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Sunday, May 22, 2016

स्त्रियाँ घरेलू क्यों बनाई जाती हैं

– सरला सुन्दरम्

भारतीय सभ्यता और संस्कृति की बात करने वाले कई लोग घर को ही स्त्री का कार्यक्षेत्र मानते हैं उन्हें यह पसंद नहीं कि स्त्रियाँ पुरुषों की तरह घर से बाहर निकलकर कोई कामकाज करें। वे अपनी बात मनवाने के लिए स्त्री को ‘गृहस्वामिनी’ या ‘घर की मालकिन’ कहकर महिमामंडित करने का प्रयास करते हैं और एक सरासर ग़लत तर्क प्रस्तुत करते हैं कि स्त्रियाँ तो स्वभाव से ही घरेलू होती हैं और उन्हें घरेलू ही रहना अच्छा लगता है। ऐसे लोग उस घर को आदर्श बताते हैं, जिसमें पुरुष बाहर जाकर काम और कमाई करते हैं, जबकि स्त्रियाँ घर-गृहस्थी संभालती हैं। ज़ाहिर है, ऐसे लोगों की नज़र में पुरुषों का काम तो काम होता है, स्त्रियों का काम कोई काम नहीं होता। उन्हें पुरुष तो काम करते दिखाई देते हैं, स्त्रियाँ कोई काम करती दिखाई नहीं देतीं। इतना ही नहीं, स्त्रियाँ उन्हें पुरुषों के काम और कमाई के बल पर ‘घर की मालकिन’ बनी बैठी दिखाई देती हैं, मानो वे बिलकुल निकम्मी-निठल्ली हों और फिर भी सारी संपत्ति की स्वामिनी हों!

Friday, May 20, 2016

वरिष्ठ नागरिक आवासीय कालोनी या वृद्धाश्रम ?

-अंजलि सिन्हा

महात्मा गांधी के पौत्र कनुभाई गांधी - जो उनके तीसरे बेटे रामदास गांधी के बेटे हैं - के अपनी पत्नी शिवालक्ष्मी के साथ बदरपुर के गुरू विश्राम  वृद्धाश्रम में रहने की ख़बर बनी है। उनके पास रूपए पैसे की कमी नहीं है। लगभग 40 साल वह अमेरिका में रहे और ‘नासा’ जैसी प्रतिष्ठित संस्थान में नौकरी की थी। अब वे खुद 87 साल के हैं और उनकी पत्नी 85 साल की है, और जैसा कि समझा जा सकता है कि इस उम्र में अधिक देखरेख की आवश्यकता होती है। 2014 में ही भारत आ गए और गुजरात में नवासारी के  वृद्धाश्रम में रहे, जहां ठगी के शिकार होने के बाद सूरत आ गए और अब दिल्ली के बदरपुर स्थित आश्रम में पहुंचे हैं। नवासारी में उनके ठगी का शिकार होना ख़बर नहीं बनी, मगर  अब जबकि वह दिल्ली के  वृद्धाश्रम पहुंचे हैं तो वह सूर्खियां बना, यहां तक कि केन्द्र सरकार के एक मंत्राी भी उनसे वहां मिलने पहुंचे। सत्ताधारी पार्टी के किसी अतिउत्साही नेता ने कनुभाई के  वृद्धाश्रम पहुंचने के लिए कांग्रेस की आलोचना भी की है।

Saturday, May 14, 2016

एक ख़ूबसूरत साजिश

 -रूपाली सिन्हा 


कुछ साल पहले मैंने एक अख़बार में यह खबर पढ़ी थी कि एक सर्वेक्षण के मुताबिक इंग्लैंड में सुंदर स्त्रियों को नौकरियों में वरीयता प्राप्त हो रही है। हालाँकि न तो यह बात नयी है और न यह केवल इंग्लैंड की सच्चाई है ,बल्कि स्त्रियों के बारे में कमोबेश पूरी दुनिया में यही स्थिति है। यूँ तो 'सुन्दर' स्त्री और पुरुष हमेशा ही आकर्षण के केंद्र बने रहते हैं लेकिन स्त्रियों के सन्दर्भ में यह राजनीति का रूप ले लेता है-"सुंदरता की राजनीति" .....