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Thursday, August 4, 2016

मेंढक की हदे-निगाह

– रवि सिन्हा


अक्सर ऐसा होता है किसी मामूली लफ़्ज़ में आमफ़हम मायनों के साथ-साथ गहरे, फ़लसफ़ाना मायनों की गुंजाइश भी छिपी रहती है। हदे-हिगाह जिसे संस्कृत में क्षितिज और अंग्रेज़ी में होराइज़न कह सकते हैं, एक ऐसा ही लफ़्ज़ है। आमफ़हम मायने तो यही है कि जहाँ तक आपको दिखाई दे वह आपकी हदे-निगाह हुई। मामूली लफ़्ज़ों के मुहावरेदार इस्तेमाल भी हो सकते हैं। मसलन, आपकी तंग नज़री और ख़ुदग़र्ज़ी से परेशान कोई शख़्स आप पर यह तोहमत लगा सकता है कि आपकी हदे-निगाह आपकी अपनी ही नाक की छोर पर ख़त्म हो जाती है। मगर, चूँकि, मेरा ताल्लुक़ आपकी निजी ज़िंदगी और शख़्सियत से नहीं है, इसलिए इस लफ़्ज़ का मेरा इस्तेमाल मुहावरेदार नहीं है। मेरा ताल्लुक़ एक सभ्यता, एक सिविलाइज़ेशन की शख़्सियत से है। ऐसे मामलों में, अमूमन, लफ़्ज़ों के फ़लसफ़ाना मायनों की ज़रूरत पड़ती है। लिहाज़ा, पहले यह साफ़ कर लेना होगा कि हदे-निगाह के इस्तेमाल में फ़लसफ़ाना गुंजाइशें क्यों हैं और कितनी हैं
    
  बीसवीं सदी में एक मशहूर फिलॉसफर हुए हैं, जिनका नाम था हान्स-ज्योर्ग गाडमर। जर्मन थे। और भी मशहूर फिलॉसफर मार्टिन हाइडेगर के शागिर्द थे। ज़ाती तौर पर मैं इन दोनों में से किसी का मुरीद नहीं हूँ। नाइत्तेफाक़ी की अलग-अलग वजहें हैं। जनाब हाइडेगर ने तो हिटलर का साथ दिया था। कहा यह जाता है कि यह साथ अधिक दिनों तक नहीं चला और जल्दी ही हाइडेगर का हिटलर से मोहभंग हो गया। मगर मेरे लिए इतना ही काफ़ी है। हाइडेगर से मैं सतर्क रहता हूँ। अपनी दूरी बनाए रखता हूँ। गाडमर से नाइत्तेफ़ाक़ी की ऐसी कोई वजह तो नहीं है, मगर उनके पूरे फ़लसफ़े का मिज़ाज मेरी अपनी दिमागी बनावट से मेल नहीं खाता। वे अर्थमीमांसावादी यानि हरमेनायटिकल फिलॉसफ़र हैं। मायनों की दुनिया उनके लिए हक़ीक़त की दुनिया से पहले आती है। अर्थ में यथार्थ का जन्म होता है। ऐसी दुनिया मुझे सिर के बल खड़ी मालूम होती है। लेकिन नाइत्तेफ़ाक़ी के बावजूद मुझे यह मानने में कोई गुरेज नहीं है कि ये दोनों बीसवीं सदी के सबसे बड़े दार्शनिकों में से थे और फ़लसफ़े की दुनिया में इन्होनें बिल्कुल नए रास्तों के सफ़र किए थे।

