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Friday, May 20, 2016

वरिष्ठ नागरिक आवासीय कालोनी या वृद्धाश्रम ?

-अंजलि सिन्हा

महात्मा गांधी के पौत्र कनुभाई गांधी - जो उनके तीसरे बेटे रामदास गांधी के बेटे हैं - के अपनी पत्नी शिवालक्ष्मी के साथ बदरपुर के गुरू विश्राम  वृद्धाश्रम में रहने की ख़बर बनी है। उनके पास रूपए पैसे की कमी नहीं है। लगभग 40 साल वह अमेरिका में रहे और ‘नासा’ जैसी प्रतिष्ठित संस्थान में नौकरी की थी। अब वे खुद 87 साल के हैं और उनकी पत्नी 85 साल की है, और जैसा कि समझा जा सकता है कि इस उम्र में अधिक देखरेख की आवश्यकता होती है। 2014 में ही भारत आ गए और गुजरात में नवासारी के  वृद्धाश्रम में रहे, जहां ठगी के शिकार होने के बाद सूरत आ गए और अब दिल्ली के बदरपुर स्थित आश्रम में पहुंचे हैं। नवासारी में उनके ठगी का शिकार होना ख़बर नहीं बनी, मगर  अब जबकि वह दिल्ली के  वृद्धाश्रम पहुंचे हैं तो वह सूर्खियां बना, यहां तक कि केन्द्र सरकार के एक मंत्राी भी उनसे वहां मिलने पहुंचे। सत्ताधारी पार्टी के किसी अतिउत्साही नेता ने कनुभाई के  वृद्धाश्रम पहुंचने के लिए कांग्रेस की आलोचना भी की है।

कनुभाई गांधी  के वृद्धाश्रम पहुंचने के साथ तीन साल पहले ओल्ड एज होम पहुंचे ‘गांधी’ फिल्म के मशहूर निर्देशक रिचर्ड एटनबरो की स्म्रतियां ताजा हो गयी, जिनके बारे में बताया गया था कि 89 वर्ष की उम्र में वह अपना मकान बेच कर वृद्धाश्रम पहुंचे थे , जहां 90 साल की डिमेंशिया से पीड़ित पत्नी पहले से थीं। एटनबरो की तीन सन्तानें थीं, मगर उनके इस कदर व्रद्धाश्रम पहुंच जाने से ब्रिटिश समाज में ऐसी सरगर्मी देखने को नहीं मिली, जिस तरह की प्रतिक्रिया कनुभाई गांधी के व्रद्धाश्रम पहुंचने से चलते मिल रही हैं। स्पष्ट है कि ऐसे मामलों मे पश्चिमी समाज सस्ती भावुकता के तहत नहीं बल्कि व्यावहारिक होकर सोचता है, लिहाजा वहां इस मसले की चर्चा तक नहीं हुई। जाननेयोग्य है कि पश्चिमी देशों में बुजुर्गों का  वृद्धाश्रम पहुंचने को बच्चों की लापरवाही या उनके आत्मकेंद्रित होने के तौर पर देखा नहीं जाता। 

भारत में भी धीरे धीरे ही सही  वृद्धाश्रमों  को लेकर रूख बदल गया है। मेरे एक पारिवारिक मित्र की माँ   - पिता के देहान्त के बाद - बंगलुरू के किसी  वृद्धाश्रम में ही रहती  हैं, जिनकी देखभाल वहीं मित्र करते  है। एक रिश्तेदार ने अपने  बीमार पिता को वहीं महाराष्ट के अपने शहर के  वृद्धाश्रम में ही शिफट किया था क्योंकि न वह उनके साथ दूसरे शहर में रहने को तैयार थे और न ही उनकी जैसी शारीरिक स्थिति थी, उन्हें अकेले छोड़ा जा सकता था। यहां तक कि सरकारी बैंक भी बुजुर्ग के मकान की ऐवज में उसे हर माह कुछ निश्चित पेंशन देते हैं, जो अन्त तक उसे मिलता है और बुजुर्ग के न रहने पर वह मकान बैंक का हो जाता है।

कनुभाई के बारे में यह बात प्रमुखता से बतायी जा रही है कि वह चूंकि निःसंतान हैं इसलिए आश्रम की तरफ उन्होंने रूख किया है, लेकिन क्या पता यदि उनकी सन्तान होती भी और वह अमेरिका से नहीं आती तो  ? बच्चे किसी दूसरे शहर में या देश में रह रहे हों यह भी आम बात हो चली है अब ! दूसरी बात कि कनुभाई गरीबी के कारण वहां नहीं गए हैं यानि यदि आप के पास अपने खर्चे के साधनस्त्रोत हैं तो भी किसी सुरक्षित से लगनेवाले या लोगों के बीच रहना चाहे जहां सामूहिकता के साथ निजता का भी आनंद उठा सकें, यही निर्णय उन्होंने किया है। पत्रकार से उन्होंने यही कहा कि ‘मैं पहले भी खुश था’ और ‘आज भी खुश हूं’।

