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Thursday, June 2, 2016

अकेली औरत की पहचान

-अंजलि सिन्हा

हालही में जारी हुई राष्ट्रीय महिला नीति के मसविदे में  एक महत्वपूर्ण मुददा एकल महिलाओं का उठाया गया है जिसमें अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा आदि श्रेणियां शामिल हैं। निश्चित ही इस बदले दौर में अकेले अपने भरोसे जीवनयापन करने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी है और साथ ही इस पुरूषप्रधान मानसिकता वाले समाज में उनके साथ उत्पीड़न तथा गैरबराबरी एवं उपेक्षा की संभावना भी अधिक बनी हुई है, इसलिए ऐसी महिलाओं के बारे में योजना बनाना जरूरी है, लेकिन नीति बनाने से पहले इस पर विचार करना तथा विमर्श को व्यापक बनाना जरूरी है।

पिछले डेढ दो दशक में इस बदलाव को आसानी से देखा समझा जा सकता है कि अब महिलाएं कारण जो भी हों और जितने भिन्न भिन्न हों अकेले भी रहने के लिए खुद को तैयार करने लगी हैं। अच्छी खासी संख्या ऐसी महिलाओं की खासतौर पर महानगरों में दिखती है जो महज सहारे या ‘‘पूर्णता’’ के लिए पुरूष पार्टनर या पति को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। यह अच्छा बदलाव है कि वे स्वयं में आत्मविश्वास तथा अपने जीवन पर भरोसा बढ़ाया है और इसका अर्थ यह कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि वे अकेले रहने को ही प्राथमिकता देने लगी हैं या एडजस्टमेंट को तैयार नहीं हैं अथवा भविष्य में परिवार बनने की सम्भावना कमजोर हो जाएगी बल्कि कोई अलग ढंग से जी रहा है तो वह ‘‘अजूबा’’ होने का असुरक्षित होने की बात नहीं होगी। दूसरे परिवार की परिभाषा और तानाबाना भी बदलता है 2001 की जनगणनाा के अनुसार लगभग साढे सात करोड़ एकल महिलाओं की संख्या है जिसमें गैरशादीशुदा, तलाकशुदा तथा विधवायें शामिल हैं और अगर विगत दशक के साथ तुलना करंे तो यह बढ़ोत्तरी 39 फीसदी है।

विदेशों मे एकल महिलाओं की समाज में उपस्थिति पहले से ही रही है और हमारे समाज की तुलना में वे उपेक्षा और उत्पीड़न की शिकार कम रही हैं। हाल में एक किताब आयी है ‘आल द सिंगल लेडीज: अनमैरिड वूमेन एण्ड द राइज आफ एन इंडिपेण्डण्ट नेशन’ जिसमें लेखिका रेबेका टेस्टर बताती हैं कि सिंगल महिलाओं की बढ़ती तादाद - जो वर्ष 2009 में शादीशुदा महिलाओं की संख्या से आगे बढ़ गयी - जल्द ही समान तनखा, समानतापूर्ण पारिवारिक छुटटी, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा और प्रजनन सम्बन्धी अधिकारों का रास्ता सुगम करेगी। 

इस बदलते वातावरण में सबसे महत्वपूर्ण यह समझना है कि इस परिघटना को कैसे देखें ? भविष्य के समाज में आधी आबादी के बारे में उनका स्थान तथा हैसियत तय करने के लिए पहले यह देखना होगा कि किस तरह उन्हें विभिन्न पहचानों के जरिए सदियों से समाज ने ऐसे गढ़ा है ताकि पितृसत्तात्मक समाज बना रहे और उसका वर्चस्व कायम रहे। जैसे कि ‘‘कौमार्य’’ होना, शादीशुदा होना या गैरशादीशुदा रहना - ऐसी पहचानें जो कुमारी और श्रीमती के माध्यम से पुष्ट की गयीं, विधवा जो ‘अशुभ’ होती है और ‘‘छोड़ दी गयी’’ जो तलाक या परित्यक्ता श्रेणीवाली, भद्र तथा अभद्र की श्रेणी जो सभ्य घरों या ‘‘रेडलाइट एरिया’ वाली, माडल टाइप या बाजार की जरूरतें पूरी करनेवाली मिस इंडिया, मिस वर्ल्ड आदि यानि ये सारी पहचानें इस तरह गढ़ी गयीं ताकि उसमे स्त्राी का अपना स्पेस, अपना स्व, एक व्यक्ति गायब था और उसकी पहचान उस पर हावी थी। 