बहरहाल, मेरा मक़सद हदे-निगाह का फ़लसफ़ाना मतलब निकालना है और इसी सिलसिले में मैंने गाडमर की चर्चा की थी। गाडमर का कमाल यह है कि बिल्कुल आमफ़हम मायनों से शुरू करके कब वे दार्शनिक दायरे में दाख़िल हो जाते हैं, यह पता ही नहीं चलता। आप मायने की गहराइयों में ख़ुद-ब-ख़ुद उतरते चले जाते हैं। गाडमर कहते हैं कि आप जहाँ खड़े होकर देखते हैं उससे आपकी हदे-निगाह तय होती है। इस बात को हल्के-फुल्के ले लेने की ग़लती बहुत आसानी से की जा सकती है। खड़े होने की जगह का अपनी ‘लोकेशन’ का यहाँ गहरा अर्थ है। मसलन हम इनसान हैं और हमारी हदे-निगाह इनसानी हदे-निगाह है। इनसान होने की सीमाएँ इस हद को तय करती हैं। इनसानी नज़रिया हमेशा सीमित होता है।

इनसानी नज़रिए की सीमाओं से घबराए हुए लोग ख़ुदाई नज़रिए की कल्पना करते हैं। एक ऊँची दीवार के एक तरफ़ खड़ा एक बौना इनसान दीवार के दूसरी तरफ़ नहीं देख पाता। तब यह बौना दलील देता है। चूँकि इनसान एक वक़्त में दीवार के एक तरफ़ ही देख सकता है इसलिए ऐसी कोई ताक़त ज़रूर है जो एक ही साथ दीवार के दोनों तरफ़ देख सके, इस तरह बौने आदमी का ख़ुदा वजूद में आता है। और ईश्वर की कल्पना करने वाला यह शख़्स बौना ही नहीं, जाहिल, कूढ़मग़ज़ और आलसी भी होता है। वर्ना वह दीवार की दूसरी तरफ़ जाने की जुगत करता है। दूसरी तरफ़ देखते समय पहली तरफ़ के नक़्शे को दिमाग़ में क़ायम रखता, उस से दूसरी तरफ़ का मिलान करता और इस तरह दीवार के दोनों तरफ़ की तस्वीर उसकी दिमाग़ी नज़रों के सामने होती। इनसानी नज़रिए की हदों के पार जाने की इस जद्दोजहद में साइंस पैदा होता है। वैज्ञानिक नज़रिया इनसानी नज़रिए का विस्तार है।

हदे-निगाह में देखने वाले के ‘लोकेशन’ का असर मौजूद होता है। तस्वीर देखकर यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कहाँ खड़े होकर तस्वीर खींची गई है। ताज्जुब यह है हर कोई अपनी खींची तस्वीर को ही हक़ीक़त की असली तस्वीर बताता है। ताज्जुब यह भी है कि प्रत्यक्ष देखने और अनुभव करने को ही ज्ञान का वास्तविक और एकमात्र आधार माना जाता है। लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि हक़ीक़त की तस्वीर अलग-अलग जगहों से खींचने पर अलग-अलग उभरती है। सच्चाई हर तस्वीर में होती है, मगर हर तस्वीर की सच्चाई अधूरी होती है। इनसान उन अंधों की तरह है जो हाथी की बनावट का अंदाज़ा लगाने के लिए उसके अलग-अलग हिस्से टटोल रहे थे। उन सभी के अनुभव प्रामाणिक थे, मगर हाथी उनमें से किसी के वर्णन के मुताबिक़ नहीं था।

इनसान एक सामजिक बनावट भी है। संस्कृति और परंपरा के ताने-बाने से उसकी बुनावट हुई है। इससे उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक ‘लोकेशन’ तय होती है। और इस लोकेशन से उसकी सामाजिक, सांस्कृतिक और सभ्यतात्मक हदे-निगाह तय होती है। अपने नज़रिए से दुनिया तो सभी देखते हैं। सवाल यह है कि कितने लोग ऐसे होते हैं जो दुनिया की तस्वीर में अपने ‘लोकेशन’ का असर देखने की कोशिश करते हैं। दरअसल इनसान जहाँ खड़ा होता है, ठीक-ठीक वही जगह उसे दिखाई नहीं देती। अपनी ‘लोकेशन’ देखने के लिए उसे अपने पैरों के नीचे देखने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, अपनी जड़ें नहीं तलाशनी चाहिए। इसकी बजाय उसे इस बात पर ग़ौर करना चाहिए कि दुनिया उसे कैसी दिखाई देती है। जैसी दिखाई देती है वैसी क्यों दिखाई देती है। अपने नज़रिए में ही अपना ‘लोकेशन’ ढूँढना ज़रूरी है। मदद इस बात से भी मिल सकती है कि अपने नज़रिए की तुलना औरों के नज़रिए से की जाए। मगर इसके लिए यह तो मानना पड़ेगा कि औरों को भी हक़ीक़त की कोई-न-कोई तस्वीर दिखाई पड़ती है। जो सिर्फ अपनी खींची तस्वीर को ही हक़ीक़त माने वह तो उस जाहिल और आलसी बौने से भी गया-गुज़रा है जो दीवार के दूसरी तरफ़ देखने की बजाय ईश्वर की कल्पना करता है और उसकी आड़ में अपनी जहालत और काहिलपने को छुपाने की कोशिश करता है।

