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Saturday, March 31, 2018

स्त्री: अग्निपरीक्षा जारी है

अंजलि सिन्हा

देश के कुछ रेलवे स्टेशनों का जिम्मा अब पूरी तरह महिला कर्मचारियों को सौंपा गया है, जहां अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक सभी कर्मचारी महिलाएं हैं। यह भी कहा जा रहा है कि देश भर में ऐसे रेलवे स्टेशनों की संख्या बढ़ाई जाएगी जहां के देखरेख से लेकर सभी अन्य कामों की कमान महिलाओं के हाथों में होगी। 

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के बहाने जब भारतीय रेलवे जेण्डर समानता के प्रति अपना सरोकार उजागर करना चाह रही थी, इस ख़बर को प्रचार माध्यमों ने काफी वरीयता दी थी। मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र का  नई अमरावती स्टेशन, मुंबई के सबर्बन सेक्शन का माटुंगा रोड स्टेशन, नागपुर के पास का अजनी स्टेशन, तिरूपति के निकट का चंद्रगिरी स्टेशन और जयपुर के पास का गांधीनगर स्टेशन आदि उन स्टेशनों की सूची में शामिल हुए हैं - जहां स्टेशन मास्टर्स से क्लीनर्स तक, गार्ड से लेकर सिग्नलिंग कर्मियों तक - सभी कर्मचारी महिलाएं हैं। लगभग 91 हजार महिलाओं को नियुक्त करनेवाले भारतीय रेल के प्रबंधन की तरफ से अपनी 68 डिवीजन्स को निर्देश दिया गया है कि वह कमसे कम एक स्टेशन चिन्हित करे, जहां सभी कर्मचारी महिलाएं हों। इतनाही नहीं कुछ टेनों में सभी ट्रेवलिंग टिकट एक्जामिनर्स भी अर्थात टीटीई भी महिलाएं होंगी। प्रायोगिक तौर पर झारखंड की बरकीछापी से तोरी पैसेंजर, कोयना एक्स्प्रेस और मुंबई से पुणे के बीच चलनेवाली डेक्कन क्वीन में यह सिलसिला शुरू हो गया है।

अब सभी की निगाहें इन स्टेशनों पर होंगी कि कहां चूक हुई और यदि ना भी हुई तो वे वाह-वाह की पात्रा होंगी कि देखों कैसे बढ़िया से सम्भाला इन महिलाओं ने। फिर से वही सदियों पुराना राग दूसरे रूप में गूंजेगा हमारे वातावरण में कि या तो वह देवी है या दासी। या तो तारीफ में कसीदे पढ़ों या फिर कहो कि है तो आखिर औरत ही न। इन स्टेशनों पर तैनात महिलाओं के सामने लगातार चुनौती रहती होगी स्वयं को साबित करने की। वैसे हर नौकरी में अपनी क्षमता साबित करनी पड़ती है और वह जरूरी भी है लेकिन यह जेण्डर के आधार पर हो तो वह जेण्डर भेद बढ़ानेवाला ही होगा। बजाय इसके कि रेलवे अपनी भर्तियों में अधिकाधिक अवसर महिलाओं को दे और देश के हर स्टेशनों पर उनकी उपस्थिति बढ़े और इसी के साथ सभी स्टेशनों पर महिलाओं के अनुकूल /वूमेनफ्रेण्डली/  वातावरण का निर्माण हो सके वह अपनी संकीर्ण सोच का ही परिचय दे रहा है। अपने सहकर्मी के रूप में स्त्राी को स्वीकारना एक जरूरी मुददा है इससे दोनों का प्रशिक्षण होता है और दोनों सीखते हैं।

अगर अंतरराष्ट्रीय  महिला दिवस के अवसर पर आप उनसे हवाई जहाज उड़वा दें , टेन चलवा दें या इसी तरह कुछ और कर लें और महिलाएं ख़बरों में आ भी जाएं तो वह प्रतीकात्मक रूप में सन्देश देने के लिए तो ठीक है, दूसरी महिलाओं में फील गुड की भावना आ सकती है कि वाह हम महिलाएं क्या नहीं कर सकते हैं बशर्ते की हम चाहें। यानि समस्या तो हमारे चाहने की है। इन प्रतीकात्मक कामों के माध्यम से जो समान अवसर मिलने का मुददा है, वह कैसे सम्बोधित होगा ?

