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Friday, December 2, 2016

महिला कर्मचारियों के असमान वेतन: ताकि मुददआ तो बदले

- अंजलि सिन्हा
 
बीते सोमवार को फ्रांस की राजधानी पैरिस के तमाम जानेमाने राजनीतिक और सांस्क्रतिक कार्यालयों की महिला कर्मचारियों ने ठीक साडे चार बजे अपना काम रोका। यह उनका विरोध का तरीका था ताकि पुरूषों की तुलना में महिलाओं को मिलते कम वेतन का मुददा रेखांकित हो सके। दरअसल महिला अधिकारों की हिमायत में संचालित एक नारीवादी न्यूजलेटर ने महिला कर्मचारियों को आवाहन किया था कि वह अपना काम रोक दे। पुरूष एवं स्त्राी कर्मचारियों के बीच आज भी मौजूद असमान वेतन को देखते हुए न्यूजलेटर ने कहा था कि 7 नवम्बर के आगे बाकी बचे साल तक महिलाएं काम करती भी रहें तो यह एक तरह से ‘स्वैच्छिक काम’ होगा क्योंकि उन्हें उतना वेतन कम मिलता है। /ीhttps://www.theguardian.com/world/2016/nov/07/french-women-walk-out-work-pay-disparity-gender-pay-gap-equality/
ध्यान देनेयोग्य है कि हड़ताल के संगठनकर्ताओं का मकसद यह नहीं था कि महिलाएं जगह जगह प्रदर्शन करें, मगर सोशल मीडिया के जरिए इसको लेकर उन्होंने की अपील से जगह जगह महिलाएं सड़कों पर उतरीं और उन्होंने समान वेतन की मांग की। यह बात भी रेखांकित करनेवाली है कि फ्रांस में हुए यह प्रदर्शन आईसलेण्ड में 24 अक्तूबर को हुए ऐसे ही प्रदर्शनों की तर्ज पर थे, जहां हजारों महिलाओं ने उस दिन ठीक 2.38 बजे अपना काम रोका था ताकि उनके देश में पुरूष एवं महिलाओं के वेतन के बीच 14 फीसद विषमता को उजागर किया जा सके।

यूरोप के देशों में इस तरह का प्रतिरोध नए सिरे से मुददा बन रहा है क्योंकि महिलाओं के लिए समान काम के लिए समान वेतन मिलने का सवाल  साकार नहीं हो सका है। अगर हम दुनिया के बड़े विकसित देशों की बात करें तो वहां भी हर स्तर पर महिलाओं का समान वेतन अभी सुनिश्चित नहीं किया जा सका है। याद रहे कि मिस्टर बराक ओबामा ने राष्ट्रपति बनने का बाद जिस पहले बिल पर हस्ताक्षर किए थे, वह था ‘इक्वल पे बिल‘ अर्थात समान वेतन कानून और इसके लिये उन्होंने वाहवाही भी लूटी। उनका कार्यकाल समाप्ति की ओर है, मगर बताया जाता है कि अमेरिका में अभी भी कई स्तरों पर गैरबराबरी कायम है। वहां हाल यह है कि शुरूआत में यदि किसी नौकरी में बराबर के वेतन पर स्त्राीपुरुष की नियुक्ति हुई भी तो बाद में धीरे धीरे औरत का वेतन कम हो जाता है। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की कमाई 74  से 77 फीसदी बतायी जाती है। हार्वर्ड में एसोसिएट प्रोफेसर मारिको चांग के मुताबिक आमतोैर पर महिलाएं तुलनात्मक रूपसे कम वेतन वाले क्षेत्रों में काम करती है लेकिन कहीं कहीं समान हैसियत वाले क्षेत्रा में भी अन्तर दिखाई देता है। यहां तक कि जिस काम में पारम्पारिक रूपसे महिलाओं का वर्चस्व रहा है उसमें भी जब पुरुषों ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया हो तो उन्हें अधिक पैसे मिलने लगे, जैसे नर्स। 