इन दिनों अपने माता पिता की देखभाल न करने को लेकर सन्तान की जिम्मेदारी का निर्वाह न करने की बात चलती रहती है, लेकिन माता पिता की भी मर्जी हो सकती है कि वह अपनी सन्तान के परिवार के साथ रहना चाहते हैं या नहीं। दूसरी बात जिनके सन्तान न हो, उनका गुजारा कैसे हो ? यानि कोई व्यवस्था सिर्फ मजबूरी के कारण बनायी जाय तो वह उपेक्षित बनी रहेगी जबकि समाज में अधिकाधिक विकल्प मौजूद हों तो चुनने की सुविधा रहती है। आजकल कुछ बड़े शहरों में प्राइवेट स्तर पर चलाये जाने वाले सीनियर सिटिजन्स होम्स के बारे में भी सुनने को मिलता है, जहां आप को भुगतान करना है और सुविधा लेनी है। अब जबकि नौकरियों को लेकर सन्तानों की गतिशीलता बढ़ी है, वहां इस तरह के इंतजाम की जरूरत बढ़ गयी है। हम चाहें जितना परिवारों की दुहाई दें लेकिन बुढ़ापे की असुरक्षा की बात भी सही है।

अब जहां तक निजी स्तर के ऐसे प्रयासों को देखें तो वह मुनाफे के तर्क के आधार पर होगा न कि व्यक्ति के अधिकार और गरिमा की रक्षा के लिए। इस मामले में भारत सरकार की नीतियां अभी बहुत पीछे हैं। बुढ़ापे में सभी के लिए पेन्शन की मांग लम्बे समय से की जाती रही है, जिसके लिए देश भर के बुजुर्गों ने आन्दोलन भी किए। प्रोफेसर प्रभात पटनायक ने ‘सर्वव्यापी वृद्धावस्था पेंशन योजना’ पर केन्द्रित अपने आलेख में इसके लिए आवश्यक आर्थिक संसाधनों की बात भी की थी। उनके मुताबिक भारत में 60 वर्ष से ऊपर कमसे कम आठ करोड़ लोगों को अगर दो हजार रूपए प्रति माह पेन्शन का इन्तजाम किया गया तो सरकार को 1,92,000 करोड़ की राशि का इन्तजाम करना पड़ेगा। उनके मुताबिक अगर सरकार कारोबारी घरानों को करीब पांच लाख करोड़ की कर राहत देती है तो क्या वह उससे भी आधी रकम का इन्तज़ाम बुजुर्गों को सम्माननीय जीवन प्रदान करने के लिए नहीं कर सकती है।

मगर सरकारें न इन मांगों को मानने के लिए तैयार है और न ही ऐसा करना उनके एजेंडे में है।  कुछ लोकलुभावन ढंग से गरीबी रेखा के हिसाब से सालाना कुछ हजार पेन्शन देने की बात भी चलती है, लेकिन एक तो वह पर्याप्त नहीं है, दूसरे सभी जरूरतमंद इसका लाभ उठा सकें इसकी कोई पालिसी नहीं बनी है। 

इस बुजुर्गियत के मुद्दे और समस्या को तीन तरह से सम्बोधित करने की जरूरत है। सबसे पहले हर व्यक्ति को अपने बुढ़ापे की योजना अपनी जवानी में ही बनाते रहना चाहिए ; दूसरे, घर परिवार के अन्दर बुजुर्गों का अपना स्थान रहे और तीसरे, सरकार की तरफ से पुख्ता इन्तजाम हो जिसमें वृद्धों को रहने के लिए सामूहिक आवास बने, जो आश्रम की मानसिकता के तहत ना चले बल्कि उन्हें उनकी इच्छा और हक के रूप में मिले। इसके अलावा कोई बुजुर्ग चाहे अपने घर में रहे या सामूहिक आवास में उसे स्वास्थ्य सुविधाएं एवं पेन्शन जरूर मिले।

हमारे संविधान के अनुच्छेद 41 में भी वृद्धावस्था में सार्वजनिक सहायता दिए जाने की बात कही गई है। लेकिन वह नीतिनिर्देशक तत्व के अन्तर्गत है। इसे प्रभावी बनाने की बात होनी चाहिए, जिसमें सार्वजनिक सहायता उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी हो। हमारे संविधान की धारा 21 हर नागरिक को गरिमामय जीवन जीने का अधिकार देती है। वह गरिमा कैसे प्राप्त होगी, यह मूल मसला है। क्या  वह सिर्फ परिवार के अन्दर के इन्तजामात से ठीक होगी या इस मसले का राजनीतिक हल निकाला जाना चाहिए ? पश्चिम के कई देश जो घोर पूंजीवादी हैं, वे भी इतनी व्यवस्था किए हैं कि कोई अशक्त असहाय प्राण न त्यागे। यद्यपि उन्हें भी ( और हमें भी) घर के अन्दर के गैरबराबरीपूर्ण रिश्ते समाप्त करने तथा सदस्यों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होने की जरूरत है, किन्तु यह सदिच्छा है तो मूल्यों में कैसे समाहित हो इसके लिए प्रयास करना चाहिए। लेकिन जहां तक नागरिक अधिकारों की गारंटी का सवाल है उसे तो राज्य को सुनिश्चित करना होता है।

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