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Thursday, December 24, 2015

स्त्री सम्मान दिवस (Day for Women's Dignity), Pamphlet


पिछले 14 वर्षों से स्त्री मुक्ति संगठन 25 दिसंबर को स्त्री सम्मान दिवस के रूप मनाता आ रहा है। सन 1927 में इसी दिन डॉ अम्बेडकर के नेतृत्व में प्रतिगामी पुस्तक ‘मनुस्मृति’ को जलाया गया था जो जाति और लिंग आधारित गैर बराबरी का आधार रही है।  बेशक ‘मनुस्मृति’ को आधिकारिक तौर पर सालों पहले खत्म कर दिया गया हो लेकिन परंपरा और संस्कृति के नाम पर आज भी हमारे समाज में तरह-तरह की गैर बराबरी मौजूद है। हिंसा के नए-नए रूप रोज ही देखने को मिलते ही रहते हैं। परंपरा और संस्कृति का पितृसत्तात्मक चेहरा नित नए रूपों में आकर औरत के जीवन पर अपना शिकंजा कसने की कोशिश करता ही रहता है।

इस तरह हम देखते हैं कि नई सदी में पितृसत्ता ने अपनी जकड नए सिरे से मजबूत की है और हमारे सामने नयी चुनौतियाँ खड़ी की हैं। हालाँकि यह भी सच है कि औरतों की स्थितियों में बदलाव भी आये हैं , वे बड़ी संख्या में घर से बाहर आई हैं, शिक्षित हुई हैं, आत्मनिर्भर हुई हैं। लेकिन दूसरी तरफ पितृसत्तात्मक मूल्यों का प्रचार-प्रसार भी चमकीले-भड़कीले रूपों में हुआ है जिसने उनकी मानसिक जकड़न को न केवल बरकरार रखा है बल्कि और बढ़ाया भी है। पिछले कुछ सालों में करवा चौथ जैसे गैरबराबरी पर टिके त्यौहार का लोकप्रिय होना, तड़क-भड़क और पुराने रीति-रिवाज़ों के साथ होने वाली शादियों का बढ़ता चलन इसके उदाहरण हैं। आज समय आ गया है कि अपने समाज और संस्कृति के उन तत्वों की पड़ताल और पहचान करें जो औरतों को मानसिक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ते हैं, उनपर कहर बरपाते हैं।  संस्कृति और सभ्यता की महानता का दम औरतों के दम पर ही भरा जाता है। इसीलिए परंपरा और संस्कृति का महिमामंडन कर, औरतों को त्याग और बलिदान की प्रतिमूर्ति होने की याद दिलाकर उनकी सोचने-समझने की शक्ति को नियंत्रित किया जाता है ताकि वे प्रश्न न उठायें। इस तरह पितृसत्ता औरतों के दिमाग को नियंत्रित कर उनका अनुकूलन कर ‘‘शासन’’ करता है।
बाज़ार और नव उदारवाद ने भी औरतों की आज़ादी के सवाल को धुंधला बनाकर उसे लक्ष्य से भटकाने का काम किया है। आज वे चुनाव और स्वतंत्रता के नाम ऐसे चुनाव करती हैं जिनकी मूल आत्मा पितृसत्तात्मक है जैसे स्वेच्छा से नौकरी छोड़कर परिवार के लिए घर बैठ जाना, व्रत-उपवास रखना, मंगल सूत्र पहनना इत्यादि। बाज़ार अपने फायदे के लिए ‘‘सौंदर्य’’ का मिथक रच रहा है जिससे औरतें खूब प्रभावित हो रही हैं। इन सारे उदाहरणों में हम देखते हैं कि आतंरिक पितृसत्ता कैसे काम करती है। इससे लड़कर आधुनिक मूल्यों को स्थापित करना आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। अगर समाज में आज़ादी की परिधि सिकुड़ रही है, अधिकारों का हनन हो रहा हो तो केवल व्यक्तिगत आज़ादी की मांग से क्या हासिल होगा? सशक्तीकरण, अधिकार और चुनाव की स्वतंत्रता को स्व की परिधि से निकाल कर समाज तक लाना होगा। उस पुरातन सामाजिक सांस्कृतिक मानसिकता पर चोट करनी होगी जो औरत को दूसरे दर्ज़े की नागरिकता प्रदान करती है।
आज देश में जैसा वातावरण बन रहा है, खाने पीने पहनने के अधिकार से लेकर स्वतंत्रा विचार करने तक पर जिस तरह की पाबन्दियां लगायी जा रही है, उसने स्त्रिायों की स्वतंत्राता की लड़ाई के राह में नये रोड़े कायम किए हैं। नैतिकता के प्रहरी राज्यसत्ता में बैठे लोगों की शह पाकर जिस तरह ऐसी सभी आवाज़ों को दबाने की कोशिश में है, उसकी जबरदस्त प्रतिक्रिया लेखकों, कलाकारों, सांस्क्रतिक कर्मियों, वैज्ञानिकों, इतिहासकारों की तरफ से भी देखने को मिली है।
ऐसी तमाम आवाज़ों के आज साथ आने की आज जरूरत है ताकि वास्तविक तौर पर एक सहिष्णु, धर्मनिरपेक्ष और बराबरी पर टिके समाज की दिशा में आगे बढ़ा जा सके।


