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Wednesday, January 21, 2015

सुन्दरता का मिथक


-अंजलि सिन्हा

गुजरात के वारछा स्थित गंगबा विद्यालय की 5 वीं कक्षा की छात्रा 12 वर्षीय प्रेक्षा कापड़ा ने कीटनाशक पीकर आत्महत्या कर ली। उसे उसके सहपाठी मोटी कह कर चिढ़ाते थे जिसके बारे में उसने अपने माता पिता को बताया था। ऐसी ही ख़बर कुछ समय पहले गाजियाबाद से आयी थी कि छठवीं एक छात्रा ने आग लगा कर इसलिए आत्महत्या कर ली क्योंकि उसे लगता था कि वह काली है।

आखिर इन छोटे बच्चों के मन में यह पैमाना कैसे बन गया कि मोटे होना चिढ़ाने की बात हो सकती है या काली होने से किसी के व्यक्तित्व में कमी होती है। ध्यान देने लायक बात है कि यह सिलसिला महज भारत तक सीमित नहीं है, जैसे लन्दन से प्रसारित इस ख़बर ने उजागर किया था जहां 13 साल की एक स्कूली छात्रा ने अपने सहपाठियों द्वारा बदसूरत कहे जाने पर आत्महत्या कर ली थी। वहां पर भी किए गए अध्ययन में देखा गया कि सुन्दरता की ग्रंथि से दुखी होकर आत्महत्या की राह चुननेवाली या अपने आप को नुकसान पहुचानेवाली लड़कियों की संख्या में इधर बीच तेजी से इजाफा हो रहा है।



मामला महज इधर उधर से प्रसारित ख़बरों तक सीमित नहीं है, ऐसे अध्ययन भी सामने आ रहे हैं जो समस्या की व्यापकता को उजागर करते हैं। कुछ समय पहले दिल्ली के एक प्रतिष्ठित अख़बार (हिन्दुस्तान टाईम्स) ने भी इस बात पर एक रिपोर्ट दी थी और बताया था कि किस तरह किशोरियों में ‘परफेक्ट शरीर’ बनाने के चक्कर में क्षुधा अभाव की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। रिपोर्ट का कहना था कि पतला/छरहरा/कृशकाय होने के लक्ष्य की पूर्ति के लिए लड़कियां खुद को लगभग भूखा रखती हैं। पत्राकारों ने दो स्कूलों के जिन पांच सौ लड़कियों से बात की उनमें से 33 फीसदी ने कहा कि उनका आदर्श वे छरहरे मॉडल या फिल्मअभिनेत्रियां हैं। अमेरिका के फ्लोरिडा विश्वविद्यालय ने प्रीपरेटरी स्कूलों में लड़कियोें पर एक शोध किया था, जिसमें पाया गया कि तीन साल की उम्र से बच्चियां अपनी फिगर, काया और वजन को लेकर चिन्तित होने लगती हैं। अध्ययन में पाया गया कि 50 फीसद बच्चियां अपनी रूपरेखा से सन्तुष्ट नहीं थी, जबकि एक तिहाई बच्चियां अपना वजन घटाना चाहती थीं। येे बच्चियां फिल्मों-कार्टूनों आदि से प्रभावित होती हैं। कल्पना करें कि इस चिन्ता का इन मासूमों के समग्र शारीरिक और मानसिक विकास पर कितना बड़ा प्रभाव पड़ता होगा।

सोचिए जरा कि सौन्दर्य के सारे मापदण्ड कैसे तैयार हुए होंगे कि नाक ऐसा चाहिए, होंठ वैसा और आंखें नीली कि भूरी और कमर इतना चाहिए। इन्हें मापने के बाद ही तो प्रतियोगिताओं में पास फेल किया जाता है। घातक बात यह है कि इन मापदण्डों का प्रभाव सिर्फ इन्हींे तक सीमित नहीं होता है जो प्रतियोगिताओं में शामिल होने की इच्छा रखते हैं या जो मॉडलिंग की दुनिया में अपना सिक्का जमाना चाहते हैं बल्कि व्यापक मानस पर यह असर छोड़ता है और खास तौर पर कमसीन लड़कियां इसकी शिकार होती हैं।