अगर यूरोप एवं अमेरिका के पुरूष एवं स्त्रिायों में वेतन की इतनी गहरी असमानता है तो तो अन्दाज़ा ही लगाया जा सकता है कि भारत जैसे विकसशील देश में इस मामले में स्थितियां कितनी और खराब होंगीं। अगर वैश्विक स्तर पर ‘जेण्डर के आधार पर वेतन के अन्तराल’ सूची में भारत उपर से छठवें नंबर पर है तो अमेरिका 16 वें नंबर पर स्थित है। पिछले दिनों एक संस्था की तरफ से किए गए आनलाइन सर्वेक्षण के नतीजे भी इस मामले में सूचक दिखते हैं जिसमें उसने 16,500 कर्मचारियों से आनलाइन सम्पर्क किया था जिसमें 13,729 पुरूष थे तथा बाकी महिलाएं थीं और इन आंकड़ों को 2006 से 2011 के बीच इकटठा किया गया। रोजगारशुदा इन कर्मचारियों के सर्वेक्षण का नतीजा था कि इस कालखण्ड में वेतन में अंतराल 54 फीसदी था। (http://www.paycheck.in/main/world-map-gender-pay-gap/gender-pay-gap-in-india-1)  सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि यह अंतराल शिक्षा, पेशों, अधिक वेतन के साथ बदलता है। मिसाल के तौर पर स्वास्थ्य प्रोफेशनल्स में जहां यह अंतराल सबसे अधिक है जबकि क्लीनर या अन्य कामों में सबसे कम है।

यह स्थितियां तब मौजूद हैं जबकि संविधान की विभिन्न धाराओं पुरूषों एवं महिलाओं के समान अधिकार और उन्हें राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में समान अवसरों /धारा 14/, धर्म, जाति, नस्ल, लिंग आधार पर हर किस्म के भेदभाव पर पाबंदी /धारा 15-1/, महिलाओं की हिमायत के लिए राज्य द्वारा विशेष प्रावधान बनाने पर जोर /धारा 15-3/; सभी पदों पर नियुक्ति में सभी नागरिकों को समान अवसर/धारा 16/; पुरूषों और स्त्रिायों क ेलिए समान काम के लिए समान वेतन/धारा 39-डी/; महिलाओं के सम्मान के प्रति अपमानजनक व्यवहारों पर पाबंदी/धारा 51-ंए/ आदि पहले से मौजूद हैं। इतनाही नहीं भारत सरकार ने कई अधिनियम बनाए हैं ताकि समान वेतन और कार्यस्थल पर सभी के साथ समान व्यवहार को सुनिश्चित किया जा सके। चाहे आप 1948 में बना न्यूनतम वेतन कानून देखें या फैक्टरीज एक्ट 1948 पर गौर करें या या वर्कमेन कॉम्पेनसेशन अर्थात श्रमिक मुआवजा अधिनियम 1923 को देखें, इन सभी अधिनियमों का निर्माण पुरूष एवं स्त्राी मजदूरों के बीच भेदभाव मिटाने को लेकर ही किया गया है। या आप 1976 में बना समान वेतन अधिनियम देखें जो समान काम के लिए समान वेतन की सभी के लिए बात करता है, जिसे इसी मकसद से बनाया गया ताकि बच्चों के प्रजनन और पालन में महिलाओं को असमान शारीरिक एवं सामाजिक बोझ उठाना पड़ता है।

स्पष्ट है कि संविधान जो भी कहे, विभिन्न कानून जिस बात को भी रेखांकित करें, मगर अभी भी हम उस लक्ष्य से दूर खडें हो जिसके तहत ं बराबर काम का बराबर वेतन के औरत के हक को अमली जामा पहनाया सके। दरअसल अब जरूरत इस बात को सुनिश्चित करने की है कि इसे लागू नहीं करना किसी भी सरकार या निजी कम्पनी या कोई भी नौकरी पेशा हो तो नियोक्ता की तरफ से इसे अपराध माना जाना चाहिए। य़द्यपि श्रम कानून के अन्तर्गत बराबरी का नियम होता है लेकिन हर जगह जेण्डर भेद के लिए रास्ते निकाल लिए जाते हैं। दर असल ऐसे हालात तैयार करना भी सरकार और नियोक्ता की जिम्म्ेादारी बनती है जिसमें महिलायें बराबर का काम कर भी सके और उन्हें बराबर की सारी सुविधाएं मिले। ज्ञात हो की हमारे संविधान का अनुच्छेद 15 यह व्यवस्था देता है कि भारत का हर एक नागरिक लैंगिक तथा जातीय भेदभाव से मुक्त जीवन का अधिकारी है। अर्थात् ऐसे भेदभाव करना कानूनी अपराध माना जायेगा। लेकिन यहां की महिलाएं नागरिक होते हुए भी आसानी से और धडल्ले से आर्थिक शोषण की शिकार होती आयी हैं। 

