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Friday, December 2, 2016

महिला कर्मचारियों के असमान वेतन: ताकि मुददआ तो बदले

- अंजलि सिन्हा
 
बीते सोमवार को फ्रांस की राजधानी पैरिस के तमाम जानेमाने राजनीतिक और सांस्क्रतिक कार्यालयों की महिला कर्मचारियों ने ठीक साडे चार बजे अपना काम रोका। यह उनका विरोध का तरीका था ताकि पुरूषों की तुलना में महिलाओं को मिलते कम वेतन का मुददा रेखांकित हो सके। दरअसल महिला अधिकारों की हिमायत में संचालित एक नारीवादी न्यूजलेटर ने महिला कर्मचारियों को आवाहन किया था कि वह अपना काम रोक दे। पुरूष एवं स्त्राी कर्मचारियों के बीच आज भी मौजूद असमान वेतन को देखते हुए न्यूजलेटर ने कहा था कि 7 नवम्बर के आगे बाकी बचे साल तक महिलाएं काम करती भी रहें तो यह एक तरह से ‘स्वैच्छिक काम’ होगा क्योंकि उन्हें उतना वेतन कम मिलता है। /ीhttps://www.theguardian.com/world/2016/nov/07/french-women-walk-out-work-pay-disparity-gender-pay-gap-equality/

Sunday, November 6, 2016

Annual Workshop Report


Stree Mukti Sangathan has organised its 17th workshop from 8-10 October, in Naugarh, Varansi, Uttar Pradesh. The workshop had four main sessions and each session had a brainstorming discussion. About seventy women raging from students to working women and activists participated in the workshop. The idea behind these sessions was to enhance our understanding on the emerging political and theoretical issues and share experience of the different groups and to learn from their experience.  The short description of each session is given here;



Sunday, August 14, 2016

GENDERED VIOLENCE AND INDIA’S BODY POLITICS

- Manali Desai

The paradox of rape is that it has a long history and occurs across all countries, yet its meaning can best be grasped through an analysis of specific social, cultural and political environments. Feminist writing on citizenship and the state has long noted the relevance of women’s bodies as reproducers of the nation; it is equally important to think about the uses of the sexed body in a political context. A consideration of gendered violence as part of a continuum of embodied assertions of power can not only tell us how masculine supremacy is perpetuated through tolerated repertoires of behaviour, but also help us to understand how forms of class, kinship and ethnic domination are secured—and what happens when they are disrupted. Rape, Joanna Bourke has observed, is a form of social performance, the ritualized violation of another sexed body. [1]This is no less true for such apparently depoliticized though grievous forms of violence as the now infamous gang rape of Jyoti Singh, a young woman returning from a night out in New Delhi in December 2012.

Thursday, August 4, 2016

मेंढक की हदे-निगाह

– रवि सिन्हा


अक्सर ऐसा होता है किसी मामूली लफ़्ज़ में आमफ़हम मायनों के साथ-साथ गहरे, फ़लसफ़ाना मायनों की गुंजाइश भी छिपी रहती है। हदे-हिगाह जिसे संस्कृत में क्षितिज और अंग्रेज़ी में होराइज़न कह सकते हैं, एक ऐसा ही लफ़्ज़ है। आमफ़हम मायने तो यही है कि जहाँ तक आपको दिखाई दे वह आपकी हदे-निगाह हुई। मामूली लफ़्ज़ों के मुहावरेदार इस्तेमाल भी हो सकते हैं। मसलन, आपकी तंग नज़री और ख़ुदग़र्ज़ी से परेशान कोई शख़्स आप पर यह तोहमत लगा सकता है कि आपकी हदे-निगाह आपकी अपनी ही नाक की छोर पर ख़त्म हो जाती है। मगर, चूँकि, मेरा ताल्लुक़ आपकी निजी ज़िंदगी और शख़्सियत से नहीं है, इसलिए इस लफ़्ज़ का मेरा इस्तेमाल मुहावरेदार नहीं है। मेरा ताल्लुक़ एक सभ्यता, एक सिविलाइज़ेशन की शख़्सियत से है। ऐसे मामलों में, अमूमन, लफ़्ज़ों के फ़लसफ़ाना मायनों की ज़रूरत पड़ती है। लिहाज़ा, पहले यह साफ़ कर लेना होगा कि हदे-निगाह के इस्तेमाल में फ़लसफ़ाना गुंजाइशें क्यों हैं और कितनी हैं