यदि हम इसके पहले के कुछ निर्णयों पर गौर करें तो यह जायजा ले सकते हैं कि ऐसे कदमों ने महिलाओं की समस्या पर किस हद तक अथवा असर डाला ? महिला थानों के बारे में हम सभी ने सुना है। व्यक्ति अपराध का शिकार होने पर या अपनी कोई शिकायत लेकर थाने जाता है। किसी भी स्त्राी को जब ऐसी जरूरत आए तो वह स्त्राी नजदीकी थाने में जाएगी या महिला थाना ढंूढेगी। दूसरी बात, किसी भी पद पर बैठा व्यक्ति वह सरकारी सेवा प्रदाता होता है और उसे अपनी डयूटी निभानी होती है, इसलिए सुनिश्चित यह किया जाना चाहिए कि शिकायतकर्ता की शिकायत बाकायदा नियम के तहत सुनी जाए। रही बात थानों को महिलाओं के लिए सहज अनुकूल बनाने की तो सभी थानों मे ंउनकी संख्या पुरूषों के लगभग बराबर की जानी चाहिए। यह बात बैंकों पर भी लागू होती है। बैंकिंग में तो जितने तामझाम और डंका पीट कर महिला बैंक खोला गया था उसे धीरे से वापस ले लिया गया और पता भी नहीं चला कि वजह क्या थी ? छिटपुट यही चर्चा चली कि इसकी कोई जरूरत नहीं थी। 

महिलाओं के लिए असुरक्षित वातावरण जब चिन्ता का विषय बन जाता है तो भी ऐसे ही सतही समाधान पेश हो जाते हैं, मसलन उनके लिए अलग टेन चलवा दो, मेटरो में अलग बोगी लगवा दो, उन्हें रात के शिफट मे काम ही नहीं करना चाहिए। इस सोच की शाखाएं हम अन्यत्रा भी आसानी से देख सकते हैं जैसे महिलाओं के लिए अलग से इंजिनियरिंग कालेज खोलने की। कुछ स्कूलों में अपने आप ही लड़के लड़कियों के लिए क्लासरूम में अलग बेंचों की पंक्ति बन जाती है। और तो और कई बार अलग गर्ल्स स्कूल कालेज के लिए उसे आधुनिक नारीवादी जामा पहना दिया जाता है कि यह महिलाओं, लड़कियों के लिए चॉइस का मामला है कि वह गर्ल्स कालेज में सुकून से लिखना पढ़ना चाहे तो उन्हें यह चुनाव का ‘‘अधिकार’’ है। संभव है कि कहीं से यह ‘‘महान’’ विचार आए कि सभी सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के लिए कुछ स्थान अलग से घेर दिए जाएं और वह उनके लिए आरक्षित हों जहां वह सुरक्षित महसूस करें। माहौल को असुरक्षित बनानेवाले पुरूष अपने लिए जगह तलाशें और जो इस सुरक्षित बनाए गए घेरे से बच गए हैं, उन्हें शिकार बनाए। ऐसी मानसिकता, जहां जिन स्त्रोतो ंसे बनती है उस पर विमर्श की, काम और नीति बनाने की फिर जरूरत नहीं होगी।

अन्त में सवाल यह है कि क्या महिलाओं के लिए अलग जोन देकर, काम देकर उन्हें अग्निपरीक्षा मोड में डालें या समूचे समाज में जेण्डर समानता बढ़ाने की दिशा में कदम उठाएं।  

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