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Monday, March 7, 2016

आठ मार्च - अन्तरराष्टीय महिला दिवस: अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलन्द करने का दिन


-अंजलि सिन्हा

दुनिया भर की शोषित-पीड़ित महिलाओं की मुक्ति का उत्सव आठ मार्च ‘अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस’ समूची दुनिया में धूूमधाम से मनाया जाता है। आज के दिन दुनिया के तमाम छोटे-बड़े शहरों, नगरों, कस्बों में महिलाएं सड़कों पर उतरती है, रैलियां करती हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं और स्त्राी मुक्ति के अधूरे संघर्ष को पूरा करने का अपना संकल्प दोहराती हैं।
गौर करने की जरूरत है कि इस दिन का ऐतिहासिक महत्व क्या है।



यह दिन दुनिया की महिलाओं के लिए अन्याय तथा शोषण के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक दिन है तथा साथ ही जीत के जश्न का भी है। 1857 में इसी दिन को पहली बार संगठित रूप में महिलाएं शिकागो की सड़कों पर उतरी थीं। उन्होंने अपने फैक्टरी मालिकों से अपने काम घंटे 16 से घटा कर 10 घंटा करने की तथा अपने नन्हें बच्चों के लिए पलनाघर आदि सुविधा की मांग की थी। बाद में 1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन शहर में समाजवादियों के सम्मेलन में जानीमानी नेता क्लारा जेटकिन के प्रस्ताव पर इस दिन को महिला दिवस के रूप में मनाने का तय किया गया। फिर 1975 में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भी इस पर अपनी मुहर लगायी। धीरे धीरे यह दिन दुनिया भर में प्रचलित हो गया।
आज हमें अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के इतिहास को जानने की ज्यादा जरूरत इसीलिए है क्योंकि आज बाजारशक्तियों को खुली छूट के जमाने में हर चीज का सतहीकरण तथा बाजारीकरण हो रहा है। कठिन संघर्षों, भयंकर शोषण उत्पीड़न तथा अन्याय के खिलाफ एकजुट होने का साहस तथा बेहतर समाज बनाने का लक्ष्य जानबूझ कर कहीं दबा देने की कोशिश दिखती है तथा कहीं निरूद्देश्य आजादी की सतही रूप से बाजार में इच्छा निर्मित करने और फिर उसे पा लेने की आजादी तक इस प्रतीक दिन को खींच कर ले जाया जाता है।
इसका लाजिमी नतीजा यह हुआ है कि मेहनतकश मजदूरों के संघर्षों की विरासत के इस ऐतिहासिक दिन के संघर्ष की धार कम होने लगी है तथा उसमें उत्सव का पक्ष हावी होता गया है। सरकारों के साथ ही कई स्वयंसेवी संस्थाओं यहां तक कि कार्पोरेट जगत के लिए भी यह एक दिन अपने फायदे में इस्तेमाल करने का दिन बन गया है। इन कार्पोरेट समूहों ने तो अपने उत्पाद को स्त्राी मुक्ति में सहयोगी बता कर बेचने का फार्मुला भी अख्तियार कर मुनाफा बटोरने की रणनीति अपनायी है।
जीत के जश्न से भी मतलब यही है कि ढेरों प्रयासों में धीरे धीरे बहुत कुछ हासिल भी होता जाता है। डेढ सौ से अधिक वर्ष पहले शिकागो की महिलाओं ने अपने संघर्ष में जीत हासिल की थी यानि मालिकों द्वारा उनकी मांगें मान ली गयी थी। उसके बाद के दौर में भी दुनिया भर में अलग अलग मुद्दों पर महिलाएं खुद के लिए बराबरी की मांग करती रहीं तथा साथ ही कामगार के रूप में शोषण के खिलाफ एकजुट हो लड़ती रहीं। इन प्रयासों ने किसी न किसी रूप में अपना प्रभाव भी समाज पर डाला। चाहे वह कानून में जेण्डर बराबरी की बात हो या हमारे जैसे पिछड़े समाजों में शिक्षा हासिल करने का मुद्दा हो या अन्य प्रकार के सशक्तिकरण का सवाल हो, वह जारी है।
