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Saturday, January 23, 2016

हम आप क्या गूगल भी घबरा गया स्टेशनों की भीड़ से ?

- अंजलि सिन्हा
भारतीय रेलवे स्टेशनों को वाई-फाई युक्त करने के प्रस्ताव के बहाने रेलव्यवस्था की कुछ चिरंतन समस्याओं पर नए सिरेसे ध्यान गया है। 
मालूम हो रेलवे स्टेशनों को वाई-फाई युक्त करने की बात काफी समय से की जाती रही है, इसके फ्री करने की और पहले चरण में इसके सौ स्टेशनों तक सीमित करने की बात भी चली थी। फ्री में कितना फ्री होगा और कितना विज्ञापनों पर आय से मिलेगा, इसके बारे में भी चर्चा चली थी। इसे मुमकिन बनाने के लिए गूगल से करार भी हुआ, पिछले दिनों इसी करार को लेकर गूगल के भारतीय मूल के सीईओ सुन्दर पिचाई भारत के दौरे पर आए, उनका खूब स्वागत हुआ। वह कहां कहां गए, उन्होंने क्या किया, इंडिया गेट पर कैसे खेले, आदि के समाचार खूब परोसे गए। 
इसी दौरान यह भी साफ हुआ कि गूगल ने स्पष्ट किया कि फ्री वाई-फाई सिर्फ 25 मिनट मिेलेगा, उसके बाद आप को भुगतान करना होगा। खैर, यह विचारणीय मुददा अलग से है कि हमारे स्टेशनों को वाई-फाई की जरूरत प्राथमिकताओं के आधार पर कितनी है, स्टेशनों की जिस बदहाली की बात चलती है, उसमें असली समस्या वाई-फाई न होने की है या कुछ और भी ?

