक्स नहीं है। कोई किसी बच्ची या महिला से जोर जबरदस्ती करके यौनसुख कैसे हासिल कर सकता है ? बलात्कार का सम्बन्ध स्त्राी पर खास कर स्त्राी के शरीर पर पुरूष की सत्ता से है। सेक्स और ताकत से आगे जाकर अपराधी के उस आत्मविश्वास को समझना होगा जो कि सारे आत्मनियंत्राण को हटा देती है। आरोपी को यह एहसास रहता होगा कि वह अपराध कर रहा है, पर साथ साथ उसे यह भरोसा भी रहता होगा कि वह अपने शिकार से बहुत ताकतवर है। वजह सज़ा से बच जाएगा ...’’ 

अब जब यह बार बार स्पष्ट हो चुका है कि बलात्कार के आरोपियों में सबसे अधिक जानकार, रिश्तेदार या परिवार का कोई सदस्य ही शामिल है तो सहज सोच सकते हैं कि शिकायत दर्ज कराने में कितनी बाधाएं आएंगी। दूसरी बात कि 12 साल की उम्र में विरले ही कोई बच्ची इतना साहस करे कि थाने स्वयं शिकायत दर्ज कराने पहुंचे। माता पिता कितने जागरूक और इस स्थिति में हैं कि दबावों का मुकाबला करने का संकल्प लेंगे। जहां कोई अपरिचित घटना में शामिल होगा वहां तो फिर भी शिकायत दर्ज कराने घरवाले पहुंच सकते हैं। इस सन्दर्भ में यह भी ठीक से समझने की जरूरत है कि शिकायत आसानी से और नजदीक में ही दर्ज हो तथा सुनवाई प्रक्रिया बेहद सरल और तेज हो। इसके लिए प्रावधान तो फास्ट टेक कोर्ट के नाम से हुए थे, लेकिन उसकी हालत भी आसानी से देखी जा सकती है। जब इन्फरास्क्टचर न हो, न ही पर्याप्त बजट हो और जो बजट मिले वह भी खर्च न हो जैसा कि निर्भया फंड पर सार्वजनिक हुई रिपोर्ट में देखा गया था, तो क्या नतीजा निकलेगा ?  फास्ट टेक कोर्ट के उपाय की तरह पहले वन स्टॉप सेन्टर खोले गए थे, लेकिन देश भर में उनकी क्या स्थिति होगी, इसका अन्दाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है।
  
दरअसल बलात्कार जैसे गंभीर तथा घ्रणित अपराध के लिए कानूनी समाधान तथा सज़ा के साथ साथ विभिन्न दूसरे स्तरों पर भी हस्तक्षेप जरूरी है जिसमें महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो। केस दर्ज करने में थाने के स्तर की चुस्ती के साथ साथ प्रशासनिक स्तर पर तत्परता और संवेदनशीलता की भी जरूरत है। यह पड़ताल करने की जरूरत है कि बलात्कार की मानसिकता बनती और विकसित ही क्यों होती है ? पिछले दिनों तमिलनाडु के राज्यपाल खुद महिला पत्राकार के साथ बेहद अशोभनीय आचरण के लिए विवादों में आए और उन्हें सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी पड़ी। मालूम हो कि किसी कालेज की टीचर द्वारा अपने छात्राओं को इस बात के लिए मजबूर करने पर कि वह अगर किसी के साथ यौनसम्बन्ध बना लेें तो उनके नम्बर बढ़ सकते हैं और मामला सूर्खियों में आने पर उसके द्वारा राज्यपाल के सम्बन्धों का हवाला देने के मसले पर ही यह प्रेस सम्मेलन बुलाया गया था जिसमें पत्राकार के प्रश्नों से असहज राज्यपाल ने खुद उसके गाल थपथपाए।

बलात्कार जैसी घटना घटने के बाद पूरे समाज का जोर बाद की प्रक्रिया पर रहता है, मगर क्या समाज का फोकस इस बात पर भी नहीं होना चाहिए कि समाज इस कदर जनतांत्रिक बने ताकि किसी के साथ जबरन यौन हिंसा की कोई ख़बर न आए। निश्चित ही यह दूसरावाला काम पहलेवाले काम से अधिक मेहनत एवं धैर्य की मांग करेगा क्योंकि वह सिर्फ सख्त सज़ा एवं सख्त कानून तथा बलात्कारियों का धिक्कार से परे जाकर नए समाज की भी बात करेगा। उसका काम बहुआयामी, बहुस्तरीय होगा जिसके नतीजे आनन-फानन में नहीं आएंगे। वह हर प्रकार की हिंसा के मनोवृत्ति के तथा परिस्थितियों के कारण की तलाश करेगा और जड़ से ही उसके निवारण के उपाय भी तलाशेगा। इसका मतलब यह नहीं है कि फौरी वाली जिम्मेदारियों से बचा जाए बल्कि वह तो अनिवार्यतः निभाना होगा। 

