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Wednesday, January 6, 2016

साफ एवं सुरक्षित शौचालय का स्त्रिायों को अधिकार: मंुबई हाईकोर्ट का अहम फैसला

- अंजलि सिन्हा

दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी सिविक एजेंसियों से पर्याप्त संख्या में शौचालयों का निर्माण न होने को लेकर जवाब तलब किया है। राजधानी मंे शौचालयों की कमी के कारण खुले में शौच करने को बेहद शर्मनाक बताया है। न्यायमूर्ति बी डी अहमद और संजीव सचदेव की खण्डपीठ में दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रही थी।

यहां भी सामुदायिक शौचालयों के अलावा सड़कों पर चलने वालों के लिए सड़क किनारे शौचालय बनाने पर काफी समय से बात होती रही है, लेकिन इस पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया है। सड़क पर चलनेवाले लोगों तथा विशेषकर महिलाओं को दिक्कतों का सामना करना होता है। इसके लिए आन्दोलन तथा लोगों को कोर्ट तक जाने की नौबत क्यों आए ?


कुछ ही दिन पहले मुंबई हाईकोर्ट के एक फैसले ने भी इस मसले की ओर ध्यान खींचा है और स्त्रिायों की गतिशीलता को नियंत्रित करनेवाली एवं शहर की संरचना के पुरूषप्रधान स्वरूप को रेखांकित करनेवाले इस अहम मसले को रेखांकित किया है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि जब महिलाएं घर से बाहर रहें तो उन्हें निवृत्त होने का हक और सुविधा चाहिए ताकि उनका गरिमामय जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित हो सके। न्यायमूर्ति अभय ओक तथा रेवती मोहिते डेरे की द्विसदस्यीय पीठ ने मुंबई कार्पोरेशन को निर्देश दिया है कि वह महिलाओं के लिए शौचालयों के निर्माण एवं रखरखाव का विस्तृत  खाका चार सप्ताह में पेश करे। अदालत का साफ कहना था कि ‘राज्य एवं कार्पोरेशन की यह अहम जिम्मेदारी बनती है कि वह सभी सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के लिए टायलेट का निर्माण करके सार्वजनिक स्वास्थ्य को सुधारने की दिशा में योगदान दे।’ पीठ ने स्पष्ट किया कि शौचालयों के उचित स्थानों पर नहीं होने या साफसुथरा नहीं होने के कारण महिलाएं कई प्रकार की स्वास्थ्य जटिलताओं तथा समस्याओं से गुजरती हैं।

ध्यान रहे कि ‘मिलून सारयाजणी’ नामक महिला मुक्ति पर केन्द्रित पत्रिका की तरफ से डाली इस पीटिशन पर अदालत विचार कर रही थी। याचिका में यह रेखांकित किया गया था कि ‘समुदाय अर्थात कम्युनिटी के स्तर पर तो शौचालय अस्तित्व में आए हें, मगर सड़कों पर चलनेवाली स्त्रिायों के लिए टायलेट उपलब्ध नहीं है।’ अभी पिछले ही साल इस याचिका की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने महाराष्ट के सभी नगर निगमों को निर्देश दिया था कि वे 31 मार्च 2015 तक सार्वजनिक जगहों तथा मुख्य मार्गों के किनारे महिलाओं के लिए शौचालय बनवाने का काम पूरा करें। अदालत ने यह भी कहा था कि शौचालयों के साफ-सफाई तथा व्यवस्था की देखभाूल के लिए गैरसरकारी संस्थाओं की भागीदारी बनायी जानी चाहिए।

दरअसल यह समझ से परे है कि आखिर नगर निगमों का तथा नीति निर्माताओं का ध्यान इस निहायत आवश्यक जरूरत की तरफ क्यों नहीं जाता है और उन्हें इस बात का एहसास कब होगा कि ऐसे टायलेटों के न होने से उन्हें कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। जिस जमाने में महिलाएं सार्वजनिक दायरे मंे ज्यादा नहीं निकलती थीं, यूं तो उस समय भी शौचालय की सुविधा होनी चाहिए थी ताकि कोई एक दो महिला भी किसी वजह से कहीं से गुजरे, तो जरूरत पड़ने पर वह निव्रत्त हो सके, लेकिन अब जब अच्छी खासी संख्या में वह घर के बाहर भी उपस्थित है तो शौचालय की इतनी कमी महिलाओं की प्रताडना का नया जरिया बन जाती हैं। 

सबसे बड़ी बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों से यह मुददा लगातार चर्चा का विषय बना है, मीडिया में भी किसी न किसी रूप में आता रहा है, इसके बावजूद सम्बधित एजेंसियां इसे गंभीरता से नहीं ले रही हैं तथा अपनी योजनाओं में प्राथमिकता नहीं दे रही हैं। तभी तो आप देख सकते हैं कि कस्बों, नगरों में ही नहीं दिल्ली जैसी राजधानी में भी बड़े पार्कों में, बस स्टेण्डों, भीडभाड वाले बाजारों में या शापिंग कम्पलेक्स में इनका अभाव साफ नज़र आता है। और अगर कहीं उपलब्ध हैं तो वह बेहद अपर्याप्त है।

