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Tuesday, March 3, 2015

स्त्रियों की आज़ादी के प्रबल पक्षधर -जॉन स्टुअर्ट मिल

 ----रूपाली सिन्हा   

(जॉन स्टुअर्ट मिल 19 वीं सदी के उन महान दार्शनिकों और विचारकों में से थे जिन्होंने स्त्री मुक्ति का ज़ोरदार समर्थन किया।  जीवन के अंतिम समय तक वे स्त्रियों के अधिकारों के लिए होने वाले संघर्षों और आंदोलनों को समर्थन देते रहे। )    




                 जॉन स्टुअर्ट मिल एक प्रसिद्द राजनीतिज्ञ, दार्शनिक तथा अर्थशास्त्री थे।  उनका समय यूरोप में जनवादी क्रांतियों के दौर का समय था, जिन्होंने उनकी विचारधारा को गहराई तक प्रभावित किया। मिल का मानना था कि पूँजीवाद की "कमियों" को दूर कर उसे जान कल्याणकारी बनाया जा सकता है। उनकी विचारधारा मानवतावाद,उदारवाद और आदर्शवाद का मिश्रण थी। अपने गहरे मानवीय सरोकारों के चलते उन्होंने अपने देश में चल रहे दासता विरोधी संघर्ष का ज़बरदस्त समर्थन किया।  मिल लम्बे समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी में कार्यरत रहे। 1865-68 तक वे हाउस ऑफ़ कॉमन्स के सदस्य रहे। वे एक लोकप्रिय जन नेता थे। अन्य नागरिक अधिकारों के साथ-साथ मिल स्त्रियों के अधिकारों के प्रति आरम्भ से ही जागरूक थे तथा उनके आंदोलनों को समर्थन देते थे। अपनी संसद सदस्यता के दौरान ही सन 1867में  उन्होंने स्त्रियों के मताधिकार का प्रस्ताव रखा था जो पारित नहीं हुआ। उन्होंने 'दी सब्जेक्शन ऑफ़ वीमेन'  1861 में लिखी जो 1869 में जाकर प्रकाशित हो पाई। इस पुस्तक ने पूरे यूरोप में स्त्री आंदोलन को नई ऊर्जा और गति दी। पुस्तक में मिल ने पुरुषप्रधान समाज तथा स्त्रियों के प्रति स्थापित मान्यताओं, रूढ़ियों तथा विधि-निषेधों की तर्कपूर्ण कड़ी आलोचना की। 
 
              स्त्रियों पर पुरुषों का वर्चस्व ऐसा सार्वभौम मत है जिसकी जड़ें मजबूती से भावनाओं में जमी हैं, इस तरह यह जनसमूह की भावना से संघर्ष है। जो लोग इस संघर्ष में शामिल होते हैं उनकी सुनवाई भी नहीं होती , वे धारा के विरुद्ध तैरने वाले लोग होते हैं।  मिल ने बार -बार भावना के स्थान पर तर्क को प्रमुखता दी। " हमने तर्क के स्थान पर नैसर्गिक स्वभाव का देवत्वीकरण कर दिया है, और हम उस तत्व को नैसर्गिक स्वभाव कह देते हैं, जो हममें है लेकिन हमें उसका तार्किक आधार नहीं मालूम। "  परंपरा और रिवाज़ों के प्रति आलोचनात्मक रवैया रखने वाले मिल का मानना था कि कई बार परंपरा, रिवाज़ की व्यापकता यह प्रभाव छोड़ती है कि वे सकारात्मक उद्देश्यों के लिए हैं। स्त्री को पुरुष के अधीन मानाने का रिवाज़ ऐसा ही रिवाज़ है, लेकिन ऐसी स्थिति में यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि यदि अन्य किसी व्यवस्था को कभी परखा ही नहीं गया तो वर्तमान को  श्रेष्ठ कैसे मान लिया जाये? वे इतिहास का हवाला देते हुए बताते हैं कि दास प्रथा के अंतर्गत पुरुषों की दासता तो ख़त्म हो गई लेकिन स्त्रियों की दासता को धीरे-धीरे नरम  निर्भरता में बदल दिया गया। मिल की मान्यता थी कि ताकत या बल का नियम अब राष्ट्रों के बीच भी काम नहीं करता लेकिन आज भी सामाजिक संस्थाएं बल के आधार पर टिकी हुई हैं, जिनमे परिवार भी है जहाँ पुरुष को यह बल स्वतः हासिल हो जाता है। परिवार में पुरुष की सत्ता की यह स्थिति काफी भिन्न और जटिल प्रकार की है। परिवार में सत्ता प्राप्त पुरुष को अपने विरुद्ध कार्यवाही रोकने की अधिक सुविधाएं प्राप्त हैं क्योकि उस परिवार की स्त्री से उसके अंतरंग सम्बन्ध हैं। उस स्त्री में अपने मालिक को नाराज़ न करने की प्रबल भावना रहती है। अब तक कोई भी ऐसी सत्ता नहीं रही है जिसके स्वामी को वह अस्वाभाविक लगे, इसीलिए पुरुषों को भी उनकी सत्ता जायज़ और न्यायसंगत लगती है। 
 
