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Thursday, December 27, 2018

निजी ही सार्वजनिक है!

- अंजलि सिन्हा

कुछ मायने में यह दौर अजीबोगरीब है। एक तरफ ‘निजी’ अत्यन्त महत्वपूर्ण होता जा रहा है, उसका दायरा बढ़ता जा रहा है, दूसरी तरफ निजी का सार्वजनिक जीवन में और सार्वजनिक का निजी मामलांे में हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। देखिये, महेन्द्रसिंह धोनी की पत्नी ने अपना एक निजी फोटो इन्स्टाग्राम पर पोस्ट किया जिसमें धोनी किसी चप्पल की दुकान में पत्नी के सैंडिल का फीता बांध रहे हैं। फिर तो प्रतिक्रियाओं की झड़ी लग गयी। किसी ने मि धोनी को अच्छे पति होने की बधाई दी तो किसी ने दोनों के प्यार की बातें कहीं। कइयों ने धोनी की भर्त्सना की कि उन्हें पत्नी को सीख देनी चाहिए। लोगों ने कहा कि धोनी युवाओं के फैन हैं और इससे गलत संदेश जाता है, आखिर साक्षी ने धोनी से ऐसा बदला किस बात का लिया आदि। बेकार की तारीफ या भर्त्सना में लोगों ने अपना समय गंवाया।

Thursday, December 20, 2018

बदलो मगर अन्दर से ! नए अभियान, नए प्रश्न

- अंजलि सिन्हा

पिछले कुछ समय से भारत में मी टू अभियान की चर्चा चल रही है। 

इस अभियान के बाद इसके असर को लेकर कुछ सर्वेक्षण रिपोर्ट भी आए हैं और मीडिया तथा सोशल मीडिया सभी जगह पर इसपर विश्लेषण और लेख भी प्रकाशित हुए हैं। इस अभियान की सार्थकता तथा कमजोरियों दोनों पर काफी बातें हो चुकी हैं अब तक। एक रिपोर्ट मार्केट रिसर्च एण्ड एनालिसिस कम्पनी वेलोसिटी एम आर द्वारा कराए गए अध्ययन पर / जागरण, 30 नवम्बर 2018/ आयी है जिसके मुताबिक इस अभियान के कारण कार्यस्थल पर औपचारिक सम्वाद में बदलाव आया है। इस अध्ययन में दिल्ली, मंुबई, बेंगलुरू, कोलकाता, हैदराबाद तथा चेन्नई के लोगों ने हिस्सा लिया। इसमें पाया गया कि 80 फीसद पुरूषों ने महिला सहकर्मियों से संवाद में सतर्कता बढ़ा दी है।

Wednesday, December 12, 2018

How Begum Rokeya — India's first Bengali Muslim feminist — dared women to dream


-Suman Quazi 
Sometimes when wars are long and without any imminent hope of triumph or an end, it's best to count on the smaller victories. Such as the taking down of Omprakash Mishra's misogynist cringe-pop video or Uber apologising for their presumptuous and sexist offer on "Wife Appreciation Day" or Hulu's The Handmaid's Tale bagging the Emmy for "Best Drama Series" leaving behind popular shows like Westworldand Stranger Things.
The Handmaid's Tale is to feminists what the BJP manifesto is to Arnab Goswami. Though Margaret Atwood's evergreen dystopian thriller published in 1985 was one of its kind, it wasn't the first. Eighty years before that, Begum Rokeya Sakhawat Hossain published her feminist utopian fantasy Sultana's Dream, a novella investigating the ironies of a technologically advanced, gender-reversed India (one where men were confined to the "zenana" — the part of a house for the seclusion of women, or as Rokeya terms it, the "mardana" — imagined in the dreams of a woman named Sultana.
begum-rokeya-main_092017104842.jpgRokeya Begum was an educationist, writer, social activist and effectively, India's first Bengali Islamist-feminist.

Wednesday, December 5, 2018

‘I finally found courage to speak’: Widowed women farmers come to Mumbai to demand their rights

- Mridula Chari

Maharashtra gives widows a pension of Rs 600. But only 34% of women farmers surveyed receive this


Six months ago, Kamalabai Dalve had gone with her husband to work on their two acres of land in Latur district in central Maharashtra. In the evening, he told her to return home to bring him some bhakris. While she was away, he swallowed poison and died. “He did not tell me that he was thinking of doing this at all,” Dalve said. “For two years nothing had come from our farm and we had taken loans worth Rs 2 lakh to Rs 3 lakh.”
Dalve is one of around 80 women, all widowed, who came to Mumbai on Wednesday from districts in Maharashtra’s Marathwada and Vidarbha regions to demand better pensions and greater support from the Maharashtra government. Their trip came just as the state is set to face another drought cycle, which already seems likely to be the worst since 2015-’16.


