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Monday, February 2, 2015

सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन: क्या अब भेदभावपूर्ण रवैये का अन्त होगा ?



- अंजलि सिन्हा

इस बार गणतंत्रा दिवस परेड में तीनों सेवाओं - थलसेना, वायुसेना और नौसेना के - महिला बटालियन की हिस्सेदारी को ऐतिहासिक बताया गया। इसके महज एक दिन पहले राष्ट्रपति ओबामा द्वारा सलामी गारद के निरीक्षण के दौरान विंग कमांडर पूजा ठाकुर ने गार्ड आफ ऑनर प्रदान किया। अख़बारों में तथा विश्लेषकों ने ‘महिला शक्ति’ की इस दस्तक पर सन्तोष  जाहिर किया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने भी इस पर प्रसन्नता जाहिर की तथा इसे महिला सशक्तिकरण के लिए अहम बताया। यह मालूम नहीं कि राष्ट्रपति ओबामा को यह पता था या नहीं कि सेना में वहां तक भी जगह पाने के लिए महिलाओं ने संघर्ष किया है तथा वह अभी भी स्थायी कमीशन के लिए कानूनी जंग लड़ रही हैं।

गणतंत्रा दिवस परेड के बाद सेनाप्रमुख जनरल सिंह ने परेड में हिस्सा लेनेवाली सेना के पूरे महिला दस्ते के महिला अधिकारियों के लिए चाय पार्टी रखी थी। उपरोक्त पार्टी में सेनाप्रमुख ने जानकारी दी कि सेना की तरफ से रक्षा मंत्रालय को एक प्रस्ताव भेजा गया है कि सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के लिए उनकी सेवा शर्तों में बदलाव किया जाए। अगर रक्षा मंत्रालय सहमति देता है तो स्थायी कमीशन मिलने के बाद महिला अधिकारी सेना की सभी शाखाओं में पूर्णकालिक सेवाएं दे पाएंगी। फिलहाल सेना में महिला अधिकारियों की नियुक्ति शार्ट सर्विस कमीशन के तहत होती है जिसकी अधिकतम अवधि 14 साल होती है, जबकि पुरूष अधिकारी 5 साल की सेवा के बाद स्थायी कमीशन के पात्रा हो जाते हैं।



अभी इस बात का कयास लगाना मुश्किल है कि क्या रक्षा मंत्रालय इसके बारे में अपनी सहमति प्रदान करेगा या नहीं, वैसे अभी तक के अनुभव को देखते हुए लगता है कि इस सम्बन्ध में न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। याद रहे कि सेना में महिलाओं के साथ जारी भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में एक कदम बढ़ाने में उच्च अदालत को ही आगे आना पड़ा था, भले हमारे संविधान के अनुच्छेद 15 जहां जेण्डर और जातिभेद का निषेध करता है तो अनुच्छेद 19 बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक को कोई भी पेशा चुनने का हक भी देता है।

सन 2003 में महिला अधिकारियों द्वारा डाली गयी याचिका - जिसका फोकस सेना में महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव पर था - पर दिल्ली उच्च अदालत ने मार्च 2010 में फैसला सुनाया था। उसने अपने फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा था कि ‘ऐसा कोई कारण नहीं है कि बराबर और समर्थ महिलाओं को पुरूषों के बराबर स्थायी कमीशन का हकदार न माना जाए। यह कोई खैरात नहीं बल्कि महिला अधिकारियों द्वारा मांगे गए संवैधानिक अधिकारों को लागू करना है।’ प्रस्तुत निर्णय के बाद भले ही नौसेना और वायुसेना ने महिला अफसरों के लिए स्थायी कमीशन के दरवाजे खोले थे, मगर थलसेना ने अलग रूख अख्तियार किया था। यह कहा गया कि उन्हंे युद्धक भूमिका सौंपने से पहले उस ग्रामीण पृष्ठभूमि का खयाल रखना होगा जहां से ज्यादातर पुरूष सैनिक आते हैं। यह सवाल उठाया गया कि ‘युद्ध की स्थिति में वह सभी लोग एक महिला अधिकारी के निर्देशों का कैसे पालन कर सकेंगे ’? दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय में दायर शपथपत्रा में सेना की तरफ से यह बात भी जोड़ी गयी कि ‘‘सिद्धान्त में थलसेना में महिलाओं की मौजूदगी अच्छी दिख सकती है मगर व्यावहारिक सन्दर्भ में देखें तो भारतीय सेना में वह काम नहीं कर सकी है और एक अवधारणा के तौर पर भी हमारा समाज युद्धक भूमिकाओं में महिलाओं को देखने को तैयार नहीं है।’