इनसानी हदे-निगाह और उसमें छिपी इनसानी ‘लोकेशन’ लम्बे-चौड़े विषय हैं, खासे उलझे हुए मामले हैं। इन्हें छेड़ने का मेरा मक़सद यहाँ कुछ और ही था। मुझे लगता है कि सभ्यताओं की भी हदे-निगाह होती है। कौन सी सभ्यता कहाँ तक देख पाती है, इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वह कहाँ पर खड़ी है।

किस सभ्यता की हदे-निगाह कहाँ तक है, यह कैसे तय किया जाए? यह आसान मसला नहीं है। इस पर रिसर्च और सोच-विचार के बेशुमार डिपार्टमेंट खोले जा सकते हैं, खुले भी हुए हैं। यह सब चंद सफ़ों में तो समेटा नहीं जा सकता। यहाँ मैं इतना ही कर सकता हूँ कि टुकड़े-टुकड़े में कुछ नमूने पेश करूँ जिससे हिन्दुस्तानी सभ्यता की तस्वीर चंद लकीरों में उकेरी जा सके।

पहली बात तो यह कि सभ्यता कोई ऐसी चीज़ नहीं होती जो पुराने महाकाव्यों में और प्राचीन इतिहास में क़ैद होती है। जो लोग आज ज़िन्दा हैं, उनकी कथनी और करनी में, उनके आचार-विचार, व्यवहार और कशमकश में सभ्यता नुमायां होती है। और आज का हिन्दुस्तान क्या सोच रहा है और क्या कर रहा है – यह आपकी आँखों के सामने है। पिछले दस-बीस सालों के दौरान जो सबसे अहम मसले खड़े हुए, या यूँ कहिए कि जिन मसलों को इस मुल्क ने अहम माना उनकी फ़ेहरिस्त आप ख़ुद बना सकते हैं। एक मस्ज़िद का गिराया जाना और उसकी जगह पर मंदिर बनाने का राष्ट्र का सबसे बड़ा कर्त्तव्य घोषित करना। यह शायद पिछले पंद्रह सालों का सबसे बड़ा मसला रहा है। एक तरफ़ हिन्दू धर्म की रक्षा का मसला है जिसके लिए मुसलमानों से हज़ार सालों का बदला लेना है, गुजरात-2002 के क़त्लेआम और हज़ारों के बलात्कार को अंजाम देना है, एक पादरी को उसके दो बच्चों के साथ ज़िन्दा जला देना है। साथ-साथ सती के मंदिर खोलने हैं, बाल-विवाह के त्यौहार मनाने हैं, गंगा के कीचड़ में चार करोड़ लोगों के डुबकी लगाने का सरकारी इंतज़ाम करना है। दूसरी तरफ़ गुड़िया और इमराना पर बर्बर और असभ्य फ़तवे सुनाने हैं। लोगों को हिदायत देनी है कि वे चौदह सौ साल पहले लिखी गई किताब के मुताबिक़ जिएँ और मरें, निकाह करें और तलाक़ दें।

