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Sunday, November 8, 2015

मारिसा मायेर का मातृत्व अवकाश

-अंजलि सिन्हा

अमेरिकी मूल की बहुदेशीय कम्पनी याहू की सीईओ मारिसा मायेर इन दिनों गर्भवती है तथा दिसम्बर में वह अपनी जुडवा बेटियों को जन्म देनेवाली  है। अभी वह अपनी कम्पनी के काम में जितनी व्यस्त हैं उसकी खूब प्रशंसा उन्हें प्राप्त हो रही हे। उन्होंने इसके पहले की  खबरों में यह भी बताया था कि जिस समय उन्होने याहू की नौकरी जॉइन की थी तब भी वह गर्भवती थी और नौकरी के दौरान ही उन्होंने अपले पहले बेटे का जन्म दिया था। अपने इण्टरव्यू में उन्होंने यह बात साफ तौर पर पहले ही बता दी थी, लेकिन  अच्छी बात यह रही कि इससे उनकी नियुक्ति पर कोई फरक नहीं पडा और अपने पद पर करते हूए वह याहू को सबसे अधिक मुनाफे कमाने वाले दौर में ले गयी।    

 ताजे ख़बर के मुताबिक इस बार के मातृत्व अवकाश के सन्दर्भ में उन्होंने पहले ही घोषणा की है कि वे सिर्फ दो हफते की छुट्टीपर जायेगी। पहली जचगीकृ/डिलीवरी/ में भी उन्होंने दो हफ्ते की ही छंुटृी ली थी लेकिन इस मुददे पर चर्चा और बहस इस बार अधिक है। यू  टयूब की सीईओ  सुजेन वोजकिकी नेे भी मारिसा के विचार से सहमति  जताते हुए कहा है कि उन्होंने भी अपने बच्चे के जन्म के बाद 14 सप्ताह की  छुट्टी ली थी। वैसे इस मसले का विश्लेषण कुछ मुद्दों को ध्यान में रखकर करना होगा। मारिया के इस सीमित अवकाश को लेकर यह बहस भी चल पड़ी है कि कहंीं इसके चलते माइक्रो मैटर्निटी लीव अर्थात  गर्भावस्था हेतु संक्षिप्त छुटटी की बात न अधिक स्थापित हो। कहा यह जाए कि कम्पनी की बॉस अगर इतनी कम छुटटी में काम  चला सकती है तो फिर क्या बाकी कर्मचारियों को उनके नक्शे कदम पर नहीं चलना चाहिए। यह भी सवाल एक तबके से उठ रहा है कि सीईओ की अपनी जिम्मेदारियां निभाने  के आग्रह  के चलते कहीं मां होने के अपने कर्तव्य से, अपनी प्राथमिकता से वह अन्याय तो नहीं कर रही हैं ?                                                                                                        
दरअसल मसला यह है कि अन्य सभी कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अवकाश के सन्दर्भ में मारिसा की पहल को कैसे देखा जाय तथा इस घोषणा का मालिकों. .एम्पलोयर्स तथा महिला कर्मचारियों पर क्या असर पडेगा ?  

पहली बात यह कि मारिसा मायेर की स्थिति तथा साधारण कर्मचारियों की स्थिति में बहुत अधिक अन्तर है। सम्पन्न तथा उच्चवर्गीय महिला को भी मारिया जैसी सुविधाएं नही होंगी तो मध्यम तथा निम्नवर्गीय महिलाओं कोे वह कहां से मिलनेवाली हैं ! 