क्या यह प्रतिप्रश्न नहीं किया जाना चाहिए कि सेना अपने कर्मचारियों की मानसिकता बदलने का प्रयास क्यों नहीं करे। यह तो फिर से वही तर्क है जो आम समाज में भी दिया जाता रहा है कि बाहर असुरक्षा है या अपराधी पुरूष हैं इसलिए महिलाएं या तो अपनी सुरक्षा का इन्तजाम खुद करें या घर पर ही रहें। ध्यान देनेयोग्य बात है कि महिलाओं को सेना में प्रतिनिधित्व देने के मामले में या उन्हें युद्धक भूमिका के लिए भेजने के मामले में हमारे कई पड़ोसी मुल्क काफी आगे हैं। पाकिस्तान की हवाई सेना में सात महिला फाइटर पायलटस हैं, श्रीलंका और बांगलादेश में भी महिलाओं को नौसेना के युद्धक पोतों में तैनात किया जाता है।

मालूम हो कि सेना में 1992 से महिलाओं को अन्य क्षेत्रों में भरती के दरवाजे खोले गए थे। इसके पहले 1943 में डॉक्टर के पद पर भरती के लिए उनके लिए दरवाजे खोले गए थे तथा 1927 में नर्सिंग के पदों के लिए महिलाओं की पहली नियुक्ति हुई थी। अभी भी सेना में पुरूषों की तुलना में महिलाओं का अनुपात बराबर होने में काफी दूरी है। सेना में मेडिकल तथा नर्सिंग सहित सिर्फ 11 फीसद का प्रतिनिधित्व है तो वायुसेना में 7.30 फीसद तथा नौसेना में 3.45 फीसद है। अर्थात कानूनी बराबरी के साथ अन्य प्रयास भी सरकार तथा सेना क्षेत्रा को करने होंगे ताकि महिलाओं की संख्या अधिक हो सके और पुरूषों के समानुपातिक बने। यह इस वजह से भी जरूरी है कि हम अक्सर ऐसे उदाहरणों से रूबरू होते हैं जहां दिखता है कि सेना के सभी क्षेत्रों में संख्याबल के हिसाब से ही नहीं बल्कि एक वातावरण के तौर पर घोर पुरूषवादी मानसिकता तथा वर्चस्व मौजूद है, जो काम करनेवाली महिलाओं के लिए असहज स्थिति पैदा करती है। विगत कुछ सालों में सेना के विभिन्न अंगों में कार्यरत महिला अधिकारियों द्वारा अपने सहकर्मियों या वरिष्ठों के खिलाफ यौन प्रताडना की शिकायतें भी दर्ज की गयी हैं, जिसमें कई मामलों में सेना को ऐसे उत्पीड़क अधिकारियों को दण्डित भी करना पड़ा है।

अगर हम स्त्राी पुरूष समानता के प्रिजम से देखे तो ऐसे सुधारों को अंजाम देने के लिए सेना सबसे अग्रणी इकाई हो सकती है जहां लगातार पुरूषवादी भाषा बोली जाती है, दुश्मन को ललकारने के लिए, खुद को शक्तिशाली तथा सक्षम बताने के लिए ऐसा मर्दवादी आक्रामक माहौल गढ़ा जाता है।







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