यौन ंिहंसा तथा बलात्कार के मामलों में यह फरक समझने की जरूरत है कि एक मसला यौन कुंठा, पुरूष होने की सत्ता, औरत के प्रति तथा  खासकर उसके शरीर के प्रति नज़रिये के कारण है तो दूसरा मसला राजनीतिक सत्ता, जाति, धर्म तथा समाज में मौजूद सत्तासंघर्ष में औरत को इस्तेमाल करने का है ताकि दबाव बनाया जा सके। उदाहरण के लिए हम देख सकते हैं कि निर्भया काण्ड समाज में मौजूद विक्रत सोच तथा यौनिक कुंठा का नतीजा था लेकिन कठुआ और उन्नाव काण्ड में प्रभावशाली लोगों ने दबाव बनाने के लिए बलात्कार को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया ।

इसी तरह देखें कि राजस्थान की भटेरी की भंवरी बाई - जो महिला सामाख्या कार्यक्रम में साथिन के तौर पर काम करती थी और बाल विवाह रोकने की मुहिम में जुटी थी - के साथ सामूहिक बलात्कार का काम यौनिक कुंठा के चलते नहीं बल्कि दबंग जाति ने अपने से कथित नीची जाति को औकात बताने के लिए, बालविवाह की शिकायत करने का साहस करने की ‘सज़ा’ के तौर पर किया था। इसी तरह पाकिस्तान की मुख्तरन माई को पंचायत ने सज़ा के तौर पर फैसला सुनाया कि पांच व्यक्ति उसके साथ बलात्कार करेंगे क्योंकि उसके छोटे भाई ने कथित तौर पर दूसरे समूह की महिला के साथ रिश्ता बनाने की कोशिश की है / जो सरासर झूठ ख़बर थी/। 

आखिर यह हमारे या हमारे पड़ोसी मुल्कों के समाजों में ऐसे फैसले क्यों सुनाये जा सकते हैं ? क्या किसी यूरोपीय मुल्क में या पश्चिम के किसी दूसरे देशों में ऐसा होता है ? ऐसा नही ंहै कि वहां यौन हिंसा नहीं होती हैं, मगर फिर भी इस तरह की घटनाएं नहीं होती हैं।

कुछ लोग सउदी अरब जैसे देशों का उदाहरण देते हैं जहां सज़ा सिर्फ सख्त ही नहीं बल्कि बर्बर भी होती है, जिसमें कई अपराधों में दोषी को सार्वजनिक तौर पर फांसी पर लटका दिया जाता है। अपराधी या बलात्कारी को मौत के डर से घटना को अंजाम देने से भले रोक लिया जाए / हालांकि यह बात भी विवादास्पद ही है/, लेकिन ऐसा कदम औरत को सम्मान और बराबरी का दर्जा नहीं दे सकता है। और ऐसा भी नहीं होता होगा कि वहां बलात्कार की घटनाएं घटती नहीं होंगी, लेकिन उनके दबा दिए जाने के लिए पर्याप्त वजहें मौजूद हैं। 

यह जानना महत्वपूर्ण है कि महिलाओं को सिर्फ यौन हिंसा से मुक्ति की जरूरत नहीं है बल्कि यह तो पहली सीढ़ी है। उसे तो पूर्ण अवसर, समानता और बराबरी चाहिए, वह सउदी अरब क्यों नहीं दे रहा। लोगों को अपनी शादी के सर्टिफिकेट लेकर घूमना पड़ता है यानि सिर्फ पति पत्नी ही साथ कही जा सकते हैं, डाइविंग के लिए, स्टुडियो में जाने के लिए महिलाओं को लड़ाई लड़नी पड़े, वे क्या पहने और क्या नहीं पहने इस पर उनका अख्तियार न हो, यही तो आलम है।

