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Tuesday, March 10, 2015

पत्नी और मां का त्याग तथा 8 मार्च का सन्देश


-अंजलि सिन्हा

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस का उत्सव बीता। वह किसी के लिए उत्सव था, किसी के लिए पी आर (पब्लिक रिलेशन) करने का मौका था, किसी के लिए घर में यह कहने का मौेेका था कि कम से कम आज बख्श दो आज महिला दिवस है, तो कार्पोरेट सेक्टर के लिए भी अपने अपने प्रॉड्क्टस के प्रचार में स्त्राी मुक्ति का तड़का लगाने का और महिलाओं को आकर्षित करने के लिए छूट देने का ऐलान करने का मौका था।

मगर इतनाही नहीं था। काफी बडी संख्या मं महिलाओं तथा कई संगठनों ने इस दिन को संघर्ष और संकल्प दिवस के रूप में भी मनाया, आने वाले समय के महिला मुद्दों पर अपनी प्रतिबद्धता दुहराई और अतीत केेेे गौरवशाली इतिहास को याद किया।



8 मार्च के बारे में तथा महिलाओं के मुद्दों के बारे में जो समझ और जानकारी हमारे नेताओं को है उससे कम से कम यह तो कहा जा सकता है कि वे आधी आबादी के लिए न्याय, बराबरी तथा प्रगति की दिशा में नीतिगत स्तर पर बहुत कुछ नहीं दे पायेंगे, पर भावनात्मक स्तर पर जरूर अपील करेंगे कि उन्हंे सम्मान दिया जाय तथा परिवार और देेेश के लिए उनके योगदान को सराहा जाय। लेकिन समान अवसर, समान भागीदारी तथा पितृसत्ता की समूल समाप्ति की दिशा में वे कुछभी बोलने की स्थिति में नहीं होते।

इस बार अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर कुछ नेताओंने क्या कहा उसे समझने का प्रयास करें, तो बात अधिक स्पष्ट हो सकती है। केन्द्रीय गृहमन्त्राी राजनाथ सिंह जो कि पुलिस द्वारा आयोजित महिला दिवस के कार्यक्रम में बोल रहे थे - वही पुलिस महकमा जिसकी जिम्मेदारी बनती है सार्वजनिक दायरे को सुरक्षित बनाना - उन्हांेने कहा कि मैं आज जो कुछ भी हूं अपनी मां और पत्नी के कारण हूं। उन्होंने कुछ किस्से भी सुनाये कि जब वह आपातकाल में जेल में थे तो इन दोेेेनों ने घर सम्हाला था।  इसी तरह दिल्ली के मुख्यमन्त्राी  अरविन्द केजरीवाल ने भी इस अवसर पर अपनी मां और पत्नी के त्याग और योगदान का बखान करते हुए कहा कि मैं जो कुछ भी हूं, उन्ही के कारण हूं। दरअसल यह त्याग तो महिलाएं सदियों से  कर ही रही हैं और उनके दम पर पुरूष आगे बढ़ते ही रहते हैं, इसमें नया कुछ भी नहीं है। यदि ये लोग अपने दम पर अपनी मांओं और पत्नियों को समाज में बाहर आकर कुछ कर डालने के लिए कुछ त्याग या सहयोग कर पाये हुए होते और उसकी बात सुनाते तो बात महिला दिवस के मौके की बन पाती।
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                 उधर देश के प्रधानमन्त्राी जब-तब अपनी मां से आशीर्वाद लेने पहुंच जाते हैं। क्या देश में ढेरो  मांएं जवानी या बुढ़ापे मे अपनी भूमिका त्याग करके रात-दिन अपने पति-बेटो को सिंहासन पर भेजने के लिए या आशीर्वाद देते रहने की भूमिका चाहती हैं ? क्या वह यही चाहती हैं कि उनके त्यागोेेे का बखान होता रहे और चौतरफा जयजयकार के शोेेेर में उनके हाल से समाज बेखबर बना रहे या वे चाहती हैं कि बराबरी की सतह पर खडा होकर प्रश्न पूछने का हक ? और अपने पतियों और बेटों से कहना चाहती हैं कि मिल के त्याग भी करेंगे और मिलके आगे भी बढेंगे। वे निजी दायरे और सार्वजनिक दायरे को स्त्राीपु़रूषों के बीच की विभाजक रेखासे बांटना नहीं चाहती। वे चाहे गृहमंत्राी, मुख्यमंत्राी तथा अन्य ऐेेसे तमाम मंत्राी एवम् नेता तथा अन्य गणमान्यों जो पद एवं प्रतिष्ठा के स्थानों पर विराजमान हैं उनसे यह जानना भी चाहती हैं कि आखिर अब तक समाज में सभी  क्षेेत्रों में बराबरी के अवसर के लिए ऐसी नीतियां क्यों नहीं बनीं तथा ऐसे प्रोत्साहन एवम् छूट क्यां नहीं दिए गए कि सभी महिलाएं सार्वजनिक दायरे तथा विभिन्न कार्यस्थलों पर समान अवसर पा सके ?