     मिल बहुत से उदाहरणों द्वारा यह  हैं कि सामाजिक-प्राकृतिक कारण मिलकर यह असंभव कर देते हैं कि महिलायें संगठित तौर पर पुरुषों की सत्ता का विरोध कर सकें।  वे इस अर्थ में अन्य पराधीन वर्गों से अलग स्थिति में हैं। पुरुष महिलाओं की आज्ञाकारिता के साथ उनकी भावनाएं भी चाहते हैं, वे उसे स्वेच्छा से बना हुआ दास देखना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने शिक्षा का भरपूर इस्तेमाल किया।  स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा ऐसी होती है, जिसमे उन्हें यह सिखाया जाता है कि उनके नारी सुलभ गुण त्याग,बलिदान,सेवा भावना, आज्ञाकारिता हैं। स्त्री के जीवन को पूरी तरह पुरुष पर निर्भर बना दिया जाता है जिसमे वह अपना सम्मान,महत्वाकांक्षा या अन्य सभी चीज़ें पति के माध्यम से ही प्राप्त करती है या पाने की कोशिश करती है। इस प्रकार स्त्री की शिक्षा और उसके चरित्र-निर्माण के द्वारा उसे मानसिक रूप से ऐसा गुलाम बना दिया जाता है जिसके केंद्र में एक पुरुष रहता है। 
    मिल के अनुसार सभी देशों में समाज द्वारा महिलाओं के लिए एक ही उद्देश्य निर्धारित किया गया है-विवाह।  इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए उनका लालन-पालन तदनुसार किया जाता है। स्त्री की पुरुष पर निर्भरता पुरुष के वहशी स्वभाव को बढ़ावा देती है और उसे यह अधिकार देती है कि वह औरत का इस्तेमाल अपने सुख के लिए किसी भी प्रकार करें। परिवार औरत के लिए सहानुभूति,कोमलता,आज्ञाकारिता का केंद्र है तो पुरुष के लिए हठधर्मिता,दबंगपन और स्वार्थ का। सामाजिक प्रचलन पुरुष को एक स्त्री पर असीमित सत्ता देता है।  एक शीलवान और कुलीन महिला तथा एक बुरी और हठीली महिला की परिभाषाएं तथा चरित्र भी यह समाज ही तैयार करता है। मिल का मानना है कि समानता समाज की स्वाभाविक अवस्था है।  आवश्यकता है कि आदेश और आज्ञाकारिता की नैतिकता के स्थान पर न्याय की नैतिकता स्थापित की जाये। परिवार भी बच्चों के लिए आज्ञाकारिता और माता-पिता के लिए आज्ञा देने की पाठशाला न रहे बल्कि बराबरी और सहानुभूति की पाठशाला बने। 
 
  मिल  पर भी ज़ोर दिया कि महिलाओं का अपनी संपत्ति पर अधिकार होना चाहिए। आज्ञाकारिता के बोझ तले दबी औरत तभी मुक्त हो सकती है जब वह आर्थिक रूप से भी स्वतंत्र हो। औरतों को घरेलू इसीलिए बनाया जाता है ताकि उनकी अधीनता कायम राखी जा सके। वे उदाहरण देते हुए कहते हैं कि महिलाओं ने यह साबित किया है कि वे सभी उन कार्यों को करने योग्य हैं जिन्हे पुरुष करते हैं।  आधी मानव जाति पर कुछ कार्यों को करने का निषेध लगाना अन्याय है। महिलायें स्वतंत्र होंगी तो पूरी मानव जाति की स्थिति बेहतर होगी।  लगभग आधी मानव जाति की क्षमता और योग्यता का उपयोग न हो पाने से दुनिया को गंभीर नुकसान हो रहा है।  क्षमता की इस राशि  बड़ा भाग गृहस्थी की व्यवस्था में लगा हुआ है।  इसके लिए मिल महिलाओं के पालन-पोषण  विशेष ध्यान देने पर ज़ोर देते हैं ताकि वे भी कारोबार,चिंतन तथा अन्य मामलों को समझने में सक्षम हों।  तभी वे दूसरों की इच्छा के अधीन जीवन और बौद्धिक स्वतंत्रता के जीवन के फर्क को समझ पाएंगी।  निश्चित रूप से इसमें निजी ख़ुशी और संतोष भी शामिल हैं। 
 
  मिल सदियों पुरानी पुरुष वर्चस्ववादी व्यवस्था की कटु तथा तर्कपूर्ण आलोचना प्रस्तुत करने के साथ ही उसके टूटने की प्रक्रिया को लम्बी मानते थे और ये भी कहते थे कि पुरुषों को भी स्त्रियों के इस आंदोलन का हिस्सा बनना होगा तभी व्यापक बदलाव संभव है। मिल की सीमायें उनके काल की सीमायें थीं। मुख्यतः वे एक सुधारवादी थे लेकिन स्त्री विषय पर उनके विचार उस समय तो क्रन्तिकारी थे ही, लगभग दो सौ सालों बाद भी प्रासंगिक हैं। ये स्त्री प्रश्न के दार्शनिक और राजनीतिक धरातल के साथ-साथ व्यवहारिक धरातल पर भी काफी कुछ सोचने-समझने की दिशा देते हैं।   

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