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Monday, February 1, 2016

नियुक्ति की शर्तों का मजहब से रिश्ता ?

-अंजलि सिन्हा

हाल में उत्तर प्रदेश सरकार ने उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एक संशोधित अधिसूचना जारी की है, जिसके तहत अब कहा गया है कि राज्य के परिषदीय स्कूलों में उर्दू शिक्षकों की भर्ती में एक से अधिक पत्नी होने पर अपात्रा होने जैसा प्रावधान अब नहीं होगा। कहा जा रहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की आपत्ति के बाद सरकार ने इस प्रावधान को हटाने का निर्णय लिया है।

बहरहाल, इस मसले पर कुछ दिनांे तक काफी गहमागहमी रही।


मामला इस तरह बढ़ा कि सरकार ने उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एक अधिसूचना जारी की। पिछले काफी समय से पद रिक्त थे और चुनाव के दौरान ही अखिलेश यादव ने वादा किया था कि वे उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति करेंगे। अब चुनावी वादा पूरा करने का मामला हो या आने वाले चुनावों में लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करने का मामला हो सरकार ने साढ़े तीन हजार उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति की सरकारी घोषणा कर दी। अगर किसी भी नौकरी के लिए जैसे आवेदन होते हैं वैसे ही होता तो शायद विवाद नहीं होता, लेकिन नियुक्ति की शर्तों को लेकर विवाद इस वजह से गहरा गया क्योंकि इसमें शर्त यह रखी गयी कि जिनकी एक से अधिक पत्नी है वे पात्रा नहीं होंगे। तर्क यह भी दिया गया कि यह प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि शिक्षक की मौत के बाद पत्नी को पेंशन देने के मामले में किसी तरह के विवाद का सामना न करना पड़े। इतनाही नहीं यह भी कहा गया कि किसी महिला अभ्यर्थी ने एक ऐसे पुरूष से विवाह किया हो जिसकी पहले से पत्नी जीवित हो तो वह भी अपात्रा होंगी।
जैसा कि होना था आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इसका विरोध करते हुए इसे मुसलमानों के शरई अधिकारों का हनन बताया। अपने आप को समुदायविशेष का प्रतिनिधि कहलानेवाले राजनेताओं, संगठनों ने भी इस सुर में सुर मिला दिया और फिर सरकार ने पुनर्विचार किया।

यह सोचना मासूमियत की हद होगी कि सरकार को इस बात का अन्दाज़ा नहीं रहा होगा कि ऐसी घोषणा की क्या प्रतिक्रिया होगी, मगर इसके बावजूद उसने ऐलान कर उसे समुदायविशेष के प्रतिनिधि कहलानेवाले संगठनों के दबाव पर वापस लेने का जो काम किया, इस पूरे घटनाक्रम से बहुत सारे सवाल खड़े होते हैं। दरअसल, अपने आप को अल्पसंख्यक हितैषी कहलानेवाली अखिलेश सरकार ने इस एक तीर से बहुत सारे निशाने साध लिए, जिसने एक साथ बहुसंख्यकवादियों की भी मदद की और उदार कहलानेवालों को भी खुश किया और बाद में पलटी खाकर अल्पसंख्यकवादियों को भी प्रसन्न कर दिया।

हालांकि अधिसूचना में शायद ऐसा कुछ न हो कि उर्दू शिक्षक के पद के लिए सिर्फ मुस्लिम व्यक्ति ही अर्जी दाखिल करे, लेकिन सहजबोध में यही है कि उर्दू मुसलमानों की भाषा है और हिन्दी एक तरह से हिन्दुओं की जुबान है। खारिज की अधिसूचना इस बात का भी संकेत देती है कि उर्दू पढ़ाने का काम तो मुस्लिम पुरूष ही करता है, महिलाएं अर्थात मुस्लिम महिलाएं इसके लायक नहीं बन सकतीं।

हमारे समाज में ‘हम’ और ‘वे’ की राजनीति तथा भावना के कारण अक्सर यह कह कर मुस्लिम समाज को पिछड़ा दिखाने की कोशिश होती है कि वे तो चार चार शादियां करते हैं जबकि हकीकत में एक फीसद भी ऐसा नहीं करते। दूसरे हिन्दू कोड बिल में हिन्दुओं के लिए एकल विवाह को कानूनी बनाया गया क्योंकि हिन्दुओं में भी बहुपत्नी प्रथा प्रचलित थी। एकल पति और पत्नी की प्रथा को मान्यता देना प्रगतिशील कदम था और इस रूप में धार्मिक आवरण के बाहर का मसला है तथा महिलाओं के समान अधिकार से जुड़ा मसला है।

