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Wednesday, February 15, 2017

प्रेम के लिए क्रांति और क्रांति के लिए प्रेम



प्रेम के विविध रंग!




एक तरफ बाज़ार, प्रेम को हीरे-मोतियों में तोल रहा है, चाकलेट में घोल रहा है। दूसरी तरफ प्रतिगामी,क्षुद्र और संकीर्ण ताकतें प्रेम से डरा रहीं हैं :- जिहाद के नाम पर, इज़्ज़त के नाम, संस्कृति और धर्म को बचाने के नाम पर !! ऐसे में प्रेम करना किसी युद्ध से कम नहीं।

१४ फरबरी को वैलेंटाइन दिवस के अवसर पर स्त्री मुक्ति संगठन, दिशा छात्र संगठन, स्त्री मुक्ति लीग ने मिल कर स्वराज विद्यापीठ, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में कार्यक्रम का आयोजन किया. कार्यक्रम में प्रगतिशील कविताये और गीत गाये गए. कबीर और फैज़ के गीत जो की प्रेम को एक नए नजरिये से देखने की बात करते है, गाये गए. कार्यक्रम में पाकिस्तान की मशहूर शायरा सारा शगुफ्ता की अमृता प्रीतम के नाम पत्र की नाटकीय प्रस्तुति की गयी. ये पत्र अमृता प्रीतम द्वारा एक थी सारा नाम से छपवाए गए थे.

 कार्यक्रम में स्त्री मुक्क्ति संगठन के पदमा ने कहा की प्रेम की सांस्कृतिक और राजनितिक जमीन जब प्रदूषित हो तो उसे साफ़ करना ही होगा. जब उत्तर प्रदेश में महिला सुरक्षा के नाम पर बीजेपी लव जिहाद और रोमियो स्क्वाड चला रही हो तो ऐसे समय में ये समझना ही होगा की कैसे ये सब औरतो को और गुलाम बनाने और पित्रसतात्मक नियंत्रण में रखने की राजनीती हैं.  WSS की तरफ से सीमा ने महिला सुरक्षा और राजनितिक दल के लोक लुभाविनी बातों से सावधान रहने की बात की.

ऐसे समय में जब प्रेम एक विवाद का मुद्दा बन गया है और हर कोइ इसे अपने अपने तरीके से या तो इसको वेस्टर्न मान कर या फिर चॉइस की बात कह कर क्लेम कर रहा है तो हमें ये सोचना होगा की इसमें महिलाओ की स्वायत आवाज़ कहाँ हैं. ऐसे समय में जब जिंदगी में प्रेम को स्त्री और पुरुष का के बिच का सम्बन्ध माना जाता है, तो हमें अन्य योनिक्ताओ और चॉइस के लोगो के अधिकारों का भी सम्मान करना होगा. जब चुनाव का आज़ादी की बात आती हैं तो हाँ कहने की आज़ादी के साथ-साथ ना कहने की आज़ादी की बात भी करनी होगी. रक्स के धेर्मेश ने कहाँ की पित्र्सत्ता आदमियों को भी उतना ही नुक्सान पहुचाती है जितना औरतों को. ऐसे समय में ये ज़रूरी बन जाता है की बाज़ार और पहरों के बिच एक इन्सान के तौर पर प्रेम की आज़ादी की बात की जाये. ये भी ज़रूरी हैं की इस प्रेम दिवस में संकीर्णता और बाज़ारीकरण के विरोध को और पुख्ता किया जाये. पारस्परिक सम्मान पर आधारित रिश्ते एक स्वस्थ समाज में ही पनप सकते हैं. प्रेम की ऐसी कल्पना तभी साकार होगी जब सम्पूर्ण समाज में एक क्रन्तिकारी परिवर्तन आयेगा. 



 


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