कोई यह पूछे कि आज के समय में महिला दिवस का औचित्य क्या बनता है ?
सबसे बड़ी जरूरत यह है कि इस दिन को रस्म अदायगी की रीति से बचाया जाए और सही अर्थों में इसे महिलाओं के साथ होने वाले हर प्रकार की गैरबराबरी, हिंसा और शोषण के खिलाफ एकजुट होने के प्रतीक दिन के रूप में मनाया जाए। आज हक़ीकत यही है कि महिलाएं सार्वजनिक और निजी दोनों ही दायरों में हिंसा तथा असुरक्षा की शिकार हैं, तमाम तरह की यौन हिंसा के साथ क्रूर तथा सामूहिक बलात्कार एवं हत्या जैसे अपराध एक दो नहीं हजारों की संख्या में घटते हैं, अभी तक शिक्षा तथा रोजगार में वह बराबरी पर नहीं पहुंची हैं और उसे समान अवसर उपलब्ध नहीं हैं ; उनकी गतिशीलता विभिन्न तरह से रोकी जाती है तथा गृहिणी बने रहने का विकल्प ही सुलभ लगता है। अगर सार्वजनिक दायरे को महिलाओं के लिए सुरक्षित एवं अनुकूल बनाने की जरूरत समझी गयी होती तो उसके ठोस उपाय भी होते जिसके चलते कुछ दशकों में समानता वास्तविकता में दिखने लगती। यदि हर प्रकार की नौकरियों में उनकी निश्चित संख्या तथा बराबर प्रतिशत बनाने का लक्ष्य रखा जाता और परिवार के एक निर्भर प्राणी से उसकी पहचान खतम कर आर्थिक रूप से सशक्त एवं सक्षम तथा अपने भरोसे अपनी गृहस्थी चलानेवाली सदस्य का निर्माण होता, तो स्थितियां भिन्न होतीं। राजनैतिक रूप से उसकी स्थिति आज भी कितनी कमजोर है इसका अन्य कोई भी प्रमाण देने की जरूरत नहीं है। संसद तथा विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व कितना है यह सबके सामने है। ऊपर से 33 फीसद आरक्षण का मसला अभी तक लटका है। आज आलम यह है कि जो महिलाएं ढेरों जद्दोजहद के बाद बाहर निकल पाती हैं और कुछ कर पाती हैं, उन्हें भी बार बार आश्वासन देना पड़ता है कि वे परिवार की जिम्मेदारी भी ठीक से वहन करती हैं और ऊपर से करवा चौथ पर निराजल भी रहती हैं।
स्त्राी मुक्ति के लिए सक्रिय संस्थाओं, जारी आन्दोलनों के योगदान का मूल्यांकन किस तरह किया जा सकता है।
यदि भारत में महिला आन्दोलन की आज की स्थिति तथा कार्यभार की हम बात करें तो यह साफ दिखता है कि यह आन्दोलन आज यथास्थिति तथा अवरोध का शिकार है। इसकी वजह से जरूरत आन पड़ती है कि हम महिला मुद्दों पर होने वाले प्रयासों का मूल्यांकन करें।
अगर हम सिंहावलोकन करें तो यही दिखता है कि आजादी के बाद यहां आन्दोलन की शुरूआत ही मुद्दा आधारित थी यानि एक-एक मुुद्दे पर अभियान चले जैसे बलात्कार विरोधी आन्दोलन, दहेज उत्पीड़न तथा दहेज हत्याविरोधी आन्दोलन, घरेलू हिंसा के खिलाफ अभियान, कार्यस्थल को यौन अत्याचारों से सुरक्षित करने के लिए आन्दोलन आदि। इन अभियानों, आन्दोलनों ने मिल कर समूचे नारी आन्दोलन का फ़लक तैयार किया। इन विभिन्न अभियानों में आरोह-अवरोह आते रहे जैसा कि किसी भी आन्दोलन में आते हैं। आन्दोलन की स्थिति तथा प्रभावों का मूल्यांकन ठीक ढंग से नहीं किया जा सका। उदाहरण के लिए यदि हम दहेज