अब एक से अधिक शादी करनेवालों को उर्दू शिक्षक की नौकरी से अपात्रा घोषित करने से वही तर्क मजबूत होता है कि उर्दू पढ़ानेवाले और पढ़नेवाले ‘वही’ होते हैं।  दरअसल हिन्दी और उर्दू दोनों को एक भाषा के रूप में स्थापित किए जाने की जरूरत है जो किसी धर्म या समुदायविशेष की पहचान की गिरफत में ना हो।
दूसरे उनके इस कदम से लिबरल समुदाय भी खुश हो गया होगा, जो निश्चित ही साम्प्रदायिक नही होता, और वह अल्पसंख्यकों में महिला अधिकारों को लेकर जेनुइनली चिंतित रहता है और इस बात पर जोर देता रहता है कि इक्कीसवीं सदी में हर धर्म एवं सम्प्रदाय में स्त्राी पुरूष अधिकारों में बराबरी होनी चाहिए। यह वही तबका है जो समान नागरिक संहिता की समूची बहस के बहुसंख्यकवादियों द्वारा ‘अपहरण’ किए जाने को लेकर उद्वेलित होता है और अपरोक्ष-परोक्ष रूप से इस बात का प्रयास करता है कि हर समुदाय में जेण्डर न्यायपूर्ण कानूनों को बढ़ावा मिलना चाहिए, किसी भी समुदाय में पर्सनल लॉ के नाम पर महिला अधिकारों को वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

और अन्त में, यथास्थिति बहाल करके अल्पसंख्यकों के हितों के प्रतिनिधि होने का दावा करनेवालों को भी खुश रहने का मौका दिया।

यह सोचने की बात है ही कि आखिर अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हितैषी कहलानेवाला पर्सनल लॉ बोर्ड अन्ततः आधी आबादी के अधिकारों के बारे में क्या सोचता है ? अगर वह यह सोचता है कि एक से अधिक शादी करनेवालों को ऐसी ‘छूट’ मिलती रहनी चाहिए तो यह समझने का मसला है कि यह छूट किसका अधिकार है और क्या इस अधिकार के बने रहते किसी और के अधिकार का हनन होता है या नहीं। यह अलग बात है कि इस अधिकार पर वास्तविक जीवन में अमल करनेवाले बहुत कम हैं।

मुस्लिम महिलाओं की स्थिति पर भी बहुत बातें हुई हैं और सुधार के प्रयास भी चल रहे हैं और यद्यपि चार शादियों पर पाबन्दी से ही उनकी स्थिति में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होनेवाला है, फिर भी हर स्तर पर स्त्राी और पुरूष के लिए समान व्यवस्था पर स्वीक्रति के लिए आवाज़ उठाना जरूरी है और यही अवसर है कि महिलाएं स्वयं बोलें कि ऐसी व्यवस्था जो भले कागज़ पर हो फिर भी हमें नहीं चाहिए।

ऐसा नहीं कहा जा सकता कि किसी आधुनिक या स्त्राी पुरूष समानता के नज़रिए के कारण सरकार ने पहले यह शर्त रखी हो कि एक से अधिक बीबी वाले अपात्रा होंगे बल्कि वह तो शुद्व रूप से प्रशासनिक/सरकारी झंझटों से बचने के लिए उठाया गया कदम था जिसमें उसने कहा था कि शिक्षक की मौत के बाद चूंकि पेंशन आदि के निपटारे में समस्या आ जाती है, उसे दूर करने का यह उपाय है। इस ‘समस्या’ को सुलझाने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुझाव दिया कि पेंशन की राशि का पत्नियों के बीच बंटवारा करके समाधान निकाला जा सकता है। सहज ही अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि किसी पत्नी शिक्षक की मौत पर पति को पेन्शन देने की कल्पना भी अभी स्वाभाविक नहीं बन पायी है। इसी वास्तविकता के कारण अभी ऐसे पुरूष आश्रितों की गिनती कम है जिन्हें पत्नी की म्रत्यु, तलाक या छोड़ दिए जाने पर सहारे के लिए किसी सरकारी स्कीम में अपील करना पड़े। आखिरकार स्कीमें भी तो सामाजिक वास्तविकताओं के मददेनज़र ही बनानी होती है नहीं तो विधुरों की पेंशन, गुजारे भत्ते आदि की चर्चा भी होती और परित्यक्त शब्द भी परित्यक्ताओं की तरह चलन में होता।



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