Tuesday, November 20, 2018

अकेले जिन्दगी बदल सकते हैं, दुनिया नहीं !

-अंजलि सिन्हा

अकेले अपने प्रयासों से अपनी जिन्दगी में बेहतरी लाना, आत्मविश्वासी बनना तथा बहुत कुछ हासिल कर लेना भी बहुत अच्छा होता है। वह एक प्रकार से उपलब्धि बोध का एहसास कराता है। खासतौर से ऐसे समाज और ऐसे समय में जब महिलाओं के लिए तमाम प्रकार के बन्धन और वर्जनाएं हों। 

स्व को अधिकाधिक ‘‘लायक’’ सक्षम और सशक्त करते जाने का प्रयास हर व्यक्ति का अपना निर्णय और हक़ होता है। जैसे जैसे हम उपरी पायदान को हासिल करते जाते हैं हमें सुकून तो मिलता है लेकिन फिर अधूरापन भी लगता है कि हम तो उसके उपर वाले और फिर उसके भी उपरवाले के काबिल हैं, हमारी तुलना में कितने फिसडडी लोग कहां कहां पहुंच जाते हैं आदि। फिर इस एहसास से बेचैन होकर फिर से और सशक्त होने के प्रयास में जुट जाते हैं।

लेकिन यदि पूरे समाज में औरत की हैसियत और बराबरी के लिए वातावरण तैयार करना है तथा ऐसा देश और समाज बनाना हो जहां औरत को अपने लिए स्थान तलाशने के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़े तो वह काम सामूहिक रूप से तथा संगठन बना कर करना होता है। इससे तुरन्त विजयबोध की अनुभूति नहीं होती, वह धीरे धीरे लम्बा चलनेवाला ऐसा काम होता है जिसका प्रभाव हो सकता है कि अपनी जिन्दगी में दिखे भी नहीं और इसके लिए हमारी मानसिक तैयारी भी होती है।

Friday, August 24, 2018

मैटरनिटी लीव लम्बी हो या छोटी !


तय करने का आधार क्या हो ?
- अंजलि सिन्हा

पिछले साल सरकार ने मैटरनिटी लीव /प्रसूति अवकाश/ को 12 हफते से बढ़ा कर 26 हफता करने का फैसला लिया था। अब भारत सरकार के श्रम मंत्रालय ने कहा है कि वह एक सर्वेक्षण कराएगी जिसमें यह पता लगाया जाएगा कि मैटरनिटी लीव की अवधि बढ़ाने के कारण महिलाओं पर क्या असर पड़ा है ? बताया जा रहा है कि इसकी रिपोर्ट इसी साल के अन्त तक आएगी और संसद के अगले सत्र में इस पर चर्चा सम्भव है।

Wednesday, August 1, 2018

‘‘क्यों मैं एक नारीवादी नहीं हूं: एक नारीवादी घोषणापत्र’’

पुस्तक परिचय
‘‘क्यों मैं एक नारीवादी नहीं हूं: एक नारीवादी घोषणापत्रा ’’
- अंजलि सिन्हा
( Why I Am Not a Feminist : A Feminist Manifesto, Melville House, Brooklyn and London, February 2017)

जेस्सा क्रिस्पिन (Jessa Crispin) की यह किताब नाम के विपरीत एक खांटी नारीवादी किताब ही है। यह नारीवाद और नारीवादियों की अन्दर से / इनसाइडर के तौर पर/ पड़ताल करती है। सम्भव है कि कहीं कहीं उनके विचार या दृष्टिकोण  से कोई असहमत हो, यह भी हो सकता है कि अमेरिकी समाज की पृष्ठभूमि में लिखी गयी इस पुस्तक की बातें कहीं कहीं अपने सरोकार की न लगें, लेकिन नारीवादी मुहिमों  और प्रयासों की सीमाओं तथा कमजोरियों पर ध्यान आकर्षित करने का काम वह बखूबी करती है। इसे हम नारीवादी आन्दोलन को मजबूत बनाने का प्रयास भी मान सकते हैं। वे सभी जो नारीवाद तथा स्त्राी मुददों से सरोकार रखनेवाले हैं, उन्हें इसे नए सिरेसे समझने सीखने के मकसद से इस किताब पर अवश्य निगाह डालनी चाहिए।

जेस्सा क्रिस्पिन एक आनलाइन पत्रिका ‘‘बुकस्लट’’ ( Bookslut )  और आनलाइन साहित्यिक जर्नल ‘स्पोलिया’ (Spolia ) की सम्पादक हैं। उनकी प्रकाशित किताबों के नाम हैं ‘‘द डेड लेडीज प्रोजेक्ट’ ( The Ladies Project ) और ‘‘द क्रिएटिव टैरट’’( The Creative  Tarrot)  । उनके आलेख तमाम अग्रणी प्रकाशनों में - जिनमें न्यूयॉर्क टाईम्स, द गार्डियन, द वॉशिंग्टन पोस्ट’ आदि शामिल हैं - प्रकाशित हुए हैं। 