उधर राष्ट्रपति महोदय ने  कहा कि बिना महिलाओं का सम्मान किए देश का सम्मान नहीं बढे़गा। तो क्या यही माना जाए कि वे परिवार की इज्जत हैं, त्यागमयी ममतामयी बहन-पत्नी-मां हैं, देेेेश का सम्मान हैं, लेकिन समान हकों से लैस बराबर की नागरिक नहीं हैं. वह ऐसी व्यक्ति नहीं हैं जो खुद अपने जीवनसाथी अपना कैरियर या अन्य कई मुद्दों पर स्वयम् फैसला ले सकें।

खतरा इस बात का दिख रहा है कि अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस कहीं एक और त्यौहारी दिवस न बन जाये। इधर बीच संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर या अन्य संगठनों की पहल पर जिन ‘दिवसों’ को मनाने की बात चलती रहती है और मौका देखते हुए कॉर्पोरेट सेक्टर भी उसमें कूद जाता है, वैसे दिनों में वह परिणत न हो जाये। महिलाओं की स्थिति में जो सकारात्मक परिवर्तन हुए है तथा संघर्षों और बदलाव के प्रयासों में आधी आबादी ने जो हासिल किया है उसकी खुशी तो अवश्य मनायी जानी चाहिए और 8 मार्च भी ऐसा दिन है जब हम अपनी उपलब्धियों पर प्रसन्न हों, लेकिन यह खुशी किसी पारम्पारिक त्यौहार की खुशी नहीं है।

यह समझना नितान्त आवश्यक है कि जिस दिन को हम अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाते हैं, वह दिन कामगार महिलाओं के हक के लिए लड़ी गयी एक अहम लड़ाई को याद करने का दिन है। और जब इस दिन को महिला दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव आया तो वह भी एक ऐसी मुहिम थी जो अमीरी और गरीबी की खाई को खतम कर समानता पर आधारित समाज बनाने की मुहिम का हिस्सा थी। बेहतर दुनिया बनाने की इस जद्ोदजहद की बीच महिलाएं भी समान हक वाली इन्सान तथा नागरिग बने,  यही प्रेरणास्त्रोत था इस दिन के लिए। इसलिए महिलाओं को त्यागमयी पत्नी, बहन, मां, बेटी के भ्रमजाल से निकलना है तथा उन्हें स्वतंत्रा उपभोक्ता बनने तक सीमित करने के बाज़ार द्वारा रचाये जा रहे भ्रमजाल  को भी ठीक से पहचानना है। उनके सामने यह चुनौती है कि वह इस भ्रमजाल से निकलंे ताकि आने वाले वर्षों में हम इस दिन का नया स्वरूप उभार सके. 
                                                                                                                                                                                         

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