असंगठित क्षेत्रा में यह भेदभाव अधिक देखने को मिलता है। आज भी कुुशल श्रमिक के रूप में महिलाएं कुल श्रमशक्ति में बराबर का हिस्सेदार नहीं बन पायी है। श्रम मन्त्रालय की एक रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती है। विगत जनगणना के अनुसार महिला श्रमिकों की संख्या 12 करोड़ 72 लाख है जो उनकी कुल संख्या 49 करोड़ 60 लाख का चौथा ( 25.60 प्रतिशत) हिस्सा ही हुआ। इनमें भी अधिकांशतः ग्रामीण क्षेत्रा में है और उनका प्रतिशत ऊपर दी हुई कुल महिला श्रमिेकों की संख्या का तीन हिस्से से भी ज्यादा (87 प्रतिशत) कृषिसम्बन्धी  रोजगार में हैं। रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्रा के रेाजगार में तीन हिस्से भी ज्यादा(80 प्रतिशत) महिला श्रमिक घरेलू उद्योग , लघु व्यवसाय सेवा तथा भवननिर्माण मंे लगी हैं। कहा गया है कि सरकार ने महिला श्रमिकों के काम की गुणवत्ता में सुधार लाने तथा उनकी स्थिति बेहतर बनाने के लिये कई कानून बनाये है लेकिन व्यवहार में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाया है। देश में महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश को छोड़कर, जहॉं क्रमशः महिला श्रमिकों की संख्या 11.90, 10.34 औेर तथा 10.07 है बाकी अधिकतर राज्यों में कुल श्रमिकों की तुलना में महिला श्रमिक एक फीसदी से भी कम है। 
दुनिया के हर देश में पारिवारिक जिम्मेदारियां भी औरत के कैरियर में रोड़ा बनती है। छोटे बच्चे का पालनपोषण तथा परिवार के सदस्यों की देखरेख आदि की जिम्मेवारिवां भी होती हैं। यह भी कई बार बताया जाता है कि महिलाएं बाहर का चुनौतीपूर्ण कार्य करने के लिए तैयार नहीं होती हैं। लेकिन इसके लिये भी परिवार का दबावपूर्ण वातावरण तथा बाहर के समाज का जेण्डर फ्रेण्डली न होना माना जा सकता है। आखिर किन कारणों से ऐसा होता है या क्या वाकई ऐसा होता भी है यह पड़ताल करने का मुद्दा है।

महिलाओं के लिए सार्वजनिक दायरे में रोजगार उपलब्ध कराने की बात जबभी चलती है, तो एक अन्य अहम मुद्दा सामने आता है और वह है रात की पाली में स्त्राी के काम करने का। निश्चित ही इस पर समाज में एकमत नहीं है। कुछ की राय होती है कि जब तक समाज में पूर्ण सुरक्षा का माहौल न बन जाये तब तक यह खतरा बना रहेगा तो कोई अगर-मगर के साथ इस प्रस्ताव को स्वीकारता दिखता है। जाननेयोग्य है कि 1961 का फैक्टरी एक्ट महिलाओं को रात की पाली में काम करने की अनुमति नहीं देता था। रात की पाली में स्त्राी के काम नहीं करने के पीछे जो सबसे बड़ा तर्क दिया जाता है वह सुरक्षा का है। और यह हकीकत भी है कि औरत के लिए वातावरण सुरक्षित नहीं है। लेकिन अगर आंकड़ों की पड़ताल करें तो स्त्राी के लिए महज सार्वजनिक दायरा ही नहीं बल्कि निजी दायरा भी असुरक्षित है।

अन्त में पैरिस में उठी यह आवाज की क्या भारत में भी प्रतिक्रिया हो सकेगी, इसका जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है।

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