किताब अंग्रेजी में हैं, वे सभी जो इसे मंगा कर पढ़ सकते हैं अवश्य पढ़ें, यहां प्रस्तुत है किताब का परिचय। इस पुस्तक में कुल 9 अध्याय हैं उसी क्रम में मैं यहां परिचय दे रही हूं:

Friday, April 27, 2018

बच्चियों पर बलात्कार के लिए फांसी का सवाल: नहीं समझी गयी अध्यादेश से पहले आकलन या शोध की जरूरत !

-अंजलि सिन्हा


दिल्ली उच्च न्यायालय ने केन्द्र से पूछा है  कि 12 साल से कम उम्र की लड़कियों से बलात्कार के दोषी को मौत की सज़ा के लिए अध्यादेश लाने से पहले क्या सरकार ने कोई अध्ययन या वैज्ञानिक आकलन किया था ? यह सवाल कोर्ट ने एक पुरानी याचिका की सुनवाई के दौरान की थी जिसे मधु किश्वर ने 2013 के बलात्कार सम्बन्धी कानून संशोधन पर दायर किया था। पीठ ने सरकार से पूछा कि मौत की सज़ा क्या बलात्कार की घटना को रोकने में कारगर साबित होगी ? क्या अपराधी पीड़ितों को जिन्दा छोड़ेंगे ? सबसे अहम बात कोर्ट की यह टिप्पणी है कि ‘‘सरकार असल कारणों पर गौर नहीं कर रही है, न ही लोगों को शिक्षित कर रही है।’’ पीठ ने बताया कि दोषियों में अक्सर 18 साल से कम उम्र का पाया जाता है और ज्यादातर मामलों में दोषी-परिवार या परिचित में से कोई होता है। वैसे यह बात सरकार को ही स्पष्ट होनी चाहिए थी कि अगर वह नया कानून बना रही है तो इसके पक्ष में उसके पास क्या तर्क हैं और क्या अध्ययन हैं जिन्हें वह पेश करती सकती है।

Saturday, March 31, 2018

स्त्री: अग्निपरीक्षा जारी है

अंजलि सिन्हा

देश के कुछ रेलवे स्टेशनों का जिम्मा अब पूरी तरह महिला कर्मचारियों को सौंपा गया है, जहां अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक सभी कर्मचारी महिलाएं हैं। यह भी कहा जा रहा है कि देश भर में ऐसे रेलवे स्टेशनों की संख्या बढ़ाई जाएगी जहां के देखरेख से लेकर सभी अन्य कामों की कमान महिलाओं के हाथों में होगी। 

Sunday, March 18, 2018

आम औरत पार्टी


- निघत गाँधी 

अंतराष्ट्रीय कामगर  महिला दिवस 2018 की शुरूआत करते हैं एक ऐसी सोच से जो अभी स्वप्न है इस सोच को हम क्रियेटिव सोच को हम अपने व्यवहार मे लायें। हम ऐसी दुनिया की परिकल्पना करे जहाँ हम सभी , प्रेम सौहार्द के साथ काम कर सके और शांति के साथ बिना किसी सरहद के बंधनो के अपने खूबसूरत एवं समृद्ध दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप मे घूम सके. और हमारी सत्ता की बागडोर होगी आम औरत पार्टी के हाथो..

Thursday, February 22, 2018

बाकियों की तुलना में दलित स्त्रियां जल्दी क्यों मर जाती हैं

-सुभाष गाताडे



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संविधान लागू होने के 68 साल बाद जब जाति, लिंग, नस्ल आदि आधारित हर किस्म के भेदभाव से मुक्ति का संकल्प लिया गया था और उसके लिए क़ानून भी बने थे. चंद ख़बरें ऐसी आती हैं जो उजागर करती हैं कि हम वहीं क़दमताल कर रहे हैं. चीजें बदस्तूर वैसी ही चल रही हैं.

Thursday, February 15, 2018

बजट में स्वास्थ्य बीमा योजना- फायदा आम आदमी का या बीमा कम्पनियों का ?

-अंजलि सिन्हा


आम बजट में घोषित सरकार की स्वास्थ्य बीमा योजना - जिसमें 10 करोड़ परिवारों को 5 लाख राशि का स्वास्थ्य बीमा देने की घोषणा हुई है - को अब तक की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना बताया जा रहा है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष ने इसे पासा पलटनेवाली योजना बताया तो वहीं सरकार के विभिन्न स्त्रोतों ने इस योजना के तहत स्वास्थ्य नीति में बड़े बदलाव का विवरण दिया है।