किसी भी आधुनिक समाज का मापदण्ड जेण्डर, जाति, लिंग, नस्ल आदि से इतर एक व्यक्ति को मान्यता देना है। उसके बाद रिश्ते आते हैं जो समाज निर्मित होता है। कहीं एकल होने की पहचान के खाचे में औरत को फिट करके देखने की सोच फिर से व्यक्ति से बड़ी न बन जाए। हमारे यहां अक्सर व्यक्ति की मान्यता और व्यक्तिवादिता को घालमेल कर दिया जाता है। व्यक्ति की स्वीकार्यता उसके लोकतंत्रा का सम्माननीय हिस्सा होने को दर्शाता है, वहीं व्यक्तिवादिता एक असामाजिक तथा स्वार्थपरक, आत्मकेन्द्रीयता का तत्व है। पूंजीवादी युग में जहां मुनाफा प्राथमिक शर्त होता है, जहां हर व्यक्ति दूसरे को पीछे छोेड़ कर आगे निकलने की फिराक में रहता है, वहां व्यक्तिवादी प्रवृत्तियां हावी होती हैं।

अक्सर आधुनिकता की आम समझदारी के तहत उसे पश्चिम से आयातित नकारात्मक धारणा के तौर पर लगाया जाता है, जिसके अनुसार कोई किसी का खयाल नहीं करता। संवेदना से परे बेरहम समाज आधुनिकता की कसौटी नहीं है, परन्तु यह तो जांचनेवाली बात बनती है कि एक व्यक्ति की - जिस भी रूप में वह है - उसकी स्वीकार्यता, उसकी गरिमा की रक्षा कहां, किस समाज में अधिक है। इस जांच में तथा उसके नतीजों में भिन्नता भले हो सकती है, लेकिन सामाजिकता या सामूहिकता को झुण्डवाद से अलग कर देखना होगा।

इस तरह हम समझते हैं कि औरत को एकल होने की अलग पहचान की श्रेणी में डालना औरत के लिए, पूरे स्त्राी समुदाय के लिए दूरगामी रूप से बहुत फायदेमन्द नहीं होगा इसका अर्थ यहां यह भी नहीं होना चाहिए कि सभी एक ही पहचान में समा जाएं बल्कि जैसे यह जानने की जरूरत नहीं है कि किसकी शादी हुई है, कौन कितनी उम्र में किस जातिवाले को अपना पार्टनर चुनती है, उसी तरह इसमें भी समाज को अधिक रूचि लेने की जरूरत नहीं है कि कौन अकेले रह रही है और कौन किसके साथ ? 

इसे रेखांकित करना इसलिए जरूरी है कि हमारे समाज में औरत के सन्दर्भ में जब बात हो, उससे सम्बधित किसी मुददे या समस्या की चर्चा हो तो उसका दूसरे व्यक्ति से क्या रिश्ता है यह सबसे पहले रेखांकित होता है। वह मां बहन बेटी पत्नी के रूप में पहले होती है। इसीलिए उत्पीड़न के खिलाफ जब कानून बना तो ससुराल के सन्दर्भ में बना। बाद में घरेलू हिंसा विरोधी कानून में मायके को भी समेटा गया। इसी तरह कन्याओं के गर्भपात के मसले पर भी पहले नारों में इस बात की प्रधानता देखी जा सकती थी कि यदि लड़कियों को गर्भ में ही मारा जाएगा तो समाज में मां बनने का संकट आ जाएगा, लड़के कुंआरे रह जाएंगे, और स्रष्टि आगे नहीं बढ़ पाएगी। अथवा भाइयों को राखी कौन बांधेगा आदि। रिश्तों मंे बांध कर देखने समझने की प्रव्रत्ति के कारण ही सम्पत्ति मे बराबरी का हक बेटी के लिए भी हो यह कानून बनने में दशकों लग गए और 2005 में यह कानून बनने के बाद भी समाज अभी स्वीकार करने को तैयार नहीं है। दहेज जैसी समस्याएं इसी की उपज हैं।

इसी तरह रिश्तों की पृष्ठभूमि में औरत के मुददे को सम्बोधित करते हुए आज के समय में एकल औरत की पहचान की धारणा प्रचलित हो चली है। पहले इसे विधवा, परित्यक्ता, कुंआरी आदि पहचानों के भीतर फिट कर देखा गया जो एकल होने की पहचान बनी। लेकिन एकल होने की पहचान भी उपर वाले पहचानों से बहुत भिन्न नहीं है। यह एकल होना भी इससे तय होता है कि किसी न किसी रूप में कोई पुरूष आप के साथ है या नहीं। चाहे वह मर चुका हो, आप से अलग हो चुका हो या अभी साथ हुआ ही न हो। कुल मिला कर इस एकल की पहचान भी पितृसत्तात्मक खांचे के भीतर की पहचान है।

