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Saturday, February 13, 2016

प्रेमदोही द्रोही समज मेें प्रेम का पर्व

                                                               
-स्वदेश कुमार सिन्हा

यह महज संयोग ही है कि इस वर्ष बसंत का पर्व और वेलेन्टाइन डे करीब-करीब एक ही साथ पड़ रहे हैै। प्राचीन ’संस्कृत साहित्य’ में बसंत के समय ’महोत्सव पर्व’ मनाने की प्रथा का वर्णन आता है ,यह महोत्सव भी एक प्रकार का प्रेम पर्व ही था। 
गलिब का एक शेर है-
’’ये इश्क नही ऑसा , बस इतना समझ लीजे,
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। ’’

’गालिब’ने यह शेर न जाने किस मनःस्थिति मेें लिखा होगा पर इस बात में कोई मतभेद नही है कि भारत मेेें आज भी एक बड़ी आबादी में स्त्री-पुरूषो के बीच का प्रेम आग के दरिया में डूबने के समान  ही है। हमारे यहॉ सूफी भक्त कवियोें ने ईश्वर या खुदा को प्रेमी या प्रेमिका मानकर प्रेम की जो लौ जलाई थी वह शुद्ध अध्यात्मिक थी, उसमेें शरीर की उपस्थिति नही थी , भारतीय समाज मेें प्रेम मेें शरीर की उपस्थिति या अनुपस्थिति हमेशा विवादो मेेें रही है। सूफी सन्त प्रेम मेेें सम्पूर्ण समर्पण मानते थे , जिसके अभाव मेें प्रेम संभव ही नही है।

प्रेम गली अति सांकरी , यामंे दुई न समाय,
जब मै था तब हरि नही , अब हरि है मै नाय।।

भक्त कवियित्री ’’मीरा’’ के लिए प्रेम एक सहता-सहता एक अन सहयता सा दर्द है। 

जो मै ऐसा जानती, प्रीति किय दुख होय,
नगर ढ़िंढ़ोरा पीटती, प्रीति न करियोेें कायेे।

हमारे यहॉ धार्मिक मिथको में हमेशा दो ध्रुूवोें का प्रेम मोैजूद रहा है। एक ओर ’राम-सीता’ का मर्यादित दाम्पत्य प्रेम है , दूसरी ओर राधाकृष्ण का प्रेमी -प्र्रेमिका का शिव-पार्वती का अर्द्धनारीश्वर होकर किया गया ’महारास’ यद्यपि ये सभी रूप लोकमनस मेें समान रूप से पूज्य है। एक ओर शिव पार्वती के साथ महारास करते हैैें , दूसरी ओर तप मेें बाधा डालने पर ’काम’ और ’प्रेम के देवता’ ’कामदेव’ को तीसरा नेत्र खोलकर भस्म भी कर देते हैैं। ’लैला-मंजनू , ’शीरी -फरहाद’ ’सोहनी-महिवाल’ ’हीर-रॉझा ’ ’रोमियो-जूलियट’ जैसी प्रेेम गाथाओ मेें ज्यादातर ने अपने प्रेम के लिए प्राणोत्सर्ग कर दिया। त्याग ,बलिदान और प्राण देने की यह अवधारणा ,सामंती समाज मेेें जहॉ सभी तरह का स्त्री-पुरूषो के बीच का प्रेम निषेध था उस व्यवस्था के खिलाफ आत्मघाती विद्रोह के रूप मेेें सामने आता है। 

     प्रेम तथा प्रेम विवाहो को कानूनी औैर राजनैतिक अधिकार अमेरिका तथा सम्पूर्ण पश्चिमी जगत के देशो मेें सत्रहवी और अट्ठारहवी शताब्दी मेें ही मिल गये थे। वहॉ अब प्रेम के लिए जान देने का रहस्य और रोंमांच लगभग समाप्त हो गया है ,वहॉ पर आज जाति वर्ण से उपर उठकर शत प्रतिशत विवाह हो रहे हैै। तथापि: प्रेम तथा विवाहो मेेें ’वर्ग’ जरूर हाबी है , परन्तु यह तो वर्तमान सामाजिक व्यवस्था की अनिवार्यता है। प्रेम का असली मुद्दा तो भारत सहित अधिकांश पूर्व के मुल्को मेें है। यद्यपि हमारे देश का संविधान सभी को प्रेम करने तथा जाति धर्म से उपर उठकर विवाह करने की अनुमति देता है। एक प्रेम विरोधी समाज मेें ’वालीवुड’ की प्रेम प्रधान फिल्मो का जादू आज भी लोगो के सिर पर चढ़ कर बोलता है, भारतीय सिनेमा के सौ वर्ष के इतिहास मेें नब्बे प्रतिशत फिल्मो का मूल तथ्य स्त्री पुरूषो के के बीच का प्रेम ही है। अगर सिनेमा से यह निकाल दिया जाये तो सिनेमा के पास कहने के लिए कुछ नही बचेगा। अर्न्तविरोध यह है कि यह उस समाज मेेें जहॉ पर गोत्र तथा जाति से विवाह करने वाले प्रेमी जोड़ो को खाप पंचायतो के हुक्म से फॉसी पर लटकाया जाता हो ’’आनर किलिग’’ के नाम पर पिता बेटी की ,भाई बहन की हत्या करता हो ,अर्न्तधार्मिक विवाहो पर दंगे तक हो जाते हैै। अनेक अतिवादी धार्मिक संगठन बम्बई दिल्ली ,बंगलौर जैसे महानगरो तक मेें बड़े-बड़े शापिंग काम्पलेक्स, पार्को आदि मेें अतिवादी धार्मिक संगठन प्रेमी जोड़ो से मारपीट तथा पिटाई तक करते हैै , तथा पुलिस प्रशासन का कानून मूकदर्शक बना रहता है। यह सब उस देश मेें जहॉ साहित्य मेें मदनोत्सव मनाने का वर्णन आता हो जहॉ राधाकृष्ण ,शिवपार्वती पूज्य हो इन्ही विरोधाभासो को वेलेन्टाईन डे पर बाजार भुना रहा है। जहॉ दमन है वहॉ प्रतिरोध भी है। बाजार इस बात को भली भॉति जानता है। महानगरो तथा छोटे-छोटे शहरो मेें भी वेलेन्टाईन डे या वेलेन्टाईन वीक मेें मॅहग मॅहगे गिफ्ट , शापिंग माल या रेस्टोरेन्ट मेें दॉवते तथा चोरी छिपे या खुलेआम प्रेमी जोड़ो का मिलना जुलना शायद इसी विद्रोह की परिणति या परिचायक है। जब तक प्रेम विरोधी इन समाजो मेें संघर्ष का कोई नया औजार विकसित नही हो जाता है ऐसे उत्सवोें का रहस्य व रोमांच बना रहेगा। बाजार गुलजार रहेेंगे ,विरोधो की लाख कोशिशो के बावजूद। 
                                                

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