बहरहाल, ख़बर आयी है कि भारतीय रेलवे स्टेशनों की अपार भीड़ देख कर गूगल घबरा गया। पता चला है कि वाई-फाई को मुमकिन बनाना हो तो गूगल को अपना पूरा सिस्टम अपग्रेड करना पड़ेगा। ज्ञात हो कि भारतीय रेलवे ने देश के चार सौ स्टेशनों को वाई फाई देने का वायदा किया था और इसके लिए गूगल से करार हो चुका था। सुन्दर पिचाई के साथ हुए समझौते में नए साल  में इसके लागू होने की बात हुई थी। पिचाई तो अमेरिका लौट गए, लेकिन उनकी टीम रेलवे के उपक्रम रेल टेल के साथ मिल कर स्टेशनों का सर्वे कर रही है। पहले राउन्ड में टीम ने बरेली, मुरादाबाद, देहरादून, लखनउ, अंबाला, चंडीगढ आदि स्टेशनों का दौरा किया, जहां उसने पाया कि भीड़ के कारण यहां के स्टेशनों पर वाई फाई का फेल होना तय है। वाईफाई का मौजूदा सिस्टम पश्चिमी देशों के स्टेशनों के हिसाब से है, जहां इतनी भीड़ भाड़ नहीं है। गूगल तो अपना सिस्टम अपग्रेड करने की बात कह रहा है, लेकिन लोग क्या करें ? हमारे स्टेशनों पर भीड़ आतंकित करने की स्थिति तक पहुंच गयी है।
किन्हीं भी वजहांे से कभी भी भगदड़ का खतरा मंडराता रहता है। भगदड कई बार स्टेशनों पर हो भी चुका है। दिल्ली के मुख्य रेलवे स्टेशन से लकर पुरानी दिल्ली सहित निजामुददीन या आनंद विहार आदि सभी की ढांचागत हालत चरमरा रही है। अगर आप निजामुददीन स्टेशन पर सराय कालेखां की तरफ से बढ़ें तो अक्सर सरकते हुए ही पहुंचना होता है। रेलवे में भीड़ को नियंत्रित करने के इरादे से, और भगदड की संभावना को समाप्त करने के लिए रेलवे विभाग ने दूसरे स्टेशनों से अलग अलग दिशाओं की गाड़ियों को रवाना करना शुरू किया है, मगर इन स्टेशनों को भी ठीक से विकसित नहीं किया गया है, लिहाजा अफरातफरी यहां भी मची रहती है। और अगर यह राजधानी का आलम है तो हम शेष भारत के बारे में अन्दाज़ा लगा सकते हैं।
भीड़ का मामला महज स्टेशनों तक सीमित नहीं है, रेलगाड़ियों के अन्दर का भी है। यात्रा यदि पहले से तय हो तो भी और आकस्मिक हो तो भी कन्फर्म टिकट मिलना आसान नहीं और फिर जरूरतमन्दों को एजेन्ट के शरण में जाना ही पड़ता है। रेलवे विभाग की तरफ से पारदर्शिता की बातेें होती रहती हैं, एजेन्टों पर नकेल कसने के उपायों का ऐलान होता रहता है, मगर अभी भी उस दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
आखिर क्या रेलमंत्रालय इतना बुद्धिहीन है कि वह आकलन नहीं लगा पा रहा है कि अनुमानित यात्रियों के अनुरूप बुनियादी ढांचे को विकसित करना पहली प्राथमिकता हो बजाय इसके कि चन्द सुविधासम्पन्न लोगों तक सीमित मानी जा सकनेवाली बुलेट टेन को दो राज्यों की राजधानियों के बीच शुरू किया जा रहा है। गौरतलब है कि लगभग एक लाख हजार करोड़ रूपए की लागत से बन रही इस परियोजना को लेकर सरकार भले ही गदगद हो, मगर वह इस बात को ध्यान में नहीं रखना चाहती कि इतनी अधिक राशि को रेल के विकास में लगाया जा सकता है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ जब ख़बर आयी थी कि रेललाइनों में बिछे रेलों की स्थिति भी ख़राब है, जिन्हें बदले जाने की जरूरत है, जिनकी वजह से दुर्घटनाएं होने का खतरा रहता है। अगर 2014 में 27,581 लोग रेल दुर्घटनाओं में मारे गए जिसके चलते दुनिया में इस मामले में भी अव्वल स्थिति में है जहां इतनी मौतें होती हैं। 
बुलेट टेन को लेकर सरकार यह भी ध्यान में रखना नहीं चाहती कि जहां दुनिया के सबसे सम्पन्न मुलक में भी बुलेट टेन नहीं है, क्योंकि वह इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि जबरदस्त प्रतिद्वंद्विता वाले मार्केट में वह सस्ती एअरलाइन्स के सामने टिक भी नहीं सकते। 
ध्यान में रखने की बात यह है कि ऐसा नहीं है कि भारत की जनसंख्या अचानक बढ़ गयी है, मगर इसके बावजूद यात्रियों की संख्या देखते हुए नई लाइनें बिछानें, नयी टेनें चलाने की योजना नहीं दिखती। आज के समय में जबकि यात्राओं को रोकना या कम करना लगभग असम्भव है। चाहे नौकरी, व्यापार या पढ़ाई आदि कई वजहों से यात्रा करना मजबूरी भी होती है। ऐसी स्थिति में भगदड़ों के आतंक में सफर करना, टिकट एवं सीट के लिए मशक्कत करना, एजेण्टों के शरण में दौड़ते रहने की नियति बन गयी है। ऐसे में वाई-फाई उपलब्ध किए जाने की ख़बर कितनों को लुभाएगी।
जहां तक आधी आबादी के सुरक्षित सफर का सवाल है, जो दुर्घटना होने, बम फूटने या अन्य प्रकार के तकनीकी या प्राक्रतिक हादसों का मसला नहीं है जिसके लिए सरकार अपनी बेबसी जाहिर करती है बल्कि साफ तौर पर बचावात्मक उपाय करने का तथा प्रशासनिक चुस्ती से असामाजिक तत्वों पर नियंत्राण पाने का मसला है, उसे भी रेलवे सुनिश्चित नहीं कर पायी है। हाल में हावडा अम्रतसर एक्स्प्रेस में चलती टेन में जवानों ने एक किशोरी के साथ बलात्कार किया तथा टेन से फेंक देने की धमकी दी। आरोपी जवान को जीआरपी ने गिरफतार कर लिया है। यही देखने में आता है कि रेलवे ने इस समस्या को कभी गंभीरता से लिया ही नहीं इसलिए उसकी प्राथमिकताओं में यह नहीं है। इसके लिए टोकन उपायों से काम नहीं चलेगा कि लेडीज कोच चला दो या महिलाओं के लिए अलग टेन चला दो बल्कि इस बात को सुनिश्चित करना होगा कि डयूटी के दौरान कर्मचारी हर बोगी पर नज़र रख सकें और उनकी यह जिम्मेदारी बने कि किसी को किसी समस्या का सामना न करना पड़े।
एक सुधार यह किया गया है कि अब किसी अपराध की शिकायत स्टेशन पर उतर कर जीआरपी का कमरा तलाशने के बजाय - जहां शिकायत दर्ज की जा सके - टेन में ही ऐसी रिपोर्ट दर्ज करायी जा सकती है, मगर उसके लिए लोगों को जागरूक बनाने की भी आवश्यकता है। सबसे अहम मुददा है कि यदि कोई घटना नहीं भी घटी या किसी को असभ्य व्यवहार का सामना नहीं भी करना पड़ा तो भी ऐसे अनहोनी का आतंक सताता है। इससे मुक्ति दिलाने की भी आवश्यकता है। 



1 comments:

Beenu Kabir said...

bahut zaroori bat rakhi.

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