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Friday, November 27, 2015

सुरक्षा का मजबूत जोड़


- रूपाली सिन्हा 

शादियों का मौसम एक बार फिर से शबाब पर है। एक ज़माना था जब प्रेमविवाह "घटना" होती थी। इसके घटने पर बड़े-बड़े नाटक-तमाशे होते थे। प्रेम-विवाह बदनामी का अच्छा-खासा सबब हुआ करता था। ऐसा करने वाले युवाओं को या तो घर-परिवार से बहिष्कृत होना पड़ता था या बड़ी लानत-मलामत, मान-मनुहार के बाद उनकी "घर-वापसी" हो जाती थी। कभी-कभी तो माँ-बाप अपनी नाक बचाने के लिए यह कहकर पर्दा डालते थे कि "अरे यह लव मैरेज थोड़ी है, वो तो हमने शादी पक्की कर दी थी,उसके बाद से दोनों मिलने-जुलने लगे थे।" धीरे-धीरे इस नाटक-तमाशे का पटाक्षेप हो जाता था।  समय के साथ इस स्थिति में परिवर्तन आया।  ऐसे बागी युवाओं की संख्या बढ़ने लगी और प्रेम-विवाह को सामाजिक स्वीकृति मिल गयी। ऐसे बागियों ने समाज में मनचाहा जीवन साथी चुनने के लिए अपना स्पेस बनाया। लेकिन ऐसा लगता है कि नई सदी में समय का चक्र पीछे घूम गया है। आज की युवा पीढ़ी जीवन साथी चुनने के मामले में उसी सामंती परंपरा को ढोती नज़र आ रही है जहाँ बच्चों की शादी माँ-बाप की ज़िम्मेदारी होती थी।  हालाँकि यह भी सच है कि समाज के एक हिस्से में आज भी प्रेमीयुगल स्वेच्छा से किये गए इस चुनाव के लिए फांसी पर भी लटका दिए जाते हैं ,कबीलाई समाज के अवशेष यहाँ अपने बर्बर रूप में दिखाई देते हैं। लेकिन मैं जिस वर्ग की बात कर रही हूँ वे मध्य/उच्च मध्य वर्ग के वे युवा हैं जिनके ऊपर समाज,परिवार या समुदाय का कोई बंधन नहीं है।  तो आखिर इस नयी परिघटना की क्या वजह हो सकती है? क्या आज के युवा अधिक आज्ञाकारी हो गए है? या उनमे जीवन साथी चुनने का विवेक नहीं रहा? यहाँ भी उत्तर आधुनिक बयार बहने लगी है या कोई अन्य कारण हैं?  
ऊँचे पदों पर काम करने वाले अधिकांश प्रोफेशनल्स शादी की सारी ज़िम्मेदारी माँ-बाप पर डालने लगे हैं।  इनका मानना है कि इश्क़-विश्क तो ठीक है लेकिन लांग टर्म रिलेशनशिप के लिए तो मम्मी-पापा ही बेहतर चुनाव करेंगे। यह स्थिति हिन्दुस्तान के महानगरों के युवाओं की है।  कुछ साल पहले 'हिन्दुस्तान टाइम्स' के एक सर्वेक्षण में, जिसमे दिल्ली और मुंबई के 603 युवा शामिल थे, जो 17 से 25 वर्ष के थे, में से 93 प्रतिशत ने अरेंज्ड मैरिज को चुना।  मार्च 2009 में 'भारत मेट्रिमनी डॉट कॉम ' ने 20 से 30 वर्ष की महिलाओं पर सर्वेक्षण किया जिसमे 49 प्रतिशत ने अरेंज्ड मैरेज को प्राथमिकता दी। 18 प्रतिशत ने लव मैरेज को बाकी ने लव कम अरेंज्ड को।  उन्ही में से 59 प्रतिशत का कहना था कि माता-पिता का निर्णय सबसे महत्वपूर्ण है। 
यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि सुविधा और अतिरिक्त देखरेख में पली यह युवा पीढ़ी अपनी ज़िन्दगी के फैसले लेने में आत्मविश्वासी नहीं है। यह ज़रुरत से ज़्यादा व्यवहारिक है कुछ हद तक स्वार्थी भी और जोखिम उठाने  डरती है। यह ऐसा भविष्य चाहती है जिसमे सुरक्षा और सुनिश्चितता हो, शादी के मामले में तो सुरक्षा का यह कवच बहुत ज़रूरी हो जाता है।  ये शादी की "असफलता" से बेहद घबराते हैं। माता-पिता की स्वीकृति भी इसीलिए चाहते हैं ताकि "असफलता" की ज़िम्मेदारीका ठीकरा केवल उनके सर पर न फूटे। शायद वे इस बात से अनजान हैं कि कोई भी विवाह सफलता की गारंटी नहीं देता।  इस सन्दर्भ में तलाक के बारे में भी गलत धारणा फैलाई गयी है कि प्रेम विवाह में तलाक़ की संभावना अधिक रहती है। 
कुछ युवाओं का कहना है कि माता-पिता अब ज़्यादा खुले और जनतांत्रिक हो गए हैं इसलिए विद्रोह या विरोध की अब कोई ज़रूरत नहीं रह गयी है। माता-पिता तो जनतांत्रिक हो गए लेकिन आप संकीर्णतावादी हो गए? सवाल है अपने जीवन का फैसला स्वयं लेने के निर्णय का, जोखिम और ज़िम्मेदारी उठाने का।  माता-पिता की नज़रों में ताउम्र 'बच्चे' बने  मानसिकता को माता-पिता भी चुनौती नहीं देते, बल्कि उन्हें तो अच्छा लगता है कि उनकी संतान उनसे इतना 'अहम्' फैसला लेने को कह रही है। इस तरह यहाँ युवा पीढ़ी उसी भारतीय परंपरा की जड़ मजबूत करती दिखती है जहाँ शादी माँ-बाप का दायित्व है और माँ-बाप भी अपने इस कर्तव्य को ख़ुशी-ख़ुशी निभाते हैं। कुछ युवाओं का यह कहना है कि इस 'परियोजना' में माँ-बाप को शामिल कर लेने से उनके पास ज़्यादा विकल्प आ जाते हैं जबकि प्रेम विवाह में ऐसा नहीं होता। मानो प्रेम विवाह कोई छोटी परचून की दूकान हो और अरेंज्ड मैरेज कोई सुपर स्टोर हो जहाँ तरह-तरह के ब्रांड मौजूद हैं, जो चाहिए चुन लो।  यहाँ चुनाव की पूरी स्वतंत्रता और ढेरों विकल्प मौजूद हैं इसलिए विद्रोह की ज़रुरत ही कहाँ है? आश्चर्य तब होता है जब यही पीढ़ी अपनी नौकरी,दोस्त, शौक, रुचियाँ यहाँ तक कि प्रेम के मामले में कोई हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करती ।  लेकिन शादी …। मैं अपने इर्द-गिर्द ही ऐसे कई उदाहरण देखती हूँ। हमारे एक परिचित ने केवल इसलिए अरेंज्ड मैरिज की क्योकि लड़की के पिता अच्छे रसूख वाले थे, उनसे रिश्ता करने के कई दूरगामी फायदे थे जैसे कि उनकी अस्थायी नौकरी का स्थायी हो जाना, उपहार में फ्लैट मिल जाना वगैरह-वगैरह।  जीवन भर वे अपनी पत्नी से नाखुश रहे , शादी से कभी संतुष्ट नहीं रहे लेकिन शादी तोड़ने की कीमत हमेशा ही उन्हें काफी भारी दिखाई पड़ती रही है। इसलिए अक्सर वे अपनी "संतुष्टि" घर से बाहर ढूंढते रहते हैं। ऐसे ही एक और परिचित हैं जिनका बेटा 30-32 साल का है, अच्छी नौकरी करता है।  उसने स्पष्ट शब्दों में अपने माँ-बाप को कह दिया कि  मेरी शादी करना चाहते हो तो लड़की ढूँढ दो,मैं शादी कर लूंगा।    
फ़िल्मों ने भी युवाओं पर काफी प्रभाव डाला है।  ताम-झाम वाली मंहगी शादियाँ तभी संभव हैं जब परिवारों की भी सहमति हो।  लडकियां वे सारे रस्म करने चाहती हैं (फ़िल्मी अंदाज़ में), ऐसा 'अभिनय' कोर्ट मैरेज करते समय कहाँ सम्भव होगा? सेलिब्रेटीज की शादियों का नज़ारा तो आप अाये दिन देखते ही रहते हैं।  कुल मिलाकर शादी का ऐसा महोत्सव आयोजित होता है कि हर युवा ऐसी शादी का सपना बुनता है।  