एकल महिला की सामुदायिक पहचान बनाना उन्हें किसी निर्मित की गयी पहचान की सीमा में बांधने की अपेक्षा ज्यादा जरूरी है व्यक्ति के रूप में उन्हें मान्यता दिलाना। महिला चाहे वह शादीशुदा हो, गैरशादीशुदा हो, तलाकशुदा हो, या विधवा भी हो सबसे पहले वह व्यक्ति और नागरिक है। महिलाओं के मुददे को सम्बोधित करने में हमेशा से रिश्तों को प्रधानता दी गयी है। परिवार के अन्दर या अकेले रहनेवाली महिला की स्थिति में निश्चित फरक बहुत बड़ा है, लेकिन पित्रसत्ता की शिकार सभी महिलाएं हैं। एकल महिलाओं को अलग से चिन्हित कर ‘‘एकल’’ होने की पहचान स्वयं में पित्रसत्तात्मक है। 

जहां तक समस्याओं की रोकथाम या निजता  की बात है तो उस आधार पर हम अकेली रह रही महिलाओं को विशेष कैटेगरी में डाल सकते हैं क्योंकि अकेले सर्वाइव करना, अपना घर चलाना आदि में और किसी के साथ मिल कर चलाने में बहुत बड़ा फरक है, जिसमें जिम्मेदारियां शेअर हो जाती हैं, लेकिन इसी बात को देखने समझने का दूसरा नज़रिया यह हो सकता है कि वह ‘‘बेसहारा’’ है और बेचारी अकेली जान को राहत देने के लिए कुछ योजना होनी चाहिए। इसलिए कम उम्र में भी विधवा होने पर विधवा पेंशन की /भले वह इंतजाम होता नहीं है/ बात होती है न कि उस महिला के रोजगार की।

न सिर्फ सरकार बल्कि महिलाओं के हकों के लिए काम करनेवाले संगठन, एनजीओ तथा महिला आन्दोलनों के लोग भी एकल महिला को अलग से संबोधित करते हैं। ऐसी एकल कही जानेवाली महिलाओं के लिए मंच/संगठन भी बनाए गए हैं यानि किसी औरत का अकेले रहना अभी उसकी मर्जी की बात नहीं हो सकती है और वह पीड़ित ही होगी यह माना गया है, जबकि हक़ीकत यह है कि भले कम संख्या में ही सही लेकिन शादी नहीं करना या तलाक के बाद दूसरे रिश्ते में नहीं जाना औरत अपनी मर्जी से तय करती है। कई बार घर वाले दबाव डालते हैं कि किसी से शादी कर लो लेकिन वह अपने ढंग से जीने का चुनाव करती है। विधवा हो जाने की पहचान अपने आप में पुरूष प्रधानता की बात होती है। किसी एक पार्टनर का नहीं होना यानि विधवा या विधुर हो जाना एक संज्ञा हो सकती है, लेकिन उस पहचान को मजबूत बनाना औरत के वैयक्तिक पहचान को कमजोर बनाना भी होता है।

महिला आन्दोलन में नारे लगते थे कि न देवी न दासी हैं, हमें चाहिए इंसान का दर्जा यानि बराबर के इंसान मानों और समान नागरिक हक सुनिश्चित करो। देवी या दासी, अच्छी या बुरी औरत के श्रेणी में समाज डालता है तथा सरकार और कानून भी कई बार इस परिधि को लांघ नहीं पाती हैं।

यदि हम बराबरीपूर्ण समाज की कल्पना करते हैं तो सभी स्त्राी या पुरूष की वैयक्तिक पहचान उस व्यक्ति की स्वीकार्यता है। वह किसी उपेक्षा से निर्मित पहचान नहीं है। किसी भी पीड़ित समुदाय की अपनी एकता और पहचान हो सकती है, लेकिन वह पहचान अपने उत्पीड़न शोषण से मुक्ति का, खुद को संगठित करने का एक रणनीतिक मसला होगा, वह सरकारी नीति का मुददा नहीं है। एकल होना या साथ होना किसी सशक्त हो चले समूह के लिए अपने चुनाव का मसला भी हो सकता है। शादी करना या नहीं करना आज लड़कियां स्वयं भी तय करने लगी हैं भले ही उनकी संख्या अभी बहुत थोड़ी है। जिस भी व्यक्ति को चाहे वह किसी रिश्ते में हो या नहीं यदि सरकारी सहायता की जरूरत हो तो उसे मिलनी चाहिए।

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