इसलिए मसला हमारी औरत की इज्जत या तुम्हारी औरत की इज्जत का नहीं है जैसा कि अक्सर हमारे यहां सुनाई देता है। गुजरात दंगे में हिन्दू औरतों की भूमिका भी मुस्लिम औरतों को उनकी हद बताने के लिए हिन्दु पुरूष उनका बलात्कार करते हैं तो उसके भी पक्ष में खड़ी हो सकती हैं। दलित पुरूष दलित महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा पर ‘‘हमारी औरतों की इज्जत’’ की बात करते हैं, लेकिन औरत होने के नाते वह उनके भी बराबर की नहीं होती हैं। हमारे यहां के कई इलाकों की पंचायतें ऐसा फैसला सुनाती रही हैं कि एक समुदाय की औरत की ‘‘इज्जत’’ का बदला दूसरे समुदाय के पुरूष उस समुदाय की महिला से बलात्कार से ले सकता है। सुदान के दारफुर इलाके में उठे हथियारबन्द संघर्ष में दमन के नाम पर जहां सुदानी फौज की सक्रियता दिखती आ रही है, मगर यह भी देखने में आ रहा है कि अरब गुरिल्ला सेनाओं का उसने साथ दिया है जिन्होंने दारफुर के गैरअरब इलाकों पर हमले किए। इस दौरान गैरअरब औरतें भयानक अत्याचार का शिकार हुईं। ज्यादा विचलित करनेवाली ख़बर तो यह है कि अन्दर अरब सेना या हथियारबन्द दस्ते गैरअरब अश्वेत महिलाओं पर अत्याचार कर रहे होते और बाहर अरब स्त्रिायां जश्न का माहौल बना कर रखती। 

हमारे प्रधानमंत्राी ने पिछले दिनों ब्रिटेन में कहा कि बलात्कार की घटना देश के लिए शर्म की बात है। इसका मतलब यही हुआ कि इज्जत पर आंच नहीं आती तो यह चल सकता है। महिलाएं अपने परिवार की, अपने समुदाय या जाति की और फिर देश की इज्जत हो जाए तो उन्हें महज इसीलिए बक्श दिया जाना चाहिए क्योंकि इससे वे जहां की हैं उसकी इज्जत चली जाएगी।

जो समाज अपने अंदरूनी मूल्यों को ठीक नहीं करता वहां बाहरी आधुनिकता भी पैर की जंजीर और उत्पीड़न का औजार बन जाती है। अब शादी से पहले साथ रहना, छोटे बड़े शहरों में भी आसानी से दिखता है। साथ रहना तो लोगों का निजी मसला है। लेकिन देखना यह है कि हमारे समाज में शादी का झांसा देकर बलात्कार एक बड़ा मुददा है। और हाल में ऐसे मामलों में बलात्कार का केस दर्ज करने को लेकर खुद अदालत ने आपत्ति जतायी क्योंकि यह सम्बन्ध सहमति से बनाए गए होते हैं जो कि सच है। बलात्कार का केस तो जबरन बनाए गए सम्बन्ध पर होता है, लेकिन इस तरह के धोखाधड़ी के मामले में औरत क्या शिकायत करे कि उसके पार्टनर को अचानक उसके माता पिता की इच्छा, जाति समुदाय की इज्जत का खयाल आ जाता है। सम्बन्ध टूट सकते हैं यह तो माना जा सकता है लेकिन जितनी आसानी से लड़के वापस जाकर घरवालों की इच्छा से अपनी शादी रचा लेते हैं वह दरवाजे उनके पूर्व पार्टनर के लिए वैसे ही खुले नहीं होते हैं। शादी जैसे आडम्बरों से बचने के लिए यदि जोड़े साथ साथ रहे तो बहुत अच्छा लेकिन तब झांसे की शिकायत तो कमसे कम नहीं आएगी। लीव इन रिलेशनशिप को कोर्ट से मान्यता मिलना समाज को एक कदम आगे ले जाता है लेकिन हमारे जैसे पिछड़े और पौरूषपूर्ण समाज में वह भी औरत के खिलाफ इस्तेमाल होता है। अपराधों की शिकायत के आधार पर यह रिपोर्ट कुछ समय पहले मीडिया में आयी थी कि लिव इन में रह रही महिलाएं हिंसा की अधिक शिकार होती हैं। परिवार और समाज से जो सहयोग शादी वाली औरत को मिलता है वह इस औरत को नहीं मिलता है।

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