हमारी संस्कृति में जीवन भर 'अवयस्क' बने रहने में कोई शर्म की बात नहीं है, इसीलिए तो शादी के लिए मंजूरी की ज़रूरत पड़ती है, अन्यथा शादी दो व्यक्तियों का निजी मसला है। आज के ज़्यादातर युवाओं को हम देखते  हैं कि वे सभी तरह के लुत्फ़ उठा रहे हैं -गर्लफ्रेंड-ब्यॉयफ्रैंड भी एक खास उम्र तक न मिले तो ये अवसाद के शिकार होने हैं। प्रेम,सेक्स, पार्टी सब कुछ चाहिए अपनी शर्तों पर लेकिन जब जीवनसाथी चुनने का सवाल हो तो सौ में से सौ गुणों वाला पार्टनर चाहिए। माता-पिता द्वारा जीवन साथी चुनने का मतलब यह नहीं है कि ये किसी भी खूंटे से बध जायेंगे।  माता-पिता को तो इसलिए शामिल करना है ताकि यदि शादी में असफलता हाथ लगी तो उसका ठीकरा अकेले इनके सर न फूटे।  दूसरा, जीवन की भौतिक सुख-सुविधाएं जिन्हे शायद अकेले इकठ्ठा करने में बरसों लग जायें।  लडकियां भी अच्छा ससुराल,पैसा कमाने वाला पति और व्यवस्थित जीवन चाहती है (जोकि लाज़िमी है) और लड़के आधुनिक पत्नी, माता-पिता के लिए आदर्श बहू और मोटी तनख्वाह लाने वाली पत्नी चाहते हैं।  अगर ये सारे विकल्प अरेंज्ड मैरेज से मिलते हैं तो क्यों नहीं? युवाओं की भौतिक आकांक्षाएँ इतनी ऊँची हैं कि वे उन्हें पूरा करने के लिए किसी भी प्रकार का समझौता करने से पीछे नहीं हटते।  अरेंज्ड मैरेज वह सुरक्षित रास्ता है जिस पर चल कर चुनौतियों और खतरों से बचा जा सकता है।  गलती हो जाने पर उसे स्वीकारने और सुधरने का माद्दा भी गायब ही हो गया है।  आज प्यार से ज़्यादा ज़रूरी जीवन शैली और स्टेटस है।  'थोड़ा है थोड़े की ज़रूरत है' कहने वाले या अपने दम पर सब कुछ पाने का विश्वास शायद इस पीढ़ी के मूल्यबोध में ही नहीं है तभी तो शोभा डे जैसी आधुनिक महिला भी यह कहती हैं कि इक्कीसवीं सदी में अरेंज्ड मैरिज का अर्थ व्यवहारिकता और सुविधा से अधिक कुछ भी नहीं है।  वे इसे परफेक्ट सोलुशन कहती हैं जो सबको 'सूट' करता है।  ऐसे बहुत से लोग यह कहते हुए भी ज़रूर मिलेंगे कि यह चुनाव का मसला है लेकिन चुनाव की स्वतंत्रता के साथ यह सवाल हमेशा जुड़ा रहेगा कि किसका चुनाव? कैसा चुनाव? क्या चुनाव के नाम पर पिछड़े, संकीर्ण और पीछे धकेलने वाले मूल्यों की वकालत करना मुनासिब होगा?   
 

3 comments:

किरण said...

har tabke mein ye beech ka rasta khatrnaak hota ja raha hai..sahi kaha ki aaj ke samaj mein sabhi ko sab kuch chahiye...sath mein aadarsh bane rehne ka sukh bhi..shyad isiliye virodh ko swar kuch halka hota ja raha hai...tay khud hi karna hoga.








किरण said...

har tabke mein ye beech ka rasta khatrnaak hota ja raha hai..sahi kaha ki aaj ke samaj mein sabhi ko sab kuch chahiye...sath mein aadarsh bane rehne ka sukh bhi..shyad isiliye virodh ko swar kuch halka hota ja raha hai...tay khud hi karna hoga.








Kishore kumar said...

मेरे भी कई परिचित हैं जिन्होंने भौतिक लाभ के लिए arranged marriage की .....कई को तो बाद में अपने साथी से "प्यार " हो गया कई प्यार तलाश में भटकते ही रहे -kishore

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