शौचालयों की समस्या के दो पहलू हैं। निजी दायरों में उनकी उपस्थिति तथा सार्वजनिक दायरे में उनका होना। आम तौर पर घरों में शौचालय हो इसकी बात होगी जो कि जरूरी और न्यूनतम बुनियादी बात है तथा स्वच्छता तथा सफाई के लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय तथा कुछ पंचायतें इसकी पहल करती हैं लेकिन सार्वजनिक दायरे में इस सुविधा का होना इससे एक अलग मुद्दा है।
यह बात समझना आवश्यक है कि घरों के अन्दर शौचालय बनना जहां मुख्यतः घरवालों की जिम्मेदारी बनती है और उसमें सरकारी तथा प्रशासनिक सहयोग की बात की जा सकती है लेकिन सभी सार्वजनिक दायरे में चाहे वह बाजार हाट हो या किसी भी प्रकार का कार्यस्थल वहां इस सुविधा को उपलब्ध कराना पूरी तरह से सरकारी तथा नागरिक इकाइयों यानि नगरनिगम तथा पंचायतों की जिम्मेदारी बनती है।

यहभी रेखांकित करना जरूरी है कि इस सुविधा का अभाव महिलाओं की गतिशीलता पर प्रतिबन्ध लगाता है इसलिए यदि सभी घरों में शौचालय बन जाता तो भी महिलाएं बाहरी समाज में विचरण कर सकंे और जरूरत पड़ने पर जनसुविधाओं का उपयोग कर सकें इसके लिए जरूरी है कि बाहर वह बने साथ ही यदि वे यदि किन्हीं भी वजहों से बाहर निकलती हैं चाहे वे शौच के लिए ही निकलें तो बाहर हर हाल में सुरक्षा तो होनी ही चाहिए।

अध्ययन बताते हैं कि महिलाओं को निव्रत्त होने में अधिक समय लगता है। इसी वजह से कई पश्चिमी देशों में इसके लिए विशेष नियम बनाये गये हैं। कुछ समय पहले कलकत्ता से निकलनेवाले दैनिक ‘द टेलिग्राफ’ में छपी ख़बर में बताया गया था कि किस तरह न्यूयॉर्क से लेकर अमेरिका के विभिन्न शहरों की नगरपालिकाओं ने बाकायदा यह नियम बनाया है कि नवनिर्मित किसी भी इमारत में पुरूष तथा स्त्रिायों के लिये बनने वाले टायलेटों का अनुपात 1ः2 रहेगा। 

न्यूयॉर्क शहर के कार्पोरेशन ने शौचालय के मसले पर  बाकायदा रेस्टरूम इक्विटी बिल पास किया, जिसमें नियम बनाया गया कि सार्वजनिक स्थानों पर पुरूषों एवम महिलाओं के लिए बनने वाले ष्शौचालयों में 1ः2 का अनुपात होगा अर्थात पुरूषों के लिए अगर एक शौचालय बनेगा तो महिलाओं के लिए दो शौचालय बनेंगे। कौन्सिल ने इस सम्बन्ध में उसके सामने पेश किये अध्ययन पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया कि पुरूषों की तुलना में महिलाओं को निवृत्त होने में अधिक समय लगता है। दिलचस्प बात है कि अपर्याप्त टायलेट सुविधाओं को यौन उत्पीड़न का प्रकार मानने के बारे मंे दायर एक जनहितयाचिका के बाद यह मसला चर्चा में आया था। लेकिन जहां तक भारत की बात है वहां तो यह अनुपात 1ः1 होने में भी कई दशक बीत जाएंगे।

सार्वजनिक दायरे में शौचालयों की अनुपस्थिति की छाया स्कूलों पर भी दिखती है। नेशनल इन्स्टिटयूट ऑफ एज्युकेशन ( प्लानिंग एण्ड  एडमिनिस्ट्रेशन  - नीपा)के एक अध्ययन के मुताबिक देशभर मे सिर्फ 32 प्रतिशत स्कूलों में ही लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था है जबकि ग्रामीण इलाकों में इसकी संख्या महज 29.41 प्रतिशत ही है। स्कूलों में 40  बच्चों पर एक शौचालय का नियम है तथा बालिकाओं के लिए 25 पर एक शौचालय सुझाया गया है। लेकिन यह सब कागज़ पर ही दिखता है। देखने में यही आता है कि दिल्ली के अधिकतर सरकारी स्कूलों में एक या दो शौचालय ही हैं। उसमें भी शायद ही कोई साफसुथरा तथा अच्छी हालत में हो।

बड़ी होती उम्र में बालिकायें अपने मासिक धर्म  के समय में शौचालय न होने के कारण या वहां पानी का इंतजाम न रहने के कारण स्कूल से अनुपस्थित होने पर मज़बूर होती है। स्वास्थ्य की मामूली जानकारी रखने वाला भी बता सकता है कि गंदगी के कारण औरतें जल्दी युरिनरी ट्रॅक इन्फेक्शन ( मूत्रानली के संक्रमण) की शिकार हो जाती हैं। दिल्ली की पुनर्वास बस्तियों में किशोरियों के साथ की गयी कई कार्यशालाओं के दौरान यही बात सुनने को मिली कि किस तरह उनकी कमी बच्चियों के शिक्षा को प्रभावित कर रही है।

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