आप कहेंगे, मैं ज़्यादती कर रहा हूँ। आखिर इसी बीच ‘नई आर्थिक नीति’ आई है, हिन्दुस्तानी इकॉनमी औसतन छः फ़ीसदी सालाना की रफ़्तार से बढ़ी है, बीस करोड़ की आबादी वाला मिडल क्लास पैदा हुआ है, यहाँ तक कि अमेरिका भी यह मानने लगा है कि हिन्दुस्तान इस सदी में बड़ी ताक़त बनकर उभरेगा।

जो बात सुनने में अच्छी लगे उस पर ज़्यादा बेरहमी से ग़ौर करना चाहिए। ‘नई आर्थिक नीति’ हिन्दुस्तानी और विदेशी सरमायेदारी के लिए तरक्क़ी और मुनाफ़े का पैग़ाम लेकर तो बेशक आई है, लेकिन इसके तहत आम हिन्दुस्तान कितना फला-फूला है इस पर फ़ैसला अभी बाक़ी है। मुल्क की कुल आमदनी में खेती-बाड़ी का हिस्सा एक चौथाई है, मगर दो-तिहाई आबादी उसी पर गुज़र-बसर करती है। और उसके बावजूद शहर झुग्गी-झोपड़ियों से अटे पड़े हैं। बेघर और बेरोज़गार लोगों की फ़ौज बढ़ती जा रही है। और मिडल क्लास? बिल गेट्स के कम्प्यूटरों के लिए प्रोग्राम लिखकर चार पैसे कमा ही लिए जाएँ तो उससे शिक्षित और स्वाभिमानी वर्ग नहीं पैदा हो जाता। इकॉनमी के बढ़ने की रफ़्तार? यही देखना हो तो पड़ोस में हिमालय के उस पार देखिए। चीन की इकॉनमी पिछले तीस सालों से हर साल औसतन दस फ़ीसदी की रफ़्तार से बढ़ रही है। अमेरिका, यूरोप और जापान सकते में हैं। चीन उन सब पर भारी पड़ने वाला है। जब हम मंदिर बनाने के लिए मार-काट मचाए हुए हैं, तब वे शंघाई शहर बना रहे हैं और मैगलेव ट्रेनें चला रहे हैं, जो दुनिया की सबसे आधुनिक और सबसे तेज़-रफ़्तार ट्रेनें हैं। उनकी तरक्क़ी की वजहें अनेक हैं। लेकिन एक वजह यह ज़रूर है कि बुद्ध के मंदिर बनें या कंफ्यूशियस के – उनके लिए यह कोई मसला नहीं है। उनकी हदे-निगाह में इक्कीसवीं और बाईसवीं सदी की दुनिया है। हमारी हदे-निगाह में सत्रहवीं और अठारहवीं सदी की दुनिया है।

आप कहेंगे, आज के हिन्दुस्तानियों की असभ्यता और कूढ़मग़ज़ी के लिए हिन्दुस्तानी सभ्यता को क्यों कसूरवार ठहराया जाए? मैं यह कसूर साबित तो नहीं कर सकता, मगर मुझे लगता है कि हिन्दुस्तानी सभ्यता और आज के हिन्दुस्तानियों की असभ्यता के बीच कोई-न-कोई रिश्ता ज़रूर है। मुझे यह ज़रूरत भी महसूस होती है कि सफल सभ्यताओं के प्राचीन ग्रंथों, उनके नैतिक मूल्यों और उनके प्राचीन इतिहास की तुलना भारतीय प्राचीन सभ्यता से की जानी चाहिए। मुमकिन है कुछ सुराग़ मिले। मसलन, होमर के महाकाव्यों की तुलना रामायण और महाभारत से करने का काम हाथ में लें तो अच्छा है। आख़िरकार ग्रीक सभ्यता पश्चिमी सभ्यता की जड़ में है।