Saturday, July 23, 2016

सैर कर दुनिया की: घुमना मना था और वह बढ़ता गया


- अंजलि सिन्हा

पटना की गीता को जब दिल्ली के एक कालेज में प्रवेश के लिए आना पड़ा तो उसने अपनी यह यात्रा अकेले ही की, किसान परिवार से सम्बद्ध उसके माता पिता के लिए यह मुमकिन नहीं था कि वह उसका साथ देते। या हैद्राबाद की राधिका, जो वहां विश्वविद्यालय में रिसर्च स्कॉलर है, उसे जब फील्ड स्टडी के लिए उत्तर भारत के पहाड़ी इलाकों में जाना होता है, वह अकेले ही आती जाती है ; या वही स्थिति लखनउ की किसी संस्था में काम करनेवाली आयेशा का है, जिसे अकेले ही सफर करना पड़ता है।

गीता हो या राधिका हों या आयेशा हो, इन सभी युवतियों, महिलाओं को अपवाद नहीं कहा जा सकता। हाल में भारत सरकार के नेशनल सेम्पल सर्वे की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट /हिन्दुस्तान 17 जुलाई 2016/ के जो अंश अख़बारों में प्रकाशित हुए है, वे यही बताते हैं कि देश भर में चालीस फीसदी महिलाएं अकेले घूमती हैं। वे तमाम आशंकाओ ंको पार पाकर घूमने को आगे आ रही हैं। यद्यपि कई राज्य अभी बहुत पीछे हैं, लेकिन कुछ जैसे पंजाब, तेलंगाना, केरल, आंध्रा, तमिलनाडु आदि आगे हैं। यह क्रमशः 66 फीसदी, 60 फीसदी, 58 फीसदी, 53 फीसदी तथा 55 फीसदी का है। इनमें पिछड़े राज्यों में जहां बिहार /13 फीसदी/, हरियाणा /13 फीसदी/ दिखते हैं, वहीं इस मामले में सबसे ख़राब स्थिति दिल्ली की है जहां यह प्रतिशत 10 फीसदी तक ही है। सर्वे के मुताबिक ग्रामीण महिलाओं का फीसद शहरी महिलाओ से आगे है / ग्रामीण 41 फीसदी और शहरी 37 फीसद/। शायद इस बदलाव का कारण होगा कि ग्रामीण इलाकों से पढ़ने या कैरियर बनाने के लिए शहर तक जाना ही होता है और लड़कियों में पढ़ाई के प्रति झुकाव बढ़ा है।

Tuesday, July 5, 2016

‘Images are Taking Over’: The Mania of ‘Capturing’ Life

Guest Post by  REBECCA MACMILLAN

Experts claim that though we might have become good at multi-tasking, our concentration levels have dropped, resulting in an inability to have dense experiences.

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At a conference on June 14, Facebook executive Nicola Mendelsohn predicted that the social networking site would be “all video” within five years.
“We’re seeing a year-on-year decline of text,” she said. “If I was having a bet, I’d say: video, video, video.”
Meanwhile, a recent article in the New York Times chronicled the lives of a group of young socialites – the “Snap Pack” – who plan their nights around snapping photos that can be shared with their followers. The reporter explained, “For them, taking photos and videos from Instagram and Snapchat is not a way to memorialise a night out. It’s the night’s main event.”
These two stories each arrive at the same conclusion: Images are taking over.