शारीरिक बीमारियों के साथ ऐसी मानसिक बीमारियों, तनावों का जिक्र भी जरूरी है जिनका ऐसी लड़कियां/महिलायें अक्सर शिकार हो जाती हैं। किसी भी शहर के मनोविश्लेषक से बात करके यह पता किया जा सकता है कि पिछले एक दशक में किस तरह उनके पास ब्युटी क्वीन बनने का सपना पाली लड़कियों के आने का सिलसिला बढ़ा है जिसमें ऐसी लड़कियां तनाव, अवसाद या नर्वस होने के कारण नींद न आने की शिकायत लेकर पहुंचती रहती हैं। मनोविश्लेषक आप को बताएंगे कि ग्लैमर की दुनिया की अंधी दौड़ और कमजोर शरीर के महिमामण्डन ने ऐसी स्थिति पैदा की है कि आत्मछवि निखारने के नाम पर हम मानसिक बीमारों की एक फौज खड़ी कर रहे हैं।

अपनी कैलोरी जलाने के लिए लड़कियां जिस तरह डायटिंग पर जोर देती हैं वह अब दुनिया भर में चिन्ता का विषय बना हुआ है। जर्नल आफ द अमेरिकन कालेज आफ कार्डियोलोजी के एक अंक में पिछले साल इसके बारे में विस्तृत अध्ययन दिया गया था कि नियमित तौर पर डाएट/अल्पाहार करनेवाली महिलाओं के शरीर में किस तरह उच्च घनता वाला लिप्टोप्रोटीन अर्थात ‘अच्छे’ कोलेस्टोरेल की मात्रा कम पायी जाती है जो दिल की विभिन्न बीमारियों में शरीर की रक्षा करता है अर्थात कम भोजन करना एक तरह से दिल की बीमारियों को न्यौता देना जैसा ही है। इसके साथ ही उन मानसिक तनावों और बीमारियों का जिक्र भी जरूरी है जिनका ऐसी लड़कियां/महिलायें अक्सर शिकार हो जाती हैं।

सौंदर्य को लेकर एक ऐसा जंजाल खड़ा कर दिया गया है कि उसको भेदना मानो असम्भव लगता है। नित नए प्रसाधनों का प्रचार तथा कथित रूप से सुन्दर बनने की आकांक्षाएं बाजार के मुनाफे को आसमान पर पहुंचाने में लगी हैं। विश्व सभ्यता के ज्ञात इतिहास में स्त्राी को सौंदर्य के प्रतीक के तौर पर देखा जाता रहा है। एक तरफ जब ऐसे मिथकों के टूटने की बात होती है तब ऐसे समाचार हमें यह सोचने के लिए मजबूर करते हैं कि स्थितियां वाकई बदली हैं या नहीं

ब्रिटेन से ही ख़बर आयी है कि आजकल वहां महिलाओं में हाई ही जूते पहनने से होने वाले दर्द से छुटकारा पाने के लिए एक इंजेक्शन लगाने का प्रचलन बढ़ा है। इसे बोटोक्स इंजेक्शन कहते हैं जो छह माह तक दर्द निवारण का काम करता है तथा विभिन्न कास्मेटिक सेन्टर इसके लिए अच्छा खासी रकम (240 पौण्ड) वसूलते हैं। इसे फूट फीलर्स कहा जाता है। एक मशहूर फुटबॉलर की पत्नी आज कल उंची हील पहनने के कारण होने वाले दर्द से पीड़ित बतायी जा रही हैं। ख़बर यह भी है कि अपनी सुन्दरता को कायम रखने के लिए वे रोजाना ढाई घण्टे पार्लर में ही बीताती हैं।