Stree Samman Divas (Day for Women’s Dignity)
Stree Mukti Sangathan has been celebrating the 25th of December as Stree Samman Divas for the last 14 years. It was on this day in 1927 that, under Dr. Ambedkar's leadership, the regressive book 'Manusmriti' , which has been the basis of caste and gender discrimination, was burned. Although the official status of the Manusmriti has been ended years ago, there are still many types of discrimination in our society today, based in culture and tradition. New forms of violence are seen every day. Patriarchy, operating through tradition and culture, perpetually try to ensnare women.
We see that patriarchy has strengthened its hold and has placed new challenges before us. While it is true that the condition of women has changed, they have come out of their houses in large numbers, have been educated and have become self-sufficient. But on the other hand, patriarchal values have been popularized in attractive ways because of which their mental hold has not just remained but has increased. The popularity of festivals like karvachauth, which are based on inequality, and ostentatious and custom-bound weddings, are examples of this. It is time now to recognize and examine those aspects of our society and culture that bind women into mental slavery. 
The greatness of tradition and culture is laden on the shoulders of women. By glorifying culture and tradition, and reminding women that they represent sacrifice and renunciation, women's ability to think and question is constrained, so that they do not ask questions. Patriarchy thus controls women's minds, such that they are controlled through their own acquiescence.
Neoliberalism and the market have blurred the question of women's liberation. Today, in name of choice and independence, women make choices that are inherently patriarchal, like leaving their jobs to look after their families, fasting, wearing mangalsutras etc. Women are being affected by the beauty myth created by the market. Through these examples we see the working of internal patriarchy. Fighting these trends and establishing modern values is amongst the greatest challenges facing us today.If freedom is being restricted and rights are being abrogated, what difference will the demand for personal freedom make? Empowerment, rights and freedom of choice have to be brought out of the ambit of the self and brought into the wider society. The conservative socio-cultural mindset will have to be challenged, which makes women into second-class citizens.
Situation as it exists today in our country, where there is growing clamour for restrictions on our fundamental rights from state and non-state actors has put new obstacles in the path to woman's liberation. The manner in which self proclaimed moral guardians in our country with due connivance of the people in power are trying to throttle all such voices of resistance has created a tremendous reaction among writers, artists, scientists, historians, intellectuals.
It is time that all such voices for justice, peace, dignity, equity come together to usher in a really tolerant, secular, democratic society.

Stree Mukti Sangathan

sangathan.streemukti@gmail.com

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