Thursday, June 2, 2016

अकेली औरत की पहचान

-अंजलि सिन्हा

हालही में जारी हुई राष्ट्रीय महिला नीति के मसविदे में  एक महत्वपूर्ण मुददा एकल महिलाओं का उठाया गया है जिसमें अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा आदि श्रेणियां शामिल हैं। निश्चित ही इस बदले दौर में अकेले अपने भरोसे जीवनयापन करने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ी है और साथ ही इस पुरूषप्रधान मानसिकता वाले समाज में उनके साथ उत्पीड़न तथा गैरबराबरी एवं उपेक्षा की संभावना भी अधिक बनी हुई है, इसलिए ऐसी महिलाओं के बारे में योजना बनाना जरूरी है, लेकिन नीति बनाने से पहले इस पर विचार करना तथा विमर्श को व्यापक बनाना जरूरी है।

Sunday, May 22, 2016

स्त्रियाँ घरेलू क्यों बनाई जाती हैं

– सरला सुन्दरम्

भारतीय सभ्यता और संस्कृति की बात करने वाले कई लोग घर को ही स्त्री का कार्यक्षेत्र मानते हैं उन्हें यह पसंद नहीं कि स्त्रियाँ पुरुषों की तरह घर से बाहर निकलकर कोई कामकाज करें। वे अपनी बात मनवाने के लिए स्त्री को ‘गृहस्वामिनी’ या ‘घर की मालकिन’ कहकर महिमामंडित करने का प्रयास करते हैं और एक सरासर ग़लत तर्क प्रस्तुत करते हैं कि स्त्रियाँ तो स्वभाव से ही घरेलू होती हैं और उन्हें घरेलू ही रहना अच्छा लगता है। ऐसे लोग उस घर को आदर्श बताते हैं, जिसमें पुरुष बाहर जाकर काम और कमाई करते हैं, जबकि स्त्रियाँ घर-गृहस्थी संभालती हैं। ज़ाहिर है, ऐसे लोगों की नज़र में पुरुषों का काम तो काम होता है, स्त्रियों का काम कोई काम नहीं होता। उन्हें पुरुष तो काम करते दिखाई देते हैं, स्त्रियाँ कोई काम करती दिखाई नहीं देतीं। इतना ही नहीं, स्त्रियाँ उन्हें पुरुषों के काम और कमाई के बल पर ‘घर की मालकिन’ बनी बैठी दिखाई देती हैं, मानो वे बिलकुल निकम्मी-निठल्ली हों और फिर भी सारी संपत्ति की स्वामिनी हों!

Friday, May 20, 2016

वरिष्ठ नागरिक आवासीय कालोनी या वृद्धाश्रम ?

-अंजलि सिन्हा

महात्मा गांधी के पौत्र कनुभाई गांधी - जो उनके तीसरे बेटे रामदास गांधी के बेटे हैं - के अपनी पत्नी शिवालक्ष्मी के साथ बदरपुर के गुरू विश्राम  वृद्धाश्रम में रहने की ख़बर बनी है। उनके पास रूपए पैसे की कमी नहीं है। लगभग 40 साल वह अमेरिका में रहे और ‘नासा’ जैसी प्रतिष्ठित संस्थान में नौकरी की थी। अब वे खुद 87 साल के हैं और उनकी पत्नी 85 साल की है, और जैसा कि समझा जा सकता है कि इस उम्र में अधिक देखरेख की आवश्यकता होती है। 2014 में ही भारत आ गए और गुजरात में नवासारी के  वृद्धाश्रम में रहे, जहां ठगी के शिकार होने के बाद सूरत आ गए और अब दिल्ली के बदरपुर स्थित आश्रम में पहुंचे हैं। नवासारी में उनके ठगी का शिकार होना ख़बर नहीं बनी, मगर  अब जबकि वह दिल्ली के  वृद्धाश्रम पहुंचे हैं तो वह सूर्खियां बना, यहां तक कि केन्द्र सरकार के एक मंत्राी भी उनसे वहां मिलने पहुंचे। सत्ताधारी पार्टी के किसी अतिउत्साही नेता ने कनुभाई के  वृद्धाश्रम पहुंचने के लिए कांग्रेस की आलोचना भी की है।

Saturday, May 14, 2016

एक ख़ूबसूरत साजिश

 -रूपाली सिन्हा 


कुछ साल पहले मैंने एक अख़बार में यह खबर पढ़ी थी कि एक सर्वेक्षण के मुताबिक इंग्लैंड में सुंदर स्त्रियों को नौकरियों में वरीयता प्राप्त हो रही है। हालाँकि न तो यह बात नयी है और न यह केवल इंग्लैंड की सच्चाई है ,बल्कि स्त्रियों के बारे में कमोबेश पूरी दुनिया में यही स्थिति है। यूँ तो 'सुन्दर' स्त्री और पुरुष हमेशा ही आकर्षण के केंद्र बने रहते हैं लेकिन स्त्रियों के सन्दर्भ में यह राजनीति का रूप ले लेता है-"सुंदरता की राजनीति" .....