सुन्दर बनने को लेकर बनी चिन्ताओं और उसके लिए झेलने पड़ते दर्द की इन ख़बरों में सबसे त्रासद ख़बर पिछले दिनों अर्जेन्टीना से आयी थी। अजेन्टीना की एक सुन्दरी कीे - जो मिस अर्जेन्टीना का खिताब पहले जीत चुकी थी - पिछले दिनों मृत्यु हुई। अपने शरीर को आकर्षक और सुन्दर बनाने के लिए उसने एक नहीं बल्कि कई कास्मेटिक सर्जरी करायी। इन्हीें में से एक सर्जरी उसके लिए जानलेवा साबित हुई। उसे सिर्फ कसरत और खानपान तक सीमित रहने से सन्तोष नहीं था और वह अव्वल दिखना चाहती थी इसके लिए उसने अपने पार्श्वभाग/हिप की सर्जरी करायी थी।

कहा जाता है कि अर्जेन्टीना में कास्मेटिक सर्जरी का काफी बोलबाला है और वहां सर्जरी कराने के लिए लातिन अमेरिका के अन्य मुल्कों से भी महिलाएं वहां पहुंचती हैं। निश्चित ही सुन्दर दिखना एक बात है और उसमें अव्वल निकल जाना या बाकी सभी को मात दे देना दूसरी बात है जो कि सौन्दर्य पर आधारित प्रतियोगिताओं में दिखती है। आकर्षण या आकर्षक व्यक्तित्व की इच्छा भी इससे अलग ही चीज होती है जो इस देह केन्द्रित मानसिकता से फरक होता है।

यही नहीं पुरूष भी अपनी प्रेमिका, पत्नी या पार्टनर में वही सौन्दर्य तलाशने लगता है। हम सहज अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि इसमें कितना पैसा और समय तथा ऊर्जा बरबाद होती होगी। विशेषतः हमारे जैसे पितृसत्तात्मक समाजों में जहां कि महिलाओं को राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक आदि क्षेत्रों में बराबरी नहीं मिली है, जहां उन्हें अभी न्याय और बराबरी के लिए बहुत संघर्ष करना है तथा बहुत जद्दोजहद इस बात के लिए करनी है कि उनके हुनर, काबलियत और क्षमता को भी तवज्जो मिले, उन्हें बराबर का अवसर तथा हक मिले। इसके बजाय यदि सारा ध्यान खुद के शरीर पर केन्द्रित हो जाएगा तो पितृसत्ता की जीत है इस सोच में। क्योंकि पुरूषप्रधान मानसिकता का एक प्रमुख तत्व यह है कि औरत का देह ही सबकुछ है, वह उपभोग के लिए है, सेवा देने के लिए है। झगड़ा सिर्फ इस बात का है कि कुछ कहते हैं कि वह सिर्फ एक के लिए है तो कुछ कहते हैं कि वह खुले बाज़ार के लिए हो और जो चाहे उसे खरीद ले। वरना तो प्रेम की उदात्त भावनाओं में और चाहत के गहरे और विशाल समन्दर में कहा कोई शरीर को नापता फिरता रहेगा। कहते हैं कि सुन्दरता तो देखने वाले की निगाहों में होती है। इन्सान यदि सौन्दर्यबोध का धनी है तो अपने ही तरह का आकर्षण लिए भी होगा और वह तो हर किसी के पास अपने तरह का ही होगा न कि बनाए हुए खांचे के अनुरूप लोग खुद को तराशने लगेंगे।
नाओमी वूल्फ अकारण नहीं कहती हैं कि एक समय मातृत्व, घरेलूपना, पतिव्रता जैसे मूल्यों की वाहक बनी पितृसत्तात्मक विचारधारा के जरिये जो सामाजिक दमन सम्भव हो पाया था उसे सौंदर्य के नये मिथक के प्रति बढ़ते सम्मोहन ने ज्यादा व्यापक, ज्यादा गहरा किया है।






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