दूसरा मसला यह है कि मातृत्व अवकाश का मसला औरत के हक के रूप में स्थापित करने को बहुत लम्बा समय लगा है और लम्बे संघर्ष के बाद  स्वीकार हुआ है वह भी अभी ठीक से लागू नहीं हो सका है। सरकारी नौकरियों को छोड कॉर्पोरेट जगत तथा निजी क्षेत्रा के रोजगारो में यह सुविधा नहीं मिलती या जहां थोडी मिलती है. जहां वह प्रावधान है वह भी ठीकसे लागू नहीं होता है। जहां प्रावधान है भी वहां बचने के तरीके इजाद किये गये हैं। मीडिया में लम्बे समय से काम कर रही मित्रों का अनुभव बताता है कि अगर कोई कर्मचारी गर्भवती है तो उसे संकेत यही दिया जाता है कि वह या तो नौकरी छोड़े या उसमें ब्रेक कबूल करे।
दिल्ली विश्वविद्यालय में यह नहीं कहा जाता कि जो एडहॉक टीचर/ कर्मचारियों को माातृत्वं अवकाश नहीं मिलेगा, लेकिन नियम है कि चार माह की बिना ब्रेक की सर्विस के बाद  यह सुविधा मिलेगी  जबकि एडहॉक नियुक्ति  इसके पहले ही ब्रेक करके पुनर्नियुक्ति होती है ! दुनियाभर में  इस पर अध्ययन तथा शोध हुआ है कि जन्म के कुछ समय बाद तक बच्चे को स्तनपान  तथा अन्य देखरेख साथ ही मॉं को भी थोडा आराम चाहिए.

इस काम को जिम्मेदारी की श्रेणी में भी रखा गया है कि बच्चा पैदा करना एक प्रकार की प्राकृतिक प्रक्रिया है तथा सामाजिक जिम्मेदारी भी इसलिये इसका खामियाजा सिर्फ औरत के हिस्से में न आकर पूरा परिवार, समाज तथा सरकार सभी उठाएं। हमारे  जैसे समाजों जहॉं घरेलू जिम्मेदारियॉ महिलाओं के हिस्से में अधिक है वहां बच्चों को पालना सिर्फ मां के कंधों पर अधिक आ जाता है, बच्चे को पैैदा करना और उसे स्तनपान कराना  तो प्राकृतिक रूपसे उसे करनाही है लेकिन बच्चे की अन्य जरूरतें पूरी करना भी स्वाभाविक रूपसे उसी पर थोपा जाता है। ऐसे में ठीक  छुट्टी न मिले तो नौकरी छोडने का विकल्प केवल बच जाता र्है।

इस मसले का दूसरा पहलू यह है कि यदि हम अपने देश की बात करें तो दो एकदम उल्टी स्थिति एक साथ मौजूद है। एक तरफ मातृत्व का बहुत महिमामण्डन होता है तथा उसे सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। जो औरत मां न बनें वह सही औरत के गुणसम्पन्न नहीं है, यह दावा किया जाता है। मां का दर्जा फिल्मों, कहानियांे से लेकर नीति-रीति सबमें प्रधान उच्च दर्जा प्राप्त है, वहीं दूसरी तरफ मांए जचगी के दौरान मरने के लिए अभिशप्त हैं। मातृ शिशु मृत्यदर अभी चुनौतिपूर्ण बना हुआ है। बच्चा पैदा होने के दौरान तथा बाद में देखभाल तथा इलाज के अभाव के कारण   तमाम माताआंे एवं शिशुओं को जान गंवाना पड़ता है।
अन्त में, मारिसा के बहाने एक बात महत्वपूर्ण है जिसपर चर्चा होनी चाहिये । बच्चा पेैदा करना एक स्वााभाविक और सामान्य कार्य है जिसे हजारों सालों से  जबसे मानवतां का विकास हुआ महिलाओंने किया है। यानि नौकरी देने में यह बाधक तत्व नही है।ं अगर याहू तथा यू टयूब का कोेई नुकसान नही हुआ तो  बाकी जगह भी  काम बिना प्रभावित हुए तथा उसकी भरपाई करते हुए बच्चे पैदा हो सकते है और पल बढ सकते है। इसमंे पिता के सहयोग के साथ सरकारी नीति दुरूस्त होनी चाहिए  तथा साथहि  महिला कर्मचारी को भी यह मानसिक तैयारी करनी है कि उसे अवसर छोड़ना नहीं है और एक कर्मचारी के रूपमें अपनी जिम्मेदारीे पूरी करके साबित करना है कि उसे सुविधा किसी खैरात के रूप में नहीं मिलती है। कुछ मोर्चे को ठीक कर लिया जाय  तो मातृत्व कोई अजूबा या मुश्किल नहीं होगा ।       


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