विरोधी अभियान को देखें तो इस अभियान के दबाव में ही दहेज निरोधक कानून बने, दहेज को एक सामाजिक बुराई माना गया, लेकिन समस्या में कमी नहीं आयी। दहेज आज भी एक गम्भीर समस्या है तथा एक प्रमुख स्त्राीविरोधी हिंसा है। अभियान ने इसे एक नैतिक तथा कानूनी मुद्दा बनाया, यह राजनीतिक-आर्थिक मांगांे में तब्दील नहीं हो सका कि समाज में औरत की बराबरी की हैसियत कैसे बनेगी ? कानून-संविधान जो भी कहे हकीकत में चल-अचल सम्पत्ति में मिल्कियत पुरूषों के पास बनी रही। यहां तक कि बेटी को सम्पत्ति में बराबर का हक 2005 में जाकर मिला और वह भी भारतीय समाज में सिर्फ कागज पर ही अस्तित्व में रहेगा। भाई-बहनों में सम्पत्ति का बराबर बंटवारा नहीं होता क्योंकि लड़की ससुराल की सदस्य समझी जाती है और ससुराल अपने परिवार के नए सदस्य को अपनी इच्छानुसार अधिकार देता है। लड़की को शुरू से पालन-पोषण में आत्मनिर्भरता के लिए तैयार नहीं किया जाता है बल्कि उसे ससुराल के लिए तैयार किया जाता है। ऐसे में दहेज समस्या जड़ से खतम होने की सम्भावना कहां थी ? व्यक्ति के व्यक्तिगत अधिकार हमारे समाज में स्थापित नहीं हो पाया और महिला आन्दोलन ने भी बेटी बहू पत्नी के रूप में ही समाज और सरकार से हक मांगे हैं।
परिवार के अन्दर के इन रिश्तों में, हर प्रकार के शोषण-उत्पीड़न हिंसा जारी रही लेकिन परिवार की वैधता पर पवित्राता पर प्रश्न खड़ा नहीं हो पाया। लड़कियों, छोटी बच्चियों के साथ परिवार के अन्दर अपने ही ‘आत्मीयों’ द्वारा यौन अपराध जारी रहे, लेकिन समाज में यह स्वर ही गूंजा कि बाहर लड़कियों के लिए असुरक्षित है लिहाजा वे घर के अन्दर ही सिमटी रहें। महिलाएं घरों से बेदखल की गयीं, परित्यक्ता बना दी गयीं या विधवा आश्रम में भेजी गयीं या हाशिए का जीवन घर के अन्दर ही जीती रही, लेकिन उन्हें परिवार के सदस्य के रूप में ही समाधान ढूंढा गया।
चुनावों में महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा अक्सर बनता है और सभी चुनावी पार्टियां भी वादा करती हैं कि वे यौन हिंसा तथा बलात्कार की घटनाओ ंपर काबू करने के उपाय करेंगे, लेकिन देखने में यही आता है कि इसके प्रति कोई गम्भीर नहीं है। क्योंकि देखा यही गया कि सारी जिम्मेदारी पुलिस पर डाल कर,  उसकी चौकसी बढ़ाने तक सीमित कर दी गयी है, जबकि यदि सुरक्षित समाज का निर्माण करना है तो कई उपाय एक साथ करने होंगे तथा दूरगामी असर डालनेवाले काम करने होंगे। मसलन बड़ी संख्या में वे बाहर निकलेंगी तो समाज महिलाओं के साथ काम करना सीखेगा। इसके लिए उन्हें हर जगह सुविधा, अवसर तथा प्रेरित करने के उपाय और नीति बनानी होगी। पुरूषों की स्त्राीद्रोही हिंसक मानसिकता बदलने के लिए भी ठोस पहल करनी होगी तथा चेक करने के पैमाने भी तय करने पड़ेंगे। किसी भी कार्यस्थल पर, दफ्तर में यदि स्त्राी पुरूषों की संख्या बराबर की है तो वातावरण का पुरूषप्रधान वर्चस्व पहले कदम पर ही टूटेगा और फिर उनमें संवेदनशीलता बढ़ाने के अन्य उपाय करने होंगे। आर्थिक रूप से बराबर की तथा सामाजिक रूप से सशक्त औरत घरेलू हिंसा की शिकार देर तक नहीं बनी रह सकती है।

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