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Saturday, May 14, 2016

एक ख़ूबसूरत साजिश

 -रूपाली सिन्हा 


कुछ साल पहले मैंने एक अख़बार में यह खबर पढ़ी थी कि एक सर्वेक्षण के मुताबिक इंग्लैंड में सुंदर स्त्रियों को नौकरियों में वरीयता प्राप्त हो रही है। हालाँकि न तो यह बात नयी है और न यह केवल इंग्लैंड की सच्चाई है ,बल्कि स्त्रियों के बारे में कमोबेश पूरी दुनिया में यही स्थिति है। यूँ तो 'सुन्दर' स्त्री और पुरुष हमेशा ही आकर्षण के केंद्र बने रहते हैं लेकिन स्त्रियों के सन्दर्भ में यह राजनीति का रूप ले लेता है-"सुंदरता की राजनीति" .....




अपने हक़ों के लिए महिलाओं की संघर्ष-यात्रा काफी लम्बी और कठिन रही है। सभ्यता के विकास में उन्होंनेभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज इक्कीसवीं सदी में जहाँ महिलाओं की एक बड़ी संख्या घर की चारदीवारी लांघ कर बाहर की दुनिया में अपने कदम रख रही है,अपनी पहचान दर्ज़ करा रही है वहीं सुंदरता के मिथक ने उसपर अपनी पकड़ और मज़बूत की है और उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया है। सवाल यह उठता है कि सुंदरता के मानदंड क्यों बनाए जाते है? कौन तय करता है ये मानदंड? औरतों के लिए सुंदर और आकर्षक दिखना प्राथमिक शर्त क्यों बन जाता है?

जीवन भर औरत इस खौफ से आतंकित रहती है कि अगर वह आकर्षक नहीं दिखेगी तो उसका क्या होगा? दूसरी तरफ सामान्य सी दिखने वाली या तथाकथित "अच्छी" नहीं दिखने वाली स्त्रियाँ जीवन भर कुंठा का शिकार रहती हैं। सौंदर्य-प्रतियोगिताएँ उदाहरण हैं जिनकी तरफ करोड़ों युवतियाँ ललचाई निगाहों से देखती हैं। और मिस वर्ल्ड,मिस यूनिवर्स, मिस कॉलेज,मिस मुहल्ला बनने का ख्वाब देखती रहती हैं। औरत के शरीर पर हमेशा से ही किसी और का नियंत्रण रहा है लेकिन विडम्बना यही है कि उसने इसे कभी पहचाना ही नहीं।  आज के पूँजीवादी समाज में औरत का शरीर बाजार के नियंत्रण में है।  वह भी उपभोग के अन्य सामानों की तरह एक वस्तु है।  औरत को आज इस इस्तेमाल से कोई परहेज़ भी नहीं है बल्कि वह तो इसे अपनी मुक्ति के खुले द्वार के रूप में देख रही है। एक तरफ पुरानी परंपरा और पितृसत्तात्मक सोच के तहत औरत का शरीर लज्जा और शील का प्रतीक है जो किसी की अमानत,किसी की संपत्ति है तो दूसरी तरफ बाज़ारवादी संस्कृति के तहत सुंदरता यदि बिकती है तो उसे बेचने में कोई बुराई नहीं है। दोनों ही जगह पितृसत्तात्मक वर्चस्व कायम है। आज की बाज़ारवादी संस्कृति में सौंदर्यबोध के मायने भी बदल गए हैं। सुंदरता का मतलब अब सौंदर्यबोध से उतना नहीं जितना क्रूरता से है।  अब 'ब्यूटी' की जगह 'सेक्सी' ने ले ली है  जिसका भावनात्मक अनुभूति से कुछ खास लेना-देना नहीं है, जिसका सिर्फ उपभोग किया जा सकता है। 

बाजार की बानगी तो यह है कि 2014 फ़रवरी के एक सर्वे के मुताबिक भारत में कुल फेयरनेस क्रीम का मार्केट लगभग 3000 करोड़ है जो सालाना 20 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। 2016 मई का एक सर्वे बताता है कि भारतीय फेयरनेस क्रीम का मार्केट सालाना 18 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। जबकि वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध हो चुका है कि क्रीम लगाने से कोई काले से गोरा नहीं बन सकता।  सुंदरता को 'परफेक्ट' बनाने के लिए विज्ञान और तकनीक का भी धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है। कुछ समय पहले हिन्दुस्तान टाइम्स ने एक महिला से बात-चीत की थी। उसने गर्व से बताया कि उसने तीन कॉस्मेटिक सर्जरी करवाई है और ज़रूरत पड़ी तो और भी करवा सकती है। सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि उसके पति को इसकी भनक भी नहीं है। उसके पति उसके नाक-नक्श में हमेशा खोट निकलते थे,विशेष रूप से उन्हें उसकी नाक नहीं पसंद थी। पहली बार उसने नाक की सर्जरी करवाई जब पति शहर से बाहर थे। लौटने पर पति को कुछ भी पता न चला (वे उसे कितने ध्यान से देखते थे?) दो साल बाद उसने अपने होंठ 'परफेक्ट' कराये ,उसके बाद उसने अपनी कमर पतली करवाई।  'देह की दासता' का इतना क्रूर रूप शायद ही इससे पहले कभी रहा हो। चाकू की नोक पर चलना अब एक तरह की लत का रूप लेता जा रहा है। प्रसिद्द मनोचिकित्सक डॉ समीर पारीख का कहना है कि, "यह एक तरह की मानसिक स्थिति है जिसे बॉडी डिस्मोर्फिक डिसऑर्डर कहा जाता है, यह शरीर से ज़्यादा दिमाग की समस्या है।"  आमतौर पर प्लास्टिक सर्जरी का इस्तेमाल दुर्घटनाग्रस्त अंग को ठीक करने के लिए किया जाता रहा है।  यदि इसे एक मानसिक बीमारी मानें तो भी इसकी जड़ समाज की उस मानसिकता में है जहाँ सौंदर्य के निर्धारित मापदंड तैयार किये जाते हैं। नोमी वुल्फ अपनी पुस्तक "द ब्यूटी मिथ" में लिखती हैं-'भविष्य की चेतावनी जो भी हो,इतना निश्चित है कि अपनी अकृत्रिम अथवा स्वाभाविक अवस्था में स्त्रियाँ, स्त्रियों की कोटि से कुरुपाओं की कोटि में डाली जाती रहेंगी और शर्म के मारे उन्हें असेंबली लाइन शारीरिक पहचान की ओर जाना ही होगा।  जैसे-जैसे औरतें इस दबाव के आगे झुकने लगेंगी, दबाव इतना बढ़ जायेगा कि अंग परिवर्तन हर स्त्री के लिए अनिवार्य हो जायेगा।  और एक दिन ऐसा आएगा जब कोई भी स्वाभिमानी औरत सर्जरी के द्वारा अपना चेहरा बदलवाए बिना घर से बहार निकलने की हिम्मत नहीं कर सकेगी"      