Saturday, March 26, 2016

पुस्तक परिचय : रोज़ वाली स्त्री (लेखिका -सपना चमड़िया)

  -रूपाली सिन्हा             

संभव प्रकाशन से सन 2016 में प्रकाशित डायरीनुमा किताब "रोज़ वाली स्त्री" भारतीय मध्यवर्ग की औरत के जीवन का लेखा-जोखा, मूल्यांकन-विश्लेषण पेश करती है। दूसरे शब्दों में कहें तो वर्ग,जाति,संप्रदाय,समुदाय से परे यह हर उस औरत की डायरी है जो पितृसत्ता के जुए के तले दबी हुई है। लेखिका सपना चमड़िया ने बहुत ही बारीकी से पितृसत्ता के इन बारीक धागों को पकड़ा है जो अक्सर परिवार और रिश्तों के महिमामंडन की चकाचौंध में दिखाई नहीं देते। डायरी की औरतें हमारे-आपके आसपास की हैं जिनसे हम रोज़ रूबरू होते हैं। बकौल लेखिका,"डायरी के ये पात्र ज़िन्दगी से उठाये गए हैं,न तो एक भी पात्र झूठा है न ही कोई घटना।" इस दृष्टि कह सकते हैं कि यह डायरी लेखिका की "आँखिन देखी" प्रस्तुति है।  ये सारी औरतें घुट रही हैं, मुक्ति के लिए छटपटा रही हैं, सवाल खड़े कर रही हैं,जीवन को निरख रही हैं,समझ रही हैं.......खुद लेखिका के शब्दों में "समाज की स्त्रियों की ऐसे किस्सों से बनी हुई यह डायरी है जिसमे हर स्त्री अपनी पहचान कर लेती है।  वह खुद को वहां उपस्थित महसूस करती है। वह उसपर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए राहत की लम्बी साँस लेती है। उसे एक ताज़ी हवा का एहसास होता है। मज़े की बात,उस स्त्री को उन्हें भी सुंनना अच्छा लगता है जोकि उसके मन की गहराई के उस कोने तक नहीं पहुँच पाते हैं,खुद उसके साथ घर में दिन-रात रहते हुए,कहते-पीते,सोते हुए। "  डायरी की इन औरतों के भीतर कुछ कसमसा रहा है,कुछ टूट रहा है,कुछ जुड़ रहा है, कुछ पनप रहा है। यहाँ अपनी ज़मीन अपना आसमान तलाशने की शुरुआत हो चुकी है।  मशहूर शायर मजाज़ के शब्दों में कहें तो :

कुछ नहीं तो कम से कम ख्वाब-ए- सहर देखा तो है 
जिस तरफ देखा न था अब उस तरफ देखा तो है   

Saturday, March 12, 2016

INDIA TODAY CONCLAVE SESSION ON SPIRITUALITY – HALO OR HOAX

-SPEECH: JAVED AKHTAR

I am quite sure ladies and gentlemen, that in this august assembly nobody would envy my position at this moment. Speaking after such a charismatic and formidable personality like Sri Sri Ravi Shankar is like coming out of the pavilion to play after Tendulkar has made a sparkling century. But in some weak moment I had committed myself.