मेरे मन में प्रोमथियस और भागीरथ की तुलना अक्सर चलती है। प्रोमथियस धरती के बाशिंदों के लिए देवताओं के यहाँ से आग चुराकर ले आया। इसके लिए उसने भयानक सज़ा झेली। दूसरी तरफ़ अपने भागीरथ थे। सालों तपस्या करते रहे, आरज़ू-मिन्नत करते रहे कि गंगा का पानी धरती पर उतरे। एक तरफ़ देवताओं को चुनौती थी, दूसरी तरफ़ उनकी प्रार्थना। बाद की पीढ़ियों पर असर तो पड़ेगा ही। भारतीय सभ्यता के प्राचीन ग्रंथों में नैतिक मूल्यों को लेकर जो उलट-फेर है, जैसा सापेक्षतावाद है, उसके सामने तो आज के उत्तर-आधुनिक नैतिक सापेक्षतावादी भी शर्मसार हो उठें। ईश्वर के सोलहकलाओं वाले अवतार कृष्ण का तो कोई सानी नहीं है। दो पक्षों के बीच महाभारत होना है। लाज़िमी तौर पर एक पक्ष सही है, दूसरा ग़लत है, अन्याय कर रहा है। लेकिन कृष्ण एक पक्ष को अपनी पूरी सेना दे देते हैं और दूसरी तरफ़ ख़ुद हो लेते हैं। फिर इस पक्ष को जिताने के लिए हर क़िस्म की चालबाज़ी और धोखाधड़ी करते हैं। अपने निजी जीवन के उनके मूल्य भी मुझे सर्वथा अनैतिक लगते हैं। उससे भी अधिक आश्चर्यजनक यह है कि पूरी हिन्दू सभ्यता किसी और की ब्याहता राधा के साथ उनके प्रेम-प्रसंग को प्रेम का सर्वोच्च उदहारण मानती है। दुनिया के सभी धर्म कम-से-कम अपने मानने वालों के बीच इनसानी बराबरी का संदेश देते हैं। लेकिन हिन्दू धर्म के प्राचीन ग्रन्थ जाति और वर्ण के आधार पर ग़ैर-बराबरी और अन्याय को धर्म-सम्मत ठहराते हैं। क्या इस सबका कोई असर बाद के समाज पर नहीं पड़ेगा? क्या इस सब पर खुलकर विचार नहीं किया जाना चाहिए?


हदे-निगाह पर वापिस आएँ। आपको यक़ीन हो गया होगा कि यह एक फ़लसफ़ाना लफ़्ज़ है। इसके मुक़ाबले मेंढक कोई फ़लसफ़ाना लफ़्ज़ नहीं है। जहाँ तक मालूम है, मेंढक कोई ख़ास फ़लसफ़ाना जानवर भी नहीं है। इस लफ़्ज़ का मेरा इस्तेमाल महज़ मुहावरेदार है। कुएँ के मेंढक वाले मुहावरे का चलन आम है। संस्कृत में जिसे कूपमंडूक कहते हैं। मेंढक के पास भी नज़र होती है। उसकी भी ‘लोकेशन’ होती है, और उसकी हदे-निगाह भी होती है। कुएँ के मेंढक की हदे-निगाह से उसकी ‘लोकेशन’ उसकी चेतना, उसकी विश्वदृष्टि का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। मुहावरे और फ़लसफ़े का यह मेल मुझे हिन्दुस्तानी सभ्यता के संदर्भ में ख़ासा दुरुस्त लगता है। वाकई तरक्क़ी करनी है तो हमें हज़ारों साल पुराने इस कुएँ से बाहर आना होगा। मुमकिन है हमारी भेंट आधुनिकता की राजकुमारी से हो। मुमकिन है, वह हमें चूम ले। मुमकिन है, हम मेंढक से इनसान हो जाएँ। इक्कीसवीं और बाईसवीं सदी के इनसान। कुएँ से बाहर निकलें तो सब कुछ मुमकिन है।


Ravi Sinha is a marxist commentator and political activist. He is associated with New Socialist Initiative (NSI). This article was originally published in Stree Mukti Magazine.  

2 comments:

Arpita said...

गजब...👍👍

Oliver Jones said...


An intriguing discussion is worth comment. I do think that you ought to write more on this issue, it may not be a taboo subject but usually people don't talk about these topics. To the next! Many thanks!! capitalone com login

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