आज तेज़ी से बढ़ते हुए  'काया' क्लीनिकों से यह स्पष्ट होता है कि अब हर औरत सुन्दर दिख सकती है ,उसे अपने शारीर पर लज्जित होने की कोई ज़रूरत नहीं है।  औरत अपनी सारी धन-संपत्ति लुटाकर अपने शरीर को चाकू की नोक पर रखने को तैयार है क्योंकि आज भी सौंदर्य ही उसकी असली पहचान,असली हथियार है। अपनी गुलाम मानसिकता और पितृसत्तात्मक सोच के कारण शुरू से ही औरतें सुंदरता को अपनी पूँजी और ताक़त के रूप में इस्तेमाल करती रही हैं लेकिन आज जबकि औरतों की क्षमता और प्रतिभा का लोहा हर क्षेत्र में माना जा रहा है वे सौंदर्य के इस मिथक से बाहर नहीं निकल पा रही हैं। अपनी योग्यता और क्षमता के द्वारा वे अपनी पहचान बनने को क्यों तैयार नहीं हैं,इसके साथ उन्हे सुंदरता की बैसाखी क्यों चाहिए? कारण है अपने शरीर को पुरुषों को आकर्षित करने या उनके उपभोग का साधन मानना।  एक परिचिता जो दिल्ली विश्व विद्यालय से पी एच डी कर रही हैं उनका कहना है कि विभागों में भी यदि आप तथाकथित रूप से सुन्दर हैं और 'अबला नारी' की छवि रखती हैं तो आपके सभी काम आसानी से होते चले जायेंगे, सभी आपकी मदद करेंगे, लेकिन अगर आप आत्मनिर्भर,आत्मविश्वासी हैं ,मदद के लिए किसी पुरुष की 'गुहार'नहीं लगातीं तो आपकी राह में बाधाएं ज़रूर आनी हैं। विश्वविद्यालय  के चुनावों में भी सौंदर्य का सिक्का खूब चलता है।  नौकरी के क्षेत्र में महिलायें पुरुष बॉस अधिक पसंद करती हैं। 

     उपरोक्त उदाहरण ऊपरी तौर पर स्त्री विरोधी लग सकते हैं ,पर ये उदाहरण इस बात पर प्रकाश डालने के लिए हैं कि महिलायें स्वयं किस कदर पितृसत्तात्मक सोच और बाजार की गिरफ्त में हैं कि अव्वल तो उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं होता कि उनकी गरिमा और उनके सम्मान को कुचला जा रहा है और यदि वे इस स्थिति को समझती भी हैं तो  स्वयं को  वस्तु मानने में कोई अपमानजनक बात दिखाई नहीं देती। अब वह समय आ गया है जब औरत  सौंदर्य के इस मिथक को तोड़कर अपने मानदंड खुद तय करे जिसका आधार उसकी योग्यता,उसकी क्षमता और प्रतिभा हो न कि मात्र देह जिसे पाने,बनने में उसकी कोई भूमिका नहीं,जो प्रकृति-प्रदत्त है। अपनी मंज़िल को पाने के लिए सौंदर्य के शॉर्टकट का सहारा न लेकर लम्बे,घुमावदार और पथरीले रास्तों पर चलना स्वीकार करे। अपनी योग्यता और ऊर्जा का इस्तेमाल सामजिक ज़िम्मेदारियों को निभाने में भी करे क्योकि वह भी इसी समाज का हिस्सा है। आमतौर पर अधिकांश महिलाएं सामाजिक उत्तरदायित्वों को पुरुषों के हिस्से में डाल देती हैं,सामाजिक बदलाव,विकास या समस्याओं से कोई सरोकार नहीं रखतीं,उन्हें वे 'पुरुषों के काम' मानती हैं। अगर वास्तविक मुक्ति चाहिए तो हमें अपनी भूमिका का चुनाव करना ही होगा।    

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