Monday, March 7, 2016

आठ मार्च - अन्तरराष्टीय महिला दिवस: अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलन्द करने का दिन


-अंजलि सिन्हा

दुनिया भर की शोषित-पीड़ित महिलाओं की मुक्ति का उत्सव आठ मार्च ‘अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस’ समूची दुनिया में धूूमधाम से मनाया जाता है। आज के दिन दुनिया के तमाम छोटे-बड़े शहरों, नगरों, कस्बों में महिलाएं सड़कों पर उतरती है, रैलियां करती हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं और स्त्राी मुक्ति के अधूरे संघर्ष को पूरा करने का अपना संकल्प दोहराती हैं।
गौर करने की जरूरत है कि इस दिन का ऐतिहासिक महत्व क्या है।

8 मार्च, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस, इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्राओं के नाम बधाई संदेश और चन्द बातें

दोस्तों,
      आप इस 8 मार्च को बधाई के पहले हकदार है क्योंकि इतिहास इस वर्ष इलाहाबाद छात्रसंघ भवन पर 1 अक्टूबर, 2015 को, आपके द्वारा रचा गया, ये इतिहास ऋचा के साहस, संकल्प, जुझारू व्यक्तित्व और आपकी एकजुटता के संगम का परिणाम है। आज आपका विश्वविद्यालय ही नही, पूरे देश के विश्वविद्यालय इस कठिन दौर में, आपके द्वारा लायी गयी, “नयी रोशनी” की तरफ बड़ी उम्मीद से देख रहे है। आपको इस रोशनी को मद्धिम नही पड़ने देना है, बल्कि इस अंधेरे दौर में जब छात्र अपने स्पेस, एकेडमिक माहौल और अभिव्यक्ति की आजादी के लिए संघर्षरत हैं, आपकी ये नयी रोशनी, ‘मशाल’ बन कर, अंधेरे के खिलाफ खड़ी रहे, यही आशा है।
      8 मार्च इसी संकल्प का दिन है- जब तक धरती पर अन्याय और गैरबराबरी है तब तक हमारे एक जुट होने की ज़रूरत बाकी है।

Thursday, February 25, 2016

I am a Muslim and I Love my Country

- Syed Rafath Parveen

I am a Muslim. I am a woman.  I am a teacher.

None of the identities mentioned above make me a competent authority according to the achievement parameters set by the society, to comment about the present situation in this country. Whatever I say will be gleaned through these identities. These thoughts always stopped me from expressing my feelings, anguish and anger towards a lot of things unfolding in the last few years, but somehow I cannot stop myself anymore.

Saturday, February 13, 2016

प्रेमदोही द्रोही समज मेें प्रेम का पर्व

                                                               
-स्वदेश कुमार सिन्हा

यह महज संयोग ही है कि इस वर्ष बसंत का पर्व और वेलेन्टाइन डे करीब-करीब एक ही साथ पड़ रहे हैै। प्राचीन ’संस्कृत साहित्य’ में बसंत के समय ’महोत्सव पर्व’ मनाने की प्रथा का वर्णन आता है ,यह महोत्सव भी एक प्रकार का प्रेम पर्व ही था। 
गलिब का एक शेर है-
’’ये इश्क नही ऑसा , बस इतना समझ लीजे,
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है। ’’

Monday, February 1, 2016

नियुक्ति की शर्तों का मजहब से रिश्ता ?

-अंजलि सिन्हा

हाल में उत्तर प्रदेश सरकार ने उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति के लिए एक संशोधित अधिसूचना जारी की है, जिसके तहत अब कहा गया है कि राज्य के परिषदीय स्कूलों में उर्दू शिक्षकों की भर्ती में एक से अधिक पत्नी होने पर अपात्रा होने जैसा प्रावधान अब नहीं होगा। कहा जा रहा है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की आपत्ति के बाद सरकार ने इस प्रावधान को हटाने का निर्णय लिया है।

बहरहाल, इस मसले पर कुछ दिनांे तक काफी गहमागहमी रही।

Saturday, January 23, 2016

हम आप क्या गूगल भी घबरा गया स्टेशनों की भीड़ से ?

- अंजलि सिन्हा
भारतीय रेलवे स्टेशनों को वाई-फाई युक्त करने के प्रस्ताव के बहाने रेलव्यवस्था की कुछ चिरंतन समस्याओं पर नए सिरेसे ध्यान गया है। 
मालूम हो रेलवे स्टेशनों को वाई-फाई युक्त करने की बात काफी समय से की जाती रही है, इसके फ्री करने की और पहले चरण में इसके सौ स्टेशनों तक सीमित करने की बात भी चली थी। फ्री में कितना फ्री होगा और कितना विज्ञापनों पर आय से मिलेगा, इसके बारे में भी चर्चा चली थी। इसे मुमकिन बनाने के लिए गूगल से करार भी हुआ, पिछले दिनों इसी करार को लेकर गूगल के भारतीय मूल के सीईओ सुन्दर पिचाई भारत के दौरे पर आए, उनका खूब स्वागत हुआ। वह कहां कहां गए, उन्होंने क्या किया, इंडिया गेट पर कैसे खेले, आदि के समाचार खूब परोसे गए। 
इसी दौरान यह भी साफ हुआ कि गूगल ने स्पष्ट किया कि फ्री वाई-फाई सिर्फ 25 मिनट मिेलेगा, उसके बाद आप को भुगतान करना होगा। खैर, यह विचारणीय मुददा अलग से है कि हमारे स्टेशनों को वाई-फाई की जरूरत प्राथमिकताओं के आधार पर कितनी है, स्टेशनों की जिस बदहाली की बात चलती है, उसमें असली समस्या वाई-फाई न होने की है या कुछ और भी ?

Wednesday, January 6, 2016

साफ एवं सुरक्षित शौचालय का स्त्रिायों को अधिकार: मंुबई हाईकोर्ट का अहम फैसला

- अंजलि सिन्हा

दिल्ली हाईकोर्ट ने सभी सिविक एजेंसियों से पर्याप्त संख्या में शौचालयों का निर्माण न होने को लेकर जवाब तलब किया है। राजधानी मंे शौचालयों की कमी के कारण खुले में शौच करने को बेहद शर्मनाक बताया है। न्यायमूर्ति बी डी अहमद और संजीव सचदेव की खण्डपीठ में दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रही थी।

यहां भी सामुदायिक शौचालयों के अलावा सड़कों पर चलने वालों के लिए सड़क किनारे शौचालय बनाने पर काफी समय से बात होती रही है, लेकिन इस पर ठीक से ध्यान नहीं दिया गया है। सड़क पर चलनेवाले लोगों तथा विशेषकर महिलाओं को दिक्कतों का सामना करना होता है। इसके लिए आन्दोलन तथा लोगों को कोर्ट तक जाने की नौबत क्यों आए ?

Sunday, January 3, 2016

सावित्रीबाई फुले जिन्होंने भारतीय स्त्रियों को शिक्षा की राह दिखाई

उपासना बेहार


“.....ज्ञान बिना सब कुछ खो जावे,
बुद्धि बिना हम पशु हो जावें,
                               अपना वक्त न करो बर्बाद,
जाओ, जाकर शिक्षा पाओ......”
सावित्रीबाई फुले की कविता का अंश

अगर सावित्रीबाई फुले को प्रथम महिला शिक्षिका, प्रथम शिक्षाविद् और महिलाओं की मुक्तिदाता कहें तो कोई भी अतिशयोक्ति नही होगी, वो कवयित्री, अध्यापिका, समाजसेविका थीं. सावित्रीबाई फुले बाधाओं के बावजूद स्त्रियों को शिक्षा दिलाने के अपने संघर्ष में बिना धैर्य खोये और आत्मविश्वास के साथ डटी रहीं. सावित्रीबाई फुले ने अपने पति ज्योतिबा के साथ मिलकर उन्नीसवीं सदी में स्त्रियों के अधिकारों, शिक्षा छुआछुत, सतीप्रथा, बालविवाह तथा विधवाविवाह जैसी कुरीतियां और समाज में व्याप्त अंधविश्वास, रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष किया. ज्योतिबा उनके मार्गदर्शन,संरक्षक, गुरु, प्रेरणा स्रोत तो थे ही पर जब तक वो जीवित रहे सावित्रीबाई का होसला बढ़ाते रहे और किसी की परवाह ना करते हुए आगे बढने की प्रेरणा देते रहे.